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सिक्किम के लिए
कम लागत की जल विद्युत परियोजनाएँ
प्रकृति
ने सिक्किम को दिल खोलकर प्राकृतिक सम्पदा एवं संसाधन दिए हैं। इन
प्राकृतिक संसाधनों में जल संसाधन प्रमुख हैं। सिक्किम में सदानीरा
नदियाँ हैं, जल - प्रपात हैं जिनके मर्यादापूर्वक दोहन से राज्य की
विद्युत आवश्यकताओं की पूर्ति के अलावा राज्य के विकास को
सुनिश्चित किया जा सकता है। राज्य में विगत में और वर्तमान में कुछ
जल - विद्युत परियोजनाएँ संचालित हैं, कुछ पर काम चल रहा है और खुछ
ऐसी भी हैं, जिनके निर्माण में स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं। यह
विरोध राथोङ चू नही पर प्रस्तावित जल विद्युत परियोजना को लेकर है।
बौद्ध धर्म के लामाओं ने, चूंकि राथोङ नदी को अति पवित्र नदी
माना गया है, इसलिए इस पर जल विद्युत परियोजना के निर्माण से इस
स्थान की पवित्रता नष्ट होने और बौद्ध धर्मावलम्बियों की धार्मिक
भावनाओं पर ठोस पहुँचने का तर्क देकर परियोजना को बन्द करवाने पर
दबाव डाला जा रहा है। यह एक जानी हुई बात है कि सिक्किम सरीखे
संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में बड़े बाँध और विद्युत परियोजनाओं के
निर्माण से कई पर्यावरणीय तथा अन्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं,
हो रही हैं। राज्य सरकार को करोड़ौं की धनराशि खर्च करने के पश्चात
एक परियोजना को बन्द करना पड़ा था। अब सिक्किम में माइक्रो हाइडल
प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है जो इस दिशा में एक स्वागतयोग्य निर्णय
माना जा सकता है। सिक्किम नवीकरण ऊर्जा विकास एजेन्सी ने लघु
आकार की विद्युत परियोजनाओं के विकास के लिए तथ्यांक इकट्ठे करने
का काम शुरू किया है। सिक्किम में बहने वाली नदियों और जल -
प्रपातों से जल विद्युत उत्पादन के लिए एजेन्सी हर गाँव - बस्ती की
परिधि में स्थानीय खपत के लिए स्थानीय निकाय, जो सम्भवत:
सहकारी समितियां भी हो सकती हैं, के जरिए लघु विद्युत परियोजनाओं
के निर्माण की दिशा में कदम उठाया है। एजेन्सी ने उत्तर और पूर्व
जिले में ऐसी 13 परियोजनाओं का प्रस्ताव रखा है। 25, 40 और 100
केवी उत्पादन क्षमता की ऐसी परियोजनाओं के बारे में नवीन और नवीकरण
ऊर्जा मन्त्रालय के सल्लाहकार एन. पी. सिंह ने कहा है कि 100 केवी
क्षमता की लघु परियोजनाओं से एक गाँव और उसके जुडे क्षेत्र की
विद्युत आवश्यकता की पूर्ति होगी। सिक्किम के लिए ऐसी 13
परियोजनाओं की मंजूरी केन्द्रीय विद्युत मन्त्रालय ने दी है।
सिक्किम में पानी की कोई समस्या न होने और कठिन पर्वतीय इलाकों में
बड़ी परियोजनाओं पर अपार धनराशि खर्च होने और लघु परियोजनाओं में
बहुत कम धनराशि खर्च होने की वस्तुस्थिति के मध्यनजर ऐसी
परियोजनाओं को सिक्किम जैसे पर्वतीय इलाके के लिए उपयुक्त
समझा जाना एक अच्छी बात है।
(सितम्बर
2011)
घोटालों का देश
आजादी
के बाद के भारत की प्रगति के अनेक उजले और अंधेरे पहलू हैं। उजले
पहलू यद्यपि कम हैं, अंधेरे पहलूओं की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती
ही जा रही है। हमें आजादी मिली, लेकिन इस आजादी का सबसे बड़ा फल
राजनेताओं ने चखा है। देश के सबसे बड़े घोटाले राजनेता कर रहे हैं
और हमारे कानून के पहरेदार जेलों में उन्हें चाय - नमकीन परोस रहे
हैं। बात हाल ही में सुरेश कलमाड़ी को तिहार जेल में रहते जेल
प्रशासन के उच्चाधिकारियों द्वारा अपने कक्ष में चाय - नमकीन
परोसने को लेकर मीडिया में छनकर आई सूचनाओं से सम्बन्धित है। क्या
होगा कलमाड़ी , राजा और कजिमोनी का?
कितने राजनेताओं को आजतक ऐसी सजाएँ हुई हैं जो आने वाली नेताओं की
पीढ़ियों के लिए सबक बन सके? अंग्रेजों
के दिए हुए कानून सिर्फ बलवानों की हिफाजत के लिए खुद अपने स्वार्थ
के लिए बनाए थे और आजतक हमारे हुक्मरान उन्हीं कानूनों को बदलने की
कोई इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखा पा रहे?
एक बड़ा घोटाला होता है, बड़ा शोरगुल मचता है, चैलनों में चीखते -
चिल्लाते - भागते पत्रकार और घोटाला करने वालों के चित्र हम रोजाना
देखने के आदी हो चुके हैं। एक घोटाले की चीख - पुकार अभी शान्त हुई
भी नहीं होती है कि एक दूसरा घोटाला सामने आ जाता है। समूचा देश एक
प्रहसन में तब्दील हो चुका है। और हमारे देश के प्रधानमन्त्री किसी
निर्लिप्त योगी या ऋषि की तरह बैठे देश के इन प्रहसनों का नेतृत्व
कर रहे हैं। - अगस्त
2011
पूर्वोत्तर
की जैव विविधता का संकट
वैज्ञानिक
शोध से जलवायु संकट से पृथ्वी के हर कोने में प्रतिकूल प्रभाव
पड़ने का खुलासा हुआ है। पृथ्वी में जल के मुख्य स्रोत हिमनदियों
से लेकर महासागर, नदियाँ, पशु - पक्षी, जीव - जन्तु और समस्त
प्राणी जगत आज सभी इस संकट से जूझ रहे हैं। पृथ्वी के विभिन्न भू -
क्षेत्रों में पाई जाने वाली जैव विविधता के अपने अस्तित्व का
संघर्ष करने की वास्तविकता से वैज्ञानिक अवगत है और चिन्तित हैं।
ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान द्वारा प्रायोजित एक अध्ययन से यह पता
चला है कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की जैव विविधता में व्यापक
स्तर पर परिवर्तन की सम्भावना बताई गई है। यह प्रभाव उन क्षेत्रों
में और ज्यादा बढ़ता जा रहा है जहाँ वन - क्षेत्रों में अतिक्रमण,
अधिक मात्रा में घास की कटाई, झूम खेती के लिए पेड़ों के काटने
जैसे सामाजिक - आर्थिक दबाव बढ़ रहे हैं लेकिन यह प्रभाव समस्त
क्षेत्र में एक समान नहीं है। पूर्वोत्तर में आठ राज्य हैं -
अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड
और आठवाँ राज्य सिक्किम। इन राज्यों में प्रचुर मात्रा में जैव
विविधता पाई जाती है, लेकिन इसके बावजूद यह क्षेत्र सामाजिक और
आर्थिक रूप से अन्य राज्यों से पिछड़ा है। अपनी समृद्ध प्राकृतिक
सम्पदा के चलते यह क्षेत्र खुद एक अलग क्षेत्र है, अद्वितीय है
लेकिन इन प्राकृतिक संसाधनों के व्यवस्थापन में जहाँ पूर्वोत्तर की
सात बहनों (सेवेन सिस्टर्स) में किसी ठोस पर्यावरण संरक्षण नीति के
अभाव के चलते व्यापक रूप से जैव विविधता विलुप्ति के कगार पर पहुँच
चुकी है जबकि राष्ट्रीय मुख्यधारा में केवल 35 साल पहले सम्मिलित,
क्षेत्रफल और जनसंख्या में तुलनात्मक रूप से बहुत छोटे राज्य
सिक्किम ने बीते वर्षों से जैव विविधता के संरक्षण में जो उपलब्धि
हासिल की है वह पूर्वोत्तर के लिए ही नहीं बल्कि समूचे देश के लिए
एक जीती जागती मिसाल है। पूर्वोत्तर के सात राज्यों की तरह सिक्किम
में भी विगत में उत्तर जिले में झूम की खेती की जाती थी लेकिन अब
इस पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है। समूचे प्रदेश में वन क्षेत्र,
हिमनदियों, जलाशयों, जैव विविधता और पर्यावरण के संरक्षण की दिशा
में ठोस नीति के क्रियान्वयन के फलस्वरूप वन क्षेत्र में लगातार
वृद्धि हो रही है। पूर्वोत्तर के अन्य राज्य यदि सिक्किम द्वारा
अख्तियार की गई पर्यावरण नीति का अनुकरण करें तो जैव विविधता के
विनाश के संकट को टाला जा सकता है।
(जुलाई 2011)
सिक्किम में हरित क्रान्ति
पहाड़ी
राज्यों में सिक्किम ने योजनाबद्ध रूप से गत डेढ़ दशक से सिक्किम
राज्य का पर्यावरण, वन - संगक्षण तथा इनसे सम्बन्धित पारिस्थितिकी
का संरक्षम, प्रवर्धन और विकास के लिए ठोस कदम उटाने के
परिणामस्वरूप राज्य का स्वच्छ वातावरण, हरे - भरे वन - जंगलों में
बढ़ोत्तरी और जैव विविधता में भी इजाफा सुनिश्चित हुआ है। इस
प्रतिबद्धता को निरन्तरता देते हुए विधानसभा में 2011 - 2012 का
बजट प्रस्तुत करते हुए मुख्यमन्त्री एवं वित्त विभाग के प्रभारी
पवन चामलिङ ने परिस्थिति तन्त्र और पर्यावरण संरक्षण में अतिरिक्त
बल प्रदान करने की दिशा में राज्य सरकार के द्वारा 1995 - 96में
घोषित हरित क्रान्ति के तहत शुरू की गई पहलों को आगे बढ़ाने के लिए
सिक्किम हरित क्रान्ति अभियान का प्रारम्भ किए जाने की जानकारी दी।
इस अभियान के तहत हिमनदियों और और मौसम परिवर्तन के अध्ययन के लिए
गहन शोध शुरू किया गया है जिसके लिए एक आयोग का गठन भी किया गया
है। जैव प्रविधि शोध एवं प्रयोग केन्द्र की स्थापना के द्वारा जैव
प्रविधि अभियान के अन्तर्गत सहायक कदम भी उठाए जाने का जिक्र करते
हुए मुख्यमन्त्री ने बताया कि राज्य हरित अभियान के विवरण में
दिखाए गए अन्य महत्लपूर्ण क्षेत्रों में पर्यापर्यटन विकास अवधारणा
का सुदृढ़िकरण, न्यायसम्मत तरीकों से दल विद्युत संसाधनों का दोहन,
समस्त शहरी क्षेत्र का सुन्दरीकरण तथा सुधार और पर्या शहर की तर्ज
पर ग्रामीण आवासीय क्षेत्र के उन्नयन पर जोर दिया गया है। राज्य
सरकार की ठोस पर्यावरण संरक्षण नीति के सही क्रियान्वयन, सभी
सरकारी तन्त्र, नागरिक समाज और सरोकार रखने वालों से सुनिश्चित
होने पर ही इस पहल को निरन्तरता दी जा सकती है और सिक्किम को सही
मायनों में सुन्दर, स्वच्छ और समृद्ध बनाया जा सकता है।
(जून 2011)
सिक्किम में पर्यटन को बढ़ावा देने पर पहल
सिक्किम
में सत्ताधारी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रन्ट सरकार 1994 में अस्तित्व
में आने के बाद से ही राज्य में पर्यटन के ढाँचे में सुधार लाने के
लिए प्रयत्नशील रही है। इस दिशा में राज्य सरकार ने पिछले 15 सालों
से विभिन्न उपलब्धियाँ भी हासिल की हैं और देश विदेश से काफी
प्रशंसा भी प्राप्त हुई है जिसकी वजह से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर
सिक्किम की छवि निखरी है। पर्या - पर्यटन के विकास की दिशा
मे राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को देश की विभिन्न राजनीतिक
पार्टियों से समर्थन प्राप्त हो रहा है। ग्रीष्मकालीन संसद के उच्च
सदन राज्य सभा में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रन्ट के सांसद् ओ. टी.
लेप्चा ने एक निजी संकल्प पेश किया था जिसमें कहा गया था कि
सिक्किम प्राकृतिक दृष्टि से देश के खूबसूरत राज्यों में से एक है।
राज्य का 87 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। सिक्किम एक मात्र ऐसा
राज्य है जहाँ पर पूरी तरह से जैविक खेती होती है। राज्य में
प्लास्टिक, पान - गुटका जैसी चीजों पर पूर्ण प्रतिबन्ध है। राज्य
मे दुनिया की तीसरी ऊंची चोटी कंचनजंघा है। राज्य में 21 हिमनदियाँ
हैं। उन्होंने कहा कि सिक्किम अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण
पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहा है। राज्य में पर्यटन को बढ़ावा
देने के लिए सड़क, रेल और वायु मार्ग सहित आधारभूत सुविधाओं को
मजबूत करना बेहद जरूरी है और इसके लिए केन्द्र की विशेष सहायता की
आवश्यकता है। लेप्चा के संकल्प पर अपने विचार व्यक्त करते हुए
भाजपा के एसएस आहलुवालिया ने कहा कि सिक्किम के लोग अपने राज्य के
पर्यावरण को बचाए रखने के लिए बेहद जागरूक हैं। राज्य में आरक्षित
वन क्षेत्र होने के कारण कारखाने नहीं लगाए जा सकते। इन बातों को
ध्यान में रखते हुए राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है
ताकि लोगों को रोजगार मिल सके। उन्होंने सिक्किम को स्विटजरलैंड से
भी ज्यादा सुन्दर बताया और कहा कि यह बात प्रमाणित हो चुकी है।
लेकिन इसके लिए देश - विदेश में प्रचार - प्रसार की जरूरत है।
सिक्किम के साथ नगालैंड, मिजोरम, मेघालय, हिमाचल प्रदेश,
उत्तराखण्ड सहित पहाड़ी राज्यों में भी पर्यटन को बढ़ावा देने के
लिए उन्होंने केन्द्र सरकार को विशेष मदद देने के लिए मांग की। इसी
तरह कांग्रेस के मुकुट मिथी ने भी पहाड़ी और छोटे राज्यों के
पर्यटन की ओर केन्दर सरकार का ध्यान खीचते हुए कहा कि सिक्किम हर
लिहाज से अन्तरराष्ट्रीय पर्यटक स्थल बनने की योग्यता रखता है। असम
गण परिषद के वीरेन्द्र प्रताप वैश्य नें भी सिक्किम सहित
पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों को पर्यटन के विकास के लिए आधारभूत
सुविधाएँ मुहैया करने की मांग की। बहस में बसपा आदि राजनीतिक दलों
के प्रतिनिधियों नें भाग लिया और सिक्किम के पक्ष की जोरदार
सिफारिश की। इससे लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर सिक्किम की साख
बढ़ा है और यह एक सुखद स्थिति है।
(नवम्बर
2010)
-
भारत में निरक्षरता
-
शिक्षा
के क्षेत्र में विकास के लिए योजनाबद्ध रूप में पिछले छह दशकों की
उपलब्धियाँ भारत जैसे देश के लिए निराशाजनक रही हैं। विश्व के 35
प्रतिशत निरक्षर लोग भारत में मिलते हैं। शिक्षा का अधिकार और सर्व
शिक्षा अभियान जैसी कई पहलों के बावजूद 35 प्रतिशत निरक्षरता देश
के लिए चिन्ता का विषय है। देश में साक्षरता के बढ़ने के संकेत
दिखने पर भी जनसंख्या में हो रही वृद्धि के चलते प्रत्येक दशक में
निरक्षरों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है। शिक्षा के अधिकार
और मध्यान्ह भोजन से कुछ सकारात्मक संकेत मिलने पर भी शिक्षा की
स्थिति में सुधार अब एक चुनौती के रूप में खड़ी है देश के नीति
निर्धारकों के समक्ष। शिक्षा की स्थिति में सुधार के पक्षधर और
अरसे से इस दिशा में अभियान चला रहे सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता
अशोक अग्रवाल के अनुसार निरक्षरता के अतिरिक्त बाल निरक्षरता भी
काफी अधिक है। उनके अनुसार आँकड़े चाहे जो कुछ भी कहें परन्तु आज
भी देश में काफी संख्या में बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। उनके
अनुसार यह संख्या 10 करोड़ है जिनमें बड़ी संख्या में बाल श्रमिक
और विकलांग हैं। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता भी किसी से छुपी नहीं
है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी और शहरी क्षेत्रों में
आवश्यकता से अधिक शिक्षकों की उपस्थिति भी एक कड़वा सच है। इधर
सिक्किम में मानव संसाधन विकास विभाग ने भी शिक्षा के क्षेत्र में
मौजूद विसंगतियों को स्वीकारा है।(अक्तूबर
2010)
सिक्किम जैविक
मिशन
जैविक
खेती का प्रचलन भारत में
काफी लोकप्रिय होता जा रहा है। बीते कुछ
वर्, में किसान, सरकारी व गैर सरकारी हस्कक्षेप और बाजार की साझी
कोशिशों के परिणामस्वरूप भारतीय जैव खेती एक नई ऊँचाइयाँ तय कर रही
है। इससे बढ़ती घरेलू माँगों की पूर्ति में मदद मिल रही है। इसके
साथ-साथ जैविक खाद्य पदार्थों के जैविक कारोबार में भारत की
हिस्सेदारी में भी इजाफा हो रहा है।
पूर्वोत्तर राज्यों में सिक्किम ने
इस क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। सिक्किम को
पूर्ण जैविक राज्य में परिणत करने के मुख्यमन्त्री पवन चामलिङ के
आह्वान से राज्य के और राज्य के बाहर के लोगों को इस ओर आकर्षित
किया है। हाल में सम्पन्न बजट अधिवेशन में मुख्यमन्त्री ने कहा -
"कृषि क्षेत्र और कृषि के लिए 14
पर्तिशत से कम उपलब्ध भूमि होने के कारण राज्य का सकल घरेलू उत्पाद
अंश सन् 1980-81 के 48.7 प्रतिशत से घटकर 2006-07 में 18.8 प्रतिशत
आ पहुँचा था। इस स्थिति में हम विश्व के स्वास्थ्य के प्रति सचेत
होकर तथा रासायनिक तरीकों से उत्पादित वस्तुओं से दूर रहने वालों
के लिए गुणस्तरीय जैविक उत्पाद आपूर्ति करवाने वाले माध्यमों की
तलाश कर रहे हैं।" उन्होंने कहा कि
सिक्किम जैविक मिशन के तहत सिक्किम की समूची खेतीयोग्य जमीन को
जैविक रूप में संभाव्य और टिकाऊ भूमि में तब्दील करने का विस्तृत
पैकेज उपलब्ध करवाने का राज्य सरकार का इरादा है।
"इन्टरनेशनल कम्पिटेन्स सेन्टर फॉर
आर्गैनिक एग्रिकल्चर" के द्वारा
प्रकाशित एक महत्वपूर्ण पत्रिका "दी
इंडिया आर्गैनिक पाथ वे" में लिखा है -
" सिक्किम को जैविक राज्य घोषित किया जा
चुका है और रासायनिक कीटनाशको को राज्य में आयात पर प्रतिवन्ध
लगाया जा चुका है।" इस संदर्भ में
मुख्यमन्त्री पवन चामलिङ ने कहा - "जैविक
खोती के संबंध में सिक्किम को एक ब्रांड के रूप में प्रबर्धन करने
के लिए इस प्रकार की राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय मान्यता का
सदुपयोग करने के लिए मैं सिक्किम की जनता व सरकारी तन्त्र का
आह्वान करता हूँ।"
सिक्किम जैविक मिशन को आगे बढ़ाने
के लिए मुख्यमन्त्री, जो राज्य के वित्त मन्त्री भी हैं, ने
वित्तीय वर्ष 2010-11 के लिए 20 करोड़ की राशि के प्रावदान की
घोषणा की है। (जुलाई)
लिबरहान से आगे
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सत्रह
सालों से लंबी जांच के बाद तैयार की गई
अपनी रिपोर्ट जस्टिस एम.एस. लिबरहान ने
करीब पांच महीने पहले सरकार को सौंपी
थी।1992 से अब तक देश में एक पूरी पीढ़ी
जवान हो चुकी है, जिसे अयोध्या की उस घटना
से कोई लेना-देना नहीं है, बशर्ते हम
जान-बूझ कर उसमें घृणा, प्रतिशोध या गौरव
जैसा कोई भाव भरने को उतावले न हों।
रिपोर्ट पेश करने में हो रही देरी की वजह
यह बताई गई है कि सरकार इसे कार्रवाई
रिपोर्ट के साथ ही संसद में प्रस्तुत करना
चाहती है। दुर्भाग्यवश, अपने देश में ऐसा
कोई नियम नहीं है कि भारी-भरकम सरकारी
खर्चे पर तैयार की गई आयोगों और समितियों
की रिपोर्टें संसद में कितने समय में पेश
कर दी जानी चाहिए, या पेश की भी जानी
चाहिए या नहीं। ऐसी रिपोर्टों की संख्या
सैकड़ों में नहीं तो दसियों में जरूर है,
जिन्हें दिन का उजाला देखने का मौका नहीं
मिला। इससे सरकार का कुछ फायदा भले हो जाता
हो लेकिन अटकलों और लीकेज के आधार पर बाहर
आए अर्धसत्यों से समाज को भारी नुकसान
उठाना पड़ता है। अभी लीकेज के कारण चर्चा
में आए आयोग के जो कथित निष्कर्ष संसद का
एक पूरा दिन स्वाहा कर चुके हैं, उनमें
कितना सच है, कितना झूठ, कोई नहीं जानता।
लेकिन आम लोग सहज बोध के आधार पर जिन नतीजों
तक पहुंचे हैं, उनसे ये ज्यादा दूर नहीं
जान पड़ते।
बाबरी मस्जिद के विध्वंस को स्वत:स्फूर्त
घटना बताने की बीजेपीनेताओं की कोशिश खुद
उन्हीं की कसौटी पर खरी नहीं उतरी थी। अगर
वे सचमुच ऐसा मान रहे होते तो कई साल तक
उनके बीच इसका श्रेय लेने की होड़ न मची
रहती। दो शीर्ष बीजेपी नेताओं ने 6 दिसंबर
1992 को कभी अपने लिए शोक का तो कभी
शर्मिंदगी का दिन बताया, लेकिन बाद में इसे
गर्व या शौर्य का प्रतीक बताने या इससे
मौन सहमति जताने में भी उन्हें कोई परेशानी
नहीं हुई। यह बहस का विषय हो सकता है कि
मस्जिद विध्वंस की योजना बनाने में किस
बीजेपी या संघ नेता की कितनी भागीदारी थी,
लेकिन तीन-चार सालों की अवधि में देशव्यापी
माहौल बनाकर अमल में लाई गई उस योजना से
पूरी तरह अनभिज्ञ होने का दावा उनमें से
कोई भी नहीं कर सकता।
देश
की सर्व-समावेशी छवि को खंडित करने
वाली इस घटना के दोषियों को सजा दिलाने
की जिम्मेदारी देश की कार्यपालिका और
न्यायपालिका की है। लेकिन, इनसे ऊपर
एक कहीं ज्यादा बड़ी अदालत जनता की भी
है, जिसने पिछले कुछ सालों में ऐसी
राजनीतिक धाराओं के खिलाफ अपने फैसले
सुनाए हैं। वे यह साबित करने के लिए
काफी हैं कि दूध का दूध, पानी का पानी
करने में उससे थोड़ी देर भले हो जाए,
लेकिन अंधेर कभी नहीं होती। बहरहाल,
आयोग की रिपोर्ट लीक करने का मकसद
सिर्फ सचाई सामने लाने का नहीं है।
संसद में महंगाई के मुद्दे पर पिटने
जा रही सरकार के लिए विपक्ष का ध्यान
बंटाने का यह एक कारगर दांव है। चंद
दिन बाद आ रहे 6 दिसंबर के संदर्भ में
इसका इस्तेमाल नए सिरे से समुदायों की
लामबंदी में किया जा सकता है, यानी
लिबरहान रिपोर्ट से आगे का एक रास्ता
समाज को दोबारा उसी पुराने टकराव की
ओर ले जाने का हो सकता है। इसकी सफलता
की संभावना कम है, फिर भी कुछ लोग ऐसी
कोशिश जरूर करेंगे। लेकिन इस अंधी गली
से अलग, हमारे देश और राजनीतिज्ञों के
लिए एक सही रास्ता आत्म निरीक्षण का
हो सकता है, क्योंकि व्यर्थ के टकरावों
से ऊपर उठे बगैर कोई भी राजनीतिक धारा
इस महादेश में अपनी प्रासंगिकता सिद्ध
नहीं कर पाएगी।
(नवभारत
टाइम्स, 24 नवंबर)
आर्थिक विषमताएं बढ़ती जा
रही हैं
आज
विश्व में आर्थिक विषमता बढ़ती जा रही है। संपन्न राष्ट्र
विपन्न राष्ट्रों के संसाधनों पर अपना अधिकार जमाने के लिए
साम-दाम-दंड-भेद सभी किस्म के हथकंडे अपनाने में बाज नहीं आ
रहे। और इस प्रभुत्व के संघर्ष में विषमताएं तांडव नृत्य कर
रही हैं। वैश्विक जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं के
साथसाथ युद्धों की विभीषिका महासंकट को आमंत्रित कर रही है।
औद्योगिक विकास की अंधी प्रतिस्पर्धा में कृषि उत्पादन पर कम
ध्यान दिया जा रहा है। तीसरी दुनिया में जितनी कृषियोग्य
जमीन है, उस पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कीटनाशकों से
मिट्टी की उर्वरता ही समाप्त होती जा रही है। परिणामस्वरूप
तीसरी दुनिया में खाद्यान्न उत्पादन घटता जा रहा है और
शक्तिसंपन्न राष्ट्र अर्थात बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर
खाद्यान्न निर्भरता बढ़ती जा रही है। महाशक्तियों के वर्चस्व
वाली संयुक्त राष्ट्र संघ की हाल की एक चेतावनी के अनुसार
विश्व में भुखमरी बढ़ती जा रही है और विश्व की सरकारों को इस
संकट का सामना करने के लिए हर संभव उपाय करने की अपील जारी
की है। एक आकलन के अनुसार विश्व में गरीबी के चलते एक अरब
लोगों को रोजाना भूखे सोना पड़ता है। वैश्विक भुखमरी
का सामना करने के लिए विश्व खाद्य संगठन (डब्लूएफपी) और
मिलेनियम विलेज प्रोजेक्ट (एमवीपी) ने इस दिशा में पारस्परिक
साझेदारी में सहमति व्यक्त की है। विश्व खाद्य संगठन की
प्रमुख जोसेट शिरान के अनुसार विश्व में भूखों की संख्या में
निरंतर वृद्धि होती जा रही है और यह 'मिलेनियम
डेवेलपमेट गोल' के लिए सबसे
बड़ी चुनौती है। वर्तमान में इस धरती पर हर छठा आदमी भूखा
है। डब्लूएफपी ने भूख की समस्या से जूझ रहे देशों की मदद के
लिए नियमों में काफी परिवर्तन किया है। यह संगठन
विकासशील देशों के कृषकों से खाद्यान्न आपूर्ति का अस्सी
प्रतिशत खरीदता है। यह मान ले कि नियमों में परिवर्तन किया
है लेकिन भारत जैसे देश में जहां अधिकांश कृषक आत्महत्या कर
रहे हों, वहां से किस प्रकार के खाद्यान्न की खरीद की बात की
जा रही है? यह एक दुश्चक्र है और
इस दुश्चक्र से बाहर निकलने के लिए तीसरी दुनिया के देशों
को, खास तौर पर भारत को, भारत के सत्ताधारियों को कृषि को
उद्योग का दर्जा देकर कृषकों को तमाम सुविधाएं मुहैया करवा
कर देश की खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की दिशा में अविलंब कदम
उठाने चाहिएं।
(14 नवंबर)
...ताकि आबादियों के पास
की हरियाली को बचाया जा सके
राजधानी
गान्तोक पिछले कुछ वर्षों से कंक्रीट जंगल में तब्दील होती
जा रही है। जिला मुख्यालय नाम्ची, मंगन और गेजिंग भी गान्तोक
का अनुकरण कर रहे हैं। यहां तक कि छोटे-मोटे कस्बों, गांवों
को भी यह छूत की बीमारी लग चुकी है। राज्य सरकार के नियमों -
कानूनों को धता बता कर गांव-बस्तियां भी कंक्रीट जंगलों में
तब्दील होने की होड़बाजी में हैं। और प्राकृतिक जंगल,
स्वाभाविक है, लोप होंगे ही। 1997 में जब गान्तोक में एक
बड़ा भू-स्खलन हुआ था और जिसमें चलते कई निजी और सरकारी
इमारते मलबे में बह गई थीं तो इसकी वजह अनियंत्रित निर्माण
बतायी गई थी। इस पर नियंत्रण के लिए जब राज्य सरकार ने एक
समिति का गठन किया था और पांच मंजिलों से ज्यादा के निर्माण
पर रोक लगा दी गई थी। लेकिन पिछले एक दशक के दौरान समूचे
राज्य में इस सरकारी नियम का कितना पालन किया गया?
शहरों में बच-खुची जमीन पर, यहां तक कि नालों और खड्डों पर
भी इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। कुछेक इलाकों में इमारतें इतनी
घनी हैं कि कोई हादसा होने पर सुरक्षा असंभव सी लगती है। तंग
गलियों से अग्निशमन के उपकरणों की पहुंच कठिन होगी।
भू-वैज्ञानिकों ने सिक्किम के मुख्य भू-कंप क्षेत्र में होने
की पुष्टि बार-बार की है पर इस पर न तो तथाकथित सभ्य समाज और
न ही नीति -निर्धारक ही कोई ध्यान देते हैं। क्यों नहीं
देते, इस मुद्दे पर गंभीरता के साथ बहस होनी चाहिए। भवन एवं
निर्माण विभाग ने अब जाकर इस बात की सुध ली है और व्यापक रूप
से राज्य भर के प्रमुख आबादी वाले इलाकों का सर्वेक्षण किया
जा रहा है। विभागीय अधिसूचना के अनुसार इमारतों के निर्माण
से पूर्व स्थल की मिट्टी की जांच के अलावा इससे जुड़े विषयों
पर अमल करने के बाद ही उक्त निर्माण की इजाजत दी जायेगी। अब
सवाल यह है कि अब तक जो निर्माण हुए हैं, उनमें इन हिदायतों
पर गंभीरतापूर्वक अमल नहीं किया गया है। अब यह कंक्रीट जंगल
किसी अप्रत्याशित हादसे के कगार पर खड़ा हो चुका है, जो
क्षति होनी थी, वह हो चुकी है। जरूरत अब यह दिखती है कि इस
मुसीबत को इजाफा देने वालों पर विभाग सख्ती से निपटे ताकि जो
कुछ हरियाली आबादियों के पास बची है, उसे सदा के लिए
सुरक्षित रखा जा सके।
(12 नवंबर)
शिक्षा प्रणाली में
परिवर्तन
केंद्र
सरकार ने देश की शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाने का
बीड़ा उठाया है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। देर आयद,
दुरुस्त आयद। आजतक शिक्षा प्रणाली की दिशाहीनता के चलते देश
ने काफी नुकसान उठाया है। मौजूदा शिक्षा प्रणाली कुशल
जनशक्ति तैयार करने में असफल रही है। मैकाले साहब ने जिस
शिक्षा की नींव डाली थी उसी को ढो रहा है देश आजतक और इसी का
परिणाम है कि शिक्षा में अराजकता है। संपन्न लोग उच्च शिक्षा
पा लेते हैं और देश में उचित अवसर उपलब्ध न होने के कारण
प्रतिभा का पलायन होता है। पिछली एक सदी से यह पलायन इस कद्र
हुआ है कि नोबेल पुरस्कार पा लेती हैं भारतीय मूल की
प्रतिभाएं। और हम देशवासी इसी पर गर्व महसूस करते हैं जबकि
वे कब के देश और देश की नागरिकता छोड़ चुके होते हैं। उनकी
प्रतिभा का सदुपयोग विदेशों ने किया, हमें इसमें गौरवान्वित
होने की क्या जरूरत है? आज जब
केंद्र सरकार शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन लाने में बाकई
गंभीर दिखती है तो उसे पहले प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की
शिक्षा पर ज्यादा जोर देना होगा। प्रतिभा पलायन न हो, इसके
लिए सरकार को उच्च शिक्षित युवाओं को देश में ही उचित अवसर
मुहैया करवाने की व्यवस्था करना होगी। राजनीति और नौकरशाही
के शिकंजे से शिक्षा को मुक्त कर दिया जाना होगा। (13
अक्तूबर)
भारत में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हैं
भारतीय
राजनीति और लोकतांत्रिक प्रणाली में अनेक खामियां हैं,
विसंगतियां हैं और इन विसंगतियों के बारे में काफी कुछ
लिखा जा चुका है। लेकिन इन विसंगतियों के बावजूद यदि भारत एक
लोकतांत्रिक वास्तविकता के रूप में विश्व में अपनी जगह बना
सका है तो केवल एक कारण से और वह है भारत की विविधता में
एकता। सरकारे बनती हैं, गिरती हैं और यह सब होता है जनता के
बलबूते। पिछले 6 दशकों से वयस्क मताधिकार के प्रयोग से हुए
चुनावों में अनगिनत खामियां रहीं लेकिन समय बदला और इन
कामियों से निजात पाने के उपाय भी खोजे जाते रहे। वैद्युतित
क्रांति की बदौलत भारतीय लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती जा
रही हैं तो इसके पीछे मुख्य कारक है ईवीएम यानि इलेक्ट्रोनिक
वोटिंग मशीन। बच्चों के सिंथेसाइजर की तरह लगने वाली इस मसीन
में बटन दबाते ही वोट दर्ज हो जाता है। पहले की तरह कागज के
लंबे पुलिंदे पर मोहर लगा कर बैलेट बॉक्स में डालने का युग
समाप्त हो चुका है। 2004 के चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर पहली
बार ईवीएम के जरिए ही हुए थे और और हर चुनाव में वोट डालने
के लिए अब इसका ही इस्तेमाल हो रहा है। समय और धन की बचत के
साथ साथ चुनावों में अनियमितताओं पर भी अंकुश लगा है। भारतीय
लोकतंत्र मजबूत होता जा रहा है।
(11 अक्तूबर)
सूखे की स्थिति और केंद्र का राज्य सरकारों को निर्देश
देश के कई राज्यों में
मानसून की अनियमितता और संभावित सूखे की स्थिति के मध्यनजर
नयी दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में
संपन्न राज्यों के मुख्य सचिवों की बैठक में सूखे की स्थिति
पर चिंता प्रकट की गई और महंगाई रोकने के उपायों पर राज्य
सरकारों को सख्ती से निपटने की हिदायत दी गई।
भारत जैसे विशाल देश में वर्ष भर में मौसम
अपना अलग-अलग मिजाज दिखाता है जिसके चलते कहीं सूखे और कहीं
बाढ़ से भारी क्षति उठानी पड़ती है तो कहीं अच्छी वर्षा होने
पर खाद्यान्न का संकट टल जाता है और किसानों को राहत मिलती
है। सूखे और बाढ़ की स्थिति में वस्तुओं की कीमतों पर
नियंत्रण रख पाना और आम जनता को उचित कीमत पर खाद्यान्न तथा
दैनिक उपभोग की वस्तुएं मुहैया करवा पाना एक टेढ़ी खीर है
क्योंकि ऐसी परिस्थितियो का नायाज फायदा मुनाफाखोर और
कालाबाजारिए उठाते रहते हैं। सरकारी तंत्र पर कीमतों
पर नियंत्रण रखकर इन विसंगतियों पर अंकुश लगाना भी एक कठिन
अभ्यास सिद्ध होता जा रहा है। इसमें सरकारी तंत्र और भ्रष्ट
व्यापारियों की मिली भगत जिम्मेदार है। प्रधाममंत्री मनमोहन
सिंह ने बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए राज्यों से
जमाखोरों और काला बाजारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने के
निदेश दिए हैं। उन्होंने जिन क्षेत्रों में सूखे की स्थिति
उत्पन्न हो रही है वहां राज्यों को आपात योजनाएं तैयार करने
को कहा है। खाद्यान्नों की उपलब्धता व जरूरी वस्तुओं की
कीमतों पर निगरानी रखने की हिदायत देते हुए उन्होंने कहा है
कि केंद्र व राज्यों को मिलकर इस स्थिति को प्रभावी ढंग से
निपटना होगा। इस स्थिति में केंद्र ने राज्य सरकारों को हर
तरह की मदद करने का आश्वासन दिया है। मूल्य वृद्धि से गरीब
जनता को बचाने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी
बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने देश के सूखा
प्रभावित 142 जिलों में तुरंत राहत कार्य शुरू करने के निदेश
दिए हैं। इस संबंध में उन्होंने सीखा प्रभावित राज्यों को
अपनी जरूरत संबंधी ज्ञापन तुरंत भेजने को कहा है।
यह कोई पहला अवसर नहीं है कि देश के कुछ जिले
सूखे का सामना कर रहे हों। जलवायु में वैश्विक परिवर्तन जो
हो रहे हैं उससे भारत जैसे देश भी प्रभावित हो रहे हैं।
प्राकृतिक प्रकोपों और विपदाओं से करोड़ों की संख्या में लोग
प्रभावित होते हैं, केंद्र सरकार करोड़ों-अरबों की राहत राशि
का ऐलान करती है लेकिन उस राशि का कितना हिस्सा प्रभावित
लोगों तक पहुंच पाता है, इस तथ्य से सभी परिचित हैं।
(9 अक्तूबर)
नशीले पदार्थों का दुरुपयोग
हर साल की तरह इस साल भी 26 जून को नशीले पदार्थों के दुरुपयोग तथा इसके अवैध व्यापार के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय दिवस देश भर में मनाया गया। राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने अपने संदेश में कहा कि नशीले और मादक पदार्थों का दुरुपयोग एक ऐसी समस्या है जिसका सामना पूरा विश्व कर रहा है और युवा पीढ़ी को इस बुराई से बचाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिएं। संदेशों के क्रम में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आदि ने भी इसी तर्ज पर अपने संदेशों में आह्वान किया। हर साल इस दिवस पर इस दिशा में जन साधारण में जागरूकता फैलाने के लिए विज्ञापन, संगोष्ठियां और अभियान चलाए जाते हैं और लाखों रुपयों की धन राशि व्यय की जाती रही है लेकिन समस्या जस की तस है बल्कि हर साल बढ़ती ही जा रही है। इस समस्या के जटिलतम होते जाने के पीछे मादक पदार्थों की तस्करी में बढ़ोत्तरी का हाथ है और इस पर रोकथाम के लिए आह्वान किया जाता है जबकि कानूनों के कड़ाई से कार्यान्वयन से इस समस्या से कुछ देशों ने शत प्रतिशत सफलता प्राप्त कर ली है पर हमारे देश में सिर्फ कानून तो बना दिए जाते हैं पर उनका कड़ाई के साथ पालन करने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं की जाती। कानून इतने लचीले हैं कि दोषी व्यक्ति कुछ हरजाना देकर या कुछ दिनों तक कारावास में रह कर फिर अपने धंधे में लिप्त हो जाते हैं। मादक पदार्थों के दुरुपयोग से देश की युवा-शक्ति का ही क्षय नहीं हो रहा है बल्कि इसकी तस्करी ने काला बाजारी, हिंसा और भ्रष्टाचार को भी जन्म दिया हैं। रिपोर्टों के हवाले से कहा जा सकता है कि मादक पदार्थों के खिलाफ वैश्विक अभियान से अफीम, होरेइन, कोकीन और गांजा आदि के उत्पादन में कमी जरूर आई है लेकिन एंफेटामाइंस, मेताएंफेटामाइन और एक्सटेसी का विकासशील देशों में उत्पादन और उपयोग बढ़ता ही जा रहा है। इस दिशा में 'यूनाइटेड नेशंस आफिस आन ड्रग एंड क्राइम' ( यूएनओसीडी) जैसी वैश्विक संस्था कार्यरत है और भारत में 'नेशनल सर्वे आन एक्सटेंट पैटर्न एंड ट्रेंड्स आफ ड्रग एब्यूज इन इंडिया' नामक एक निगरानी तंत्र की स्थापना की गई है जिसे 'ड्रग एब्यूज मानिटरिंग सिस्टम' के नाम से जाना जाता है। सिक्किम की राज्य सरकार भी इस समस्या से निपटने के लिए विशेष सतर्कता से कार्यरत है। आए दिन पुलिस द्वारा इस अवैध धंधे में लिप्त लोगों को गिरफ्तार भी करती रहा लेकिन यह समस्या जस की तस है।
(5 अक्तूबर)
वाम प्रदेश में भूख
सर्वहारा की उन्मुक्ति की
दुहाई देने वाली और तीन दशकों से सत्ता में रह कर भी पश्चिम
बंगाल वाम मोर्चा सरकार राज्य में भुखमरी की घटनाएं न सिर्फ
चौंका देने वाली हैं बल्कि वामपंथियों की पोल भी खोलती हैं।
हाल ही में की गई आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ
है कि पश्चिम बंगाल में नौ प्रतिशत परिवारों को दोनों जून की
रोटी नहीं मिलती है जबकि 43 प्रतिशत लोग पौष्टिक आहार से
वंचित हैं। यह बात और ज्यादा चौंका देने वाली है कि राष्टीय
अनुपात की तुलना में बंगाल में दोनों जून रोटी नहीं पाने
वालों की संख्या सात प्रतिशत से अधिक है जबकि राष्टीय स्तर
पर यह प्रतिशत 1.9 का है। इस मामले में पश्चिम बंगाल उड़ीसा
से भी पिछड़ गया है क्योंकि उड़ीसा जैसे अत्यंत गरीब कहे
जाने वाले प्रदेश में यह प्रतिशत 5.3 का बैठता है। रिपोर्ट
के अनुसार बंगाल की 43 प्रतिशत जनसंख्या को पौष्टिक भोजन
नहीं मिल पा रहा है। उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी में सात,
मालदा में छह, उत्तर दिनाजपुर व दक्षिण दिनाजपुर में
पांच-पांच प्रतिशत परिवार दो जून की रोटी से मोहताज हैं।
पश्चिम बंगाल नि:संदेह
विरोधाभासों का एक पिटारा है जहां एक ओर तो सर्वहारा की
उन्मुक्ति के नारे पर चुनाव जीत जाते हैं लेकिन सत्ता के
शीशमहलों में कैद जन प्रतिनिधि उन्हीं मतदाताओं को भूल जाते
हैं। यह तो एक बंगाल का उदाहरण हो सकता है। स्थिति अन्य
राज्यों में बेहतर है, ऐसा कहना गलत होगा। आंकड़ों का खेल भी
होता है और चूंकि पश्चिम बंगाल आज हर मोर्चे पर परास्त दिख
रहा है इसलिए उसकी बिगड़ती छवि को इन आंकड़ों से और ज्यादा
धूमिल करके राजनीतिक लाभ उठाया जा सकता है क्योंकि पश्चिम
बंगाल में निकट भविष्य में विधान सभा के चुनाव होने जा रहे
हैं। (1 अक्तूबर)
पश्चिम बंगाल मे गरीबी का ग्राफ बढ़ता ही जा
रहा है
पिछले तीन दशकों से
लगातार शासन की बागडोर संभाले हुए वामदलों के राज्य पश्चिम
बंगाल में आर्थिक स्थिति में सुधार के बजाए गरीबी बढ़ते जाने
की असलियत बाकई चौंका देने वाली है। यह खुलासा किसी विपक्षी
दल ने नहीं किया है बल्कि राज्य सरकार के ही एक सर्वेक्षण
में यह बताया गया है कि पश्चिम बंगाल में पचास फीसदी आबादी
गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। पिछले पांच वर्षों
में 51 लाख से बढ़कर 91 लाख परिवार गरीबी रेखा के नीचे आ गये
हैं। इससे निपटने के लिए राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार से
अतिरिक्त आर्थिक सहयोग की मांग की है। दिलचस्प पहलू यह है कि
राज्य सरकार ने इस सर्वेक्षण के लिए घर-घर कर्मचारी भेजकर
गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की सही
पहचान करवाकर यह रिपोर्ट तैयार करवायी है। लेकिन इन आंकड़ों
पर केन्द्र सरकार ने अपनी शंका व्यक्त करते हुए कहा है कि
राज्य सरकार ने सामाजिक-आर्थिक स्थिति की जो सूचना उपलब्ध
करायी है उसके मुताबिक राज्य में 28 फीसदी से ज्यादा गरीबी
नहीं होनी चाहिए। अब यहां एक विचित्र स्थिति उत्पन्न
हो गयी है। राज्य सरकार के द्वारा पेश किए गये आंकड़ों पर
केन्द्र सरकार को भरोसा नहीं है इसलिए वह अपने हिसाब से
केन्द्रीय सहायता देने जा रही है। इसमें
सस्ती दर पर राशन उपलब्ध करवाने का मामला आता है। केन्द्र
सरकार ने केवल 50 लाख से कुछ ज्यादा परिवारों को ही सस्ती दर
पर राशन उपलब्ध करवाने की बात मानी है। अब बाकी के परिवारों
को राज्य सरकार को स्वयं ही राशन उपलब्ध करवाना पड़ेगा।
पश्चिम बंगाल में राशन कार्ड बनाने में भी कफी समय से
अनियमितताएं होने के आरोप शासन पर लगते आ रहे हैं। इस स्थिति
में राज्य सरकार को चाहिए कि केवल केन्द्रीय सहायता के लिए
ही नहीं बल्कि राज्य की सही आर्थिक स्थिति का आकलन
करने के लिए व्यापक सर्वेक्षण करवाए और सर्वहारा की मुक्ति
को केवल भाषणों में सीमित न रखकर सही अर्थों में अपनी अवाम
की मुक्ति के लिए काम करे। बदलते जमाने की नवज पहचाने।
(30 सितंबर) |
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