Gangtok, Sikkim,
Editor: Subhash Deepak
 

 

कवि अमर बानियाँ 'लोहोरो' की सद्य - प्रकाशित

 

 पुस्तक कबीर की दोहावली

 

डॉ. वेद 'व्यथित'

 

प्रसिद्ध कवि अमर बानियाँ 'लोहोरो' नेपाली भाषाभाषी जन के लिए व नेपाली साहित्य के लिए कोई नया नाम नहीं हैं। वह जाना माना नाम है। विगत वर्षों से निरन्तर उनका लेखन द्रुत गति से प्रवाहमान है साथ ही उनके लेखन का यह प्रवाह वर्षाकालीन नदी नही है जिसमें बेमतलब उफान और झाड़- झंखाड़ हों अपितु सदानीरा की तरह सुन्दर है, सत्य और शिव है।

 

'लोहोरो' के लेखन का कथ्य निरन्तर जीवन को केन्द्र मानकर उसके ही इर्द - गिर्द घूमता है। वह चाहे 'जीवन - चित्र' हो या उनका एक हरफे काव्य 'काव्याणु' हो। उनकी समग्र लेखन में गहराई व ऊँचाई दोनों एक साथ मिलती है। यही उनके लेखन की प्रामाणिकता व वैशिष्ट्य है।

 

उनकी सद्य - प्रकाशित पुस्तक 'सन्त कबीर की दोहावली' जो कबीर के दोहों का भावानुवाद है, अत्यन्त ही सुन्दर कृति के रूप में हमारे हाथों में है। इतने विशाल साहित्य में से उनके द्वारा सन्त कबीर के दोहों का चयन करना भी अपने आप में विचारणीय है। कबीर कोई साधारण कवि नहीं हैं। हिन्दी साहित्य के सर्वप्रथम क्रान्ति - द्रष्टा के रूप में कबीर की स्थापना है। भक्ति हमें अभय बनाती है, हमें निडरता प्रदान करती है, सत्य को सत्य कहने का साहस प्रदान करती है। लाभ - लोभ, मोह - माया से ऊपर उठाती है, नीर - क्षीर विवेक प्रदान करती है। और यदि वह यह सब नहीं कर सकती तो फिर वह भक्ति नहीं है, ढोंग है, कहीं मन की अन्त: - ग्रन्थियों का स्राव है।

 

सन्त कबीर ने भक्ति के वास्तविक रूप को जाना और उसे अंगीकृत किया। भक्ति के नाम पर विभिन्न प्रकार के ढोंग - पाखण्डों का साहित्य व भक्तिधारा में सर्वप्रथम खण्डन करने का साहस जुटाया। बेशक कृष्ण भक्तिधारा के कवि  राज्याश्रय से दूर भक्ति में लीन रहे उनका सीकरी सौं कोई काम नहीं था तभी तो कहा - सन्त कौ सीकरी सौं का काम। आवत जात पन्हैया टूटू विसर गयौ हरिनाथ। फिर भी वे जन सामान्य को कबीर की भाँति पाखण्डों के विरुद्ध खड़ा करने का कार्य नहीं कर सके। वे जन सामान्य को ऐसा साहस प्रदान नहीं कर सके जैसा सन्त कबीर ने प्रदान किया।

 

छोटे - मोटे पाखण्डों का खण्डन ही नहीं अपितु राज्याश्रय प्राप्त पाखण्डों के विरुद्ध बजाने का सीधा अर्थ राजसत्ता के विरुद्ध बगावत थी परन्तु कबीर ने यह सब भक्ति के वास्तविक स्वरूप को समझकर किया। तत्कालीन राजसत्ता इस्लाम की संरक्षक थी क्योंकि इस्लाम ईश्वर प्राप्ति हेतु इस्लामिक पद्धति को छोड़कर किसी दूसरी पद्धति के मार्ग को स्वीकार नहीं करता। कबीर ने इसी मिथक या कट्टरपन के विरुद्ध सत्य की घोषणा करके राजसत्ता से भी शत्रुता मोल ले ली क्योंकि यह समय ही आज की तालिवानी इस्लाम का यही विश्वास है। इसी विश्वास का संत्रास पूरा विश्व भोग रहा है। परन्तु कबीर ने उस समय भी इस मिथक को नकार दिया। उन्होंने हर तरह के कष्ट उठाए, उन्हें हाथी के पैर से बाँधकर काशी की गलियों में खिंचवाया गया परन्तु वे अपने सिद्धान्त से जगमगाये नहीं, एकेश्वरवाद की स्थापना करके वैदिक विश्व कल्याण के मार्ग का अलख दगाने निकल पड़े। ऐसे सन्त कबीर को व्यक्तित्व से भला कौन आकर्षित नहीं होगा। अमर बानियाँ 'लोहोरो' भी इस धारा से अछूते कैसे रह सकते हैं। क्योंकि जिस के सीने में मानवीय संवेदनाएँ हिलोरे मार रहीं हों उन्हें शान्त करने के लिए कबीर जैसा विशाल पर्वतीय व्यक्तित्व ही चाहिए जिसे लोहोरो ने स्वत: चुन लिया। इसके लिए मैं उन्हें साधुवाद देता हूँ।

 

नेपाली भाषा की इस दोहावली के भावानुवाद की भाषा बड़ी सरल और कबीर के बहुत निकट है। इसकी यह विशेषता है कि इसके भावानुवाद पर नेपाली भाषा का आत्मिक प्रभाव भी खूब दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने उसके लिए नेपाली मुहावरों आदि का भी भरपूर उपयोग किया है व लोक प्रचलित शब्दावली को बहुलता से स्थान दिया है। यही इसकी विशेषता है। मैं अमर बानियाँ लोहोरो को शुभकामनाएँ देता हूँ। वे निरन्तर नेपाली भाषा के साहित्य की इसी भाँति गम्भीरता व गुरुता से श्रीवृद्धि करते रहें। इत्यलम्।

email: dr.vedvyathit@gmail.com                                          

 

पुस्तक का नाम - सन्त कबीरका दोहावली, लेखक एवं प्रकाशक - अमर बानियाँ लोहोरो, प्रकाशन वर्ष - सन् 2010, मूल्य - 30/-  रुपये                 नवम्बर 2011

 

 

काव्य एकादश

 

संकलन एवं संपादन डॉ. हितेश कुमार शर्मा

 

बिजनौर, उत्तर प्रदेश निवासी डॉ. हितेश कुमार शर्मा के संपादन में काव्य एकादश 2011 प्रकाशित हुआ है जिसमें देश भर के 106 कवियों की कविताएं संकलित हैं। करीब 292 पृष्ठों के आकर्षक सज्जा मे मुद्रित इस काव्य संकलन में सिक्किम के दो कवियों की कविताएं भी सम्मिलित हैं। सुवास दीपक हिन्दी में लिखते हैं और अमर बानियां लोहोरो की हिन्दी में अनूदित कविताएं संकलन में शामिल की गई हैं।

 

संकलन के विषय में दो शब्द में डॉ, बुद्धि प्रकाश शर्मा लिखते हैं -

 'एक के बाद एक संकलन संपादित करते हुए डॉ. हितेश कुमार शर्मा ने अब तक 11 संकलन प्रकाशित कर दिए हैं। इससे व्यक्तिगत रूप से डॉ. शर्मा का जान - पहचान का दायरा बढ़ा है। यहां तक उनका संकलन पहुंचता है और जो जो कवि उसमें सम्मिलित होते हैं उन सभी से उनकी जान - पहचान स्वाभाविक रूप से हो जाती है। संकलन में कवि लोग आपस में भी एक दूसरे से अपने विचारों का आदान - प्रदान करते हैं और साथ - साथ परिचय भी प्राप्त करते हैं। कल तक जिस कवि को केवल उनका दर्पण ही जानता था आज वह कई सौ कवियों से परिचित हो चुका होता है।...बसुधैव कुटुम्कम् इसी से सार्थक होता है।'

 

संकलन में एक कवि प्रकाशचन्द्र शर्मा वर्तमान में कनाडा में रहते हैं। शेष कवि देश के विभिन्न राज्यों से लिए गए हैं। इस प्रकार यह संकलन लगभग पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता है और डॉ. बुद्धि प्रकाश शर्मा के अनुसार 'इस दृष्टि से यह संकलन अद्वितीय है।'

(प्रकाशक - हरिगंगा प्रकाशन गमपति भवन, सिविल लाइन्स, बिजनौर - 246701 (उ.प्र.), मूल्य - 200/)   - अगस्त 2011

 

उर्मि कृष्ण की पुस्तक 'चुनी हुई कहानियाँ'

 

तथा शुभ तारिका के 'कृष्णांक - 10'  का लोकार्पण

 

म्बाला की प्रसिद्ध साहित्यकार, निदेशक कहानी लेखन महाविद्यालय, सम्पादक शुभ तारिका (मासिक) उर्मि कृष्ण की नव प्रकाशित पुस्तक का लोकार्पण शिलांग (मेघालय) में कुमारी अगाथा संगमा (ग्रामीण विकास राज्य मन्त्री, भारत सरकार) के कर कमलों द्वारा हुआ। इसी मंच से डॉ. महाराज कृष्ण जैन संस्थापक कहानी लेखन महाविद्यालय व पत्रिका शुभ तारिका, अम्बाला छावनी के 'कृष्णांक - 10' का लोकार्पण भी कुमारी संगमा ने किया।

 

डॉ. महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान एवं पुरस्कार समारोह का आयोजन 5 जून डॉ. जैन की पुण्यतिथि पर आयोजित किया गया। इस सम्मान/पुरस्कार समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से आए 52 लेखकों को सम्मानित/पुरस्कृत किया गया। इसके आयोजनकर्ता थे कहानी - लेखन महाविद्यालय के सदस्य अकेलाभाइ, पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी, शिलांग के अध्यक्ष श्री विमल बजाज।

 

समारोह में देशभर से पधारे लेखकगण के अतिरिक्त विशेष अतिथि थीं हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला की निदेशिका डॉ. मुक्ता। हरियाणा से सम्मिलित होने वाले लेखक शब्दकर्मी थे प्रसिद्ध लेखिका सुश्री लक्ष्मी रूपल, उर्मि कृष्ण, पंकज शर्मा, देव मस्ताना, विजय कुमार, दीपक, कुमारी तनु।

 

ज्ञातव्य है कि सबसे छोटी उम्र की लोकसभा में चुनकर आने वाली मेघालय की कुमारी अगाथा संगमा ने 2008 में हिन्दी में शपथ ली थी। उन्होंने इस मंच से भी अपना भाषण हिन्दी में दिया।

 

कुमारी अगाथा ने कहा कि मुझे हिन्दी अच्छी लगती है। जब मैंने लोकसभा में हिन्दी में शपथ ली जब मेरे पास बहुत से बधाई के फोन आए। मैं उर्मि कृष्ण को उनकी नई पुस्तक के लिए बधाई देती हूँ। उनके समस्त हिन्दी कार्यों के लिए सराहना करती हूँ।

                         (शुभ तारिका संवाददाता,अम्बाला छावनी) - जुलाई 2011

 

 

मूल्यांकन

कथा में पहाड़ : कुछ निजी विचार

 

विद्यासागर नौटियाल

ह किसी समर्थ, ख्यात या मान्यताप्राप्त समीक्षक के द्वारा लिखी गई विधिवत् समीक्षा नहीं, ये मेरे निजी विचार हैं। नितान्त निजी विचार। पुस्तक को पढ़ने के बाद रचनात्मक साहित्य और भारत के पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े एक सामान्य पाठक की प्रतिक्रियाएँ। यह संग्रह जिसका नाम "कथा में पहाड़' है, अपने शीर्षक के माध्यम से ही पहाड़ से बाहर न निकलने का ऐलान कर रहा है और मंगलाचरण के इस शुरूआती मुहूर्त पर ही पाठक के सामने स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित करता है - कौन से पहाड़? किस देश के? भारत के किस भाग के या किन - किन भागों के पहाड़? अपनी इस जिज्ञासा को शान्त करने के लिए पाठक को पुस्तक के पन्नों को उलटते हुए उससे रू - ब - रू होना पड़ेगा। तब जानकारी मिलती है कि इसमें हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के पहाड़ों की परिधि के अन्दर सीमित किया गया है। मैं इसे हिन्दी  कथा - साहित्य में एक घटना और अविस्मरणीय उपलब्धि मानता हूँ।

इससे पहले किसी साहित्यकार, सम्पादक या प्रकाशक ने कोई ऐसा प्रयास ही नहीं किया था कि भारत के उत्तरी भाग में, अड़ोस - पड़ोस में बसे इन दो राज्यों के हिन्दी कथाकारों को एक ही मंच पर एकत्रित होने को आमन्त्रित किया जाए। ये महानुभाव शायद उत्तराखण्ड राज्य के गठन की प्रतीक्षा कर रहे थे। यद्यपि कथाकारों के ऐसे किसी शुभ मुहूर्त का इन्तजार करने के कोई तथ्यात्मक विवरण या प्रमाण नहीं मिलते कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड दोनों का राजसत्ता की मेहरबानी से, भौगोलिक तौर पर अलग - अलग राज्यों की राजनीतिक इकाइयों के रूप में गठन हो जाता तो हम भी लिखना शुरू कर देते। लेखन के लिए राज्यों का निर्माण, गठन या पुनर्गठन महत्वहीन होता है।

रमाप्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी', मोहन थपलियाल या यशपाल ऐसे राज्यों के गठन के इन्तजार में बैठे रहीं रहे। वे आजीवन अपने लेखन में व्यस्त रहे और भविष्य की पीढ़ियों के लिए अनोखी रचनाओं की निधियाँ छोड़कर हमसे विदा हो गए।

 

प्रस्तुत संग्रह में इन दोनों राज्यों के कुल अड़तीस पुरुष और एक (मात्र) महिला कथाकारों की रचनाएँ सम्मिलित की गई हैं। इनमें से कुछ हमारे बीच नहीं हैं और बाकी अधिकांश रचनाकार अपनी आयु से स्वाभाविक तौर पर उत्पन्न हो जाने वाली शारीरिक अक्षमताओं को धोखे में रखते हुए लगातार लेखन में व्यस्त हैं। इनमें अधिकांश पहाड़ों की परिधि के चर्चित लेखक ही नहीं, हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर भी हैं। 'अधिकांश' पर मैं जोर देना चाहूँगा, चूँकि सम्पादक ने ऐसे मामले में चयन सम्बन्धी अपने विशेषाधिकार (वीटो) का बोल्ड होकर प्रयोग करते हुए मात्र एक अपवाद को छोड़कर कुल लेखिकाओं को पंगत से बाहर खदेड़ दिया है। यहाँ तैंतीस प्रतिशत आरक्षण नहीं चल सकता। पहाड़ में जन्म लेने से क्या फर्क पड़ता है? हैं ते महिला? शिवानी को पर्वतीय लेखक के रूप में अपने को शामिल करवाना था तो उन्हें पुरुष के रूप में जन्म धारण करने से किसने रोका था? ऐसे मामलों में कुछ शर्तों को लागू करने के लिए दिल को कठोर करना ही पड़ता है। अपने दिल की इस भड़ास को निकाल लेने के बाद हमें यहाँ पर सम्पादक की सीमाओं को पहचानते हुए उसे ग्रेस मार्क्स भी देने ही होंगे।

संग्रह के प्रकाशक ने इसे प्रकाशित पर एक बहुत बड़ा रिस्क लिया है। खासकर उस कटु अनुभव से गुजर जाने के बाद जो उसे 'कथा में गाँव' को प्रकाशित करने के बाद हासिल हुआ। किसी भी साहित्यिक पत्रिका ने उस पर चर्चा करना तो दूर की बात, उस पर कोई टिप्पणी तक देने की जरूरत नहीं समझी थी। आम पाठक तो उन्हीं रचनाओं के वश में रहते हैं जिनकी तारीफ के पुल दिल्ली में बैठे कुछ मठाधीशों ने बाँधे हों।

अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों को छोड़ने के बाद भी यह संग्रह 555 पृष्ठों का हो गया।

सूची में कुछ और लेखको को जोड़ने का मतलब होता उसे दो भागों में विभाजित करना। वह काम तो तिसी संस्थान के वश का ही हो सकता था।

इति।

 

हिमाचल हो या उत्तराखण्ड। दोनों के बारे में यह निर्विवाद तथ्य प्रकट होता है कि हमारे सभी लेखक पहाड़ों में घिनघिनाती हुई अमानवीय, क्रूर, आदिम, सामन्ती कुप्रथाओं के विरोध में अपनी लेखनी का जोर आजमाने में व्यस्त हैं। कुछेक कहानियों को छोड़कर बाकी सभी रचनाकार पाठकों के सामने उन वीभत्स घटनाओं को उजागर कर जीवन और वर्तमान सामाजिक ढाँचे के प्रति उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन करने की कोशिशों में लगे हैं.

इस संग्रह में शामिल प्रतिष्ठित उत्तराखण्डी लेखकों की हिन्दी में बहुचर्चित कहानियाँ ली गई हैं। लेकिन हिमाचली लेखकों की सभी रचनाओं पर यह बात लागू नहीं होती। मेरा ऐसा ख्याल है। मगर उनमें कुछ ऐसी भी कहानियाँ मुझे मिलीं जिन्हें पढ़ने के बाद मेरे मन में आजीवन जमा अज्ञान की परतों से मुक्ति मिल गई। मेरी शिराओं में सर्द लहरें दौड़ने लगीं और अपने उस अज्ञान के बारे में कहीं और चर्चा न करने पर मैंने अपने को धन्य माना।

मेरे बचपन के तीन बरस (1939 से 1942) आज के हिमाचल की सीमाओं के आखिरी छोर पर स्थित हाटकोटी मन्दिर के सन्निकट, टिहरी रियासत की सीमावर्ती पट्टी बंगाण में बीते। उस आधार पर में अपने को 'बंगाणी' भी मानता हूँ। बंगाण के अपने कुछ अनुभवों को मैंने लिपिबद्ध कर पत्रिकाओं में प्रकाशित भी करवाया है। मेरी स्मृति में एक प्रसंग हमारे रेंज क्वार्टर के पास से पौबासू देवता की डोली की जातरा का है। वहाँ घास काट रही एक युवती डोली की ओर सर नवाते हुए बार - बार उच्चारित करती जा रही है - 'पौबासू महाराज, तेरी बलि डेउँ महाराज।' मैं आजतक इस डेउँ शब्द को किसी विदेशी भाषा से बंगाण में आ लगा शब्द मानता आया था। यद्यपि उसका अर्थ मेरे मन में सुस्पष्ट था। लेकिन मैंने उसकी व्युत्पत्ति के बारे में कहीं चर्चा नहीं की। अब 'गाची' कहानी को पढ़ते हुए उसके पृष्ठ 126 पर छपा है -

 

'बूढेया मेरेया कीमुआ, तेरे डालटे हरे।

आपू डेवे औ, घरटै, हामें छोड़े जलदै घरे।।'

 

इसमें आए डेवे शब्द को देखकर मुझे जो आश्चर्यमिश्रित सन्तोष हुआ, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जिसे मैं आजीवन विदेशी शब्द मानता आया वह तो हमारे पड़ोस के देहातों में आम आदमी द्वारा लगातार प्रयुक्त किया जानेवाला शब्द है, सदियों पुराना शब्द।

 

संग्रह की अधिकतर कहानियाँ पर्वतीय क्षेत्रों की विशिष्टताओं का समावेश करने के कारण महत्वपूर्ण बन गई हैं। इतिहास की करवटों के साथ लगातार बदलते जो रहे सांस्कृतिक परिवेश को दृष्टिगत रखते हुए कहा जा सकता है कि भविष्य के पाठकों के लिए कुछ ही बरसों के बाद ऐसी कहानियाँ आज के मानव और उसके इतिहास को समझने की सामग्री बन जाअँगी।

इस सन्दर्भ में मेरे मन में हरि मृदुल की 'अर्जन्या' बार - बार उभरने लगती है। कुछ ही बरसों के बाद ऐसी कहानियों को पढ़नेवाले पाठकों को आश्चर्य होने लगेगा। सोचता हूँ कि क्या तब तक 'डेउँ' का प्रयोग करने वाले कोई गरीब, अशिक्षित, देहाती, शहरी, हिन्दी से अप्रभावित रहते हुए जिन्दा रह पाएँगे या यह शब्द भी इतिहास के लिए शोध किए जाने की सामग्री बन जाएगा?

 

कथा मे पहाड़ (कहानी संग्रह), सम्पादक: श्रीनिवास श्रीकान्त, संवाद प्रकाशन, आई - 499, शास्त्रीनगर, मेरठ - 250004

                                (विपाशा, वर्ष 26, अंक 148, 2010 से साभार)            जून 2011

 

शुभ तारिका

(प्रबुद्ध पाठकों तथा शब्दकर्मियों का अग्रणी मासिक)

 

उर्मि कृष्ण

 

शुभ तारिका आज एक लोकप्रिय मासिक पत्रिका है। इसकी पृष्ठभूमि जानना आपको रोचक लगेगा।

इसकी शुरूआत आज से 38 वर्ष पहले एक साइक्लोस्टाइल पत्र के रूप में हुई थी। सुभ तारिका निकालने के पीछे डॉ. साहब (महाराज कृष्ण जैन) का एक ही मकसद था कि विद्यालय (कहानी लेखन महाविद्यालय) के सदस्यों के लिए आवश्यक सूचनाएँ इसमें प्रकाशित की जाएँ। फिर इसमें पाठकों के इक्का - दुक्का पत्र छपने लगे। पत्रों के साथ छिटपुट दो - एक रचनाओं ने अपने लिए जगह की मांग की। तब डॉ. साहब को लगने लगा कि इसे एक पन्ने तक सीमित रखना सम्भव नहीं है। उन्होंने इसे कभी चार और कभी छह पृष्ठों की निकालना शुरू किया और यह साइक्लोस्टाइल की बजाय लैटर प्रेस में छपने लगी। उस वक्त इसका आकार छोटी पुस्तक जितना 7 बाइ 5 इंच था। आज इसका आकार पहले से दुगना है और इसकी छपाई लेजर द्वारा की जा रही है। अब यह नियमित 32 पृष्ठों की तथा इसके विशेषांक 100 पृष्ठों से भी अधिक के छप रहे हैं।

शुभ तारिका डॉ. महाराज कृष्ण जैन स्मृति पर्व के अतिरिक्त अन्य विशेषांकों का आयोजन भी सफलतापूर्वक करती रहती है। अबतक इसके कहानी - विशेषांक, लघु कथा विशेषांक, हिमाचल विशेषांक, हरियाणा विशेषांक व चण्डीगढ़ विशेषांक, हिमांक तथा मध्यदेश विशेषांक निकल चुके हैं। सभी अंक बहुत सराहे गये। शुभ तारिका लेखक परिशिष्ट का आयोजन भी करती है। इसमें एक ही लेखक की रचनाएँ जो कि आठ पृष्ठों की होती है, उसके परिचय सहित दी जाती है।

विशेषांकों की विशेषता यह रही है कि कई प्रदेशों से आग्रह आ रहे हैं कि उन पर भी विशेषांक निकाले जाएँ।

आरम्भ में शुभ तारिका रूपाम्भरा नाम से छपती रही। फिर कुछ सरकारी निर्देशों के कारण इसका नाम पहले तारिका और फिर शुभ तारिका किया गया।

इस छोटी सी अव्यावसायिक पत्रिका से कई महत्वपूर्ण साहित्यिक नाम आरम्भ से ही जुड़े रहे। शुभ तारिका के निर्माण और विकास में प्रसिद्ध लघु कथाकार पृथ्वीराज अरोड़ा, सारिका, नवभारत टाइम्स और संडे मेल में रहे प्रसिद्ध कथाकार और सम्पादक स्व. रमेश बतरा, नवभारत टाइम्स के महावीर प्रसाद जैन, दैनिक भास्कर से सम्बद्ध, राजस्थान पत्रिका के वीरेन्द्र आर्य, हीरालाल नागर, सुप्रसिद्ध लेखक सैन्नी अशेष, सुभाष बंसल, कथा शिल्पी विकेश निझावन, रत्नचन्द निर्झर आदि महानुभावों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

समय के साथ - साथ शुभ तारिका में कई नये स्तम्भ जोड़े गए। सबरंग, लेखा पढाई का, आत्मा का भोजन, शब्दयात्रा, चिन्तना और पत्र - पत्रिकाएँ इसके सर्वाधिक लोकप्रिय स्तम्भ हैं। इसका कारण यह है कि अनेक पत्र - पत्रिकाओं ने दूसरे शीर्षकों से यही स्तम्भ आरम्भ कर दिए हैं।

शुभ तारिका को किशोरवय बालकों से लेकर वयोवृद्ध तक रुचि से पढ़ते हैं। कविता और लघुकथा के प्रेमी साधारण पाठक से लेकर प्रतिष्ठित लेखकों और विद्वानों तक में शुभ तारिका के स्तर एवं अपने इस या उस स्तम्भ के कारण लोकप्रिय हैं। स्व. विष्णु प्रभाकर, भीष्म साहनी, सूर्यभानु गुप्त, अजातशत्रु, ऋषिवंश, किशन सरोज, विजय सहगल, कमलेश भारतीय, राम स्नेही लाल शर्मा यायावर, दर्शन राही, मंजू नागोरी, नरेन्द्र कौर छाबड़ा, बानो सरताज, किशोर श्रीवास्तव, अनिता पण्डा, सन्त कुमार टंडन रसिक, डॉ. अंजनी कुमार दुबे भावुक जैसे वरिष्ठ लेखको ने शुभ तारिका को रचनात्मक सहयोग दिया है। इनमें अशेष, रत्नचन्द निर्झर और अकेलाभाइ का विशेष सहयोग रहा है।

आज शुभ तारिका नेपाल, मारिशस, दुवई, साऊदी अरब, इंगलैंड, नीदरलैंड, अमेरिका और देश के अहिन्दी प्रदेशों, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल चेन्नई, पोर्टब्लेयर, आसाम, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, पश्चिम बंगाल तथा समस्त हिन्दी प्रदेशों में पढ़ी जा रही है।

शुभ तारिका ऐसी रचनाओं को प्राथमिकता देती है जो जीवन के प्रति आशा और उत्साह जगाएँ। जो पाठक के हृदय में प्रेरणा और उमंग भर दे। मनुष्य समाज और संसार के पतन पर केवल विलाप करने वाली रचनाएँ हम पसंद नहीं करते। शायद यही शुभ तारिका की लोकप्रियता का प्रमुख आधार है।

शुभ तारिका विगत 38 वर्षों से न कोवल अपना अस्तित्व बनाए हुए है बल्कि निरन्तर उन्नति भी कर रही है। हमारी एक बड़ी चिन्ता इसे दीर्घजीवी बनाने की है। यह तभी सम्भव है यदि आप इसे अपना स्नेह और सहयोग देते रहेंगे। मैं अपनी ओर से आश्वाशन देती हूँ कि शुभ तारिका आपको कभी निराश नहीं करेगी।

(पूर्वोत्तर वार्ता - स्मारिका 2010, सम्पादक डॉ. अकेलाभाइ से साभार) - नवम्बर 2010

निरख - परख

(साहित्य, संस्कृति और मानवता का संवाहक)

राष्ट्रीय साहित्य परिषद, प्रगति मंच, खगड़िया (बिहार) का मुख - पत्र निरख - परख का तीसरा अंक मेरे पास आ पहुँचा है। इस द्वयमासिक पत्रिका के संपादक हैं जाने माने चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. बोढ़न मेहता विहारी। साहित्य में गंभीर चिंतन को आगे बढ़ाने और मानव मूल्यों पर अधिक जोर देने के उद्देश्य से ओत-प्रोत इस पत्रिका के नवीनतम अंक में सभी रचनाएँ स्तरीय हैं।

संपादकीय अपेक्षाकृत कुछ लम्बा होने के बावजूद कई विषयों पर सोचने पर मजबूर करता है। सम्पादक लिखते हैं - "साहित्य संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के साथ - साथ परोक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संवाद का माध्यम है। संवेदनशील व्यक्ति अपनी संवेदना दूसरों में बाँटकर निर्भर होना चाहता है। साहित्य साधना भी एक प्रकार की आध्यात्मिक साधना है।" इसी तरह वह रचनाकारों से अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बौद्धिकता की शोषण भावना का शमन करने में सहयोग की अपेक्षा करते हैं। संस्कृति की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए वह कहते हैं कि आज हमारा देश सांस्कृतिक प्रदूषण की चपेट में आ गया है। विविधतापूर्ण संस्कृति वाले इस देश की सांस्कृतिक सहिष्णुता के किले में दरारें उभर आई हैं। दरारों की वजह से बाह्य प्रदूषण के संक्रमण का संकट खड़ा हो गया है। हमारी अनेक समस्याएँ सांस्कृतिक सामंजस्य और समन्वय के अभाव में निर्मूल हो गई हैं। सम्पादकीय में डॉ. बोढ़न मेहता विहारी ने समाज में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने विस्तारपूर्वक देश की आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को खंगाला है और साहित्यकारों को तटस्थ रहकर इस पर अपनी दृष्टि केन्द्रित करने का आह्वान किया है। सम्पादक कहते हैं - रचनाकार तटस्थ द्रष्टा होते हैं। उनकी दृष्टि एक समाज और संसार के घटनाक्रमों के प्रति होती है और दूसरी अपने अन्दर की संवेदनाओं की ओर। इसलिए भले मानुष की खाल ओढ़े कुटिल जनों के प्रति रचनाकार सजग रहते हैं और ऐसे सुधी रचनाकार सभी प्रकार के प्रलोभनों की उपेक्षा पर अपनी कृति को बौद्धिक शोषण का माध्य बनने से मुक्त रखते हैं।

पत्रिका के इस अंक में आलेख, गजल, कविता/गीत, कहानी और समीक्षाएँ प्रकाशित हैं। आलेखों में महीसयी महादेवी वर्मा पर एक खोजपूर्ण टिप्पणी की गई है तो महाभारत में शैव धर्म की अवधारणा पर डॉ. ईश्वर चन्द ने विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। आलेखों में चिकित्सा और बाजार में बिकने वाले डिब्बाबन्द खाद्यों से मानव शरीर पर पड़ रहे कुप्रभावों के बारे में जानकारी दी गई है। कविताएँ सामान्य हैं। कहानियों में डॉ. बोढ़न मेहता विहारी की कहानी गरीब की बेटी एक यथार्थवादी और मर्मस्पर्शी कहानी बन पड़ी है।

समग्र रूप से देखें तो डॉ. बोढ़न मेहता विहारी द्वारा सम्पादित निरख - परख सच्चे अर्थों मे "साहित्य, संस्कृति और मानव मूल्यों का संवादक" के रूप में प्रस्तुत है।

(निरख - परख, वर्ष 1, अंक 3, जुलाई - सितम्बर 2010, सहयोग राशि - 15 रुपये, वार्षिक शुल्क 60 रुपये, सम्पर्क - सम्पादक - निरख - परख, प्रगति मंच, गाँधी नगर, खगड़िया - 851204 (बिहार)

(अक्तूबर 2010)

स्वयं सिद्धा: माँ शबरी

 

(भील संस्कृति जनित अप्रतिम जीवन-गाथा)

 

रचनाकार - डॉ. बोढ़न मेहता 'विहारी'

 

लोक जीवन को उसकी सम्पूर्ण सहजता, जीवंतता और समग्रता के साथ प्रस्तुत करता बोढ़न मेहता 'विहारी' का महाकाव्य 'स्वयं सिद्धा: माँ शबरी' डॉ. हरिवंश तरुण के अनुसार 'वनवासी भीलों की जीवन शैली एवं व्यवहार की सरलता, निश्छलता, सदभाव-संपृक्तता तथा उदारता की बोलती काव्य कथा है।'

 

2008 में प्रगति मंच प्रकाशन, गाँधी मगर, खगड़िया (बिहार) से प्रकाशित यह महाकाव्य भीलों के जन्म-संस्कार, उनके वैवाहिक रस्मो-रिवाज, उनका पहनावा, उनके नृत्यगान, उनके धार्मिक अनुष्ठान, उनके मृत्यु-संस्कार, उनके लोकोत्सव आदि का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।

 

वन के लोक जीवन से शबरी के चरित्र को लेकर महाकाव्य रचने के पीछे की पृष्ठभूमि के बारे में स्वयं कृतिकार का स्पष्टीकरण इस प्रकार है -

 

'मैंने माँ शबरी को ही अपनी रचना की नायिका क्यों बनाया? इस प्रश्न का उत्तर देने के पूर्व, मुझे उस पृष्ठभूमि की चर्चा आवश्यक प्रतीत होती है, जिसकी वजह से इस नायिका प्रधान काव्य का अंकुरण सम्भव हुआ। ...मेरी पहली कृति एकलव्य शिष्य महान खण्डकाव्य जिसका केन्द्रीय प्रकरण सत्ता सदैव प्रतिष्ठा से डरती है और सब शोषण का मूल एक है, वह है, बौद्धिक शोषण के प्रकाशन के उपरान्त मेरा आत्म विश्वास बढ़ा हुआ था। बहुत पहले से मेरा अन्तर्मन शक्तिस्वरूपा नारी की अबला संज्ञा से अपने को सहमत नहीं पा रहा था। अभी भी मुझे लगता है कि इस सृष्टि में मर्दों ने यदि किसी को सर्वादिक मूर्ख बनाया है, तो वह नारी है। नारी सहज त्याग, सेवा और सहनशीलता के कारण कूब छली जाती रही है। उसका न केवल शारीरिक शोषण होता रहा है, बल्कि इतना अधिक बौद्धिक शोषण हुआ है कि वह स्वयं भी यह मानने लगी है कि वह अबला है। मुझे ऐसा लगता है कि नारी अपनी अस्मिता, महिमा, गरिमा और आन्तरिक सामर्त्य की उत्कृष्टता को भूल गई या यों कहिए कि भुलवा दिया गया।... मैं इस विचार से सहमत हूँ कि नारी की अस्मिता, गरिमा एवं महिमा को नष्ट करने में पुरुष सदियों से अग्रमी रहा है। इस सच्चाई से आप भी सहमत होंगे कि पुरुषों की करतूत के चलते नारी सिर्फ जननी बनकर रह गई।

...नारी के अधिकार की पहचान करने के क्रम में प्रथमत: मेरे विचारों में यह आया कि परिवार की पालिका होना, गृहस्वामिनी होना उसका नैसर्गिक अधिकार है। लेकिन अपना यह प्रश्नोत्तर ही मुझे संतुष्ट नहीं कर सका। मदा को गर्भाधान, प्रसव एवं शिशु की सुरक्षा के लिए गेह, घोंसला या मांद की आवश्यकता होती है और नर मादा की संगतिलाभ के लिए उसको गृहस्वामिनी बनाने के लिए बाध्य है। बच्चे के समुचित लालन-पालन के लिए मादा का गृहस्वामिनी होना, प्रसव और लालन-पालन का अनुसांगिक है। मादा को घर उपलब्ध कराना नर का दायित्व है। भारत के लोग कन्या के विवाह के लिए घर और वर ढूँढते हैं। इसलिए घर और घरनी का सम्बन्ध पारस्परिक है, एक दूसरे का पूरक है। इस प्रकार गृहिणी या गृह स्वामिनी होना मादा (नारी) का नैसर्गिक अधिकार बनता है, बल्कि गृहस्वामिनी होना मातृत्व और वात्सल्य के राज-संस्करण के अधीन आ जाता है। ऐसी स्थिति में यह देखना पड़ता है कि आखिर नारी का नैसर्गिक अधिकार क्या हो सकता है?... मातृत्व अर्थात् गर्भाधान, प्रसव और लालन-पालन अर्थात् वात्सल्य नारी के नैसर्गिक दायित्व और कर्तव्य हैं, तो निश्चित तौर पर तत्सम्बन्धी निर्णय लेना उसका नैसर्गिक अधिकार है। वस्तुत: शारीरिक रूप से पुष्पित नारी का यह नैसर्गिक अधिकार है कि इच्छित पुरुष के बच्चों की मां बने और इस ख्याल के आते ही मेरा प्रश्नोत्तर स्पष्ट हो गया। इसी क्रम में यह स्पष्ट हुआ कि नारी को आकर्षित करने के लिए गेह बनाना, उसकी तथा उसके शिशु की सुरक्षा को सुनिश्चित करना, नर का नैसर्गिक दायित्व है। जन्म देने वाले की हैसियत से अपने जनित और उसकी जननी के लिए श्रम करना नर का नैसर्गिक  कर्तव्य है। और मधुगंधायित मादा में उसकी अनुकूलता परखना उसका नैसर्गिक अधिकार है जिसकी राह स्नेह और सम्मान निर्मित राजपथ है। नारी (मादा) को उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे अपने अनुकूल करने के लिए विवश करना बलात्कार है जो नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी अपराध है। अपने उपर्युक्त ख्यालों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए मुझे ऐसी नायिका की खोज थी जो सम्पूर्ण-नारी का प्रतीक बन सके। जो लोक परलोक अर्थात् अन्दर और बाहर दोनों रूपों में उच्चतर शिखर पर आरूढ़ हो और इस क्रम में मेरा ध्यान स्वयम सिद्धा: माँ शबरी की ओर जाना स्वाभाविक था, अब तक मेरे ख्याल में मातृत्व और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति माँ यशोदा और मां नीमा के उज्ज्वल चरित्र संरक्षित थे। जब से मैं इन दो संरक्षित चरित्रों में से किसा एक का चयन क्यों नहीं किया? क्योंकि माँ यशोदा गोकुल के सम्पन्न गोपालक नन्दजी की रानी थीं। उनके घर सम्पन्नता फलफूल रही थी। दाना-पानी, दूध-दही का कोई अभाव नहीं था। परिवार में दश-बीस खाने वालों की संख्या बढ़ जाने से किसी परेशानी की संभावना नहीं थी। नन्दगांव में नन्दजी का सामन्ती दबदबा था। माँ यशोदा तो अपनी पुत्री देकर बदले में ज्ञात कुल-गोत्र एवं सकल श्री सम्पन्न पुत्र को पाकर धन्य-धन्य थीं। वह उस बाल-मुकुन्द पर अपनी सारी ममता उड़ेलकर आनन्दमयी बनी अहोभाग्य से भरी रहती थी। उसे अपनी पुत्री से बिछड़ने की तनिक भी चिन्ता नहीं थी, जैसे उसकी नजर में वह पुत्री कानी कौड़ी थी, जिसे फेंकना ही उसकी सार्थकता हो।

दूसरी ओर निर्धन की बेटी नीमा निर्धन नीरू से विवाहित हुई थी। वह निर्धन दम्पती गौना (बाल विवाहोपरान्त बधू के सियानी होने पर पति घर बसने के लिए प्रथम बार आना) के क्रम में अपने घर लौट रहा था। उसी दौरान, पाँव पैदल चल रही पिपासित नीमा जब जल लेने लहरतारा तालाब पर गई तो जलकुम्बी और पुरईन-पत्रों पर टुकुर-टुकुर ताकते नवजात को देखकर, ममता से लबालब भरे स्नेह और करुणा की तरंगों से पुलकित गृहस्थी की मधुर संकल्पना एवं नारी सुलभ झिझक बहकर तिरोहित हो गई और वह उस शिशु को उठाकर एवं छाती से लगाकर अहोभाव से भर गई। लेकिन इन दोनों के जीवन में पति या परिजनों का कोई विरोध नहीं था, उसके मातृत्व में फूल और शूल साथ-साथ नहीं थे, जबकि माँ शबरी का अपना विशिष्ट स्थान है।

माँ शबरी का मातृत्व सम्पन्नता से दूर गिरि कानन के मध्य पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विसंगतियों के बीच, पति से परित्यक्त, गर्भाधान के बगैर बिना किसी अबोध शिशु के सहारे उत्कृष्टता के शिखर पर अवस्थित है, जो नारी की सकल गरिमा महिमा को न केवल उदघाटित करने में सक्षम है, बल्कि नारी को सहजता से मोक्ष स्थिति पाने का हकदार मानती है और स्वयं सिद्धा माँ शबरी स्वयं मुक्त होकर आदर्श प्रस्तुत करती है।

स्वयं सिद्धा श्रमणी की अथाह ममता, अन्तर्ज्योतित राम को खेलाती, दुलराती हुई मर्यादा पुरुषोत्तम अवधेसी-छैला मनोहारी राम की असीम प्रतीक्षा करती है। रोज-रोज उस वृद्धा माँ की तरह प्रवासी पुत्र के प्रियखाद्य को बनाती है, सहेजती है ताकि उसके आने पर दुलार से भेंट कर उसका हृदय, उसके नयन परितृप्त हों। मातृ प्रतीक्षा का यह अद्वितीय उदाहरण उसके मातृत्व को अप्रतिम बनाता है।... स्वयं सिद्धा: माँ शबरी के जीवन वृत्त का गठन भील संस्कृति को केन्द्र में रखकर उनकी परम्पराओं के अनुकूल किया गया है।"

रचनाकार ने इस काव्य में भीली बोली में प्रचलित संज्ञा शब्दों का 'दुस्साहसपूर्वक प्रयोग' किया है। वह कहते हैं - "हिन्ही भाषा में इन शब्दों का प्रचलन प्राय: नहीं है, तथापि भील संस्कृति की एक झलक पाठकों तक पहुँचाने के उद्देश्य से यह प्रयोग मुझे अच्छा लगा। इस प्रकार के प्रयोग और शोधजनित कथानक होने की वजह से काव्यालंकरण और प्रवाह प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके हैं, जिसके लिए मैं अपने सुधी पाठकों से क्षमा याचना करता हूँ।"

रचनाकार के अनुसार इस काव्य की रचना कथोपकथन शैली में है, जिससे पाठकों को एक ही साथ काव्य, नाटक और उपन्यास की झलक मिलेगी।

इस काव्यकृति में रचनाकार ने भील क्षेत्र की संक्षिप्त झलक भी प्रस्तुत की है जिससे पाठक इस आदिवासी क्षेत्र के भीलों के सामाजिक संगठन, उनके जन्म-संस्कार, मृत्यु संस्कार, घोटुल प्रथा, भीलों में प्रचलित विवाहों के प्रकार, पहनावा, नृत्य आदि से रुबरू हो सकेंगे।

डॉ. हरिवंश तरुण के अनुसार इस महाकाव्य में भीलों की सामाजिक गहनता, संगठन-प्रशक्तता तथा अन्याय-दुष्कृत्य-विरोध भी अपनी सम्पूर्ण मांसलता के साथ उभर कर सामने आए हैं।

इस काव्यकृति को पढ़ना एक नए अनुभव से गुजरना है।

 

समीक्षित पुस्तक - स्वयं सिद्धा: माँ शबरी ( भील संस्कृति जनित अप्रतिम जीवन-गाथा)

रचनाकार - डॉ. बोढन मेहता 'विहारी'

प्रकाशक - प्रगति मंच प्रकाशन, गांदी नगर, खगड़िया (बिहार)

प्रकाशन वर्ष - 2008, मूल्य - 245 रुपये

 

अब पवन चामलिङ 'किरण' का कविता संग्रह हिन्दी में भी

 

 - शशिभूषण द्विवेदी

सिक्किम की साहित्यिक और सांस्कृतिक दुनियां में अभी जिन दो किताबों को लेकर काफी चर्चा है, वे दोनों ही हिन्दी और नेपाली भाषाओं उस जुड़ी हुई अटूट परंपरा का प्रतिनिधित्व करती लग रही हैं जो सदियों से इस दोनों भाषाओं और संस्कृतियों का साझा है। अदभुत बात यह है कि ये दोनों किताबें मूल नेपाली का हिन्दी अनुवाद बनकर सामने आईं हैं और निश्चित रूप से इन दोनों किताबों ने एक सांस्कृतिक खाई को पाटने का काम किया है। और साहित्य के अध्येताओं के लिए बहस के एक साझा मुकाम का सृजन किया है।

एक किताब है पवन चामलिङ 'किरण' की 'क्रूसीफाइड प्रश्न और अन्य कविताएं', दूसरी है - 'भारतीय नेपाली कहानियां'। दोनों का ही नेपाली से हिन्दी अनुवाद पत्रकार, लेखक, कवि सुवास दीपक ने किया है। दीपक स्वयं हिन्दी के कवि और नेपाली के पत्रकार हैं। उनका एक उपन्यास भी हिन्दी में प्रकाशित हो चुका है। वह पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. हैं।

पहली किताब 'क्रूसीफाइड...'  पवन चामलिङ 'किरण' की 104 नेपाली कविताओं का हिन्दी अनुवाद है, जो कवि ने समय समय पर लिखी हैं। श्री चामलिङ अभी सिक्किम के पांचवें मुख्यमंत्री हैं और उनकी आठ कृतियां पहले भी प्रकाशित हो चुकी हैं। कहा जा सकता है कि वह भारतीय नेपाली साहित्य के पहचानने योग्य हस्ताक्षर हैं।

कवि 'किरण'  और राजनीतिज्ञ पवन चामलिङ के व्यक्तित्वों की आपसी टकराहट से फूटी इन एक सौ चार कविताओं के मूल में दो बातें हैं। वे ही दोनों घुमा फिराकर कवि की चिंता के विषय हैं। वे हैं 'मैं' और 'आदमी'। यह तथ्य इसी से इन कविताओं को पढ़ते हुए स्पष्ट हो जाता है कि इन सभी एक सौ चार कविताओं में से 13 कविताओं के शीर्षक में ही मैं या मेरा या इसी तरह का की न की मिलता - जुलता सर्वनाम प्रयुक्त हुआ है। ग्यारह कविताओं के शीर्षकों में ही किसी न किसी रूप में 'मानव', 'आदमी' या 'इन्सान' शब्द आए हैं। कहा जा सकता है कि ये कवि की केंद्रीय चिंता के महत्वपूर्ण बिंदू हैं और राजनीतिज्ञ तथा और साहित्य के दुहरे प्रहार को झेलता-सहता कवि इनके साथ माथापच्ची करता जीवन को बेहतर बनाने में लगा हुआ है। 47 वर्षीय कवि इसी अर्थ में इन पाटों के बीच से जीवन को बेहतर बनाने की कला की तलाश में लगा प्रतीत होता है।

कवि किरण अपने 'दो शब्द' में हिन्दी के युगपुरुष कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के हवाले से कहते हैं कि कविता सांस्कृतिक प्रक्रिया के साथ - साथ समाज अथवा वर्ग की देन भी है, इसीलिए ये कविताएं जनता की कविताएं हो गई हैं। कवि आर्थिक संपन्न्ता का भी समर्थक है। ये कविताएं 'गरीब की देह पर माघ पूस का घाम हैं', ऐसा कवि मानता है।

मैं और मानव के अलावा इन कविताओं में सिक्किम की तिस्ता और रंगीत नदियां, इदी अमीन और हिटलर जैसे क्रूर शासक, संपीर्ण क्रींति की तड़प, मां का प्यार, खेल-खलिहान, प्रेम की खोज आदि सभी मानव स्वभाव के कंप्लिमेंटरी भाव आए हैं। अनुवादक यह पता नहीं चलने देता कि पाठक अनुवाद पढ़ रहा है, हालांकि वह मानता है कि अनुवाद एक जोखिम भरा काम है।

दूसरी किताब 'भारतीय नेपाली कहानियां' के अनुवादक भी सुवास दीपक ही हैं। यह किताब भी निर्माण प्रकाशन ने छापी है। इन 35 कहानियों की पृष्ठभूमि भारत का वह इलाका है, जहां नेपाली भाषा बोली, समझी जाती है। यानि उत्तर बंगाल और सिक्किम का पहाड़ी हिस्सा, इसे भी एक जरूरी किताब कहा जा सकता है। (जनपथ समाचार,2 फरवरी 1997)

 

क्रूसीफाइड प्रश्न और अन्य कविताएं

 

 लेखक - पवन चामलिङ 'किरण', प्रकाशक - निर्माण प्रकाशन, नाम्ची (सिक्किम), 1996, मूल्य 100 रुपये

 

समीक्षक - विनोद कुमार

नाम्ची (सिक्किम) के निर्माण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'क्रूसीफाइड प्रश्न और अन्य रविताएं' पुस्तक में श्री पवन चामलिङ 'किरण' की 1970 से अब तक अर्तात् लगभग 25 वर्ष की काव्य साधना की एक झलक प्रस्तुत की गई है।

इन कविताओं में एक युवक की आकांक्षाएं तथा सपने, गरीबों के उत्थान में संलग्न एक समाजसेवी का सपर्पण तथा एक राजनेता की वैचारिक संपन्न्ता अर्थात् सभी कुछ देखने को मिलता है।

इस काव्य संग्रह में कवि के तीन प्रकाशित कविता संग्रहों 'प्रारंभिक कविताहरू', 'अन्तहीन सपना:मेरो विपना' तथा 'म को हुँ?' में से च्यनित कविताओं तथा कवि के राजनीतिक जीवन में सत्ता के सोपानों में प्रवेश करने के बाद रचित कुछ कविताओं को संकलित किया गया है।

कि ने स्वयं कहा है कि समाज में व्याप्त असमानता, जहालत और शोषण से उसका हृदय रो पड़ता है। ये सारी कविताएं उसकी इन्हीं भावनाओं को प्रकट करती हैं।

 

समाज में एकता की मिटती भावना के प्रति उसका 'सत्यबोध' कुछ इस प्रकार है -

 

इस संसार में

हम 'हम' बनकर जी सकते थे।

इज्जत के साथ

खुशी खुशी से जिन्दा रह सकते थे।

हम अकेले ही पहाड़ों को फोड़ते हैं

मैं 'मै' में तकसीम होकर

आज न तो हम 'हम' बन सके हैं

न तो कुछ बन सके हैं

कुछ न होना ही हमारी जात बन चुकी है

अभाव और असुरक्षा ही हमारा मुल्क बन चुका है।

 

समाज में धर्म, जाति, वर्ग, प्रथा के आधार पर फैल रही घृणा तथा नारियों पर हो रहे अत्याचारों की 'खंडित मानव' की कहानी कवि ने कुछ इस प्रकार व्यक्त की है:

 

धर्म और वर्ण की राजनीति से

वर्गभेद की राजनीति से

कुप्रथा, कुरीति और अन्धविश्वास से

कितना नारियां सती बन

कितने पुरुष बली चढ़कर

मौत के शिकार हो गए....

आदमी आदमी के बीच चोखा रिश्ता

स्थापित न हो सकने का इतिहास है।

 

बढ़ता जनसंख्या तथा विदेशी घुसपैठ पर प्रहार करते हुए कवि 'माँ के वियोग में' कहता है -

 

हमारे घर में तो अपरिचित

और बहुत से डरावने लोग आकर बस चुके हैं

अड्डा जमा चुके हैं।

आजकल तो हमारा घर खचाखच भरा हुआ है

अपना घर भी क्या कहें इसे

यह तो पराया घर हो चुका है।

पर्यावरण प्रदूषण तथा विशेष रूप से हिमालय को बढ़ते खतरे के कारण 'टिस्टा अभी भी मटमैली है' -

चट्टानें मिट्टी कीचड़ और फूलों के पौधे

यहां की उपजाऊ मिट्टी

देवदार के हरे पेड़

हिमालय का स्निग्ध और सौम्य सौंदर्य

इन पर्वत पहाड़ों के साथ टिस्टा में बहते जा रहे हैं

और टिस्टा मटमैली होती जा रही है...

सच्चे अर्थों में साहित्यिक अनुवाद एक कठिन कार्य है। उसमें भी काव्य का अनुवाद तो असंभव और दुष्कर कार्य है। कवि विभिन्न समय पर पृथक पृथक मानसिकताओं एवं भावनाओं से प्रेरित होकर काव्य रचना करता है। जब तक अनुवादक उसी मानसिकता तथा भावनाओं को समझकर उसमें बहकर अनुवाद करने का प्रयास नहीं करेगा तब तक काव्यानुवाद असंभव है।

शत प्रतिशत कवि की भावनाओं को प्रस्तुत करने का दावा तो कोई भी अनुवादक नहीं कर सकता। कई बार अलग अलग भाषाओं की भी अपनी अपनी अभिव्यक्ति सीमाएं होती हैं। परन्तु इस काव्य संग्रह के अनुवादक श्री सुवास दीपक ने अपनी समग्र प्रतिभा का प्रयोग करके इस काव्य संग्रह का यथासंभव सर्वोत्कृष्ठ अनुवाद किया है तथा कवि हृदय की भावनाओं को मूल रूप में प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

हिन्दी जगत को इस महान कवि व राजनेता की भावनाओं से अवगत कराकर श्री सुवास दीपक ने हिन्दी साहित्य की सेवा की है और उसकी माला में एक और मोती पिरो दिया है।

काव्य संग्रह पठनीय एवं प्रेरणादायक है तथा सभी ग्रंथालयों में संग्रह करने योग्य है।

(इम्पा फीचर, 29 मार्च 1995, नई दिल्ली)

 

 

 

पुस्तक समीक्षा)

'चकक्रव्यूह तथा अन्य कहानियां' पर मेरा अभिमत

 

श्री सुवास दीपक द्वारा रचित कहानी संग्रह 'चक्रव्यूह तथा अन्य कहानियां' मुझे उन्हीं के द्वारा भेंट में पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी, शिलांग के समारोह के बाद 25 मई को मिला - धन्यबाद।

मैंने उसका पठन, मनन किया तो लगा कि  सुवास दीपक, एक कुशल लेखक हैं। जो भाषा प्रयुक्त की है, वह जनसाधारण की है, यही विशेषता है। साहित्यकार लिखे तो जनसाधारण के लिए लिखे। भाषा का प्रवाह ऐसा है कि वह किसी पश्चिमोत्तर  प्रदेश के लेखक की है।

'धुलते बिम्ब' में हीनता एवं बेबसी का चित्र है, जो स्वाभाविक है साधारण परिवार में।

'तुमि आमाके मारते पारोना' - एक बेबस का अहं भाव है।

'टूटना....' जनसाधारण में शराब की लत जो भारत के प्रत्येक साधारण परिवार का चित्र है। हर कोई मदिराभक्त सरकार का प्रसाद समझ आचमन करता है।

'ग्राम सेवक' - में अकथनीय संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। जब स्वयं ही संस्कार-वंचित हो, तो शिक्षा या सत्संग क्या करेगा?

'चक्रव्यूह' में असफल प्रेम में फँसे मुरारीलाल की दुर्दशा उन्हें शायर बना देती है। कभी कभी अप्रत्यासित भी हो जाता है। उनकी दुर्दशा देखकर महमूद का गीत याद आ गया - मैं तेरे प्यार में क्या क्या न बना दिलवर...

सभी कहानियां सामाजिक विद्वेशपूर्ण हैं। यही होता है अविकसित समाज में। सभी कहानियां मनोवैज्ञानिक धरातल पर खरी उतरती हैं। यही लेखक की कुशलता है।

मेरी श्री दीपक को हार्दिक बधाई और पुन: मिलने की इच्छा के साथ -

 - रामप्रसाद अटल,

जबलपुर, मध्यप्रदेश।

(रामप्रसाद अटल एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। 86 वर्ष की उम्र में भी वे सक्रिय रूप से साहित्य रचना कर रहे हैं - संपादक)

 

 अमर बानियाँ लोहोरो का 'जीवन चित्र'

 

 

"छ आत्मविश्वास

आर्थिक रूपले विपन्न भए पनि

पूर्ण शिक्षित र ज्ञानी नभए पनि

 

र कुनै ओहदेदार नभए पनि

भनौं, अपूर्ण - अपूर्ण नै भए पनि

निश्चय म मान्छे हुँ

हो, मान्छे नै हुँ

मान्छे

मान्छे

मान्छे"

 

जी हां अमर बानिया लोहोरो नेपाली भाषा के एक ऐसे सजग एवं जुझारू कवि हैं जिनका दर्शन उनकी लेखनी से प्रकट होता हुआ जन - जन के हृदय में स्पंदित होता है। वे कहते हैं, मैं पहले एक आदमी हूं। और आदमी होना ही आज के दौर में सबसे मुश्किल काम है।

 

जो चट्टानों को काटकर नहरें बना देता है

दीवारें खडी करके अट्टालिकाएं बना देता है

चांद और सूरज के रहस्य बता देता है

वह आदमी ही है।

जो सीमा पर प्रहरी बन, सुरक्षा का अहसास दिलाता है

मृत्यु के मुख से भी जीवन छीन लाता है

निरक्षरों में अक्षर बन ज्ञान की दीप जलाता है

हां वह आदमी ही है।

 

यही तो है आदमी बनने का अर्थ। और इस अर्थ में अमर जी पूर्णरूपेण 'आदमी' हैं। एक अन्य कविता का बिंब देखिए -

 

यो मेरो मनको मसीमा

भावनाको कलम चोबेर

त्यो स्निग्ध आकाशको नीलोपनभरि

हृदयका शब्दहरू

मानवताका कविताहरू

निर्विराम लेखिरहूँ - लेखिरहूँ।

 

अमर जी ने जीवन को यथार्थ में समझने का प्रयास किया है। समाज में व्याप्त अनूठी विसंगतियों पर उनकी पैनी नजर ने तीखे मगर सरल भाषा में कटाक्ष किये हैं जो पाठक को विचारने पर विवश कर देते हैं -

जेले सुन्दछ

त्यो बोल्दैन

बोल्नै सक्दैन।

अनि अहँ। त्यो बोल्दैन

त्यो परन बोल्नै सक्दैन।

मुखले न केही देख्दछ

न त केही सुन्दछ

तर बाठो मुखै बन्दछ

अड्डा अदालततिर

उही अन्धो र बहिरो मुछ बोल्दछ

त्यहाँ मुख नै गवाही बन्दछ।

 

जो देखता है, बोलता नहीं, जो सुनता है - वह भी बोलता नहीं और जो न सुनता है, न देखता है, वह बोलता है। कैसी विडंबना है कि बोलने वाले की बात पर विश्वास किया जा रहा है। इसी प्रकार अमर जी के गहन चिंतन का एक अन्य बिंब -

 

हुन्न हत्य

मात्र हात-हतियारद्वारा

मात्र अस्त्र-शस्त्रद्वारा

मात्र हत्यालिप्त हातद्वारा

हत्या त कलमद्वारा पनि हुनसक्छ

वचनैद्वारा पनि हुनसक्छ

सुझाव र निर्मयद्वारा

भावना र विचारद्वारा पनि हुनसक्छ।

 

जीवन चित्र यथा नाम तथा गुण को चरितार्थ करती इस पुस्तक की प्रत्येक रचना अपने आप में जीवन का यथार्थ चित्र है। जिसमें कडुवे, माठे, कसैले एवं तीखे अनुभवों का चित्रण शब्दों की तूलिका से किया गया है। अमर जी ने जीवन की छोटी - छोटी घटनाओं पर भी अपनी लेखनी द्वारा शब्दों के चित्र अंकित किए हैं। चश्में के टूट जाने पर ही उसके महत्व का पता चलता है -

 

जबसम्म यो भग्न थिएन

तबसम्म उसको महत्व बुझिनँ

अब यो टक्क भाँचियो

तब दिलमा शूल भास्सियो।

 

अमर जी के विचार चिंतन का विषय मात्र मानव जीवन नहीं अपितु जीवन का हर पल है जिसमें देश. समाज, सभ्यता, संस्कृति, जीवन - मृत्यु दर्शन, उचित-अनुचित आचरण अर्थात सभी विषयों पर विलक्षण दृष्टि से - चिंतन व मूल्यांकन शामिल है। देश को देखने की उनकी ललक -

 

विश्व इतिहासकै

महान भारत खोज्ने - क्रममा

सुनको पंछी

आर्यवर्त/हिन्दुस्तान/भारत/इन्डिया

खोज्ने क्रममा।

यद्यपि मेरो देशको साक्षात प्राप्तिमा

म भट्किरहें - तड्पिरहें

आकुल - व्याकुल नै भइरहें म।

अन्ततोगत्वा

मेरो देशलाई देखें

सत्य मेरो देश भेटें

राष्ट्रभक्ति गीतका स्वरहरूमा

देशभक्ति कविताका हृदयहरूमा

अनि देखें इतिहासका पृष्ठहरूमा

आजादीका ती पुनर्स्मृतिहरूमा

सत्य हो त्यहाँ मेरो देश

देखें त्यहाँ मेरो देश।

 

मेरा देश कहां है, शायद इससे सुंदर वर्णन नहीं किया जा सकता। साहित्य का वर्णन करते हुए तो अमर जी ने चंद शब्दों में साहित्यसार ही बना डाला, जो उनकी विद्वता का द्योतक है -

 

मन हुँ मानवको

जो यथार्थ बाँचेर

कल्पना गर्दछु

धन हुँ धरतीको

जो सर्वाङ्गै छु

प्राण हुँ प्राणप्रियताको

जो मान्छे - मान्छेमा छु

निर्माण हुं सृष्टिको

जो दृश्य र अदृश्य छु...

 

एक अन्य रचना 'प्रश्न' में वह मनुष्य से पूछते हैं कि तुम कौन हो - हिंदु, मुसलमान, सिख, ईसाई - या?

फिर कहते हैं आदमी, स्त्री व मपुंसक होने का तो प्रमाण है, परंतु हिंदु, मुसलमान, सिख या ईसाई का क्या प्रमाण है?

'जीवन चित्र' अमर जी की मूल नेपाली कविताओं का संग्रह है जिसका अनुवाद सुवास दीपक, भीम ठताल एवं प्रवीम राई जुमेली द्वारा हिंदी व अंगरेजी में किया गया। 'जीवन चित्र' को त्रिभाषा अर्थात नेपाली, हिंदी व अंगरेजी (तीनों में एक साथ) प्रकाशित किया गया। अनुवादक विद्वानों ने अपनी विद्वता का परिचय देते हुए अनुवादित रचना में बी वही सरसता, सुगमता अवं भावप्रधानता बनाए रखी है। नंदराम भट्टराई अवं विमला भट्टराई जी ने अपनी अमूल्य निधि से इस पुस्तक का प्रकाशन कराकर अपने साहित्य अनुराग का उदाहरण पेश किया है। जीवन चित्र में 32 रचनाओं का नेपाली, हिंदी व अंगरेजी में संकलन किया गया है। नेपाली भाषा के जाने माने विद्वानों द्वारा पुस्तक एवं लेखक के बारे में व्यक्त विचारों से अमर जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के दर्शन होते हैं। इससे पूर्व भी अमर जी के दो संग्रह भावधन काव्याणु प्रकाशित हो चुके हैं।

अगर संक्षेप में कहूं तो अमर जी एक सच्चे एवं सरल कवि हैं। जीवन में घटने वाली हर छोटी - बडी घटना से भी वे आहत होते हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे अंधकार से लडने की प्रेरणा देते हैं, मानव बनने का सपना देखते हैं तथा देश एवं ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से प्रकट होते हैं। जीवन चित्र का आवरण, जो बी मणि थुलुङ ने बनाया है, जीवन की जटिलताओं को चित्रित करता है और बहुत ही आकर्षक एवं उपयुक्त बना है।

भव्य आवरण, साफ - स्पष्ट छपाई एवं त्रुटिहीन मुद्रण पुस्तक में चार चांद लगाते हैं। इस संग्रह की रचनाएं पठनीय, मननीय अवं आचरणयोग्य हैं। पुस्तक संग्रहणीय है।

 

लेखक को सशक्त लेखन के लिए हार्दिक बधी अवं भविष्य के लिए शुभकामनाएं।

 

- ए. कीर्तिवर्धन, email - a.kirtivardhan@gmail.com

 

समीक्षित पुस्तक  - जीवन चित्र, लेखक - अमर बानियाँ लोहोरो,

 प्रकाशक - नंदराम भट्टराई एवं विमला भट्टराई, मूल्य 250/ -

लेखक का पता -

अमर बानियाँ लोहोरो, पो.आ. साम्दुर - 737102, गंगटोक (सिक्किम), मो. 098320 - 92104

(मई 2010)

 

अमर बानियाँ 'लोहोरो' के 'जीवन चित्र' के वैचित्र्य

 

-डॉ. वेद 'व्यथित'

जो भी हमें दिख रहा है वह चित्रवत ही तो है। इसी प्रकार जब हम जीवन को देखते हैं तो कितने ही रंगीन व धूसरित चित्र आंखों के सामने से गुजरते हैं। उनमें कुछ इतने चटख या आकर्षक होते हैं कि मन को अपने आप चलने को वाध्य कर देते हैं और ऐसा आबद्ध करते हैं जो छुड़ाए नहीं छूटता। मुक्त कराएं भी तो नहीं होता। उससे वह एक रस हो जाता है, उसमें अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है, उसमें खो जाता है। वह स्वयं भी चित्रवत हो जाता है। उसमें पृथक रहता ही नहीं - 'जित देखूं उत तू ही तू',  'कैसया खेल रचयो मेरे दाता जित देखूं उत तू ही तू या  'आप ही कलियां आप ही माली, आप ही तोड़ता जी',  'या 'जल में कुंभ कुंभ में जल का भेद परंतु  'फूटता कुंभ जल जलहि समाना'  बाहर-भीतर पानी, एक पानी, एक रस, एक आत्मा, एकाकार सब कुछ एक ब्रह्म द्वितीय नास्ति, सब कुछ अद्वैत में समाहित दूसरा कुछ भी नहीं।

ऐसे ही चित्र अमर बानियां 'लोहोरो'  ने 'जीवन चित्र'  काव्य संकलन में प्रस्तुत किए हैं। जंगम के स्थावर के, जड़ता के ऐश्वर्य के, सत्य के अहिंसा के करुणा के, मानवीय मूल्यों के उदात्त गुणों के। 'लोहोरो'  ने जीवन के कितने ही रंग एक साथ एकत्र किए हैं। कितनी ही लघु और दीर्घ तूलिकाएं इकट्टी की हैं और विशाल पृथ्वी ग्रह तथा ब्रह्माण्ड को कैनवास मान कर चित्र रचना की है - 'सात समुंद की मसी बना कर लेखनी अब बनराई'  बना कर जो जो भी जैसा जैसा भी चित्र बनता गया,  'लोहोरो'  उसे उसी तरह चित्रित करते रहे क्योंकि यह जीवन चित्र प्रतिबिंब है 'कविता भी दर्पण में दिखता प्रतिबिंब है। जिस प्रतिबिंब में जीवन जगत और दार्शनिकता का त्रैकालिक चित्र स्पष्ट दिखता है।' पृ. 28

जीवन के इस चित्र को स्पष्ट देखना कोई आसान काम नहीं है क्योंकि कबीर इस विषय में कहते हैं कि 'मैं कहता आंखन की देखी' परंतु 'तू राख्यों उरझाई रे'  यानि जहां आंखों देखी भी झूठी हो सकती है और कानों सुनी भी। यही तो भ्रम है, यही तो माया है, यही तो व्यक्ति यानि जीव और ब्रह्म के बीच का आवरण है और जब ईश्वर की अनुकंपा होती है तब यही आवरण हट जाता है, समाप्त हो जाता है। फिर कुछ बिलग नहीं रहता। इसी लिए अमर बानियां 'लोहोरो'  ने इसे पहचान कर कहा है -

 'इसीलिए कई सच्चाइयों में

 झूठ भी हो सकते हैं

जहां वे वास्तविक गवाह विस्फारित आंखों से देखते रहते हैं

अवाक् सुनते रहते हैं -

बताओ यह कैसा सत्य है

कैसा अद्भुत महासत्य है!' - पृ. 3  

क्योंकि

'आंखें नहीं

 कई बार अंगुलियां भी देखती हैं

जैसे आंखें बोलती हैं

वैसे ही अंगुलियां ही नहीं

 नासिका भी देखती है

कान भी देखते हैं

यानि रोम रोम देखने लगता है

इसलिए ठीक नहीं है

केवल आंखों के भरोसे रहना'

 या

 ' यूं तो खुली ही रहती हैं आंखें

और पलकें भी

फिर भी देखती नहीं हैं उसे

जिसे देख रही होती हैं।'2

इसी लिए अमर बानियां 'लोहोरो'  व्यक्ति की बात करते हैं, देखने सुनने और समझने की नहीं क्योंकि ये सब क्रियाएं भरोसे के लायक नहीं हैं परंतु जो देखता,  सुनता या समझता है वह ईश्वर की कृति है उसे भौतिक साधनों की जरूरत नहीं, वह ईश्वर की एक संपूर्ण रचना है। ईकाकी प्राणी है, उसके पास अलग अलग इंद्रियां व समान इंद्रियां होने पर भी समान क्षमता नहीं है परंतु बात क्षमता की नहीं उस प्राणी की है या ईश्वर की रचना की है जो समान है फिर उसमें यानि मनुष्य-मनुष्य में पृथकता कैसे हो गई। उसमें ऊंच-नीच का भेदभाव कैसे आ गया क्योंकि जो जीवात्मा उसके अंदर है वह तो सब में एक ही है। फिर मानव मानव से पृथक कैसे हो गया क्योंकि व्यक्ति की तो एक ही बात है और वह है मानव की जात क्योंकि उसके पास प्राकृतिक प्रमाण है परंतु अन्य प्रमाण तो उसने स्वयं बनाए हैं, स्वयं गढ़े हैं, स्वयं ओढ़े हैं जिनसे ये विभेद उत्पन्न कर लिए हैं। इसी लिए 'लोहोरो'  पूछते हैं -

 'लेकिन ए मानव!

 मैं पूछता हूं तुम्हें

तुम्हारे पास ऐसा कोई प्रमाण है

  उसकी कोई पहचान है?

क्या तुम वही हो?

 अपने दुराग्रह को नहीं छोड़ते हो

कट्टरता, हठधर्मी नहीं छोड़ते हो

मैं तुम्हें पूछ सकता हूं?

 कहां है तुम्हारा वह जन्मजात प्रमाण? (पृ0 95)

क्योंकि ' एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले कौम मंदे'  या एक राह से सब जग आया'  परंतु फिर भी पता नहीं क्यों हमने ये विभेद पैदा कर दिए हैं। हमारे स्वार्थों ने इन्हें जन्म दिया है। इसी लिए इस विश्व को दो-दो भयंकर विश्व-युद्धों की विभीषिका झेलनी पड़ी। व्यक्ति-व्यक्ति में भेद आतंक जैसा वीभत्स कर्म आखिर क्यों? क्योंकि हमने अपने प्राकृतिक ईश्वरप्रदत्त रूप को विकृत कर दिया है। जिससे वह अलग-अलग दिखाई दें,  उसकी एकरसता या एकरूपता समाप्त हो जाए। आखिर आवश्यकता क्या है इस सब की?

इसलिए आज तुरंत यह चाहिए कि मानव इस विभेद को तुरंत समाप्त करे।

'अब अविलंब रुक जाएं यहीं

और पहचानें सही रास्ते को

अपनी भूल यात्रा की

अनंत सभ्यता, प्रगति और शांति के रास्तों को।' पृ. 91

परंतु हो उल्टा रहा है, हम सही रास्ते से अपने आप को कोसों दूर पाते हैं। अपितु उसके स्थान पर अब

'अभिशप्त हाथों के

अब लह-लह बढ़ रहे हैं

 परिवृत्ति के दूषित पौधे

विश्वव्यापी कुविचार।'  - पृ. 29।

यही एक बड़ा कारण है विश्व को आतंक की चपेट में लाने का इन्सान को इन्सान न समझ कर अपना और पराया समझने का क्योंकि आज मन प्रदूषित है। उससे उत्पन्न वचन या वाणी तो स्वत:  प्रदूषित होगी ही। इसलिए ही तत्जन्य कर्म भी प्रदूषित हो चुके हैं।

इसलिए आज आवश्यकता है मन की पवित्रता की जिससे यह विभेद दूर हो सके। 'अंन्तर के पट खोल रे तोहे पीऊ मिलेंगे' - यदि यह संकुचित वृत्ति या कट्टरपन के पट नहीं खोले तो वह मन का ईश्वर कहां दिखाई देगा

 'तुम मंदिर, बौद्ध विहार, गुरुद्वारा जाते हो

तुम मस्जिद, चर्च जाते हो

 जाने को तुम हर पवित्र स्थल जाते हो

लेकिन क्या तुम देख सकते हो?  ईश्वर कहां है?

क्या तुमने देखा है? - पृ. 41

नहीं पता चलेगा कि भेद मिटाए और हम उलझ जाएंगे वाह्य तत्वों में, ऊपरी दिखावे में मात्र कर्मकाण्ड में, पूजा और नवाज में और पीछे छूट जाएगा सारतत्व जिसकी मनुष्य को तलाश है। वह सारतत्व आडम्बररहित ईश्वर का स्मरण है। उसकी रचना से प्रेम है।

वास्तव में भारतीय दर्शन में आदि शंकराचार्य ने  अद्वैत का जो सिद्धान्त दिया वह अनोखा है। उसी को समझ कर जीना वही होकर जीना ब्रह्म ही सर्वत्र दीखना, यही अद्वैत है। इसीलिए यह एक ऐसी खुमारी है जो चढ़ कर कभी उतरती नहीं, उसकी तन्हाई कभी दूर नहीं होती। यदि यह खुमारी एक बार चढ़ जाए तो बस फिर क्या पूछो। इसी लिए महान सन्त गुरु नानक देव ने लिखा 'नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।

'इसीलिए 'लोहोरो'  लिखते हैं

'इसीलिए इस नशे में

 एक दूसरा ही आनन्द है

एक दूसरा ही मजा है

 बहुत अलग है यह नशा

 भिन्न है यह मदिरा

मेरे मन की यह मदिरा।' पृ. 136

यदि यह खुमारी नहीं चढ़ी तो व्यर्थ है जीवन, बेकार है, किसी काम का नहीं। क्योंकि व्यक्ति का जीवन ही कितना है 'पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात/ देखत ही छुप जाएगा ज्यों तारा परभात।यही बात लोहोरो कहते हैं  -

 'क्षणिक ओस की तरह विलुप्त हो

पहाड़ मैदान और मरुभूमि में

 कालखंड में

 उन युग-युगान्तों के बीच

 कहीं झिलमिलाती बत्तियों में

उत्साह के रंग बन

कहीं अदृश्य रातों में

कल्पनागत दृश्यों में

आस्थाओं के स्वभाव बन...'141-42

परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम पलायन करें जीवन से अपितु 'परहित सरस धरम नहीं भाई'। इसीलिए दूसरों के हित हमारा यह तुच्छ जीवन काम आ सके तो यही है इसकी सार्थकता -

'हे मेरे मेघ मित्रो

 ऐसी बातें सुनकर

इस तरह पलायन न करें हम

लुप्त न हो जाएं हम

बल्कि दुगने उत्साही बन

मरुस्थलों को भी

 हरियाली में तब्दील कर हें

और इस विश्व आकाश में

अनन्त भावचित्रों में जिन्दा रहें

 '

 

 इसी तरह जीते रहें

जीते रहें इसी तरह।' पृ.120

यही भाव है इस देश की प्राचीन संस्कृति का,  मूल्यों का,  परंपराओं को कि हम सबसे सुख और कल्याण के लिए प्रार्थना करें सर्वे भवन्तु सुखिन: केवल इसी देश की परंपरा है। इसी परंपरा का निर्वहन 'लोहोरो'  कर रहे हैं - 

'मैं बुद्ध बोल रहा हूं

बाध्यतावश बोल रहा हूं

लेकिन सर्व हिताय सर्व सुखाय के लिए ही बोल रहा हूं। -पृ.107

तथा इसी प्रकार 'संपूर्ण प्राणी की शांति और सुरक्षा चाहता हूं।' - पृ. 68

परंतु यह सब इतना आसान नहीं है,  इसके लिए इस देश ने बहुत कुछ इन अच्छाइयों के लिए बलिदान किया है। बलिदान इस देश की परंपरा है और यदि इस देश में रह कर हमने इन परंपराओं को, बलिदानों को न जाना, उनके प्रति मस्तक नहीं झुकाया तो जीवन व्यर्थ है। इसलिए जरूरी है कि इस देश को जानने के लिए उसके इतिहास को जानना, स्मृतियों को जानना तभी हम निभा पाएंगे इन परंपराओं को -

अन्ततोगत्वा

अपने देश को देखा

सचमुच अपने देश को मिला

 राष्ट्रभक्ति के गीतों के स्वर में

 देशभक्ति की कविता के दिलों में

और देखा इतिहास के पन्नों में

 आजादी की उन पुनर्स्मृतियों में

 सचमुच वहां देखा अपना देश

 वहां देखा अपना देश।' पृ. 56.

इस प्रकार देश के लिए अमर बानियां 'लोहोरो'  के नमन के साथ मेरा भी नमन है।

'जीवन-चित्र'  जैसी सुंदर कृति के लिए मैं अमर बानियां 'लोहोरो' को बधाई देता हूं।

 

(अनुकम्पा 1577, से. 3, फरीदाबाद-121004)

 

अमर बानियां 'लोहोरो'  के काव्याणु का अवलोकन

 

वीनता और विविधता व्यक्ति का वैशिष्ट्य है। वह प्रत्येक क्षण कुछ नया करना चाहता है। व्यक्ति की यही उत्कंठा उसे सक्रियता के साथ-साथ जीवट भी प्रदान करती है या यह ही उसकी जिजीविषा का कारण बनती है तथा उसमें सर्जना की पीड़ा भी जागती है। वह प्रसूति-पीड़ा के सुखद परिणाम की प्रतीक्षा स्वरूप कुछ ऐसी सृष्टि कर देता है जो नवीनता, चारुता, सैद्धांतिकता, उपयोगिता अपने आनंद के संप्रेषण के सर्जक या कवि तथा सहृदयी-पाठक दोनों को अभिभूत कर देता है। यही है नवीन सर्जन और उसकी उपादेयता। ऐसा ही सफलतम प्रयास पूर्वोत्तर की सुंदर, मनोहारी, शस्य-श्यामला भूमि के चिंतनशील कवि, युवा सर्जक तथा नेपाली भाषा के सशक्त हस्ताक्षर अमर बानियां 'लोहोरो'  का काव्याणु है।

काव्याणु एक लघु आकार यानि एक पंक्ति या एक चरण की या नेपाली भाषा मे 'एक हरफे कविता' की सुंदर पुस्तक है। यह नेपाली भाषा में लिखी गई है। नेपाली भाषा की लिपि देवनागरी होने के कारण तथा सांस्कृतिक एक्य होने के कारण यह नेपाली भाषा-साहित्य के लिए तो अनुपम है ही अपितु हिंदी भाषियों के लिए चिंतन-मनन, पठन-पाठन तथा आनंद-अनुभूति का विषय भी है।

'लोहोरो'  ने आज के सामाजिक परिवेश के दंश को झेलते हुए ही इसकी रचना का निर्णय लिया है। कुछ वर्ष पहले तक जिस प्रकार लंबे-लंबे पत्र लिखने के स्थान पर दूर संचार क्रांति ने पहले तो पत्रों को फोन द्वारा बातचीत में समेटा और बाद में उसका स्थान भी एसएमएस यानि लघु संदेशिका को जिस प्रकार प्रचलन में ला दिया उसी प्रकार लोहोरो ने काव्य जगत में भी ऐसा ही सफल प्रयोग करके इसे प्रचलन में लाने का भरपूर प्रयत्न करके एक अदभुत और प्रशंसनीय कार्य किया है।

जिस प्रकार आज दुनिया में समय के अभाव को सिद्ध किया जा रहा है उसी के अनुसार फैशन या समय की मांग के अनुसार लगता है काव्याणु का प्रचलन निकट भविष्य में प्रमुखता तथा प्रचुरता से होने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं जैसे जापानी कविता की छोटी-छोटी विधाएं तंका और हाइकू भारत में प्रवेश पा गई इसी प्रकार लगता है काव्याणु अपनी पैठ बना ले परंतु इसका श्रेय जाएगा अमर बानियां लोहोरो को ही।

काव्याणु जहां शिल्प की नवीनता लिए हुए है विषय की नवीनता और विविधता भी लिए हुए है। परमानंद सहोदर जैसे साहित्यिक गुण को अपने आप में समेटते हुए काव्यानंद की रस-निष्पत्ति कराने में यह काव्याणु पूर्णत:  अमर और समर्थ है। असी म आनंद जैसे आध्यात्मिक विषय से लेकर साम जैसे पुरुषार्थ एवं आधुनिक जीवन शैली के विभिन्न अंगों यानि अनेकानेक सांसारिक विषयों को काव्याणु के रूप में लोहोरो ने इसमें चित्रित किया है। यह एक पंक्ति में एक बड़े विषय को समेटने का एक अदभुत प्रयास बड़ा कठिन कार्य है परंतु उन्होंने इसे सहज और रुचिकर बनाने का सफल प्रयास किया है। उनका यह प्रयास ही इस काव्याणु की तथा लोहोरो की विशेषता है। उनकी उपलब्धि काव्याणु का आनंद है। यथा - दैनिक निंदा - 'मृत्युको निरंतर पूर्व अभ्यास।' (पृ.22) मृत्यु - 'एक जीवनको पूर्ण विराम।' संसार - 'ईश्वरीय सृष्टिको अनुपम लीला।' अहम - 'आत्मोन्नतिको बाधक तत्व।'  दयाभाव - 'ईश्वरको हटात् स्मरण।' ...आदि ऐसे ही अनेक गंभीर विषयों को कुछ शब्दों में पूर्णता से प्रस्तुत करके पाठक को चमत्कृत तथा उपकृत किया है। पाठक को सहजानंद की अनुभूति के संप्रेषण में यह पूर्ण समर्थ और सार्थक है। निश्चित ही लोहोरो के इस प्रयास का साहित्य जगत में स्वागत होगा।

पुस्तक का नाम - काव्याणु, मूल्य -दो रुपये, लेखक - अमर बानियां लोहोरो, प्राप्ति स्तान - पो.आ. साम्दुर - 737102, गान्तोक, सिक्किम।

- डा. वेद 'व्यथित', अध्यक्ष, भारतीय साहित्यकार संघ, अनुकंपा 1577, सै.3, फरीदाबाद - 121004, हरियाणा।