कहावतें जिन्दगी की सच्चाइयों
का निचोड़ होती हैं। वे
बहुत थोड़े शब्दों में बहुत बड़ी सच्चाई को कह पाने की क्षमता
रखती हैं। एक बहुत बड़े सामाजिक यथार्थ का बोझ अपने कन्धों पर
ढोती आ रही इस कहावत में सिर्फ बिल्ली और उसके गले तक पहुँचकर बंध सकने
वाली घंटी ही मुख्य पात्र नहीं हैं पर एक बहुत बड़ी भूमिका
निभाने वाली शक्शियत को आप भूल रहे हैं, वे हैं चूहे। गरज यह
कि यदि चूहे नहीं होते तो बिल्ली के गले में घंटी बाँधने की
परिकल्पना ही नहीं की जा सकती थी। चूहे इस सामाजिक यथार्थ की
रीढ़ की हड्डी हैं।
इस कहावत की परिकल्पना करने
वाले ने बिल्ली, घंटी और चूहों को जिस किसी का प्रतीक बनाया हो
उस पर अमल न करते मैं आज इस कहावत को नया रूप देने जो रहा हूँ।
जिस तरह विदेशी कृतियों से कथानक चुराकर फिल्म निर्माताओं के
लिए फिल्मी लेखक धाँसू पटकथा लिख देते हैं, ठीक उसी तरह मैंने
भी इस खांटी देसी कहावत में अपनी सुविधा के अनुसार रद्दोबदल की
है और सरेआम इस गुस्ताखी और चोरी को कबूल कर रहा हूँ।
मेरी परिकल्पना में बिल्ली
मेरी पत्नी है जो मेरे इस देश की ही नहीं बल्कि सारी दुनिया की
पत्नियों का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व करने की क्षमता रखती है।
बिल्ली बनाम पत्नी के गले की घंटी में कोई परिवर्तन करने की
जरूरत नहीं। घंटी क्योंकि खुद नहीं बजती इसलिए उसके अस्तित्व
को यथावत रखा जा सकता है और चूहे बनाम पति की भूमिका में पिछले
बीस सालों से बखूबी पूरी निष्ठा के साथ निभाता आ रहा हूँ। सभी
पत्नी - पीड़ित, बिल्ली - पीड़ित पतियों बनाम चूहों का मैं
प्रतिनिधित्व करता हूँ और इस भूमिका में परम्परागत चूहों के
नक्शेकदम बड़ी आज्ञाकारिता से चलता आ रहा हूँ।
अब आएँ असली मुद्दे पर। बिल्ली
की भूख असीमित है, उसकी कोई सीमा नहीं है। यह भूख बाजार में
टहलते साड़ियो की दुकान पर नजर पड़ते ही, पड़ोसिन को नई साड़ी
में देखते ही और हमारे बेडरूम में घुस आए टीवी महाशय के जरिए
अपना उग्र रूप धारण करने लगती है। साड़ियों की दुकानों,
पड़ोसियों की बीवियों और टीवी की नित नई साड़ियों से सजी - धजी
रूपसियों को देखता हूँ तो पत्नी पर गुस्सा नहीं आता पर इन्हीं
रूपसियों पर आने लगता है। पर उन्हें तो कुछ कह नहीं सकता इसलिए
पत्नी के आगे घुटने टेकने के अलावा मेरे पास और कोई विकल्प
नहीं रहता।
सुबह - शाम इस कद्र घुटने
टेकने से तंग आकर पत्नी बनाम बिल्ली की असीमित भूख पर अंकुश
लगाने के लिए मैं तमाम पत्नीपीड़ित पतियों अर्थात् चूहों को
इकट्ठा करता हूँ। उन सभी का प्रतिनिधि होने की वजह से मैं भी
प्रस्तावित
सभा का प्रतिनिधित्व कर रहा होता हूँ। पत्नी रूपी बिल्ली का
आतंक दिलो - दिमाग पर छाया है पर चूंकि मेरे पीछे मेरे तमाम
सहकर्मी हैं इसलिए मैं कुछ अतिरिक्त हौसला बटोरकर मंच पर पड़ी
एक लड़खड़ाती कुर्सी पर धंसा हूं। हौसला उसी तरह का है जैसे एक
मशहूर पत्नी पीड़ित कार्टूनिस्ट से उसकी पत्नी ने पूछा - जब भी
आपके ससुराल जाने का मौका आता है आप
काँप उठते हैं, आपको बुखार
चढ़ जाता है। जब इतना डरते हो तो मेरे साथ शादी करने के लिए
आने की हिम्मत कैसे हुई? पति ने कहा
- तब मेरे साथ डेढ़ सौ बाराती थे।
पर आज
चूँकि डेढ़
सौ से भी कई
गुणा ज्यादा पत्नीपीड़ित पतियों के समर्थन में हम एक बहुत बड़े
ऐतिहासिक निर्णय पर हस्ताक्षर करने जा रहे थे इसलिए हौसला वाकई
बुलंद था।
चारों ओर देखता हूँ, पति, पति, पति और पति। चूहे, चूहे, चूहे
और चूहे। पतियों और चूहों के इमेज मिक्स हो गए थे। कौन चूहे
हैं और कौन पति - यह अन्तर कर पाना असम्भव नहीं तो मुश्किल
अवश्य था। समुद्र की तरह फैले इस विशाल कैनवास पर मुँह लटकाए,
पत्नियों बनाम बिल्लियों से आतंकित और प्रताड़ित होते हुए भी
उनके विरुद्ध हौसला जुटाते हुए भी निरीह प्राणियों की तरह लग
रहे थे।
मैं कुर्सी के किसी नेता की
तरह चिपक गया था। और इसी जद्दोजहद में भूल गया था कि मैंने किस
मकसद के लिए यह सभा बुलायी थी। नींद से जैसे जागते हुए मैं
उठता हूँ और माइक की ओर जाने लगता हूँ मगर घिसी चप्पल में
पायजामे का पाइँचा उलझ जाने से मैं औंधे मुँह गिर पड़ता हूँ।
मेरे सहकर्मी समझते हैं कि मैं गश खाकर गिरा हूँ। कुछ
मंच पर चढ़ जाते हैं और अखबार से मुँह पर हवा देने लग जाते
हैं। कोई कहता है - पानी छिड़को थोबड़े पर तो भीड़ से कोई
चिल्लाता है - सभापति को मिर्गी का दौरा पड़ गया है, जूते
मारो, नहीं, सुँघाओ। यह सुनते ही मैं फुर्ती से खड़ा हो जाता
हूँ और हाथ जोड़कर अर्ज करता हू कि मुझे जूते मत मारो... नहीं,
नहीं...मत सुँघाओ, मैं ठीक हूँ। जल्दी ही माइक पकड़कर सभी को
वस्तुस्थिति से अवगत कराता हूँ कि मुझे जूते मारने या सुँघाने
की जरूरत नहीं।
शोरगुल कुछ थमता
है और मैं
अपना भाषण शुरू करता हूँ - इस दुनिया के पत्नीपीड़ित पतियो
बनाम चूहों, मेरे साथियो! आज की सभा
मैंने भांग पीकर आपके मनोरंजन के लिए नहीं बुलायी है बल्कि
इसका एक उद्देश्य है एक मकसद है। सदियाँ बीत गईं, हम एक नामर्द
कौम के वारिस लकीर के फकीर बने रहे और हमेशा पिटते रहे, पिसते
रहे, कदम - कदम पर हम नाचीज पत्नी बनाम बिल्ली की असीमित भूख
के शिकार होते रहे। अपनी कौम के संरक्षण और सम्वर्धन के लिए
कोई उपाय निकाला नहीं तो तुम बीते इतिहास के एक अंश के रूप में
सिर्फ अजायबघरों की शोभा बढ़ाने लायक रह जाओगे। जमाना बहुत
खराब है मेरे दोस्तो! पत्नियों बनाम
बिल्लियों के इस निरंकुश रवैये पर यदि अंकुश लगाने में तुम
कामयाब नहीं हुए, अर्थात् उनके गले में घंटी बाँध नहीं पाओगे
तो फिर यह न कहना कि मैंने अर्थात् मूसानन्दन प्रसाद सिंह
'पीड़ित'
ने आपको पहले नहीं बताया था।
कुछ पलों के लिए दूरदर्शन पर
समाचार पढ़ते समाचार वाचक के मानिटर पर नजर डालने की तर्ज में
मैंने मेरे सहकर्मियों की ओर कनखियों से देखा तो उन सबके
चेहरों पर यथास्थितिवाद की मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। चेहरे
सपाट थे, कोई प्रतिक्रिया नहीं थी उनपर।
उन निर्जीव जिस्मों में प्राण
फूँकने के लिए मैंने वीर रस की एक हुँकार भरी। पत्नी की हुँकार
और चिंघाड़ के आदी हो चुके मेरे सहकर्मी मेरी हुँकार को भी
अपनी - अपनी पत्नी की हुँकार समझ बैठे और कछुओं की तरह अपने
कोटरों में दुबक गए।
परिवर्तन की प्रक्रिया जिन्दा कौम में होती है पर एक कहावत के
चूहों में तब्दील हो चुके मेरे सहकर्मी परम्परा के उस हिमालय
को कैसे धराशायी कर सकते थे? मुझे
लगा मैं अन्धेरे में लाठियाँ भाँज रहा हूँ फिर भी मैंने अन्तिम
प्रयास करके ऊँची आवाज में कहा - मैंने आप लोगों को यहाँ आने
से पहले सूचना भेजी थी कि अपने - अपने साथ एक एक घंटी भी जरूर
लेते आएँ। मुझे आशा है आप उसे लाना नहीं भूले होंगे। आज इस सभा
में अपनी - अपनी पत्नियों बनाम बिल्लियों के गलों में बंधने जा
रहीं घंटियों को साक्षी रखकर हम यह प्रण करेंगे कि आज शाम को
यदि हम इस अभियान में सफल नहीं हुए तो..."
"तो
हम इन्हें दरिया में फेंक देंगे।"
बीच में किसी मसखरे पति बनाम चूहे ने तीर फेंका।
ठहाकों का एक लम्बा दौर चला।
सम्भवत: सदियों से ये इतने जोर से
और पत्नियों के आतंक से मुक्त इतना हँसे हों। बड़ी मुश्किल से
उन्हें शान्त कराकर मैंने फिर कहा, "दोस्तों,
यह मजाक का वक्त नहीं है। यह तुम्हारी परीक्षा की घड़ी है और
ऐसे मौकों पर तुम्हें मजाक सूझ रहा है। मैं तो कह रहा था...
मैं तो कह रहा था...मैं क्या कह रहा था...?
मैं...मैं...
"...अरे
क्या बकरी की तरह मिमिया रहा है, असली मुद्दे पर आ।"
"तो
दोस्तो! मैं कह रहा था कि घंटी तो
आप लाए ही होंगे। वैसे यह घंटी सदियों से हमारे पास मौजूद है
पर आजतक हम उस गले तक पहुँचा ही नहीं पाए जहाँ इसे बाँधना था।
पर आज आपको इस परियोजना के ठोस और वास्तविक कार्यान्वयन के लिए
आगे बढ़ना है।"
भीड़ में कुछ हलचल होती है।
चालीस पार कर चुके कुछ पति बनाम चूहे उठकर मेरे पक्ष में मतदान
करते हैं। धीरे - धीरे, स्वेच्छा से नहीं पर दूसरों का अनुकरण
करके कुछ और खड़े हो जाते हैं। फिर एक - एक करके एक विशाल जन
समूह हाथों में घंटियाँ लिए खड़ा हो जाता है। सभा गृह में
घंटियाँ बज उठती हैं। मेरी आवाज घंटियों की मिश्रित आवाज में
दब जाती है। कानों के पर्दों को फाड़ देने वाले इस महाशोर से
बचने के लिए मैं अपने कानों को हथिलियों से ढक लेता हूँ। फिर
भी आवाज बंद नहीं होती। मैं बेहोश होकर गिर पड़ता हूँ।
...जब होश आता है तो पता चलता
है कि मैं अपनी खाट से गिरकर नीचे फर्श पर पड़ा हूँ। घंटियों
की आवाज अभी भी कानों में सुनाई दे रही है पर यह घंटी मेरे
सिरहाने टेबल पर रखी टाइम पीस की घंटी है। औंधे मुँह गिरने से
अभी उठ नहीं पाया हूँ। आँखों में धुँधलापन - सा है। बड़ी
मुश्किल से करवट बदलकर सीधा होता हूँ तो आँखों के आगे एक
धुँधला बिम्ब उभरता है। फिर धीरे - धीरे वह बिम्ब स्पष्ट होता
जाता है और एक आकार ग्रहण करने लगता है आँखों के सामने। मुझे
दिख रहा है एक बहुत बड़ी बिल्ली मेरे ऊपर झुकी हुई है और जिस
प्रकार एक बिल्ली अपनी गिरफ्त में आए चूहे को उदरस्थ करने से
पहले अपने पंजों से इधर - उधर उचालती है ठीक वैसी हरकत वह
बिल्ली मेरे साथ कर रही होती है। मैं आँखें फाड़ - फाड़कर
देखता हूँ तो वह भारी - भरकम बिल्ली मेरी पत्नी में तब्दील हो
जाती है। गर्दन पकड़कर वह एक ही झटके से मुझे उठाकर सीधा करती
है और कहती है - "क्यों जी, सपने
में क्या घंटी - घंटी चिल्ला रहे थे?
जब देखो नींद में घंटी घंटी बड़बड़ाते रहते हो। तबीयत तो ठीक
है न?"
और वह एक उबासी और बेहूदी सी
अंगड़ाई लेकर खाट पर सो जाती है। मुझसे कहती है रौब जमाकर,
"जाओ चूल्हे पर मेरे नहाने का पानी
चढ़ा दो और सुनो दीमकचन्द गिलहरी प्रसाद साड़ी वाले के यहाँ
जाना है। नाश्ता जरा जल्दी तैयार करना। मैं थोड़ी देर सुसता
लेती हूँ, रात भर तुम्हारे बड़बड़ाने से नींद पूरी नहीं हो
पायी।"
...भाइयो!
मैंने कहावत को एक नया रूप देने का बीड़ा उठाया था पर अब इस
नतीजे पर पहुँचा हूँ कि यह मेरे वश का रोग नहीं है। पत्नी बड़ी
मासूमियत से खाट पर पड़ी सुबह की मीठी नींद ले रही है और मुझे
एक शे'र याद आ रहा है। आपको सुनाकर
रसोई घर की ओर चलता हूँ। शे'र अर्ज
करता हूँ जो मेरी पत्नी को समर्पित है -
इस सादगी पर कौन न मर जाए
अब खुदा
लड़ते हैं मगर हाथ में
हथियार नहीं।
(चक्रव्यूह तथा अन्य कहानियाँ,
निर्माण प्रकाशन, सिक्किम, 2004 से साभार)
जनवरी 2012
तीन लघु कथाएँ
जय श्रीराम
डॉ. रामनिवास
'मानव'
जिन
में राम मन्दिर - निर्माण का विरोध करने वाले नेता ने, घर
लौटते ही रामनामी ओढ़ी और सीधे रामजी की मूर्ति के आगे जाकर
पसर गए। बोले - 'माफ करना भगवान!
कुर्सी की मजबूरी है, वरना मन्दिर - निर्माण तो मैं भी चाहता
हूँ।
आग
मोहल्ले
में आग लग गई थी। वह यह सोचकर निश्चिन्त था कि आग बहुत दूर है
तथा उसका घर पूर्णतया सुरक्षित है।
आग कुछ नजदीक आ गई तो वह थोड़ा
चिन्तित हुआ, लेकिन कुछ करने की आवश्यकता उसने अब भी नहीं
समझी।
आग उसके पड़ोसी के घर तक आ गई,
जब भी वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। पड़ोसी के लिए वह अपने हाथ
क्यों झुलसाए। मन ही मन वह सोचता है।
अब जलने की बारी उसके घर
की थी। आग बुझाने के लिए वह कुछ कर पाता, इससे पूर्व ही आग
उसके घर को राख में बदलकर, अगले घर तक पहुँच चुकी थी।
हार - जीत
विधानसभा
के चुनावों में पार्टी प्रत्याशियो की हार - जीत को लेकर अ और
ब में बहस छिड़ गई थी।
'मेरी
पार्टी का उम्मीदवार जीतेगा।'
अ ने कहा।
'नहीं,
मेरी पार्टी का जीतेगा।' ब ने दावा
किया।
'तुम्हारे
उम्मीदवार के जीतने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।'
अ में बड़ा आत्मविश्वास था।
'प्रश्न
हो या न हो, जीतेगा वही।' ब भी अपने
मत पर दृढ़ था।
'लेकिन
कैसे? वोट तो मिलेंगे नहीं उसे।'
'वोट
हमें लेने आते हैं।'
'वह
कैसे?'
'ऐसे।'
कहते हुए ब ने एक तेजधार चाकू अ की आँतों में उतार दिया। अ
वहीं ढेर हो गया।
अगले दिन, इधर अल्पसंख्यक
समुदाय के व्यक्ति की हत्या की खबर फैली और उधर वोट ब के
उम्मीदवार की झोली में जा गिरे।'
विपल्व
एक आला न्यूज चैनल का उदीयमान रिपोर्टर था। रोजाना किसी
एक्सक्लूसिव खबर की तलाश में निकलता और अपने बॉस को निराश न
करता। उस दिन भी वह किसी स्टोरी की तलाश में सालाना भरने वाले
अमावस के मेले में अपने सहायक के साथ धूल फाँकता घूम रहा था।
अचानक विस्फोट की एक आवाज आयी और चारों ओर भगदड़ मच गयी। सहायक
मारे घबराहट के काँपने लगा। मगर दूरदर्शी विपल्व ने उसे तुरन्त
कैमरा आनअप करने का आदेश दिया। चारों तरफ मची भगदड़ और यहाँ -
वहाँ फैला लाशों के विजुअल फटाफट लिए जाने लगे। अचानक एक दृश्य
पर कैमरा फोकस होते ही सहायक चीख पड़ा, 'सर,
देखिए, एक छोटी - सी बच्ची नीचे गिर गयी है, यदि किसी के पैरों
तले चली गयी तो ... मैं उसे उठाने जा रहा हूँ।'
विपल्व ने सहायक को डपटा,
'बेवकूफ, कैमरा उसी बच्ची पर फोकस
रख। यही तो वह एक्सक्लूसिव सीन है जो सिर्फ हमारे कैमरे
पर आएगा औऐर हमें नम्बर वन तक पहुँचाएगा।'
उस पूरे दिन दर्शकों ने टी.वी.
पर कदमों तले दम तोड़ती उस बच्ची को कई बार देखा। साथ ही
विपल्व की वह आवाज भी सुनी कि मानव संवेदनाएँ कैसे सो गयीं। जब
एक बच्ची पैरो तले रौंदी जाती रही और कोई उसे उठाने आगे नहीं
आया।
(कथादेश, अगस्त 2009, मीडिया
विशेषांक से साभार)
नवम्बर 2011
विकल्प
सुवास दीपक
वह
एक विचित्र सपना था।... वह फाँसी के फंदे से लटका था। जल्लाद
ने जब फंदा कस दिया तो भी वह मरा नहीं था। मृत्यु का आतंक, जो
अभी - अभी उसे शून्य बनाए जो रहा था, वह अब, आश्चर्य में
परिवर्तित हो गया था। उसे लगा था कि उसने मृत्युको जीत लिया
है। अचानक फाँसी का फंदा फूलों की एक माला में तब्दील हो गया
था और हजारों खुरदरे, कठोर और सख्त हाथ उसे उठाए हुए थे। उसे
लग रहा था जैसे वह फूलों के उड़नखटोले में उड़ा जा रहा
हो...ऊपर...ऊपर...काफी ऊपर...।
अचानक उसकी नींद टूट गई थी।
निचट अंधेरे में उसने आँखें फाड़ - फाड़कर देखा था और माथे पर
जोर देकर वस्तुस्थिति पर सोचने लग गया था। तत्काल उसे कुछ भी
समझ में नहीं आया था। अभी - अभी टूटे सपने का प्रभाव उसके मन -
मस्तिष्क पर विद्यमान था। वह काफी देरतक अंधेरे में देखता रहा।
तभी जांघ में किसी कीड़े के
काटने से उसे दर्द हुआ था। हाथ अचानक दर्द उछने वाली जगह पर
चला गया था तो एक खटमल उसकी उँगलियों में आते ही वह एक झटके से
अपने विगत लोक में पहुँच गया था।
वह एक कातिल था।
वह समझता था कि उसने कोई अपराध
नहीं किया है जिसके लिए उसे उम्र कैद या फाँसी की सजा हो सकती
है। पर वह अपने आप को नितान्त निर्दोष बताता आ रहा था।
... इसी से मिलता - जुलता सपना
उसने आज फिर देखा था।
उसे लगा था कि जैसे वह मर गया है। 'खुद
मर जाना और मर जाने का खुद को आभास होना...'
इस पर उसने अंधेरी सीलन - भरी कोठरी में बैठकर खूब सोचा था।
सपना कितना विचित्र था!... वह मर
चुका है पत्नी उसकी लाश को उठाकर कहीं फेंकने जा रही थी। वह
पहले उसे किसी जोहड़ में फेंक देना चाहती थी। फिर न जाने क्यों
वह उसे जोहड़ में फेंकने के बजाय नदी में फेंक देना चाहती थी।
नीचे मटियाली नदी उफन रही थी।
उसे महसूस हो रहा था कि उसकी पत्नी के साथ कोई दूसरा आदमी भी
है जो उसकी पत्नी को निर्देश दे रहा था। लाश को छपाक् से पत्नी
ने नदी में फेंक दिया था। डूबने के बजाय वह लाश थोड़ी दूर बह
जाने के बाद किनारे लग गई थी। उसे लगा था कि उसने मृत्यु को
जीत लिया है।
किनारे लग जाने के बाद वह नदी
के किनारे चलता हुआ एक मोड़ पर पहुँचा था। आगे का रास्ता काफी
संकरा था। एक लोहे का फाटक सा था पर वह खुलता नहीं था बल्कि एक
चक्रव्यूह की तरह था। इस फाटक को लाँघकर उसे उस पार जाना था।
उसके साथ कुछ और आदमी भी थे। बड़ी आसानी से वह उस चक्रव्यूह
बनाम फाटक को लाँघकर उस पार पहुँच गया था। उस पार पहुँचते ही
विजय की मुस्कान उसके चेहरे से होती हुई समूचे शरीर में
संचारित हो गई थी।
इन दोनों सपनों के बाद उसकी मन:स्थिति
कुछ हल्की हो गई थी। निचट अंधेरे में एक क्षीण उजाले की रेखा
खिंच गई थी - एक उम्मीद की किरण...संभवत:
न्याय व्यवस्था उसे फाँसी न दे...!
दूसरे सपने से संबंधित घटना पर
जब उसने विचार किया था तो उसे अपनी पत्नी कैलसिया की याद आ गई
थी। सपने में उसके मरने पर वह तनिक भी विचलित या दुखी नहीं हुई
थी। यह विचार आते ही उसका दिल बुझ सा गया था। आशा की क्षीण
रेखा अंधेरे में विलीन हो गई थी।
कैलसिया... उसकी पत्नी और छह
बच्चे! बच्चों की चल्ल - पों, सभी
के सूखे चेहरे, हड्डियों के गट्ठर... काले - कलूटे - सभी उसकी
आँखों के आगे कौंध गए थे।
आखिर यही बच्चे थे जिन्हें
भूखे देखा नहीं जा सकता था। माँ - बाप से रोटी माँगना उनका
जन्मसिद्ध अधिकार जो ठहरा! वह भी इस
बात को अच्छी तरह से समझता था। उन्हें बिलबिलाता कैसे देख सकता
था!
फैक्टरी से उसे निकले बीस दिन
हो गए थे। वह मजदूर था। मैनेजमेंट के अनुसार उसने स्टोर से
अल्काथिन पाइपें चुराई थीं। दरअसल इसे चुराना नहीं कहा जा सकता
क्योंकि स्टोरकीपर ने उसे खुद पाइप स्टोर से निकालकर चुपके से
बेच आने को कहा था। वह एक साधारण मजदूर था। एक मजदूर को कोई
बड़ा कर्मचारी कोई काम करने को कहे तो वह इन्कार कैसे कर सकता
है?
स्टोर से पाइप कम निकलने पर
रिपोर्ट जब एम.डी. को मिली थी तो स्टोर कीपर बड़ी चतुराई से
पाक - साफ निकल गया था और उसे मजदूरी से छुट्टी मिल गई थी। वह
गिड़गिड़ाया था पर उस मजदूर की ईमानदारी पर विश्वास करना तो
दूर उसे बलपूर्वक फैक्टरी की झुग्गियों से निकाल दिया था। एक
टीन का ट्रंक, एक अदद पत्नी, छह बच्चे, एक बोरे में बर्तन -
भाँडे और दरी में चीथड़े लपेटकर उसका काफिला लेबर कॉलोनी से
निकला था और हाट - बाजार की शेड के नीचे उसने अपना डेरा जमा
लिया था। उस वक्त उसके पास सिर्फ सात रुपये पचहत्तर पैसे का
बैंक बैलेंस था।
आज बीस दिन बीत चुके थे।
कैलसिया ने हाट में फेंके हुए सड़ी गोभी के पत्ते, सड़े - गले
आलू - प्याज और ऐसी ही खाद्य सामग्री (?)
इकट्ठी की थी और घास - फूस जलाकर दो इंटों के चूल्हे पर
अल्मूनियम की हंडिया चढ़ी दी थी। बच्चे उसके इर्द - गिर्द बैठे
थे। दिसम्बर की कलेजा चीरने वाली सर्दी थी। बच्चों को एक बड़े
से अल्मूनियम के थाल में उसने उबले पत्ते डाल दिए थे। बच्चे एक
ही रोटी के टुकड़े पर कई कुत्तों के झपटने की तरह थाल पर टूट
पड़े थे। कैलसिया ने पति के आगे भी 'डिनर'
परोस दिया था। बड़ी
मुश्किल से उसने एक दो घूंट उस
'सूप' के
पिए थे और फिर गोभी के डंठल चबाने लग गया था...।
"कोई
काम मिला?" कैलसिया ने डरते - डरते
पूछा।
"नहीं।"
उसने सिर्फ इतना ही कहा था। आदत के अनुसार वह बहुत कम बोलता
था।
"तो
कैसे काम चलेगा?"
उसने कोई जवाब नहीं दिया था
बल्कि ऊँघने लग गया था। साँय - साँय करती हवा चल रही थी।
अंधेरा घना होता जा रहा था। कैलसिया ने गूदड़ बिछाकर बच्चों को
लिटा दिया था और खुद भी लेट गई थी।
उसकी हड्डियाँ ठंड से ठिठुर
रही थीं। कैलसिया उसकी बगल में थी और दोनों के पेट भूखे थे।
बच्चे सर्दी से सो नहीं पा रहे थे। वर्षा की बौछारें और बिजली
की कौंध उनके शयन कक्ष में आँख - मिचौनी कर रही थीं।
करवट बदलकर उसने सोचा था कि
यदि वह सबों को पाल नहीं सकता तो उन्हें इस प्रकार
'जिन्दा'
रखने का अधिकार भी उसे नहीं है। वह बिजली की कौंधती
रोशनी में उनकी ओर देखता तो सोचता - इनका मर जाना जिन्दा रहने से बेहतर
है। पर क्या उन्हें मारकर किस
बड़े उत्तरदायित्व से फारिग हुआ जा सकता है?
नहीं। वह सोचता सुबह होने का
इन्तजार करता रहा था।
कैलसिया उसकी
दूसरी बीबी थी। पहली को 'देस'
में जब एक ठेकेदार ने गायब कर दिया था तो ठेकेदार का घर जलाकर
इधर पहाड़ों की ओर भागकर आए हुए भी तो आठ साल बीत चुके थे।
कैलसिया उसे इधर मिली थी। वह उन हजारों आदिवासी मजदूरों में एक
थी जो इधर पहाड़ों पर वर्षों से सड़क निर्माण में अपनी
जिन्दगियों को गिरवी रखे थे।
...दूसरे दिन
उसने पत्थर तोड़ने का काम शुरू कर दिया था। पास ही में सड़क का
काम चल रहा था। मजदूर गिट्टी - पत्थर तोड़कर ठेकेदारों को
हिसाब देते और और शाम को अपनी मजदूरी वसूलकर हंडियों में कुछ
उबालकर खाते और चीथड़ों में लिपटे अलाव के इर्द - गिर्द बैठकर
मादल के ताल पर लोक गीतों के रस में जिन्दगी की अथाह पीड़ा को
भिगो कर पीते थे।
... पिछले सात
दिनों से दिहाड़ी पर काम कर रहे मजदूरों को मजदूरी नहीं मिली
थी क्योंकि ठेकेदार शहर से वापस नहीं आया था। उसके हप्ते के
तैंतीस रुपये बनते थे।
शाम को
ठेकेदार आ गया था और उसका मुनीम मजदूरी के लिए सभी मजदूरों को
डाक रहा था। अपनी पाली आने पर जब वह मुनीम के पास पहुँचा खा तो
मुनीम ने खाते से बिना नजर उठाए पूछा था - 'क्या नाम?'
'लकड़ा।'
'हैं?'
मुनीम जैसे चौंक पड़ा हो। नाक से चश्मा उठाकर ऊपर नजर करके
उसने पूछा था - 'क्या लेने आया हो
यहाँ रे?'
'मजदूरी!
पत्थर के सात ढेर, एक हफ्ते के तैंतीस रुपये।'
उसने नपा - तुला स्पष्टीकरण मुनीम पर उछाल दिया था।
'क्या बकवास
करता है? काम किया ही नहीं और आ गया
मजदूरी माँगने? दिखाओ कहाँ हैं
तुम्हारे पत्थर?'
'वो तो तुमने
उठवा लिए हैं।'
'उठवा लिए हैं',
मुनीम उसकी नकल करके बोला था, 'हट्
यहाँ से! हमारा वक्त बरबाद मत कर।'
मुनीम ने लापरवाही से कहा था।
'देख मुनीम,
यह बात ठीक नहीं है। मेरी मजदूरी तुम्हें देनी ही पड़ेगी। यह
बेइन्साफी है।'
'बेइन्साफी है!
कानून की बात करता है। चोर - उचक्के भी आजकल कायदे - कानून की
बात करने लग गए हैं। कौड़ी की औकात नहीं।'
मुनीम ने चिल्लाकर कहा था।
मुनीम की बात
सुनकर ठेकेदार मुँह में पाइप दबाए बाहर निकला था, 'क्यों
क्या बात है जैन?'
'साहब, यह
कहता है कि इसने पत्थर इकट्ठे किए थे और हमने उठवा लिए हैं,
उसके पैसे माँगता है।'
'तो दे क्यों
नहीं देते?' ठेकेदार ने निरपेक्ष भाव
से कहा था।
'पर इसका नाम
- पता कुछ भी हमारे खाते में दर्ज नहीं है। हम कहाँ से दें?'
मुनीम ने
नासमझी से कहा था।
'साहब, हमने
इसके अपना नाम लिखवाया था और पूछकर ही काम पर लगा था।'
वह बोला था।
'भई, जब मुनीम
कहता है तब हम कैसे विश्वास न करें?
हमारे यहाँ सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं।'
और वह पाइप से धुआँ उगलता वहाँ से हट गया था।
लकड़ा खून का
घूंट पी कर रह गया था। इतनी अंधेर नगरी...अन्याय। उसके दिल में
आया कि वह इस पिद्दी जैसे मुनीम को उठाकर नदी में फेंक दे। ।
अन्य मजदूरों के निरपेक्ष व्यवहार पर भी उसे काफी विक्षोभ और
निराशा हुई थी क्योंकि कोई भी उसके पक्ष में नहीं बोला था।
भारी कदमों से
वह अपने तथाकथित बसेरे की ओर चल पड़ा था। उसके बच्चे और पत्नी
उसे इस प्रकार देख रहे थे जैसे भूखे कुत्ते ललचाई नजरों से
रोटी के टुकड़े की ओर देखते हैं।
स्वाभाविक भी
था क्योंकि पत्नी और बच्चे इसी इन्तजार में थे कि वह पैसे लेकर
आएगा और आज भर पेट जीमने को मिल जाएगा। पर लकड़ा जब खाली हाथ
आया तो बच्चों के मुँह कुम्हला गए थे। कैलसिया निर्जीव बुत्त
बनी बैठी थी। उसकी आँखें... सारा शरीर पीला पड़ चुका था और
शरीर पर का अपर्याप्त कपड़ा उसके फूले पेट को ढँकने में असमर्थ
था।
कैलसिया ने
समझा कि वह पैसे जरूर जुए में हार आया है क्योंकि पहले भी वह
कई बार पूरी की पूरी तन्ख्वाह जुए की भेंट कर चुका था। बेहद
कमजोर होने पर भी वह चिल्लाने लग गई थी। लकड़ा चुपचाप निरपेक्ष
- भाव से शून्य की ओर ताकता दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया था।
उसकी चुप्पी कैलसिया को खलने लग गई थी और बच्चों का सुबह से
उसे नोंचते रहना उसकी बरदाश्त से बाहर हो रहा था।
'कुतिया...
तेरे बाप ने एक पैसा नहीं दिया। खा गया सारे पैसे और ऊपर से
चीं - चीं करती है बिना समझे!' उसने एक
लात कैलसिया की पीठ पर जड़ दी थी। वह पेट के बल गिरी और कुछ
देर छटपटाकर बेहोश हो गई थी। बच्चे रोने लग गए थे।
...उसकी
आँखों के आगे बार - बार उस फिसड्डी मुनीम का, पाइप पीते
ठेकेदार के चेहरा घूम जाता। कैलसिया बेहोश पड़ी थी। बच्चे
हुआते हुए चुप हेकर माँ पर लुढ़क चुके थे और वह सारी रात सर्दी
से बेखबर अपने आप से जूझता रहा था। उसका मानसिक सन्तुलन
बिगड़ने लग गया था...। उसने सोचा - इस कुतिया कैलसिया और इसके
इन पिल्लों के लिए वह कितना लाचार है!
एक थी देस में, वह उस ठेकेदार की भेंट चढ़ गई और यह है सिर्फ
उसके साथ ही चिपकी हा, हर साल पिल्ले जनती रहती है। 'कुत्ती
कहीं की!' वह जोर से चिल्लाया था। आस -
पास सांय - सांय करती हवा और कुत्तों के भौंकने की आवाजें गूँज
रही थीं। अतीव घृणा, क्रोध और अनिश्चय के बीच वह अपने को छीलता
जा रहा था। रह - रहकर उसे लगता कि वह इस पास पड़े कैलसिया के
ढेर को उठाकर नदी में फेंक दे...! इसी
उधेड़ - बुन में उसकी आँख लग गई थी...।
...उसके हाथ
में एक तेज चाकू है। बारी - बारी से वह
बच्चों के टुकड़े - टुकड़े करके गोश्त को एक बड़े बर्तन में
डालकर एक ऊँचे पहाड़ की चोटी से नीचे फेंक देता है। जब वह वापस
आ रहा होता है तो जमीन पर पड़े कुछ गोश्त के टुकड़ों को देखकर
कैलसिया पूछती है तो वह लपककर उन टुकड़ों को उठाकर नीचे फेंक
देता है। कैलसिया इस बात से अनभिज्ञ है कि उसके सभी बच्चे मार
दिए गए हैं। बच्चों के हत्यारे होने का बोध और एक अज्ञात भय उस
पर हॉबी होता जा रहा था।... भयंकर तूफानी और समुद्री यात्रा...
ऊँची - ऊँची लहरें और झंझावात...।
जब उसका सपना
टूटा था तो उसे लगा था कि सचमुच इस भयावह यात्रा में उसकी
किश्ती मझधार में फँसी है। कैलसिया उसी प्रकार बेहोश पड़ी थी
और बच्चे पहले की तरह ही उस पर लुढ़के पड़े थे...।
उस त्रासद और
अव्याख्येय स्थिति में लकड़ा के अन्दर एक दावानल जन्म ले रहा
था जो समूची दुनिया को फूँक देने में समर्थ था... वर्षों से
जंग लगे ट्रंक में पड़ा उसका रामपुरिया चाकू अब उसकी मुट्ठी
में आ गया था...।
---
--- --- ---
...यह सब
कितनी जल्दी घटित हो गया था। वह फटी - फटी आँखों से उस धड़ को
तड़पते देख रहा था। सिर ऊपर सड़क पर था और धड़ नीचे झाड़ियों
में लुढ़कता पहुँच गया था। करीब दस मिनट तक तड़पने के बाद सब
कुछ ठंडा हो गया था। आसपास की झाड़ियाँ और सड़क रक्तिम हो चुके
थे। रामपुरिया चाकू अभी तक उसकी मुट्ठी में भिड़ा था...
और शाम का धुंधलका चारों ओर घिर चुका था। आस - पास भयावह
निस्तब्धता छाई हुई थी...।
उसकी चेतना जब
लौटी थी जब नदी के उस पार वाली सड़क पर एक ट्रक की बत्तियाँ
जगमगा उठी थीं। उसने शून्य मन से उस छुरे को और अपने हाथ -
मुँह नदी में धोए। छुरे को झोले में डाला। मुनीम के सिरबिहीन
शव से नोटों की गड्डी निकाली और उसे भी झोले में डाला और जंगल
के रास्ते प्रान्त की सरहद से पार हो गया था...।
दस कोस रात भर
चलने के बाद वह एक छोटे से पहाड़ी कस्बे में पहुँचा था और एक
धर्मशाला के बरामदे पर बाकी रात काटी थी। रह - रह कर वह आतंकित
हो उठता था। बच्चों और पत्नी का लगाव उसे दूर जाने को लगातार
रोकते जा रहा था। फटे झोले में पड़े नोट उसे फनियल साँप की तरह
लग रहे थे... मुनीम का तड़पता हुआ शव, खून का परनाला और चीखें
उसकी हृदय की घाटियों में गूंज जातीं। वह कुछ भी तय नहीं कर
पाया था कि क्या करे।
दूसरे दिन बस
- स्टॉप पर सादी पोशाक वाले कुछ लोगों ने उसे घेर लिया तो वह
भौंचक्का रह गया था।
वह यन्त्रवत्
उनके पीछे हो लिया था और फिर शुरू हुआ था पुलिस की जानलेवा मार
का कभी न टूटने वाला सिलसिला। पर भयानक रूप से गम्भीर लकड़ा ने
'उफ्'
तक नहीं की थी और संक्षिप्त शब्दों में अपना अपराध स्वीकार कर
लिया था। पर उसके अन्दर सब्र का ज्वालामुखी उस वक्त फूटा था जब
अपना अपराध स्वीकार कर लेने पर भी उसे पुलिस बेरहमी से यातना
देती रही थी। लगा था जैसे पुलिस का वह कक्ष हिल - सा गया
हो...। कड़कती आवाज में उसने कहा था
"...मैं हत्यारा नहीं हूं, हत्यारा फैक्टरी का स्टोर
कीपर है, ठेकेदार है। मैंने कोई हत्या नहीं की। इस पेट के लिए,
अपने बीबी - बच्चों के लिए दो रोटियाँ भी आपकी व्यवस्था मुझे
मुहैया नहीं कर सकती। पूरी हड्डियाँ गलाकर भी भूखों मर जाते
हैं हम।... मेरे बच्चे, मेरी बीबी पन्द्रह दिनों से सड़े - गले
पत्ते उबालकर खा रहे है। उन्हें भर पेट रोटी कौन देगा?
आप देंगे? आप सिर्फ उन्हें कुत्तों
की तरह सड़ - सड़कर मर जाने के लिए मदबूर कर देंगे। उन्हें
हत्यारे बनने के लिए मजबूर करेंगे... है...हा...हा...।"
वह पागलों की तरह चिल्लाने लग
गया था और फिर जैसे हाँफता हुआ लुढ़क गया था...। दारोगा ने
बेहोशी की हालत में एक भरपूर ठोकर उसकी कनपटी पर जमा दी थी -
चूतिया कहीं का, कानून झाड़ता है! और
फिर पुलिस की उस कोठरी में एक मृत सन्नाटा छा गया था। लकड़ा के
मुँह में जैसे ताला लग गया था। वह खतरनाक हद तक चुप हो गया था।
...और आजतक यह खोमोशी रह -
रहकर चारों दिशाओं में गूंजती रहती है... प्रतिध्वनित होकर,
फिर बहरे कानों से टकराती है पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती...
लकड़ा फाँसी की प्रतीक्षा कर रहा है।... उसका परिवार, उसकी
बीबी, बच्चे न जाने कहाँ हैं?
लावारिस कुत्तों की तरह गंदी नालियों में मुँह मारते रहेंगे...
अपने बाप की तरह जितनी भी हड्डियाँ गलाएँगे, फिर भी कभी उनके
चेहरे सब्ज नहीं होंगे। लड़के बड़े होकर बाप की तरह किसी की
हत्या करके फाँसी के फंदे पर झूल जाएंगे... जेलें तरक्की करती
जाएँगी। ठेकेदारों को आधुनिक सभ्यता के निर्माताओं के अलंकरण
मिलते रहेंगे... व्यवस्था के बहरे कान और खोखले दिमाग लकड़ा
जैसों का निर्माण करते रहेंगे... क्या विकल्प है?
कोई जवाब देता क्यों नहीं?
लकड़ा इसका जवाब जेल की
सींखचों में अपनी दुर्दान्त चुप्पी के जरिए माँगता है...!
(रचनाकाल - 1975)
अक्तूबर 2011
मोती और
मेघराज
महेन्द्र सिंह
शेखावत 'उत्साही'
"-
नहीं पापा, मैं कल ही
ठंडी रोटी नहीं खाऊँगा। दाल नहीं खाऊंगा। कभी कुछ ढंग का खाने
को मिलता ही नहीं। मिलता है तो ठंडा - बासी खाओ।"
मेघराज ने खाने की थाली को ठुकराते हुए नाराज
होकर कहा।
"बेटे, जो कुछ
भी खाने को मिलता है, उसे बड़े प्रेम के साथ स्वीकार कर लेना
चाहिए। कभी किसी को ठुकराना नहीं चाहिए।"
मैंने मेघराज को समझाते हुए कहा।
लेकिन मेघराज
नहीं माना।
तभी मैंने कल
की ठंडी रोटी के छोटे - छोटे टुकड़े करके मोती को बुलाया -
"ले मोती।"
सुनते ही मोती
दौड़ता हुआ आया और बड़े प्रेम से रोटी के टुकड़े को खाने लगा।
तब मैंने पुन:
मेघराज को समझाते हुए कहा - "देख बेटा,
यह कुत्ता कितना वफादार। इसे हम जो भी, जैसा भी खाने को देते
हैं, उसे वह बड़े प्रेम से खाता है। कभी कोई नखरे नहीं दिखाता।
और एक तुम हो...! इसलिए तुम से अच्छा
तो मोती हुआ न?"
अब मेघराज का
सिर नीचे झुक गया था।
(सितम्बर
2011)
ग्राम सेवक
सुवास दीपक
वे
मेरी बगल वाले कमरे में
किराए पर रहने लगे थे। उनके बारे में मुझे शहर के एक भद्र
पुरुष ने बताया था कि वे अच्छे आदमी हैं और दारू बगैरह नहीं
पीते। उनकी उम्र चालीस से ऊपर थी। मिलिटरी कट बाल, गोल चेहरे
पर पिचकी गालें और भद्दी नाक। बातें करते करते उनके मुँह से
निकले थूक के छींटे सामने वाले व्यक्ति से प्राय:
टकरा जाते थे। उनकी आदत पान चबाते रहने और थूकते रहने की थी।
पहले ही दिन परिचय के बाद वे
मुझसे इधर - उधर के विषय लेकर बतिया रहे थे तो उनके मुँह से
निकली सस्ती शराब की दुर्गन्ध मेरे नथुनों से जा टकराई थी।
मेरा जी मितलाने लगा था।
उनकी दिनचर्या से मैं परिचित
हो रहा हूँ। साहब चार बजे उठते हैं और शोर मचाने और गाने लग
जाते हैं। बच्चों को पाँच बजे ही उठा देते हैं और कड़ी सर्दी
में भी ठंडे पानी से नहलाने लगते हैं। बीच बीच बच्चों की पिटाई
भी करते हैं।
बच्चों को नहलाकर वे पहलवानों
की तरह कच्छा ऊपर तक चढ़ाकर टाँगें धोते हैं। हाथ मुँह धोने के
बाद उनका दैनिक स्नान समाप्त हो जाता है। उसके बाद पूजा के
बर्तन, कुछेक ठाकुर, जो उनके इष्टदेव होंगे, चमकाकर साफ करते
हैं और पूजा शुरू कर देते हैं। न जाने किस भाषा में
मन्त्रोच्चारण करते हैं, जानना मुश्किल है क्योंकि वे नासिका
से ज्यादातर उच्चारण करते हैं। मन्त्रोच्चारण के बाद
'ओम् जय जगदीश हरे....'
होता है। इसी बीच उनके बच्चों में से कोई वहाँ आ जाए तो
'जय जगदीश हरे'
मुँह में ही लटकाए उस पर झपट पड़ते हैं। खूब पीटते हैं। जब थक
जाते हैं तो फिर आरती शुरू कर देते हैं।
शाम को वे रोजाना सस्ती शराब
का एक पौवा गले के नीचे उंढेले बिना भरपूर नींद नहीं ले सकते।
शराब का नशा जब उनकी सदैव लाल रहने वाली आँखों में उतर आता है
तो वे अत्यन्त सहज और भावुक हो जाते हैं। जब वे भावुक होते हैं
तब ही बच्चों को प्यार करते हैं। शायद बच्चे भी इसी इन्तजार
में रहते हैं कि कब शाम हो और वे बाप का प्यार पाएँ। उनकी
गर्दन से लटक जाएँ, उनकी पिचकी गालों में उँगलियाँ गढावें या
उनके मिलटरी कट बालों में से सफेद बाल ढूँढें।
रात को करीब पाँच - छह बार वे
पेशाब करने जाते होंगे क्योंकि खटाक से दरवाजा खोलने और बन्द
करने से मेरी नींद अक्सर खुल जाती है।
उनकी अजीब आदतों के अतिरिक्त
वे परिश्रमी भी हैं। उन्होंने बकरी और मुर्गियाँ पाल रखी हैं।
एक बार मुर्गी ने अंडों से चीजे निकाले। एक चूजा मुर्गी के पैर
के नीचे दबकर मर गया। इस पर वे लाल पीले हो उठे और मुर्गी की
एक टाँग रस्सी से बाँधकर लगे उसे पीटने। जबतक उनकी गुस्सा ठंडा
नहीं हुआ तबतक उन्होंने
उसे पीटना नहीं छोड़ा। उस मूक प्राणी के
प्रति उनके इस व्यवहार पर मैं बहुत दु:खी
हुआ।
उनकी एक बकरी प्रसूती काल में
थी। एक दिन वह पड़ोसी की सब्जियाँ और फूल रौंद आई। पड़ोसी ने
जब शिकायत की तो उसका भी वही हाल। लगता है, साहब पीटने को आदत
विरासत से मिली है। उन्हें दरअसल पुलिस में होना चाहिए था।
ग्राम सेवक वे कैसे बन गये? पीटने
के लिए उनके पास एक पुरानी चमड़े की पेटी है जिससे वे मुर्गी,
बकरी और बच्चों को पीटते हैं।
इसी प्रकार समय बीत रहा था।
मैं तटस्थ - सा उनके चरित्र का बारीकी से अध्ययन कर
रहा था कि
एक घटना घट गई। घटना अचानक नहीं घटी परन्तु धीरे - धीरे घटती
चली गई।
उनकी अस्सी - पचासी साल की
बूढ़ी माँ गाँव में बीमार थी तो वे उसे इधर इलाज के लिए ले आए।
माँ सचमुच बुढ़ापे का प्रत्यक्ष रूप थी। चेहरा झुर्रियों से
भरा, कमर कुबड़ी और आँखें ज्योतिहीन। उसका ऐसा रूप देखकर किसी
समय के एक सुन्दर सुकोमल शरीर का इतना भयानक हो जाना निश्चय ही
कंपा देने वाला था। उसका इलाज शुरू हुआ तो कुछ ही दिनों में वह
स्वस्थ हो गई। स्वस्थ क्या हो गई, उसे कोई बीमारी नहीं थी।
केवल बूढ़ा शरीर, अन्धी दुनिया और साथ - साथ उसका दिमाग भी कुछ
बिगड़ गया था। वह चौंकती, चिल्लाती, भूत - प्रेतों की बातें
करती। उजूल - फिजूल बकती रहती। वह बिस्तर से उठकर हाथों से
दीवारों को छूती कमरे से बाहर निकल आती तो बच्चे उसे देखकर
किलकारियाँ लगाने लगते या पीछे से उसे गुदगुदाने लगते। वह न
जाने क्या क्या गालियाँ देती।
बुढ़िया के आ जाने पर ग्राम
सेवक का व्यस्त जीवन और व्यस्त हो गया है। अपने विभाग के नाम
पर शायद ही वे कोई काम करते हों। सामने वाला कमरा उनका बेड रूम
कम आफिस है।
जब वे आफिशियल काम करने लगते
हैं तो खिड़कियाँ, दरवाजे सभी बन्द कर लेते
हैं। हाथ काँपते
रहने के कारण कलम बीच की दो
उँगलियों के बीच जकड़कर लिखते हैं।
उनकी यह रुटीन पाक्षिक है।
बुढ़िया ज्योतिहीन होने पर उसे
पाखाने उसकी बहू को ले जाना पड़ता है। इधर उसने काफी दु:ख
देना शुरू कर दिया है। एक मिनट भी खाट पर नहीं बैठती। कभी इधर
कभी उधर गिरती पड़ती रहती है, कभी दरवाजे से टकराती है तो कभी
दीवार से। कभी बर्तन गिरा देती है तो कपड़े - लत्ते पैरों तले
रौंदने लग जाती है। ग्राम सेवक काफी परेशान दिखते हैं, उनकी
पत्नी भी। एक आदमी तो चौबीस घंटे बुढ़िया की चौकीदारी के लिए
चाहिए था। वे ऊँचे स्वर में चिल्लाकर माँ को समझाते परन्तु
उसपर कोई असर नहीं होता। उसका बुढ़िया को ऊँचे स्वर में दिया
भाषण केवल यही होता था, वह चुपचाप खाट पर पड़ी रहे,
यहाँ तक
हिले - डुले नहीं।
काफी दिनों तक यह सिससिला चलता
रहा। उनकी दिनचर्या में कोई त्रुटि नहीं है बल्कि उन्होंने
आजकल बच्चों को ज्यादा पीटना शुरू कर दिया है।
अब तो उन्होंने पेटी से
बुढ़िया पर भी प्रहार करने शुरू कर दिए हैं। बुढ़िया चिल्लाती
है। क्यों पीटता है कहती है। वह समझाते हैं। एक मिनट के लिए वह
चुपचाप लेट जाती है। खुली - खुली ज्योतिहीन आँखें, जिनमें न
रोष, न गुस्सा, न सहानुभूति और न ही ममता - माया। लगातार लेटे
रहने से शायद वह थक जाती होगी और कमर सीधी करने के लिए जरा -
सी उठती है तो सामने होने पर ग्राम सेवक पेटी से प्रहारों की
झड़ी लगा देते हैं।
उस दिन मैं दफ्तर से लौट रहा
था तो देखता हूँ कि बुढ़िया की खाट के चारों ओर जंगला लग गया
है, तार का नहीं रबड़ का। चारों पायों पर चार काठ के कील से
ठोंककर चारों ओर रबड़ लपेट दी गई है। बुढ़िया भीतर लेटी थी।
मुझे तो केवल एक गठरी सी लग रही थी। उफ!
ऐसे दृश्य की मैं कल्पना तक नहीं कर सकता था। एक अंधी,
मरणासन्न बुढ़िया के लिए इतना तगड़ा जंगला!
साहब सुबह से ही व्यस्त थे। मुझे देखते ही कमर सीधी करके, कुछ
हँसते (जरा से हँसने पर उनके जबड़े दिखाई देते हैं) हुए कहा -
बड़ा दु:ख दे रक्खा है। क्या करूँ?
यदि ऐसा न करता तो क्या करता? मैं
हतप्रभ कभी जंगले की ओर तो कभी बुढ़िया की ओर देख रहा था।
मैंने सोचा था कि अब वह
बुढ़िया को पीटना बन्द कर देंगे परन्तु हुआ इसके बिल्कुल
विपरीत। बुढ़िया की पिटाई पच्चीस प्रतिशत और बढ़ गई है। आधी
रात को कभी कभी मैं पसीज जाता हूँ, व्याकुल हो उठता हूँ जब
पेटी से पीटने की चटाक चटाक की आवाजें सुनता हूँ। बुढ़िया बुरी
तरह चिल्लाती है। उसका चिल्लाना इतना दर्दनाक होता है कि कठोर
से कठोर हृदय भी पसीज उठे। लेकिन ग्राम सेवक के हृदय में दया
या सहानुभूति का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंश भी नहीं है।
अब तो देखा - देखी में उनके
बच्चों ने भी उसी पेटी से बुढ़िया को पीटना शुरू कर दिया है।
वह जंगले में पड़ी यदि करवट भी बदलती है तो वह मंदबुद्धि लड़का
अपने बाप की तरह पेटी हाथ में लेकर बुढ़िया को पीटने लग जाता
है। उसके रोजाना पिटते रहने से शरीर के तीन चौथाई भाग में जख्म
हो गए हैं जिनमें पीप पड़ गई है और उनसे इतनी दुर्गन्ध आती है
कि पास नहीं बैठा जाता।
बच्चों को उन्होंने स्कूल नहीं
भेजा जबकि उनकी उम्र स्कूल जाने की हो गई है। रोज सुबह नहाने
के बाद उन्हें स्लेट और खड़ी दे देते हैं और बच्चे बैठ जाते
हैं पढ़ने। पिछले दस महीनों से वे 'अ'
'आ' से आगे नहीं बढ़े। लड़की
हर बार एक अक्षर लिखकर थूक से मिटाती है। इसी तरह वे लगभग एक
घंटा पढ़ते होंगे। पढ़ते समय भी पेटी उनका पीछा नहीं छोड़ती।
उस शाम हमारे मकान मालिक आए
थे। काफी देर तक बातें करने के बाद उन्होंने जब ग्राम सेवक के
कमरे में झाँका तो जंगले में पड़ी एक जीती लाश को देखकर सहम
गए। उन्होंने ग्राम सेवक को कहा था कि माँ की सेवा करें। यही
उनके लिए लाख तीर्थों की यात्रा के बराबर है। और कहा था कि वे
नि:सन्तान हैं। बूढ़ी माँ की सेवा
ही उनकी अमूल्य उपलब्धि होगी।
मकान मालिक चला गया था और मैं
'नि:सन्तान'
शब्द पर सोचता रहा - तो क्या ये दोनों बच्चे उनके अपने नहीं
हैं?
मुझे बाद में पता चला कि
उन्होंने दो शादियाँ की थीं परन्तु किसी से भी एक बच्चा नहीं
हुआ। ये दोनों बच्चे उन्होंने गोद लिए हैं।
उस दिन बुढ़िया के कमरे में
दोनों बच्चे बैठे थे। बुढ़िया उठने की कोशिश कर रही थी। इतने
में लड़का पेटी लेकर जंगले के अन्दर हाथ घुसाता है और बुढ़िया
को पीटने लग जाता है। सारे शरीर पर जख्म और उन पर लगी चोट से
बुढ़िया बुरी तरह छटपटाती है। मैं खिड़की से झाँककर देखता हूँ
तो मुझे बड़ा गुस्सा आता है। यह मूर्ख लड़का भी अब बुढ़िया को
पीटने लग गया है। झट उसके हाथ से पेटी छीनकर मैं अपने कमरे में
छुपा देता हूँ।
कुछ देर के बाद ग्राम सेवक
पेटी की तलाश करते हैं। मैं घबरा जाता हूँ और डरते - डरते
उन्हें पेटी वापस दे देता हूँ।
उस रात काफी वारिश हुई। बिजली
कड़की। गलियों में कुत्ते भौंके, बड़ी देर तक गीदड़ हुआते रहे।
और इस भयावह आधी रात को जब सभी सो रहे थे, बुढ़िया के कमरे से
पेटी की धड़ाधड़ बौछारों की आवाज आ रही थी। बुढ़िया की हृदय
विदारक चीत्कार।
चार बजे फिर वही खटाक - खटाक,
फिर खामोशी। वारिश रुक गई है अब। ग्राम सेवक की दिनचर्या शुरू
हो गई है। बुढ़िया जंगले के रबड़ को ऊपर नीचे खींच रही है।
पाँव जंगले से बाहर निकालने की कोशिश कर रही है।... धड़ाम की
आवाज! ग्राम सेवक शायद लेट्रिन में
हैं। लेट्रिन से निकलकर सीधे बुढ़िया के कमरे में पहुँचते हैं।
बुढ़िया फर्श पर पीठ के बल पड़ी है। खुली - खुली ज्योतिहीन
आँखें अपलक। वे पेटी उठाते हैं और सटाक सटाक... प्रहारों की
झड़ी। बुढ़िया की ओर से कोई प्रतिक्रिया, कोई हलचल नहीं है। वह
कुछ क्षण पहले ही ठंडी हो चुकी होती है और ग्राम सेवक उसके
पथराए शरीर पर पेटी से प्रहार करने में व्यस्त हैं।
(रचनाकाल 1972, चक्रव्यूह तथा
अन्य कहानियाँ, निर्माण प्रकाशन, सिक्किम 2003 में संग्रहीत) अगस्त 2011
दो लघु कथाएँ
आश्चचर्य
चन्द्रभूषण सिंह
'चन्द्र'
एक
चौराहे पर ही डाकुओं के सरदार ने बिना किसी भय के बतलाया कि
उनका दल सदस्यों की ईमानदारी पर टिका है। वे लोग जो कुछ भी
कहीं से लाते हैं, उसका ईमानदारीपूर्वक वितरण कर लेते हैं,
चाहे वह एक अदद नारी ही क्यों न हो।
उसी चौराहे के निकट शाम को
सत्य प्रकाश संस्था की सभा हुई। सत्य प्रकाश संस्था के अध्यक्ष
ने बतलाया कि उनकी संस्था का हर सदस्य आजकल बेईमानी कर रहा है।
संस्था के नाम पर जो भी चन्दा लेता है, उसे वही हज्म कर जाता
है।
मजबूरी
प्रदीप शंशाक
बारात
धूमधाम से आगे बढ़ रही थी। बारात में शामिल लड़के प्रत्येक
चौराहे पर लगभग आधे घण्टे तक डांस कर रहे थे। डिस्को लाइट सिर
पर उठाए रमिया बहुत बेचैनी महसूस कर रही थी, तब मन ही मन सोच
रही थी - ये लड़के जल्दी - जल्दी आगे क्यों नहीं बढ़ रहे हैं,
बारात जितनी जल्दी लड़की वालों के घर पहुँचे उसे मुक्ति मिले।
आज सुबह से ही उसके लड़के की तबीयत बहुत खराब थी, उसे उसके लिए
दवा ले जानी थी। मजदूरी जल्दी मिल जाती तो वह शीघ्र ही दवा
लेकर घर पहुँच जाती। उसके बुढ़ापे का सहारा उसका लड़का ही तो
है जिसे वह अपना पेट काटकर पढ़ा रही है।
बारात मंथर गति से आगे बढ़ रही
थी, और उसे चिन्ता भरी घबराहट हो रही थी। चिन्ता के कारण वह मन
ही मन बड़बड़ाने लगी - क्या ये नाचने कूदने वाले लड़के किसी
दूसरे की मजबूरी को महसूस नहीं कर सकते?
(नई
दिशा, अंक 70, जून 2011
से साभार) - जुलाई 2011
रुखसाना सिद्दिकी की लघु कथाएँ
शर्त
निकाह
की रस्म अदायगी कर, गवाहों के साथ मौलवी साहब जाने लगे... तभी
एक जनाना खनकवार लहजा सुन वे ठिठक गये - "अभी
रुकिए मौलवी साहब..।" गवाहों के साथ
- साथ सभी की सवालिया निगाहें उधर उठीं..। सामने दुल्हन की
अम्मी सिर झुकाये कह रही थी - "एक
इल्तिजा है आपसे... निकाहनामे में एक शर्त नोट कर दीजिएगा।"
"कौन
सी शर्त?" मौलवी साहब हैरत में पड़
गये।
"हमारी
बेटी को परदे की कैद से आजाद रखियेगा। वो एक होनहार आर्टिस्ट
हा।" कहकर उन्होंने सामने दीवार पर
लगी पेंटिंग की ओर इशारा किया। पेंटिंग की खूबसूरती देखकर सबके
मुँह से एक साथ निकला ..वाह... सुवाह...नल्ला।"
"आपकी
शर्त हमें मंजूर है...। हम फन और फनकार की कद्र करते हैं।"
जवाब दूल्हे की अम्मा ने दिया।
"एक
खास खबर देने के लिए तुम्हें फोन किया था...। पर देखो न... इधर
- उधर की गप्पों में मुद्दे की बात कहना मैं बूल गई..."
जेठानी बीच में बात काटकर बोली।
"कौन
- सी खास बात?"
"हनीफ
भाई की कब्र खुल गई है।"
"क्या...?
किसने कहा?" सकीना बुरी तरह चौंकी।
"ये
पिछले हफ्ते कब्रिस्तान गये थे। बोले... तुम्हें इत्ला दे दूं।"
"आपका
बहुत बहुत शुक्रिया..." कहते - कहते
सकीना की आवाज लजर गयी। उसने रिसीवर रख दिया। आँखों की सूनी
कोरों से आँसू छलछला आये, होंठ बुदबुदा उठे...हनीफ...। कितना
बड़ा फर्ज निभाया तुम्हारे भाई ..भाभी ने।"
(जून 2011)
खुली कब्र
लोग क्या कहेंगे
डॉ. देवेन्द्र नाथ साह
सम्मान
प्राप्त कर साहित्यकार महोदय घर लौट रहे थे। रेल स्टेशन पर
गाड़ी की प्रतीक्षा में बैठे थे। बातचीत के दौरान एक सज्ज्न ने
पूछा, "आप कहाँ से आ रहे हैं और
कहाँ जाएँगे?"
साहित्यकार ने कहा,
"मैं इसी शहर में साहित्यिक सम्मेलन से आया था और अब घर
लौट रहा हूँ। जो बी गाड़ी आती है, भीड़ से भरी रहती हैं। चढ़ने
की हिम्मत नहीं होती है।"
उस सज्जन ने कहा, "आप
वही साहित्यकार हैं जिन्हें "लोग
क्या कहेंगे" के लिए सम्मानित किया
गया है।"
साहित्यकार ने पूछा,
"यह आपने कैसे जाना?"
सज्जन ने कहा,"मैंने
रेडियो से सुना था और अखबार में पढ़ा था, "
फिरआगे सज्ज्न ने कहा,"मैं
अगले स्टोशन तक जाऊँगा, चलिए मैं आपको सीट दिलवा दूँगा।"
साहित्यकार ने कहा,"नहीं,
नहीं। आप जाइये। मैं तो किसी प्रकार चला ही जाऊँगा।"
सज्जन ने कहा,"नहीं,
यह मेरा फर्ज बनता है। आप मेरे अतिथि हैं। यदि यहाँ के लोगों
को यह जानकारी मिल गयी कि आप कष्ट से घर लौटे हैं, और मैंने
जानते हुए भी आपकी कोई मदद नहीं की है तो मुझे यहाँ के
"लोग क्या कहेंगे?"
(निरख
- परख, अक्तूबर -
दिसम्बर 2010 से साभार)
लघु कथा
दुपट्टा
चेतन आर्य
सत्रह
पार कर उसने अठारह में कदम रखा है।
रोज शाम को ट्यूशन जाती
है और दो घंटे बाद वापस आती है। आज लौटी तो रोते हुए।
उसे रोते देख माँ घबरा
गई। पूछा तो 'कुछ नहीं - कुछ नहीं'
बोलकर टालने का प्रयास किया। और हिचक - हिचककर रोने लगी। थोड़ी
देर बाद जब माँ ने पुन: पूछा तो बताने
लगी - जब ट्यूशन जाती हूँ, मुहल्ले के लड़के मोड़ पर खड़े रहते
हैं और कैसी - कैसी बातें करते हैं, मुझे देखकर हँसते भी हैं।
कल से ट्यूशन नहीं जाऊँगी।" कह सुबकने
लगी। उसकी बात सुनकर विधवा माँ को अपने दिन याद आ गये। बेटी के
सिर पर हाथ रखकर समझाया - "बेटा, अब
तुम बड़ी हो गयी हो। कल से सिर झुकाकर और सीने पर दुपट्टा
डालकर ट्यूशन आना - जाना।"
(शुभ तारिका
से साभार) - जनवरी 2011
ठहाका
महावीर उत्तरांचली
-
साहब,
भारत में माता के नौ रूपों की पूजा होती है।
मन्दिर के सामने माता की
मूर्ति को नमन करते हुए राजू गाइड ने अमेरिकन टूरिस्ट से
अंग्रेजी में कहा और नवरात्रि का महत्व तथा माता के रूपों का
विस्तार से वर्णन करने लगा।
- इतना ही नहीं साहब,
यहाँ की सती स्त्रियों ने तो अपने तप के प्रभाव से यमराज की
चंगुल से अपने पति के प्राण तक वापिस मांग लिए। यहाँ गाय को गऊ
माता कहा जाता है और नदियों तक में माता की छवि देखी जाती है
जैसे मोक्षदायिनी गंगा मईया, यमुना, कृषणा, कावेरी, गोदावरी,
गोमती आदि। विश्व का पहला अजूबा ताजमहल शाहजहाँ और मुमताज के
अमर प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इसके बाद भी राजू गाइड उस
पर्यटक को हिन्दुस्तान की न जाने क्या - क्या खूबियाँ गिनाने
लगा और ऐसा कहते वक्त उसके चेहरे पर गर्व का भाव था।
- लेकिन तुम्हारे यहाँ
आज भी कन्या के जन्म पर मातम क्यों मनाया जाता है?
उस पर्यटक ने बड़ी
गम्भीरतापूर्वक कहा।
- प...प...ता नहीं
साहब... सिर खुजलाते हुए राजू गाइड बड़ी मुश्किल से बोल पाया
था और अगले ही पल उसके हिन्दुस्तानी होने का गौरव न जाने कहाँ
गुम हो गया ।
- रिलैक्स राजू गाइड,
तुम तो सीरियस हो गए, मैं तो यूं ही मजाक में पूछ रहा था।
कहकर उस पर्यटक ने एक जोरदार
ठहाका लगाया। साथ देने के लिए राजू ने भी हँसा मगर उसका चेहका
उसकी हँसी में बाधक था।
(शुभ
तारिका से) -
नवम्बर 2010
मेरे
पापा
पंकज शर्मा
दोपहर
की तपती गर्मी, परिंदा भी पर न मारे, आदमी की तो बात ही
क्या... वह भी आजकल का... मगर मजबूरी, मुझे किसी अति आवश्यक
कार्य से अपने घर से किसी मित्र के घर जाना पड़ा था। जैसे ही
मैं मुख्य सड़क से जुड़ी सन्नाटेदार छोटी सड़क पर मुड़कर थोड़ी
दूर पहुँचा, तो देखा कि सात - आठ साल का एक छोटा - सा बच्चा इस
तपती दुपहर की धूप में स्कूल की छुट्टी के उपरान्त पैदल ही
अपने घर की ओर जा रहा था। मैंने उसके पास जाकर अपनी मोटर
साइकिल को विराम दिया और प्यार जताते हुए उसे कहा,
"आयो बेटा बैठ जाओ। मैं छोड़ देता
हूँ आगे तक, उधर ही जा रहा हूँ।"
कुछ असमंजस और कुछ धन्यवादी
नजरों से मुझे देखते हुए वह बैठ गया। मैंने यूँ ही बात शुरू
करने की गरज से पूछा,"बेटा, आप पैदल
ही स्कूल जाते - आते हो क्या?"
"अंकल,
मेरे पापा नहीं हैं," उसके जवाब में
गजब की मासूमियत थी।
उसके इस एक ही जवाब में मेरे
द्वारा आगे पूछे जाने वाले तमाम सवालों का जवाब था। इससे आगे
उससे मैं कुछ न पूछ सका। (शुभ
तारिका से)
(अक्तूबर)
प्रतिक्रिया
डॉ. रुखसाना सिद्दिकी
युवा
मन्त्री की कार दुर्घटना में अकाल मौत हो गई। उन्होंने अपने
अल्पकालीन सेवाकाल में अनेक लोक कल्याणकारी कार्य किए थे।
श्रेष्ठ उपलब्धियाँ हासिल कर जन जन के लोकप्रिय नेता बन गए थे।
उनके असामयिक निधन पर सबसे अधिक क्षति सत्ताधारी पार्टी को हुई
थी। जाने माने प्रतिष्ठित नेताओं द्वारा श्रद्धांजलि समारोह
आयोजित किया गया। श्रेष्ठ वक्ता के रूप में प्रसिद्ध नेता कह
रहे थे - "महान आत्माओं की धरती पर
ही नहीं, स्वर्ग में भी जरूरत होती है। अल्पकालीन सेवाकाल में
उन्होंने इतने उल्लेखनीय काम किए कि उन्हें सदैव याद किया
जाएगा।
बुद्धिजीवी वर्ग आपस में विचार विमर्श
कर रहा था कि शिक्षा के क्षेत्र में मन्त्री जी की घोषणाएँ
भविष्य में मील का पत्थर साबित होंगी। यदि ईश्वर ने उन्हें
दीर्घायु दी होती तो निश्चय ही इस क्षेत्र में गुणात्मक सुधार
होता और शिक्षा का स्तर इतना निम्न न होता।
युवा वर्ग की आशाओं पर पानी फिर गया था।
वे मुँह लटकाए आपस में चर्चा कर रहे थे - "मन्त्री
जी से हमें कई आशाएँ थीं। हमारा भविष्य ही उन पर टिका था। वे
होते तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वर्षों से लगी रोक हट
जाती। नई नियुक्तियाँ होतीं। जिसमें हम अपना भाग्य आजमाते।
उनके आश्वासन से हमें कई आशाएँ बंधी थीं, उन पर कुठाराघात हो
गया।"
ग्रामीण चौपाल पर बैठे चर्चा कर रहे थे
- "जे मन्त्री भोत अच्छे हते। जब से
स्कूल के मन्त्री भय, हमाय गाँव की सब बिटियन को साइकलें
मिलीं, उन्ना (कपड़ा - ड्रेस) मिले, किताबें स्कूल खुलतन ही
मिल गईं। नई तो पहले मास्साब महिनन किताबन को लटकाय रेत ते। और
सुनत है भैया इनने घोसना करी थी। अगले बरस से स्कूल की सब
बिटियन को दो - दो हजार रुपैया मिल हे।"
दूसरे ने मुँह बिसूरते हामी भरी -
"हाँ भैया...जमराज भी अच्छन को चीनत
है, दुष्टन को नई ले जात।"
लघु कथा
मेरी तरक्की
अनिल कुमार जैन
हर
आदमी अपनी तरक्की चाहता है। अपने व्यापार की तरक्की की दुआ
करता है। विज्ञापन देता है। मैं भी चाहता हूं कि इस भाग-दौड़
भरी जिंदगी में मेरा भी व्यापार बढ़े। मैं भी आधुनिक
सुख-सुविधाओं से सुसज्जित रहूं, पर समझ नहीं आता कि क्या दुआ
करूं...? कैसे अपने व्यापार को
बढ़ाऊं...? क्योंकि कफन जो बेचता
हूं! डॉक्टरों को रिश्वत दूं या
दवाई वालों को? (शुभ
तारिका मार्च 2010 से)
नई औरत
उर्मि कृष्ण
पति
की मृत्यु पर उसने चूड़ी, बिछिए उतार देने से साफ इन्कार कर
दिया। वहां उपस्थित सभी औरतें सकते में आ गईं। दुख की इस घड़ी
में भी औरतों की कानाफूसी साफ सुनाई पड़ रही थी। एक बुजुर्ग
महिला उसे एकान्त में ले जाकर समझाने लगी - बहू पति की मृत्यु
के संग चूड़ी, बिंदी उतार देने की परंपरा है। हम बिरादरी में
क्या मुंह दिखाएंगे?
- बुआ,
आत्मा अमर है। तुम सब हर क्षण राग अलापते रहते हो। उसने धीमे
से कहा।
- हां,
सो तो है ही।
- फिर
उसकी अमर आत्मा के लिए मैं सब कुछ पहने रहूंगी। ये सब मेरे
प्रिय को प्रिय थे। इन्हें उतारकर मैं उनकी आत्मा नहीं दुखाना
चाहती।
- बहू,
मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ। ये हमारे धर्म के रिवाज हैं।
- बुआ,
थोथे रिवाजों को क्यों बांधकर रखा जाए?
- तुझे
सुहाग के लुट जाने का गम नहीं है क्या बहू?
- मेरे
दुख को तुम्हारे रिवाज नहीं समझा सकेंगे। मैं दुख का प्रदर्शन
नहीं करना चाहती बुआ जी।
उसकी धीमी
आवाज में दृढ़ता थी।
बुआ ने
कानाफूसी करती औरतों के बीच आकर कहा,
- वो नई
औरत है, हमार का सुने। (दृष्टि से साभार)
बोधकथा
स्वर्ग और
नर्क
महाराज कृष्ण जैन
जापान
के जेन सम्प्रदाय के एक महान आचार्य थे, रिजेई। उनकी ख्याति
दूर दूर तक फैली थी। एक दिन एक युवक उनके पास आया। उसने कहा -
मुनिवर मैं स्वर्ग और नरक के रहस्य को जानना चाहता हूं। कृपया
मुझे समझाएं। रिजेई ने उसे गौर से देखा। फिर प्रश्न किया - वह
मैं समझाता हूं। पर तुम कौन हो?
करते क्या है?
युवक ने बड़े गर्व से कहा - मैं योद्धा हूं। राजा की सेना में
एक उच्च पद पर...
रिजेई बोले -
योद्धा? तुम क्या योद्धा होंगे। देखने
में घसियारे या मोची लगते हो?
युवक ने तैश
में आकर कमरबन्द में खोंसी हुई तलवार निकाल ली और बोला - क्या
यह तलवार आपको दिखाई नहीं दी? क्या यह
मेरे योद्धा होने का प्रमाण नहीं है?
रिजेई पुन:
उपहासपूर्वक उसे देखते हुए बोले - हुंह। तलवार!
इस तलवार से तो सब्जी -भाजी भी न कटती होगी। तुम इससे घास
छीलते होंगे!
युवक तलवार को
म्यान से खींचकर बोला - बहुत हो गया। अब आपने एक भी अपशब्द कहा
तो यह तलवार आपकी दर्दन धड़ से अलग करके ही म्यान में लौटेगी।
रिजेई के
चेहरे पर एक शांत मुस्कान तैरने लगी। वह बोले - युवक, अब तुम
नरक में हो। अच्छी तरह देख लो। समझ लो।
अपना संयम
खोने और आवेश की ज्वाला में जलने का परिणाम क्षण भर में युवक
के सम्मुख स्पष्ट हो गया। उसने लज्जित होकर क्षमा मांगी और सिर
झुकाकर आचार्य रिजेई के चरणों के समीप बैठ गया।
रिजेई ने कहा
- वत्स, यही स्वर्ग है।
नेपाली लोक कथा
दो मुहों वाला सांप
सुवास दीपक
टिस्टा
नदी के किनारे रानीबाग में एक दो मुहों वाला सांप रहता था। एक
ही जैसे दो मुंह थे, परंतु एक पर आंखें नहीं थीं। वह दोनों तरफ
चल सकता था, परंतु चलते समय दोनों मुंह आपस में झगड़ते रहते
थे। एक कहता - मैं पहले चलूंगा। दूसरा कहता कि पहले मैं। वे
कभी आपस में मिलजुल कर नहीं रहते।
एक बार आंखों वाला हिस्सा सांप
को घसीट रहा था। अचानक पिछला हिस्सा एक वृक्ष के तने से लिपट
गया। दोनों में खीचातानी होने लगी।
आंखों वाले को अपने ताकतवर
होने का घमंड था, परंतु वह हार गया। पिछला मुक सांप को घसीटने
लगा। अंधाधुंध अब सांप को जहां-तहां ले जाने लगा। कई बार पानी
में गिर पड़ा, कभी ऊंचे टीले के नीचे।
एक दिन वह अंधा मुक एक घर के
अंदर घुसा। चुल्हे में आग जल रही थी। उसने समझा कि वह कोई गुफा
होगी। वह चूल्हे में घुसने लगा, और आग से झुलस कर मर गया।
(सारिका, अगस्त 1973 में प्रकाशित)
दो तिब्बती लोक कथाएं
कसाई
सुवास दीपक
तिब्बत में एक कसाई था। वह
फाल्गुन महीने से पहले ही काटने का काम खत्म कर लेता, क्योंकि
फाल्गुन महीने के बाद पशु-हत्या वर्जित थी। कल फाल्गुन जल्दी
शुरू होने वाला था इसलिए वह जल्दी भेड़-बकरियां काट रहा था
ताकि समय पर सभी काम खत्म हो जायें। कसाई की एक बेटी थी। जब
अंत में एक बकरी बची तो उसकी बेटी ने उसे खाना खाने के लिए
आवाज दी। कसाई ने सोचा, काम खत्म हो गया, केवल एक बकरी बची है।
काना खा लूं, बाद में काट दूंगा। 'चुप्पी'
(बकरी काटने वाला औजार) वहीं छोड़कर वह खाना खाने चला
गया।
खाना खाने के बाद उसने बकरी
काटनी चाही परंतु चुप्पी गायब थी। देर तक खोजने के बाद भी नहीं
मिली।
वह क्या देखता है कि बकरी ने
अपने खुरों से जमीन खोदकर चुप्पी वहां रख दी थी और खुद उसके
ऊपर बैठी हुई थी। उस बकरी की आंखों से आंसू बह रहे थे और वह
क्षमा याचना भरी निगाहों से कसाई की ओर देख रही थी। कसाई का
कठोर हृदय पिघल गया। उसने सोचा, इस पशु में इतना ज्ञान!
मनुष्य होकर भी मुझमें कोई दया अथवा ज्ञान नहीं है। उसने सोचा,
इस पापी जिंदगी से तो मरना बेहतर है। सभी कुछ वहीं छोड़ देता
है और एक पहाड़ की चोटी पर पहुंचता है। भगवान से अंतिम
प्रार्थना करके पहाड़ के नीचे छलांग लगा देता है। इतने में
स्वर्ग से परियां आती हैं और उसे हाथों पर उठाकर स्वर्ग की ओर
ले जाती हैं। नाचे गिरने गिरने ही नहीं जेतीं।
पहाड़ की कंदरा में एक लामा
तपस्या कर रहा होता है। उसने उस दृश्य को देखा। उसने सोचा,
छलांग लगाने पर कसाई को परियां हाथों पर उठाकर स्वर्ग की ओर ले
गईं। मैं भी अगर छलांग लगाऊं तो मुझे भी ले जायेंगी।
वह उठता है और पर्वत के नीचे
कूद पड़ता है। परंतु उसे किसी परी ने हाथों पर नहीं उठाया। वह
नीचे गिरा और जान से हाथ धो बैठा।
तीन शर्तें
तिब्बत में एक गांव में एक
बूढ़ी औरत रहती थी। उसका एकमात्र बेटा था जो बचपन से
ब्रह्मचारी था। वह रोजाना नदी के उस पार एक गुम्बा (बौद्ध
विहार) में जाता और पूजा करके लौट आता।
गुम्बा के उस पार एक समीप के
गांव में एक नव युवती रहती थी। वह उस ब्रह्मचारी को किसी भी
सूरत से प्राप्त करना चाहती थी। उसने अपने यौवन और सौंदर्य से
ब्रह्मचारी को आकर्षित करना चाहा परंतु ब्रह्मचारी पर कोई असर
न हुआ। अनेक युक्तियों से उसने ब्रह्मचारी को अपना बनाने की
कोशिश की परंतु निष्फल। परंतु वह हार मानने वाली नहीं थी।
नियमित रूप से ब्रह्मचारी एक
दिन सुबह गुम्बा की ओर जा रहा था तो उसने देखा कि वही युवती
उसका रास्ता रोके खड़ी है। वह अपने साथ एक बकरी और एक हंडिया
लेकर आई थी जिसमें उसने अनाज से बनाई शराब जैसा नशीला पेय था
जिसे नेपाली प्रचलित भाषा में जांड़ कहा जाता है। लड़की ने
ब्रह्मचारी को प्रणाम किया और कहा कि वह कुछ कहना चाहती है।
ब्रह्मचारी ने कहा, 'क्या कहना
चाहती हो?'
'मैं
तीन शर्तें पूरी करने को कहती हूं और इन तीनों शर्तों में एक
शर्त तुम्हें पूरी करना ही होगी। यदि तुम पूरी न करोगे तो मैं
नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या कर लूंगी।'
शर्तें इस प्रकार थीं-
1. तुम्हें मेरे साथ शादी करनी
होगी।
2. यह बकरी काटनी होगी।
3. अथवा यह जांड़ पीना होगा।
ब्रह्मचारी महान संकट में पड़
गया। क्या करे? यदि वह शादी करे तो
ब्रह्मचर्य-व्रत भंग। यदि बकरी काटे तो पशु हत्या और यदि जांड़
पिए तो पाप लगे। यदि तीनों में से एक भी न करे तो नर-हत्या
लगे।
बहुत सोच विचार के बाद उसने
जांड़ पीना स्वीकार किया। सोचा कि आखिर अनाज का ही तो बना हुआ
है। इसके पीने से कोई पाप नहीं लगेगा। पूरी हंडिया खत्म करने
के बाद उसने तीनों शर्तें पूरी कर दीं।
(सारिका, अगस्त 1973)
लोकगीत में गुथी कथा
पनघट
उर्मि कृष्ण
गांव में पनघट पर
उल्लसित सजी युवतियां अपने अपने घड़े भर कर घर जा चुकी हैं। एक
अलबेली छबीली अभी घड़े में फंदा डाल ही रही थी कि एक बटोही आ
खड़ा हुआ। युवती ने कनखियों से देखा। गर्दन नीचे झुकाई, फिर
तनिक गर्वित मुस्कान के साथ घूंघट की ओट से बोली - के काम से
छोरा?
युवक दो पग और बढ़ा। बोला - प्यास घणी से।
युवती चुप।
- दो एक घूंट पाणी पिलावेगी कामणी नार.
तुनक कर युवती ने नैन नचाते हुए कहा - दीखे नी
से मैं कोमल नार हूं। कुएं में घघरी भरने में म्हारी कम्मर बल
खा जागी। भरी घघरी उठाने से हाथ दूखेगा। पाणी किस तरह पिलाऊं
बटोही।
- थारा गाम की बढ़ाई सुण आयो से। ना
पिलावेगी तो प्यासो रैलूंगा। युवक लौटने को हुआ।
युवती उसे रोकते हुए बोली - रुक जा बटोही। दो
क्षण रुक कर बोली - ये तो बता बांका छोरा तू के गाम का पावणा
से? किस का भरतार से?
युवक मुस्कराया। बोला - मैं थारा गाम का पावणा
हूं... तेरे पिता की बेटी का भरतार (पति) हूं। आंख्या उठा के
देखेगी कोनी?
युवती की नजरें युवक की ओर उठ गईं। एकदम लजा
मुंह ढक लिया उसने। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद युवक फिर
बोला - प्यास जाऊ?
युवती ने एकदम कुएं में घड़ा डाला और शीघ्रता
से कमर लचकाते पानी खींच लिया। युवक को बिना देखे ही हाथों से
घड़ा उसकी ओर झुका दिया। घड़ा युवती के हाथों से लेता युवक
बोला - ईब तेरी कम्मर कैसे नवे से। कामणी, ईब तेरा घड़ा कैसे
भरे से नार।
दोनों की हंसी से पनघट गूंज उठा।
लघु कथा
इस बार
सुखचैन सिंह भंडारी
वह हर वर्ष अपने
रिश्तेदारों एवं मित्रों को निरंतर नववर्ष की शुभकामनाओं के
कार्ड भेजता। उसे ऐसा करके बड़ी मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती।
चाहे कई लोग उसकी उन मंगलकामनाओं का आभार भी अपने पत्र द्वारा
न लौटाते तो भी वह पहली जनवरी से तीन-चार दिन पूर्व बहुत ही
खूबसूरत कार्ड डाक द्वारा भेज देता।
परंतु इस बार वह सभी रिश्तेदार और मित्रगण
आश्चर्यचकित थे कि उनके पास, उनके नव वर्ष के कार्ड क्यों नहीं
भेजे। ऐसा पहली बार हुआ था। इसी लिए एक खास मित्र ने अपने पत्र
द्वारा पूछ ही लिया कि इस बार उसने शुभकामनाएं क्यों नहीं
भेजीं?
तीसरे दिन उस मित्र को उत्तर गया -
'मेरे दोस्त!
मुम्बई के ताज होटल कांड में मेरा एक मित्र भी मारा
गया, जिसको मैं पिछले बीस साल से लगातार हैपी न्यू ईयर की
बैस्ट विशिज भेज रहा था। बस! अब
और नहीं।
('शुभ
तारिका',जुलाई 2009 से साभार)
तुमि आमा के मारते पारोना
सुवास दीपक
दूसरे दर्जे के वेटिंग रूम में काफी भीड़ और उमस थी। अत: बाहर खंभे
के पास चादर बिछा कर मैं चे की जीवनी पढ़ रहा था। मानसून शुरू हो चुके थे, अत: जोरों से वर्षा हो रही थी। पांव के पास छत से पानी तप...तप... गिर रहा था। कबी-कभी हवा तेज हो जाने से बौछार भिगो जाती थी परंतु वहीं पड़ा रहा। उठकर अन्य जगह पर नहीं बैठा।
सुबह होने में अभी चार घंटे बाकी थे। मैं तन्मयता से पढ़ रहा था कि अचानक देखा, एक दुबला - पतला, सांवला मरियल-सा लड़का, जिसकी उम्र बीस या पच्चीस साल के बीच होगी, प्लेटफार्म पर खड़ा कह रहा ता, 'यू गिव मी बल्ड्, आ विल गिव यू फ्रीडम।'
और वह मार्चपास्ट की मुद्रा में सैल्यूट करता दस गज दूर से आ रहा था।
किताब नीचे रखकर मैं उसकी ओर देखने लग गया था। रेलवे पुलिस का एक कांस्टेबुल उसके पीछे चुपके सा आया और 'चटाक' से उसके चूटड़ पर डंडा मारकर 'चल चूतिया कहीं का, हल्ला करता है!' कह कर आगे हो लिया था। अचानक पड़ी चोट से वह उछल पड़ा था और काफी पीछे हटकर चूतड़ों को दोनों हाथों से मलते हुए 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा...यू गिव मी ब्लड्...' वह ऊंची आवाज में चिल्लाने लग गया था। चोट से उसके चेहरे पर तनाव आ गया था और अपने अंदर के आक्रोश को जैसे जबरदस्ती जज्ब करके वह ठहाका मारकर हंस दिया था।
मैं पहले लेटा-सा उसे देख रहा था। अब उठकर सीधा बैठ गया था। पास की रेलवे कैंटीन की गोल सिमेंट्री पर बैठे दिल्ली के किसी अंगरेजी स्कूल के चौदह-पंद्रह साल के छात्र उसकी हरकतों का लुत्फ ले रहे थे। मेरे अंदर कुछ पिघल रहा था। कुछ ऊबड़-खाबड़, कुछ टेढ़ी-मेढ़ी और तिरछी लकीरें आंखों के आगे कौंधिया जाती थीं। पाल्थी मारकर बैठे मैंने उसके चेहरे पर दिग्भ्रमित युवा मानस का चित्र देखा। उसके सींकिए बदन, पिचकी गालें परंतु अत्यधिक चमकती आंखों में कुछ ऐसा था जो मंत्रमुग्ध करने, संज्ञाशून्य करने अथवा किसी जड़ता तक पहुंचाने के लिए काफी था। मैं एकटक उसे देख रहा था।
अब वह कुछ ऐसी हरकतें करने लग गया था कि कभी हंस पड़ता था, कभी रोने। कभी नजरूल इस्लाम की पंक्तियां - 'महाविद्रोही रण-क्लांत, आमि छेइ दिन होब शांत...' बोलता जाता था।
इस बार उसने पुलिस वाले को एक हवाई फायर दाग दिया था और एम्बुश लगाकर स्टेनगन संङालने की मुद्रा में एक आंख दबाकर दनादन गोलियां दागनी शुरू कर दी थीं। सिपाही उसकी ओर न देखकर कैंटीन वाले लड़के को धमकाकर चाय बनाने को कह रहा था। लड़का स्टूल पर सिर टिकाकर ऊंघ रहा था। वह उसी पोजीशन में कांस्टेबुल की ओर देख रहा था। अचानक जब वह मुड़ा तो वह गोली लगने की मुद्रा में जोर से चीखकर उछल पड़ा था। एक हाथ में उसने अपना सीना दबा रखा था और 'आ...आ...जोल...पानी' कह कर धड़ाम से फर्श पर गिर पड़ा था। परंतु दूसरे ही क्षण 'तुमि आमाके मारते पारोना...तुमि आमाके...आमि महाविद्रोही रण-क्लांत...' कहता ऊंगली उठाकर कांस्टेबुल की ओर देखता चिल्लाए जा रहा था। उसने चीथड़ी बुश्शर्ट खोल दी थी तथा उसकी पसलियां आसानी से गिनी जा सकती थीं। उसने अपना सीना फुलाकर कहा था - 'यह लोहा का है, यहां गोली नहीं लग शोक्ता। मारकर देखो।'
कांस्टेबुल उसकी हरकत पर कुटिल मुस्कान से उसकी ओर डंडा घुमाता आ रहा था और वह एकटक उसकी ओर देखता अपने चूतड़ों पर हाथ फेर रहा था। कांस्टेबुल जब उसके पास पहुंचा तो वह फटी-फटी आंखों से उसकी ओर देख रहा था जैसे बकरा कसाई को देख रहा होता हो। डंडा घूमा था परंतु दूसरे ही क्षण वह उल्टे पांव दस-पंद्रह पीछे सरक गया था। डंडे वाले ने एक निहायत अश्लील गाली उछाली थी और आगे हो लिया था। लड़का पीछे आकर फिर उसकी नकल करने लग गया था।
काइंटर पर बैठे छात्र उसकी हरकतों का अभी तक लुत्फ ले रहे थे और चे को पढ़ने वाला मैं अभी तक पाल्थी मारे उसे देख रहा था। समूचा हिंदुस्तान मेरी आंखों में घूम चुका था। वब बावला-सा लड़का मुझे बावला कतई नहीं लग रहा था बल्कि शोषित युवा-शक्ति का प्रतीक लग रहा था।
"साला नक्सलाइट लगता है। पागल हो गया है।" स्कूली लड़कों का तर्क था।
"पर है बड़ा दिलचस्प! सारी बोरियत खत्म हो गई! अबो ओ क्रांतिकारी दे पुत्तर, तैंनू की तकलीफ है!"
एक सरदार मुसाफिर ने फिकरा कसा था।
अब वह चुपचाप बैठा था। वर्षा उसी प्रकार हो रही थी। ठंडी हवा भी चलने लग गई थी जिससे प्लेटफार्म की उमस और बदबू कुछ छंट गई थी। स्कूली लड़के भी अब जाकर वेटिंग रूम में सो गए थे। प्लेटफार्म में कई जगहों पर पानी चू रहा था। मुझे चाय की तलब होने लग गई थी। परंतु कैंटीन के लड़के को मीठी नींद से जगाना उचित नहीं समझा। अत: तलब दूर करने के लिए सिगरेट पर सिगरेट फूंक रहा था। सिगरेट के धुएं में उस लड़के के चेहरे पर चमकती आंखें, ऊंघता कैंटीन का लड़का, कांस्टेबुल का डंडा... आइ विल गिव यू फ्रीडम...तुमि आमाके मारते पारोना... तुम मुझे मार नहीं शोक्ता...हा...हा...।
मैंने आंखें बंद कर ली थीं।
( चक्रव्यूह तथा अन्य कहानियां
-2003 से साभार)