अज्ञेय की तीन कविताएँ
प्यार की तरीके
प्यार के तरीके तो और भी होते हैं
पर मेरे सपने में मेरा हाथ
चुपचाप
तुम्हारे हाथ को सहलाता रहा
सपने मकी रात भर...
प्रेमापनिषद्
वह जो पंछी
खाता नहीं, ताकता है,
पहरे पर एकटक जागता है...
होगा, होगा जब।
मैं वह पंछी हूँ
जो फल खाता है
क्योंकि फल डाल, तरु, मूल,
तुम्ही हो सब।
पर एक
जागता है, ताकता है -
कौन?
मैं हूँ, जागरूक, पहरेदार।
पक्षी और डाल, तरु और फूल,
सभी में देखता हूँ
तुम्हारा होकर।
मुक्त करे तुम्हें, मौन
वही तो होगा
मेरा प्यार।
प्यार
प्यार
एक यज्ञ का चरण
जिस में मैं वेध्य हूँ।
प्यार
एक अचूक वरण
कि किस के द्वारा
मैं मर्म में वेध्य हूँ।
शून्य
मुक्तिबोध
भीतर
जो शून्य है
उसका एक जबड़ा है,
जबड़े में मांस खाने के दाँत हैं;
उनको खा जायेंगे,
तुमको खा जायेंगे।
भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह
हमारा स्वभाव है,
जबड़े की भीतरी अँधेरी खाई में
खून का तालाब है।
ऐसा वह शून्य है
एकदम काला है, बर्बर है, नग्न है
विहीन है, न्यून है,
अपने में मग्न है।
उसको मैं उत्तेजित
शब्दों और कार्यों से
बिखेरता रहता हूँ
बाँटता फिरता हूँ।
मेरा जो रास्ता काटने वाले हैं,
मुझसे मिले घावों में
वही शून्य पाते हैं।
उसे बढ़ाते हैं, फैलाते हैं,
और - और लोगों में बाँटते बिखेरते,
शून्यों की सन्तानें उभारते।
बहुत बिकाऊ है,
शून्य बिकाऊ है।
जगह - जगह करवत, कटार और दराँत,
उगाता - बढ़ाता है
मांस काट खाने के दाँत।
इसीलिए जहाँ देखो वहाँ
खूब मच रही है, खूब ठन रही है,
मौत अब नये - नये बच्चे जन रही है।
जगह- जगह दाँतदार भूल,
हथियारबन्द गलती है,
जिन्हें देख, दुनिया हाथ मलती हुई
चलती है।
(सम्भावित रचनाकाल 1960 -
61, चाँद का मुँह टेढ़ा है में संकलित)
जनवरी 2012
गीत
आचार्य
विजय चक्रवर्ती
जिस
जिस नगर में
मैं रहूँ
होमटाउन
जाए बन।
मैं जन्म से
वाशिन्दा हूँ
यहीं का
यों लगे।
पराया शब्द
अर्थ खो दो
सब दिखें सगे,
लपिन - सा
नहीं चुभे
मुझे
अजनबीपन।
जहाँ जाऊँ
मुस्कराए
उस नगर की धरा।
पुत्र के
आने पे ज्यों
माँ
देती हो मुस्करा।
सेवा करूँ मैं
वहाँ
सभी की
लगा के मन।
मैं रहूँ जिस नगर
में
सुख - शान्ति
हो सदा।
हों सभी सुविधाएँ
आए नहीं आपदा।
न हो भ्रष्टाचार
वहाँ
और
न शोषण।
(दिसम्बर
2011)
प्रेम कविताएँ
तुम्हारा आना
राहुल झा
तुम्हारा
आना
वही गूँजती पगवाहट आली -
सा
और भीतर के संसार में
कुछ बजता - सा
मन की हरी टहनी हिलाकर
कहता हूँ
कि तुम आयी हो
हवा के ठंडे झोंके की
तरह।
पुल
अनुभूति और एकान्त में
एक - दूसरे में
इतनी बार
इतनी बार
इतनी बातें की थीं...
कि उसके बीच
एक थरथराता पुल बन गया
गो कि शब्द
उसके ऊपर होकर नहीं गुजरा
गो कि एक सोच, एक संवेदना
इस थरथराते पुल के नीचे
हरहराती रही सरसों...।
(नया
ज्ञानोदय, अक्तूबर 2009 से साभार)
नवम्बर 2011
नदी
वैद्यनाथ उपाध्याय
मेरे
गाँव के दोनों ओर से
नदी बहती है।
सभ्यताओं के उत्थान और
पतन का
इतिहास अधर में लपेटे
न जोने कितनी पीढ़ियों की
व्यथा - कथा को अपने वक्ष
में समेटे
मौन - नि:शब्द
निरन्तरता को यथार्थता
देती हुई प्रवाहित है वह
नदी।
इस नदी के किनारे
झूलता हुआ कहीं गुम हो
गया है
मेरा बचपन।
जवानी के कितने गिले -
शिकवे
इसी की रेत में समा गए।
जीवन और नदी
नदी और जीवन
कितने मिलते जुलते हैं
एक दूसरे से।
जीवन
बाल्यावस्था, युवावस्था,
वृद्धावस्था से होकर
निरन्तर प्रवाहित है।
यह नदी के प्रवाहित होने
और मेरी उम्र के गुजर
जाने में
कितना सामंजस्य हा।
जब मैं नहीं रहूँगा
दुनिया में
फिर भी रहेगी यह नदी
इसका प्रवाह
यादों की चिनगारियों को
रेत में
बदलकर खामोश हो जाएगी
और दिशाएँ बदलते हुए
प्रवाहित होती रहेगी
यह नदी।
baidyanath2010@ ovi.com
(गगन
के उस पार, 2010 से साभार)
अक्तूबर 2011
भारत
डॉ. ए. कीर्तिवर्धन
कण - कण में जहां शंकर बसते, बूंद
- बूंद में गंगा
जिसकी गौरवगाथा गाता विश्व विजयी
तिरंगा।
सागर जिसके चरण पखारे, और मुकुट
हिमालय
जल - जल में मानवता बसती, हर मन
निर्मल चंगा।
वृक्ष धरा के आभूषण, और रज यहां की
चंदन
बच्चा - बच्चा रामकृष्ण - सा, बहती
ज्ञान की गंगा।
विश्व को दिशा दिखाती, आज भी वेद
ऋचाएं
कर्मयोग प्रधान बना, गीता का संदेश
चंगा।
'अहिंसा
और शांति' मंत्र, जहां धर्म के
मार्ग
त्याग की पराकाष्ठा होती,
'महावीर'
सा नंगा।
भूत - प्रेत और अंधविश्वास का, देश
बताते पश्चिम वाले
फिर भी हम हैं विश्व गुरु,
अध्यात्म संदेश है चंगा।।
09911323732
(सितंबर 2011)
परिवर्तन
अतुल कुमार माथुर
भोर
के बुझते दिए को
कौन करता है नमन,
उगते सूरज को ही होते हैं
सदा अर्पित सुमन,
आस्थाएँ निज स्वार्थ की ही
संचालित करती हैं जीवन।।
कौन उठा के ज्योति पताका
संघर्ष करता है सतत,
यामिनी के पाश में जब
सोता है सब जगत,
कौन बढ़ाता वंश प्रकाश का
तम होता है जब सघन।।
कौन सींचता है खून से
फसल सदा प्रकाश की,
कौन रखता है सजीव
परम्परा विश्वास की,
कौन दिखाता है साहस जब
होता उजालों का पतन।।
भूल जाते हैं सदा क्यों
हम किसी बलिदान को
आँकते हैं कम सदा क्यों
दीप के योगदान को,
कायोत्तर हो जाते हैं क्यों
हम स्वभाव से कृतघ्न।।
रीते दिये का सुबह सवेरे
तिरस्कार कितना होता है
दो कौड़ी की चीज हो कोई
मूल्य माँग इतना होता है
याद आता है दीप वही जब
निशा का होता आगमन।।
कामना है बदल डालें हम
इस अजब व्यवहार को,
स्वीकार करें हम बड़ी श्रद्धा से
दीप के उपकार को,
बदल जाए ये रीत जगत की
और हो जाए परिवर्तन।।
(पगडंडियाँ
पहाड़ की, सम्पादक -
डॉ. अकेलाभाइ, पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी, 2009 से साभार) -
अगस्त 2011
सिर्फ तुम्हारे लिए
डॉ. सन्तकुमार टण्डन
'रसिक'
मेरे
मर्म के मरुस्थल में
तुम एक बहती हुई नदी हो
दिन, माह, वर्ष नहीं
तुम एक सारस्वत सदी हो,
कूप, सरोवर, सरिता
सूख सकती है
पर, तुम्हारे प्रेम की गुप्त सरस्वती
सदा प्रवाहित रहेगी अन्त:
सलिला सी,
मुझे विश्वास है
मेरी जिजीविषा को
तुमने उत्प्रेरित ही नहीं किया है
उसे सदा जीवन्त रखना चाहती हो
यदि तुम मुझे बूढ़ा नहीं समझतीं
तो अपने यौवन - अमृत के
कुछ वासन्तिक क्षण - कण देकर
मेरे पल - पल को अनन्त विस्तार दे दो
मैंने फैला रखी हैं अपनी बांहें
सिर्फ तुम्हारे लिए ही,
तुम अपने पग बढ़ाओ
और मुझमें समा जाओ।।
(दस्तक - 2011, सम्पादक
डॉ. हितेश कुमार शर्मा से साभार)
- जुलाई 2011
एक पल
मंजु लामा
सहयात्री!
अपने जीवन का एक पल
मुझे दे दो।
उस पल को मैं
सुवासित कर दूँ
हवा के झोंकों में तुम्हारा नाम बिखेर
दूँ
उदास उन आँखों में
एक स्मृति दूँ
ताकि जीवन यात्रा के
थकते क्षणों में
तुम मुझे याद कर सको।
ऐ सहयात्री -
तुम अपने जीवन का एक पल
मुझे दे दो।
(जून
2011)
आँख का पानी
डॉ. अ. कीर्तिवर्धन
होने लगा है कंम अब आँख का पानी
छलकता नहीं है अब आँख का पानी।
कम हो गया लिहाज, बुजुर्गों का जब
से
मरने लगा है अब आँख का पानी।
सिमटने लगे हैं जब से नदी, ताल,
सरोवर
सूख गया है तब से आँख का पानी।
परपीड़ा में बहता था दरिया तूफानी
आता नहीं नजर कतरा, आँख का पानी।
स्वार्थों की चर्बी जब आँखों पर
छाई
भूल गया बहना आँख का पानी।
उड़ गई नींद माँ - बाप की आजकल
उतरा है जब बच्चों की आँख का पानी।
फैशन के दौर की सबसे बुरी खबर
मर गया है औरत की आँख का पानी।
देखकर नंगे जिस्म और लजरते होंठ
पलकों में सिमट गया आँख का पानी।
लूटा है जिन्होंने मुल्क का अमन औ
चैन
उतरा हुआ है जिस्म से आंख का पीनी।
नेता जो बनते आजकल, भ्रष्ट बेईमान
हैं
बनने से पहले उतारते आँख का पानी।
0911323732
मुखौटा
डॉ. अकेलाभाइ
आज
तुमने अपना मुखौटा क्यों हटा दिया
अपना असली चेहरा दिखाकर
मुझे क्यों रुला दिया
किताना खुश था मैं
तेरे नकली चेहरे को देख - देखकर
आज तुमने मुझे अपना
असली चेहरा क्यो दिखा दिया
मुझे लगता था कि
तुम कितने करीब हो मुझसे
मुझे लगता था कि
तुम ही रकीफ हो सबमें
अपना मुखौटा हटाकर
क्यों नंगा किया इस समाज को
जिसे मैं स्वर्ग से सुन्दर
और मन्दिर से भी पवित्र मानने लगा था।
आज तेरे नंगे बदन को देखकर हैरान हो
गया हूँ
आज तेरा नंगापन देखकर परेशान हो गया
हूँ
इतना गिर सकता है तेरे जैसा इन्सान
आखिर किसलिए
इससे तो भला तेरा वह मुखौटा था
जो छलता रहता जीवन भर
मुझे कभी दु:ख
न होता और मैं कभी न रोता।
(पगडंडियाँ पहाड़ की,
सम्पादक: डॉ. अकेलाभाइ,
पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी, शिलांग से साभार) अप्रैल 2011
(नए
हस्ताक्षर)
पोटली
बब्लु
सोनी
तू
मत खोल अपनी
दु:ख
की पोटली
जहाँ दु:ख
- दर्द और सिर्फ
तनहाई भरी है
अरे ये लोग क्या
जानें
तेरे सामान की कीमत
क्या है!
तेरा सामान अमूल्य है
तू इसे वहाँ खोल
जहाँ इसकी कीमत है
यूँ तो हीरों की परख
केवल जौहरी की करते
हैं।
ये सब तुम्हें
न जाने क्या कह डालें
कोई पागल या मुफ्त
में गाली न दे डाले
या उठा न ले कोई
पथ्र।
अरे ये सब लोग क्या
जानें,
द:ख
- दर्द और तनहाई
किस चिड़िया का नाम
है
इसमें जो मिठास है,
वह सुख में कहाँ
खामोशी में जो बात है
वह शोर में कहाँ
तम में जो बात है वह
ज्योति में कहाँ!
क्योंकि रात की रानी
कुसुम
निशा में ही खिला
करती है
और सुगन्ध बिखेरा
करती है।
(गेजिंग
बाजार, पश्चिम सिक्किम)
धूप के हाथ
डॉ. जगदीशचन्द्र चौरे
धूप
के हाथ मेंहदी रचाने लगे
खिड़कियों से कंगन मुस्कराने लगे
एक घटा घिर गई
रूप के गाँव में
मेले जुड़ने लगे
अजनबी गाँव में
प्रीत के रत जगे, गीत गाने लगे
खिड़कियों से कंगन मुस्कराने लगे
एक किरन बावरी
जब से तन को छू गई
तब से सपने भरी
जिन्दगी हो गई
आँख में कुछ दीये जगमगाने लगे
खिड़कियों से कंवल मुस्कराने लगे।
(डॉ.
हितेश कुमार शर्मा के
सम्पादन में प्रकाशित संयुक्त कविता संग्रह
दस्तक
से साभार)
-
नवम्बर 2010
एक और अनेक
पंकज शर्मा
स्मृतियों
में पन्ने पलटकर
किताब की तरह
अपने जीवन के बिल्कुल
पहले पृष्ठ पर से
फिर से शुरू करना
और देखना
चलचित्र की भाँति
अपना बचपन और
अपनी जवानी और
कभी - कभी बुढ़ापा भी
साक्षात और जीवन्त
सचमुच, मानो या न मानो
पर अगर समझो तो
महसूस करो जो मेरी तरह
अपने बच्चों में...
एक समय में एक साथ
कई जीवन जिए हैं मैंने
अपना बुढ़ापा, बेटे का यौवन, और
उसके बच्चों का बचपन।
(अक्टूबर 2010)
अमर
काव्य:
ऋतुसंहार
वर्षा
ऋतु पर विशेष
वर्षा
तो
प्रियो, जल-कणों से लबालब बादलरूपी मस्त हाथी पर चढ़कर,
बिजली-सी
झंडियों को फहराता और नगाड़े को गड़गड़ाता हुआ
वह
कामी-जनों का प्यारा वर्षाकाल राजाओं जैसे ठाट-बाट में
इठलाता
जा रहा है।
ससीकराम्भोधर - मत्त - कुञ्जर:
तडित्पताकोsशनि - शब्द -
मर्दल:।
समागतो राजवदुद्धत - द्युतिर्
घनागम:
कामिजन - प्रिय: प्रिये।।
Look, my love, the royal
rainy season
so dear to lovers has
arrived,
riding cloud - elephants
drunk on rain drops,
beating drums of
thunder,
flashing flags of
lightning.
(किताबघर
प्रकाशन की पत्रिका
समकालीन साहित्य
समाचार से साभार)
(खण्ड काव्य)
उर्वशी
टीकाराम उपाध्याय
'निर्भीक'
नहीं हो माता, नहीं हो कन्या, नहीं
हो बधू, सुन्दर
रूपसी,
हे!
नन्दवासिनी उर्वशी!!
चरण में जब आती सन्ध्या, देह में
स्वर्णांचल फैलाकर,
तुम कोई गृह प्रान्त में नहीं
जलाती सन्ध्या दीप को।
-
द्विधा में जड़ित पद में कम्प, डर
लेकर,
नम्र नेत्रपात के साथ।
स्मित हास्य ले नहीं जाती,
सुहागरात में लज्जा साथ -
स्तब्ध आधी रात।
-
ऊषा के उदय समान अनबगुण्ठिता,
तुम अकण्ठिता,
बृन्तहीन पुष्पिता स्वयं स्वयं ही
खिलता,
कब तक खिल गयी उर्वशी,
हे नन्दवासिनी उर्वशी!!
-
आदिमबसन्त के प्रान्त में निकल गयी
मंदित सागर
में,
दायाँ हाथ सुधा पात्र विषपात्र ले
बायें हाथ में,
तरंगित महासिन्धु मन्त्रशान्त
भुजंग समान,
पड़ा था पद प्रान्त में उच्छव सहित
फना लाख लाख,
करके अवनत।
-
कुन्द शुभ्र नग्न कांति सुरेन्द्र
वन्दिता -
तुम हो अनिन्दिता -
कोई कल में नहीं थी मुकुलिका
बालिकावयसी -
हे!
अन्ता यौवना उर्वशी!!
-
अन्धकार सिन्धु तल में किसके गृह
में अकेली बैठी,
माणिक मुक्ता लेकर शैशव में खेलती
तुम अकेली -
मणिद्वीप द्विप्त कक्ष में समुद्र
के कल्लोल संगीत में,
अकलंक हास्य मुख से सोयी थी -
प्वाल प्यांक में-
किसके अंक में?
-
जब आयी विश्व में यौवन गठिता,
पूर्ण युगान्तर से तुम केवल विश्व
की प्रेयसी -
हे!
अपूर्व शोभना उर्वशी!!
-
मुनियों के ध्यान भंग कर दिए हैं,
पद में तपस्या का फल -
तुम्हारी अकटाक्ष धात में त्रिभुवन
यौवन चंचल,
तुम्हारी मदिर गंध अन्ध वायु -
बहती है दिशा दिशा में।
-
मदुमत भृंग सम मुग्धकवि घूमता -
लुब्धचित्त लेकर,
उद्दाम संगीता -
नूपुर के गुंजन साथ आकुल अंचला,
विद्युत चंचला -
सरसभी तल में -
जब नृत्य करती पुलकित बनकर,
हे!
विल्लोल हिल्लोल उर्वशी!!
-
चन्द छन्द में नाचते हैं -
सिन्धुमाझ तरंग के दल,
शष्य शीर्ष रोमांच होकर काँपता धरा
का अंचल।
जवस्तनदार से नभस्तल में गिरते
सितारे,
अकस्मात पुरुष के उर में चित्त
आत्महारा -
नाचता रक्तधारा -
दिगन्त में मनमादुरी,
तब होता भंग अचम्भित -
हे!
असम्वृत।
-
स्वर्ग के उदयाचल में -
मूर्तिमता तुम हो उषी -
हे!
भुवन मोहिनी उर्वशी!!
-
जगत के अश्रुधार में -
द्योत जब तन को उस बखत,
त्रिलोक के उर रक्त में -
अंकित जब चरण रज में -
मुक्त वेणि विवश में विकसित विश्व
वासना के,
अरविन्द बीच में,
पाद पद्म रही है तुम्हारी -
हे!
अधिरा उर्वशी!!
-
अनादि युग पुरातन इस जगत में -
आओगी तुम कब?
अतल अकुल से सिक्त केश लेकर उठोगी
कब,
प्रथम रूप स्पष्ट होगा,
प्रथम प्रभात में।
सर्वांग हो सकेगा तब,
निखिल के नयन आघात में -
बारि बिन्दु पात में।
-
अकस्मात महाम्बुधि अपूर्ण संगीत
लेकर,
तरंगित होकर निश्चय नहीं, नहीं
आयेगी,
अब अस्त वह गौरव शशी -
हे!
अस्ताचल वासिनी उर्वशी!!
-
तब तो आज धरातल में,
बसन्त का आनन्द उच्छवास -
किसकी चिद वीरता से मिलकर -
बहती आती दीर्घ श्वास,
पूर्णिमा निश में जब हास्य से,
दशों दिशा परिपूर्ण होती,
दूर स्मृति की किसी दिशा से,
व्याकुल बंशी बजती रहती -
जब अश्रु शशी गिरती।
तो आशाप्राण के क्रन्दन में आती
रहती,
अई, अबन्धनी उर्वशी।
-
सहस्रों में से एक लोक ही,
तुम्हारी स्मृति में ब्रह्माण्ड
सम्पूर्ण,
सन्न, शून्य, शान्त, स्तब्ध,
निस्तब्ध -
हृदय में चोट मिली होगी जैसी -
सम्पूर्ण देवाकुल आज -
अतीव बिदग्ध, विभग्न होने से बच न
सके,
दुर्जय काल धन्य हो न सका,
तो भी तुम हो एक सौन्दर्य यौवना.
हे!
सुन्दरी उर्वशी!!
-
हृदय कठोर कुटिल होने से भी,
अपरिहार्य बाध्य अन्तरंग सहृदय है,
किसी का आरोपित सिद्धि समृद्धि
सुख,
उद्दाम भाव राशियों को सुललित
शब्दों से,
सन्मुख होने के लिए व्यग्र हैं
देवता,
शब्द-विन्यास उच्च की भावनाएँ,
उक्रान्ति का अनन्त अनन्त करते हैं
जग विजय,
जो तुम आ जाती हो एक बार
कितनी करुणा -
कितनी आशाएँ हैं मनुज में।
निधि जीवन -
जीवन जागरणी
उ जागरणी हे!
उर्वशी!!
-
ओ!
तुम्हारे जीवन काव्य का,
विचित्र अध्याय,
जैसे काव्यश्री की गोद में -
किलकारी भरने वाली -
जवानी वाली मुग्धे!
-
तुम्हारी अधूरी अस्पष्ट -
रेखाओं का,
विचित्र किन्तु -
रागमय रेखाचित्र,
साथ ही तुम -
लाडली कन्ये!
सच ही तुम - सुन्दरी हो,
हे!
सुन्दरी उर्वशी!!
-
तुम किसके लिए क्या हो?
तुम्हारे लिए,
देवता प्रणम्य हो जाते हैं,
ऋषि मुनि तथा -
देवता प्रणाम करने के लिए -
व्याकुल दिखाई देते हैं।
तुम्हें अपने कठोर हाथों से -
पीट न सकने के कारण,
तुम्हारे थारे कोमल -
हाथों से अपने को पिटाने के इच्छुक
हैं।
तुम्हें मेरी कहानी -
सुना के सुलाऊँ या -
खुद ममता के मन्दिर में -
आनन्द से सो जाऊँ।
हे!
स्नेहमयी उर्वशी!!
-
यहाँ तक कि -
तुम्हें तुम, कहूँ या मैं, कहूँ,
अथवा -
हम ही तहूँ यह समझ में नहीं आता
क्योंकि लोक आसिक है,
तुम्हारे लिए आशिक,
तुम विचित्र हो,
तुमको सृष्टि करने वाला भी विचित्र
है,
और यह देवता निर्मित -
अभिव्यक्ति का साधन भी,
अधूरा है,
अंजान है,
हे!
सुन्दरी उर्वशी!
-
इस वैचित्र्य के मधुर सौन्दर्य का,
प्रेषणीय चित्र रूप देने में -
वहाँ संगीत के सप्त स्वरों में -
अथवा
स्वरों के बन्धन में -
रहने वाली तुम एक अध्याय हो,
अधूरा ही सही,
अपूर्ण में पूर्ण है -
सुन्दर से सुन्दर है,
विचित्र स्वर्ग है
अचित्र चित्र है,
हे!
सुन्दरी उर्वशी!!
-
वह नहीं कर पायी ऋंगार,
परन्तु उन्हें किसी की मृदु आवाज
सुनाई देती है -
सहसा कोई,
रस में भीग जाता है,
चारों ओर चाँदनी में उमड़ी है -
बसन्त वाली,
कोकिल की तान सुनाई देती है
जैसे चन्द्रमा -
भूमि पर गिरा है।
रजनी को शिथिल करने के लिए,
कभी किसी को,
चिन्ता से चूर करने वाली -
हे!
सुन्दरी उर्वशी!!
-
स्पर्श में,
लेकिन कोई सुधा की रागिनी है,
और त्वचा में भी शक्ति है,
स्पर्श का झंकारमय यह गीत है,
गीत से नींद टूट जाती है,
लगता है -
चाँदनी में किरणें कनक जैसी,
झिलमिलाती हैं।
-
तुम्हें पाकर
रोम कूपों से -
उठती संगीत की झनकार।
खिल जाता है जूही के फूल जैसा -
मुख मण्डल।
तुम्हें मिथ्या कौन कहेगा?
हे!
सविदुषी उर्वशी!!
-
तुम अचानक ही
कहाँ से आ गयी थी -
रूह की प्रतिमा जैसी,
निकल सहसा -
दुम्रों की छाँह जैसी
शीतलता में -
प्यार से जलती हुई आतुर भुजायें
तिमिर से फूटने वाली,
प्रखर किरण के बीच -
हाथ पर तुमने रखा जो हाथ
-
देवताओं की ग्रीवा का हार बनकर
देवी तुम
स्वप्न में भी आ जाती हो,
हे!
नर्तकी उर्वशी!!
-
फैलकर मुड़ गयी स्वयमेव,
जैसे साँप दीपक को देखकर,
फण तोड़ लेता है -
मैं तुम्हारी ओर
अपलक
देखता खोता गया।
कैसी हो?
तुम हे!
सुन्दरी उर्वशी!!
-
उठती है -
उर में हिल्लोल,
तुम कुसुम कलियों पर,
स्वयं अजंग,
ठगी सी रुकी नयन की प्यास।
लिए अंजन -
तुम्हारी उंगली सुकुमार
अरी भोली मानिनि इस रात
अनामन्त्रित -
अर्पण कर देह,
अपूर्ण होंगी कामनाएँ
हे!
सुन्दरी उर्वशी!
हे!
चंचला उर्वशी!!
-
चाँदनी की शीतल छाया में भी
अभी तक नहीं निखर आयीं,
लम्बी प्रतीक्षा के बाद
तुम्हारी अनुपस्थिति में -
चाँद के यश गान में भी,
खोया खोया सा लगता है।
न जाने पीड़ितों के लिए -
तुम कैसी हो उर्वशी?
हे!
चंचला उर्वशी!!
-
न जाने वहाँ कोई,
तुम्हारे लिए -
कीमती चीज है,
न तो दिल के किवाड़ों को,
खोलने वाली चाबियाँ, यद्यपि
तुम्हारे लिए -
कुछ विश्वास की बातें,
अवश्य हैं।
-
न समझो यहाँ काँटों की रेखाएँ हैं,
तुम -
आँखें खोल भी तो सकती हो,
हे!
सुन्दरी उर्वशी!
कितनी आस्थाएँ थीं?
जिन्दगी जीने के लिए।
-
दिन रात कवि की कल्पना,
कुछ भाव ऐसे पा सकेगा,
है देश प्राणों से बड़ा,
यह विश्व को बतला सकेगा।
(असम के जाने माने लेखक, कवि
टीकाराम उपाध्याय
'निर्भीक'
नेपाली व हिन्दी और
असमिया के भी जानकार हैं। नेपाली व हिन्दी में उनकी कई
कृतियाँ और अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें
साहित्य अकादेमी का अनुवाद पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है।
वर्षों से अध्यापन का अनुभव)
-
एहसास हो तो
पंकज शर्मा
जिन्दा
हूं तो जीने का एहसास तो हो,
मुझमें बी कोई एक बात खास तो हो।
इन्सान हूं तो इन्सानियत ही फर्ज हो
मेरा,
ऐसा ही कोई जज्बा मेरे पास तो हो।
मरने को तो मर जाएंगे सभी,
जीते जी जीवन में पर उल्लास तो हो।
'सच'
जिन्दगी का सच में हो जाएगा हासिल,
सच्ची को पाने की सच्ची प्यास तो हो।
हारी ही बाजी भी जीत सकते हो मगर,
मन में दृढ़ जीतने की आस तो हो।
भूख से तड़पते होंगे कैसे खाली पेट,
जान जाओगे जरा निरा उपवास तो हो।
वास बने सुवास हर दिल चाहे लेकिन,
स्नेह, समर्पण, विश्वास की सुवास तो
हो।
एक और अनेक
पंकज शर्मा
स्मृतियों
के पन्ने पलटकर
किताब की तरह
अपने जीवन के
बिल्कुल
पहले पृष्ठ पर से
फिर से शुरू करना
और देखना
चलचित्र की भांति
अपना बचपन और
अपनी जवानी और
कभी कभी बुढ़ापा
भी
साक्षात और जीवन्त
सचमुच, मानो या न
मानो
पर अगर समझो तो
महसूस करो जो मेरी
तरह
अपने बच्चों
में...
एक समय में एक साथ
कई जीवन जिए
हैं
मैंने
अपना बुढ़ापा,
बेटो का यौवन, और
उनके बच्चों का
बचपन।
गजल
किनारे
खड़े हो चमन जल रहा है
नाम मजहब के पर वतन जल
रहा है।
हिन्दू मुसलिम भाई भाई
हैं सब
दरिन्दों से आज सदन जल
रहा है।
नींद में हो कारवाँ
गुजरते गए
द्वेष में भारत का गुलशन
जल रहा है।
बताना होगा मासूमों का
जुर्म
कैसा है यह देश नर तन जल
रहा है।
न्याय धर्म मिट गया जगत
से
भारत का खिलता सुमन जल
रहा है।
-
विभूतिनारायण लिंह 'विमल',
खगड़िया, बिहार
खुशियों की
खरीद-फरोख्त का शहर
प्रद्युम्न श्रेष्ठ
पाखंडी जीवन के क्षण
पल पल बीतते जा रहे हैं
बोन्साई बन चुके हमारे
सपने
न तो ठहाका मारकर हंस सके
हैं
न तो जी भरकर रो सके हैं।
यहां प्लास्टिक के फूलों
की तरह
सुगंधरहित, सोन्दर्यविहीन
जिन्दा लोग
अपनापन, प्रेम और मिट्टी
की गंध से कटे
मरुभूमि के कैक्टसों की
तरह शुष्क, काँटोंभरे
मेरे इस राज्य में जिन्दा
रहने की मजबूरियां
ठंड से ठिठुरते, गर्मी से
झुलसते क्षण
न तो पनप सके हैं न खिल
सके हैं
कंक्रीट के जंगल में
पडोसी होने के बावजूद
अपरिचित लोगों के बीच
खुशी भी यहां खरीदनी पडती
है
शहर में जिन्दा लोग
मृगतृष्णा से सताए लोग।
(नेपाली से अनुवाद -
सुवास दीपक)
आरोप पत्र
डा. जीवन नाम्दुंग
जिन्दगी के बहाने
मेरे विरुद्ध वक्त ने आरोप पत्र दायर
किया है
वक्त के कभी भी समाप्त न होने वाले
महासागर से
एक अंजलि जिन्दगी हथेली में लिए
जिन्दगी की एक घूंट प्यास
मिटाने की कोशिश में
सदियां बीत गईं
खुद की खुद से तलाश में
एक कभी भी समाप्त न होने वाले सफर की
तरह
कहीं किन्हीं पगडंडियों और मोडों पर
जिन्दगी से मुलाकात न होने का जख्म
दुखता है
जिन्दगी बारहसिंगे के सींगों से
उलझ बैठी है
जिसके इंतजार में बेदर्द शिकारी खडे
हैं
बहुत दिनों से भूखे, हिंसक और आक्रामक
शिकारी कुत्तों में
तब्दील हो चुका वक्त
मेरा पीछा करता रहता है
और मेरे हाथ में आरोप पत्र थमा देता
है।
(अनुवाद - सुवास दीपक)
संपादक - चयन
मेरी कविता
नीरज इंदुवती कुंदेर
मेरी कविता शून्य है
अर्थहीन है
क्योंकि नहीं है उसमें
धरातल के मीठे परिदृश्य
मेरी कविता दिखाती है
यथार्थ का अस्तित्व
सच का खारा पानी
जिसे कोई नहीं चाहता है पीना
फिर भी मैं लिखता हूं
क्योंकि मैं भूखा हूं
इसलिए मैं
बेस्वाद-सी कविता को ही
चखता रहता हूं
मैं परोस नहीं सकता
पाठकों के सामने
नंगापन, झूठा परिदृश्य
यही कारण है कि
मैं,
परोसता हूं उनको भी
बेस्वाद - सी अपनी कविता...
(समकालीन भारतीय साहित्य,
मार्च - अप्रैल 2009 से साभार)
यह तुम्हारा
गांव है
रामगोपाल शर्मा
'दिनेश'
आओ तनिक
बैठो यहां
बंदूक रख दो
यह तुम्हारा गांव है!
सांझ कब की हो चुकी
गाएं घरों में बंध गईं
कर चुके ब्यालू
अलावों पर
ठहाके, गप्प
बातें खेत की।
भून दी हैं बालियां
आओ पी लें
यह चिलम
जो प्यार की।
दूर है थाना यहां से
और दिल्ली
वह बहुत दूर है।
पूछते हैं हम न तुमसे
प्रश्न कोई
और इस बंदूक से भी।
जानते हैं
सिर्फ इतना
यह तुम्हारा गांव है।
खांसते से सामने जो
झुर्रियों पर
लिख चुके हैं
इन अलावों के धुएं से।
उम्र की सारी कहानी
उस कहानी पर
बटोही!
खून का धब्बा न डालो।
नाम, इमली, यह -
जटाओं से झुका बरगद
तुम्हारे साथ होना चाहका है
रात में छट
और दिन में
यह तुम्हारी छांव है।
आओ तनिक
बैठो यहां
बंदूक रख दो
यह तुम्हारा गांव है।
सुख के पहाड़
विजय विजन
बहुत से खे सुख
अपनी इसी पृथ्वी पर।
लगभग आशातीत।
हमने बांटने शुरू किये
कहते हैं सदी के शुरू में
बांटने से बढ़ने थे वे।
धीरे - धीरे ऐसा होना
मुश्किल हो गया
सुख अपने लिए बांट लिए जाने
से
दूसरों के लिए बचे
आस्वासन भर।
कई वर्षों तक सीधे - सादे
लोग
आंखों की शर्म से
उन्हीं पर करते रहे यकीन।
अपने लिए समेटे गये
धूर्तों के सुख
माटी के पहाड़ों की तरह
ऊंचे हुए और फिर धीरे - धीरे
दूषित पर्यावरण से
इधर-उधर गये
वख्त के तेज चक्रवातों
में।
उड़ते हुए किसी ने नहीं देखे
धूर्तों के सुख के पहाड़,
पर आज भी शायद इसीलिए
कुछ सीधे - सादे लोग
सुखी रहते हैं
सिर्फ दूसरों के सुख में।
एक प्रेम कविता
भविलाल लामिछाने
तुम -
एक कविता की किताब
उसमें से सबसे मीठी पंक्ति
की
उस पंक्ति का सबसे प्यारा
शब्द
शब्दों में सजा एक-एक अक्षर
एक एक प्रवाह
अमंत से
अनंत तक।
मंद मुस्कान की स्मित-रेखा
जिसे छू नहीं सकते
नीले आकाश में अठखेलियां
करती बिजली
छूना चाहें तो हाथ कांपते
जिंदगी एक भूकंप के रोमांस
में डूबती है।
तैर रहा हा सूरज सदियों से
कोई किनारा नहीं
कोई ठौर नहीं
नहीं, नहीं
जो तुम समझ रही हो
वह
वह नहीं
कुछ भी नहीं।
सावधान!
वह छूले की चीज नहीं
देखने की भी नहीं,
अनुभव करना होगा
भोगना होगा
भोगना होगा उसमें -
तभी उभरेंगी गुलाबी लकीरें
आंखों में।
क्यों यह शाम सजकर, पोतकर
लालिमा चेहरे पर
सदा अंधेरे का इंतजार
करती है?
श्माल घूंघट में छिपा
कौन है वह?
क्यों आजतक कोई भेद न
सका यह रहस्य?
यह शाश्वत है, सत्य है -
जितनी तुम
तुम्हारा स्पर्श
कभी न छूने पर भी
सदा स्पर्शित है।
मन के आकाश में इच्छाओं के
घोड़े
छोड़ता कौन है?
तुम्हीं तो नहीं?
-
तुम्हारे नाम अब क्या कविता
लिखूं:
जितनी बार लिखा
वही नाम
वही अक्षर
वही शब्द
वही पंक्ति, वही कविता
वही किताब।
तुम -
एक कविता की किताब
उसमें से सबसे मीठी पंक्ति
उस पंक्ति का सबसे मीठा शब्द
शब्दों में सजे अक्षर
सुबह की किरण सा स्निग्ध
पवित्र,
ऊंगलियों से छूना चाहता हूं
संकोच को खोना चाहता हूं।
कमल के चूमकर सूरज की किरणें
अपने से शरमा रही हैं।
तुम्हारी आंखों से ही होकर
जिंदगी की घड़ियां जा रही हैं।
(नेपाली से अनुवाद - खड़कराज
गिरी)
सीढ़ियों पर
बिर्ख खडका डुवर्सेली
धूप सरक रही है
सीढ़ियों पर
नीचे की ओर
सरक रहा है वह भी
विश्व बैंक के बोझ तले
जिस तरह सरकता है देश
दबे दबे
चुपके से।
क्या वजह है
सीढ़ियां चढ़ने वाले
आज नहीं हैं
लोगों में अब
धर्म-कर्म नहीं रहा।
विश्वास सरकता जा रहा था
उसका।
खाली बाटी है
मुर्दे से पड़े हैं चीथड़े
घंटियां नहीं बज रही हैं
बार बार सदा की तरह
पुजारी की तरह ही
क्या आस लगाए बैठा है।
सुबह बहुत हड़बड़ी हुई
पहुंचने की
कहीं कोई छूट न जाए।
उसे क्या पता
कल शहर में कत्ल हुआ
मौसम का बदला-सा भाव है
और आज तनाव है।
धूप सरक रही है
सरक रहा है वह भी
सीढ़ियों पर।
अपना घर
नंदिनी मेहता
हमने घर बनाया
है
इसलिए नहीं कि
दीवारों में बंद हो जायें
बल्कि इसलिए
कि द्वार खोल पायें -
हमने घर की छत बनायी है
इसलिए नहीं कि
आकाश पर विस्वास नहीं
बल्कि इसलिए कि
आकाश को भीतर भर पायें -
हमने घर की खिड़कियां बनायीं हैं
इसलिए नहीं कि
चांद-सितारों से विमुख हो जायें
बल्कि इसलिए कि
चाद-सितारों को आंखों में बसाये -
हमने घर की चौखट बनायी है
इसलिए नहीं कि
सूरज से इंतजार करवायें
बल्कि इसलिए कि
सूरज के स्वागत में पलक पांवरी बिछायें -
दोस्तो,
घर हमने बनाया इसलिए हमारा नहीं
न सिर्फ अपनों का, न सपनों का
बल्कि उन सबका,
जो -
इस घर के आंगन में आंसू सींचकर
मुस्कराने की चाह लेकर
अपने घर के अंदर चले जायें -
('मेरी कुछ
कविताएं' से साभार)
शंकर लामिछाने की हिंदी कविता
तुम कौन हो?
तुम कौन हो
चंद्रमा की विमल स्वर्णिम रश्मि सी तुम
कौन हो
तुम कौन हो
कमल की नव पल्लवी सी कोमला तुम
कौन हो
तुम कौन हो
मधुर वीणा के स्वरों सी चंचला तुम
कौन हो
तुम कौन हो
आग की उठती लठा सी सुंदरी तुम
कौन हो
तुम कौन हो
कौन जीवन के अंधेरे में उजाले की किरण सी तुम
कौन हो
तुम कौन हो
स्वर्ग का वरदान हो तुम
या कि माया मूर्ति कोई
अप्सरा या मायावी हो
सत्य हो या स्वप्न कोई
मुस्कराहट में नयन की
बात मन की
मत छिपाओ
यह बताओ
कौन हो
तुम कौन हो
भारतीय नेपाली साहित्य (अनूदित)
(अनुवादः सुवास दीपक)
दीवार
वीणाश्री खरेल
खुशियाँ उधार लिया मन
सपनों को बंधक रखी ये रातें
हमेशा उधार लिए जाने वाली खुशियाँ
उधार लिए सपनों को
उऋण करने के लिए छटपटाता यह मन
समझौते की सुई से बहुत बार
सिला हुआ यह जीवन
पता नहीं चलता कब उधड जाता है -
नदी के तट पर थक जाने पर
प्यासा होता है मन
तृष्णा मिटाने नदी को छूते
अनायास मरुस्थल बन जाता है पानी
आजकल तो
आलिंगनों की उष्णता में भी
ठंडेपन की बाड लगी है जैसे
हम नजदीक हैं, पास हैं
तथापि
हमारे बीच अदृष्य
कोई उपस्थित है शायद।
पेंटोमिम का बूढ़ा शहर: एक आर्टिस्ट का कमरा
किशोर छेत्री
मैं अभी अभी
उग्र दर्शकों की भीड़ से
बचते बचते, भागते और छुपते-छुपाते
कुछ क्षुब्ध, कुछ विक्षिप्त
अपने कपरे में आ पहुंचा हूं।
मेरे साथ मेरा पीछा करते
शहर के दो-चार आवारा कुत्ते, दरवाजे तक आ कर चले गए हैं
कमरे में मेरा एक कुत्ता है
वह मेरे अंदर आते ही पूंछ हिलाता है
मेरे चेहरे को चाट कर मेरा स्वागत करता है
इसीलिए उसके प्यार को थामने के लिए मैं
अभी-अभी कमरे में वापस आ पहुंचा हूं
संतोष का सांस लेकर
उसे सहला रहा हूं।
यह मेरा अपना कमरा है
यहां मेरा मेटामार्फिसस नहीं होता
मेरा स्व यहां रहता है, वह कभी बाहर नहीं जाता
परी कथा के राक्षस के प्राणों वाले तोते की तरह
इसीलिए मैं अभी-अभी अपने प्राणों से मिलने
सभी मेकअप उतारकर कमरे में वापस आ पहुंचा हूं
यहां पुस्तकें ही पुस्तकें है
कविता, कहानी और नाटक
हरेक पुस्तक के
शांत कलेवर को देखकर मैं सोचता हूं
द्वंद्व कितने बंद हैं
वाद-विवाद और छटपटाहटें
इन किताबों की जिल्दों में
हरि और लुरे का द्वंद्व
अमृता के घर का पता मिटने का दु:ख
और गोदो के लिए अशेष प्रतीक्षाएं
इसीलिए अभी-अभी
अपना कलेवर उतारकर
इन किताबों की जिल्दों के अंदर घुस गया हूं
कुछ भ्रमित, कुछ आतंकित
मैं अभी - अभी अपने कमरे में वापस पहुंचा हूं।
दीवाल की घड़ी की ओर देखकर
समय के साथ कैलेंडर की
कड़ी मिला रहा हूं
टुकड़ा समय और लंबी रातों और दिनों को
रौं चीर कर देखने के लिए मैं अभी-अभी
स्वयं अपने अंदर घुसा हूं
मैं एक लंबी सड़क चल कर शहर के गली-कूचों से होते हुए
आक्रामक आंखो से भागते हुए
शराब की दुकान में दो- चार घूट गटकते हुए
समय देकर भी मिलने न आने वाली
युवती को मन ही मन में कोसते हुए
वर्तमान अर्थनाति के आयतन को नापते हुए
आंदोलित, अवहेलित और विस्थापित
अभी-अभी अपने कमरे में वापस आ पहुंचा हूं।
मैं अपने कमरे में अभी-अभी लौट कर आया हूं
मैं अपने कमरे के रिक्त पेंटोमिम में
फकत एक निष्क्रिय, नीरस जोकर बन कर आया हूं।
यहां मुझे दो-चार सिगरेट फूंकने
शराब के कुछ अतिरिक्त घूंट गटकने
और पागलों की तरह बड़बड़ाने की स्वतंत्रता है
यहां बैठकर मैं
शहर और देश के भाई-बापों के विरुद्ध असंख्य पोस्टर लिख सकता हूं
नेताओं के कार्टून बना कर
फर्श पर बिखेर सकता हूं
मैं थिएटर के निर्देशक को निर्देश दे सकता हूं
खाली दिमाग दर्शकों को गालियां दे सकता हूं
मैं यहां बैठे बैठे अपनी स्थिति में
लंबी कविता लिखकर
चिल्ला चिल्ला कर पढ़ सकता हूं
अपनी गर्दिशों के लिए
कला के बहाने रो सकता हूं
मैं इस कमरे में अपनी इच्छा के अनुसार
आत्महत्या कर मर भी सकता हूं।
इसीलिए हर रात की तरह आज भी
मैं अभी-अभी अपने कमरे में वापस आ पहुंचा हूं।।
निर्विकार चैतन्य
विजय बान्तवा
शून्य में भी शक्ति है, चैतन्य है
चुपचाप, मौनता की बडी आवाज है
भयंकर हो-हल्ला और कोलाहल है।
कोई चुपचाप ही बहुत चिल्लाता है
मौनता को चीर कर कोई चुपचाप ही युद्ध करता है।
लेकिन शान्त मौनता किसी का कोई झमेला नहीं है,
चिन्ता नहीं है, फिक्र नहीं है,
केवल सच्चिदानन्द स्वरूप कलकल बह रहा है
अनन्त की ओर।
कोई विचार ही नदीं है
इसीलिए किसी के विरुद्ध कोई दुर्भावना भी नहीं है
किसी पर असत भी नहीं है, भोग लालसा भी नहीं है
समाधिस्थ है मन, अचल है मन
सभी बातें स्थगित हैं
फिर भी संचालित चेतना समाहित है
कोई दुख नहीं है, पीडा नहीं है।
विचार सीमा तक पहुँच चुके हैं
अन्तिम निष्कर्ष तक पहुँच चुके हैं
और हर क्षण एकाकार हो गए हैं।
फिर भी गतिशील हैं मौनता के भीतर,
शून्यता के भीतर,
सभी इन्द्रियाँ गुणातीत स्विच आफ
हो चुकी हैं यहाँ
एक ही सुपर इन्द्रिय में परिणत
अनन्त का अमृत पी कर
आनन्दित है मन की परिधि में।
समय बहती नदी
प्रद्युम्न श्रेष्ट
समय बह रहा है
बह रही है नदी निरन्तर
मै बहता हूँ नदी के संग
बहते हैं हम सभी नदी की तरह
इसी तरह फिसल रहा है समय
इसी तरह बह रहा है समय
बहना नियति है नदी की
देख रहा हूँ बहती नदी को
बेशुमार पानी बह रहा है
पत्थर, रेत, और पेड-पौधे....
मुट्ठी में नहीं ये नदी और समय
किनारों को छूती बह रही है नदी
कहीं टुकडों में बह रही है नदी
कहीं चट्टानों पर जमी काई पर बह रही है नदी
कहीं मीठी आवाज में
तो कहीं परछाईयों में बह रही है नदी।
नदी में सुमदुर गीतों और मनमोहक रंगों में
बहती नदी को देखता हूँ
लगता है जैसे जिन्दगी बह रही है
संवेदनाओं की धारा बह रही है
प्रेम और इच्छाएँ बह रही हैं...
लेकिन मैं जो हूँ
कि बहती नदी न बन सका
समय नहीं बन सका
मैं जीवन बन बह नदीं सका
मैं खुद इक नही में रूपान्तरण नहीं हो सका।
संदिग्ध परिवेश
केदार गुरुंग
हमेशा की तरह
खिडकी से दिखने वाले
भकेम्लो के पेड से
एक झुण्ड कौवे
कोई नयी नितांत वश्यक
सूचना देने की तरह
अपने अपने नाम पुकार रहे हैं
पर क्यों होगी किसी को इन बातों में दिल्चस्पी।
ये कौवे
आंगन में दाना चुग रहे चूजों को
दबोचने की ताक में हैं क्या.
नहीं तो भकेम्लो के पके खट्टे
दानों को ठूंग कर
अपने नामों का और अभिनय का
प्रदर्शन करके
वहां से उड कर चले जाएँगे क्या।
बडे संकोच में डुबा कर
ये कौवे गुरूरू उडते हुए
फिर किसी अनिश्चित दिशा की ओर
अदृश्य हो जाते हैं।
ऐसी संदिग्धता किसलिए।
मुझे तो कुछ मालूम नहीं
लेकिन हमेशा ऐसा ही
परिवेश व्याप्त रहता है यहाँ।
सुवास दीपक की हिन्दी कविताएं
एकता और सदभावना का नीर
सुवास दीपक
देश को एक अनिश्चित भविष्य की ओर
धकेलने का दुस्साहस करता
सदभावना की मजबूत डोरी से बंधे
हृदयों पर
आतंक और घृणा की कैंची चलाता
वह कौन है
आँखों के सामने होते हुए भी
पहचान में न आ सकने वाला
वह क्रूर हाथ किसका है -
जिसने मेरे पवित्र देश के शरीर पर
घृणा के खून के छींटे बिखेरे हैं।
आशा का एक दीपक जो
शताब्दियों से जलता आ रहा है
उसे बुझने मत दो घृणा की आँधी से
बचाओ उस नन्हे शिशु को
जिसकी नन्हीं पुतलियों में
प्रज्ज्वलित हो रही है आशा की यह रौशनी।
घृणा की आँधियों, वबंडरों और चक्रवातों से बचाओ
इस शस्य-श्यामला धरती पर फूटती कोंपलों को
अन्न की लहलहाती फसलों को
जो भरेंगी कोटि कोटि देशवासियों के
पीठ से चिपके भूखे पेटों को।
अंजलि भर पियें हम
एकता व सदभावना का
चिरकाल से बहता नीर
आलिंगनबद्ध हों हम एक दूसरे से
जिससे टूट जाएँ घृणा की ये दीवारें
जो खडी कर दी हैं उन अदृश्य ताकतों ने
जो कर देती हैं कुंठित मानवीय संवेदनाओं को
और जो देशवासियों की छाती पर
सत्ता के अलाव जला कर
निजी स्वार्थ की रोटियाँ सेंकती हैं।
चलो
चलो हम निकल चलें
इस घुटते वातावरण से
कहीं दूर चले जाएं
जहाँ साँस लेने के लिए
खुली और स्वच्छ हवा हो
और खुल कर हँसने के लिए
तुम्हारी बातें सुनने के लिए
और अपनी बातें सुनाने के लिए
दूर दूर तक जैसे सारी आवाजें गूंगी हो गई हों
तुम्हें अपनी बाहों में भरने के लिए
तुम्हारा आत्मीयता से भरा आलिंगन हो।
पहचान
न कोई छाया थी
न की सहारा तब था
न अब है
प्रकाश-स्तंभ न कोई था
जो मुझे दिशा-ज्ञान देता
न अब कोई मंजिल है न ठिकाना
दिशाहीन
युगों की थपेडों को सहता
अपनी पहचान खो चुका.....
मेरे पास आओ
मेरे पास आओ
मैंने मिन्नत की अपनी कविता से
एक भरपूर आलिंगन में
बंध जाने की गुजारिश की
मुकम्मल प्यार करने की छटपटाहट लिए
उसकी ओर देखता रहा टकटकी लगाए
पर उसने मुझसे आँखें तक नहीं मिलाईं।
मैं उसमें हूँ
पर वह मुझमें होकर भी मुझमें नहीं है
बेलौस ठंडपन व्याप्त है
उसके समूचे जिस्म में
उसकी आँखें न जाने
किस गहरी नींद में डूबी हैं
झझकोरने पर भी टस से मस नहीं होती।
मैं उससे प्यार करना चाहता हूँ
उसे भरपूर भोगना चाहता हूँ
पर वह मेरी गिरफ्त में होने पर भी
अपनी अनुपस्थिति का अहसास करा रही है
एक मरीचिका में तब्दील हो चुकी है मेरी कविता
खुली आँखों से
मेरी नींद सदियों से न जाने कहाँ गायब हो ग्ई है।
मैं बार-बार उसे खींच कर
बलपूर्वक अपने आगोश में लेकर
उसके जिस्म को परत-दर-परत उघाड कर
अपनी वासनाओं को
झंकृत कर देने वाले
एक मुकम्मल समर्पण की अपेक्षा कर रहा हूँ।
पर वह मुट्ठी में पारे की तरह
फिसलती ही जाती है हर बार.....
क्यों
ठहर गया है जैसे वक्त
प्रकृति के समस्त नियमों के विरुद्ध!
क्यों आगे नहीं बढ़ रहे कदम
चिपक क्यों गए हैं किसी अदृश्य चुंबक से
आती क्यों नहीं है कोई
जिस्म के तंतुओं को छू देने वाली आवाज
फासिल बन चुकी नियति के वजूद को
कोई पुरातत्ववेत्ता
क्यों नहीं ढूंढ पा रहा
खरोंच-खरोंच कर परत-दर-परत
क्यों नहीं कोई
इसके वजूद को पहचान पा रहा।
तोड़ता क्यों नही शून्य की दीवारों को
कोई विस्फोट
मूर्छित पड़े लक्ष्मण को जगाने
क्यों नही कोई पवनसुत संजीवनी ढूंढ पा रहा।
संवाद के सारे पुल क्यों टूट गए हैं
सारंगी के तार क्यों बेसुरे हो गए हैं
सांस क्यों अटक गई है गले में ही
क्यों नहीं कोई छू कर जगाता
चेतना के सुप्त तंतुओं को।
सरसराती वर्फीली हवाएं
क्यों नहीं सुन्न कर पाती हैं
जिस्म के लहू को।
क्यों बदलती जा रही हैं हमारे ख्वाबों की तासीरें
किसके इंतजार में खड़े हैं ये पर्वत।
कौन है जो खुली आंखों से भी
दृष्टिगोचर नहीं होता
क्यों नहीं चुंधियाती आंखें
तेज रोशनी में भी।
क्यों उठ कर चले गए हैं
बहस-मुबाहिसों में शामिल लोग।
कौन बरगला रहा है
दानिशमंद चुप क्यों हैं।
(18.08.1995)
बूढ़ा और मैं
पीस रहा है बिहारी बुड्ढा
अपनी बेटियों के हाथ पीले करने
अपनी हड्डियों को
तीसरे तल्ले पर
सुबह चार बजे
या रात के बारह बजे तक
इस कंक्रीट बिल्डिंग पर
जब सिरौट पर रगड़ता है सिलबट्टा
उसकी टांगों की तरह
थरथराहट करती हैं इमारत की दीवारें
इक कंपन से
थरथरा जाती है
टेबल पर रखी मेरी मरहूम पत्नी की तसवीर भी।
मेरी नींद उचाट हो जाती है
मैं करवटें बदलते
सोने की कोशिश करता हूं
पर नींद मेरे करीब आने से डरती है।
पेट में गड़बड़ है
दरवाजा खोलता हूं
गली की बिल्ली
सुबह चार बजे ही दरवाजे पर
म्याऊं करके मेरे पैरों से लिपट जाती है
मैं उसे एक कटोरी दूध देता हूं।
यह क्रम रोजाना दुहराया जाता है।
बाहर उजाला धीरे-धीरे पसर रहा है
मैं सीढ़ियां चढ़ कर मूल सड़क पर आता हूं
हमारे हाल ही में मरे कुत्ते का दोस्त
बड़े कद का देसी नस्ल का कुत्ता
बीच सड़क पर बैठा होता है
और पूंछ हिला कर मेरा स्वागत करता है।
सुबह की ताजी हवा
अपने फेफड़ों में भरपूर खींच कर
दस-बीस कदम दोनों दिशों में चलता हूं
लोग-बाग उठ लहे हैं
बच्चे स्कूली दौड़ में भाग लेने के लिए
अपने सहपाठियों को अभ्यास के लिए
चलने को ऊंची-ऊंची आवाजों में बुला रहे होते हैं
कहीं पास से रिकार्ड पर
ओम जय जगदीश हरे आरती बज रही है
सामने कंचनजंघा पर एक सफेद बादल
जैसे टंग-सा गया है।
सब कुछ यथावत् है
सिर्फ मैं अकेला हूं।
बीच रास्ते से ही लौट रहा हूं
जवान बेटियों के बोझ से पिसता
बिहारी बुड्ढा लाठी टेकता
सीढ़ियां चढ़ रहा होता है
मुझे देख कर राम राम कहता है
मैं भी उसे राम राम कहता हूं।
बुड्ढे को जल्दी है
बेटियों के हाथ पीले जो करने हैं।
मुझे कहीं जाना है
पर दिशाएं भूल चुका हूं।
(19.10.1995)
धरोहर
एक काया नश्वर
सांसों का आरोह-अवरोह
खंडित व्यक्तित्व
जर्जर रोगग्रस्त शरीर
दुविधाग्रस्त मन-मस्तिष्क
न बूत न भविषिय
वर्तमान अनुपस्थित
कौन करेगा निशानदेही?
(25.06.1996)
स्मृति के पंछी
स्मृति के पंछी चक्कर काट रहे हैं
स्वप्न और दिवास्वप्न एकाकार हो गए हैं
स्मृति के पंछी मंडराते रहते हैं
चक्कर काटते रहते हैं
न इन्हें भूख है, न प्यास
न नीद, न थकान
ये तो सिर्फ निकल चुके हैं एक अनंत यात्रा पर
शताब्दियों से खड़ा
एक वट-वृक्ष है
एक चबूतरा है
उस चबूतरे पर एक बच्चा
खड़िया से एक इतिहास लिख रहा है
वर्णमाला में
पंछी चक्कर काट रहे हैं
वह बच्चा अनुपस्थित है आज
आसपास लोग भी नहीं हैं
सिर्फ गली-कूचों, खेत-खलिहानों
और बूढ़े दरख्तों के अलावा
पंछी चक्कर काट रहे हैं
कट चुके बुजुर्ग दरख्तों के कभी होने के
एहसास को अपनी आंखों में संजोए
उनके ऊपर-ऊपर चक्कर काट रहे हैं
दरख्त नहीं हैं
पंछी फिर भी चक्कर काट रहे हैं
दरख्तों की आदिम मीठी गंध से खिंचे
उनकी बूढ़ी कांपती टांगों बनाम टहनियों से
लटक कर
शरारतें करते हैं
और एक मीठी-सी झिड़की और ढेर-सा दुलार
पाते हैं
पंछी चक्कर काट रहे हैं
चबूतरे पर बूढ़ा पंडित
महाभारत की कथा बांच रहा है
लालटेन की कंपकंपाती लौ में
ग्रामवासी कंबलों में लिपटे
बड़ी एकाग्रता से कथा सुन रहे हैं
दूर नीचे पौष की चांदनी से नहाई
नदी की धीमी पर लगातार आवाज सुनाई दे रही है
चबूतरे के एक कोने में
सदियों के इतिहास के गवाह ठाकुर
चुपचाप महाभारत का समूचा युद्ध-वर्णन
अपने में समेटे निस्पंद पड़े हैं
ग्रामवासियों की आत्मा के प्रतीक कुलदेवता
ग्रामवासियों की जमात में शामिल हो
मौन आशीर्वाद दे रहे हैं
पंछी चक्कर काट रहे है
(23.08.1995)
रोशनी
खामोश अंधेरी रात है
बिजली गुल है
रात का तीसरा पहर गुजर चुका
एक अकेले मुर्गे ने बांग सुनाई दी है
आंखों में नीद नहीं
मन स्थितप्रज्ञ।
खामोश अंधेरी रात है
बिजली गुल है
रात का चौथा पहर गुजर चुका
मुर्गे की बांग सुनाई नहीं दे रही
आंखों में नींद नहीं
मन स्थितप्रज्ञ।
मेरी उपस्थिति को नकारता
उदंड एक छुछुंदर
मेरी कविताओं की पांडुलिपि कुतर रहा है
टिमटिमाती मोमबत्ती मेरी उंगली पकड़
मुझे
रास्ता दिखाने की जद्दोजहद में
जल कर समाप्त हो चुकी है।
खामोश अंधेरी रात है।
(25.05.1996 - रात 3.30 बजे)
बच्चे और बच्चे
खाने की मेज पर जब मैं बैठता हूं। नन्ही डाली ठीक मेरी बगल में बैठ जाती है। जब मैं मुंह में कौर डालता हूं तो वह अपने पंजों से मुझे खरोंचने लगती है। जोर से भौंकती है। मैं कभी-कभार रोटी का एक टुकड़ा उसे दे देता हूं। वह फिर आकर वही कृत्य दुहुराती है। अपने बर्तन का खाना छोड़ कर वह मेरे हाथों का दिया खाना खाना चाहती है। कभी-कभार मैं उसकी ओर ध्यान नहीं देता। वह भौंक कर पंजों से खरोंच कर बड़ी मासूमियत से मेरी ओर देख रही होती है। उसकी यह अदा मुझे इतनी प्यारी लगती है कि मैं उसे उठा लेता हूं एक बच्चे की तरह। एक आदमी और एक जानवर के बीच की भिन्नता खत्म हो जाती है। वह मुझे अपनी ही प्यारी बिटिया लगती है। मैं उसे सीने से लगा लेता हूं। बच्चे, सिर्फ बच्चे ही बाकी रह चुके हैं। चाहे वे आदमी के हों या जानवरों के। जो प्यार देते हैं और प्यार पाते हैं।
(22.06.19996)
(भारतीय नेपाली कविता)
दो कविताएं
कवि का मन
अमर बानियां लोहोरो
अटल होता है
चंचल होता है
कवि मन
लेकिन निश्कपट होता है
और निबिड होता है
कवि मन।
विशाल होका है
सुंदर होता है
कवि मन
और कोमल होता है
तथा निर्मल होता है
कवि मन।
वह बंदना नहीं चाहता
किसी विज्ञापन में
पर पीडा पर
वह रोता है
और जगत की रमणीयता में
वह शून्य में अथाह रम्य
एकांत में भी मुस्कराता है
कहें पागल की तरह होता है
कवि के भीतर का मन
यकीनन असादारण होता है
किसी मन के भीतर का मन।
अपने प्राणों की तरह समझता है
सभी प्राणियों को
स्वजन समझता है मानवता को
सांझा घर समझता है विश्व को
ऐसा ही होता है कवि का मन।
अभिलाषा जिसकी
सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्
मूल मन्त्र उसका वसुधैव कुटुम्कम्
ठीक ऐसा ही होता है
नितांत कवि का मन
नितांत कवि का मन।।
सडक के शब्द
लाचार हैं
तभी तो लंपसार
कहां है उठ खडे होने का सार
और आसमान छू सकने का आधार।
दौड रही हैं गाडियाँ हमारे सीनों पर
क्या रात क्या दिन
रौंदते चलते हैं राहगीर
हमारी छातियों को
तत्पर रहते हैं हमारे
सिरों पर चढने के लिए।
क्या राजा क्या रंक
कभी कैमवस के जूते पहन कर
कभी नाल जूतों में
चल पडे हैं बेधडक रौंदने के लिए।
गाडियां अजीब होती हैं
हमारे दिलों और सिरों पर चढ कर चलती हैं
फिर हमारी निंदा करती हैं
निश्चय ही अभिशाप मानती हैं।
कहते हैं कि बेशरम हैं
बरसात जितना भी धोए
जैसी भी कार्पेटिंग हो
सडकें दुर्गंधपूर्ण होती हैं।
कब देखेंगे कृतघ्न लोग
हमारी विवशतों को
हमारे संतापों को
कब होगा उन्हें महसूस
बेरहम दिल
हमारे समर्पणों को कब समझेंगे
हमारी मित्रता और हमारे निशब्दों को
हर मन और मानव मस्तिष्क को।।
जिन्दगी की सोच
अमर बानियाँ लोहोरो
मत समझो
सिर्फ आँसुओं में बह जाती है
जिन्दगी की पीडा...
बहते रहते हैं
दृश्यविहीन बन कर भी
जीवन और आँसू
जीवन ही तो है
दुखता ही रहता है
चाहे आँसू बहें
आखिर जीवन ही तो सजीव है।
दुखते नहीं हैं क्या
उनकी प्रजातियाँ और घडियाल
यावत जिन्दगियाँ
दिलों के मिलने पर
मनों के न जानने पर।
समय
विन्द्या सुब्बा
तुम उदास रहते थे
मैं रेत का घर बनाती थी
मन के फूलों से फूलबाडी सजाती थी
जीवन का हाथ पकड कर
जैसे भी हो कष्ट उठाती थी।
आजकल तुम बहुत सुखी हो
अति व्यस्त रहते हो
ईंट और सीमेंट से बने हमारे इस घर में
छोटी फुलबाडी के पास के रास्ते आंगन में
कमरे में बरसों से किसी के तजार में उदास हूँ मैं।
एक कविता की प्रतीती
केदार गुरुंग
आज भी मैं
एक धार्नी (तीन सेर का ढक) जाडा पका कर
शरीर को ठींस ठूंस कर खिला रहा हूँ
यह मन ही है जो
तन से ज्यादा शिथिल होकर
कभी एक पाथी( आठ माना - दस मुरी) सेहत की सृजना नहीं कर सका।
सृजना तो इस वक्त
किसी गर्म रजाई या अग्निकुंड की प्रतीक्षा कर रही होगी
या किसी कोठे गोष्ठी की रमझम में डूबी होगी।
रुग्ण कवि की कविता की तरह भावना
और सूखे संपादकीय अक्षर
कितने जीर्ण-शीर्ण अवयव
सपने से ज्यादा अर्थहीन शब्द।।
सभी देवता मौन हैं
गिर्मी सेर्पा
महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ
कुरुक्षेत्र के मैदान में गिरी लाशें
दाह-संस्कार के लिए
किसी जगह पहुँचा देने के बाद
खून के धब्बों को
सत्य के हाथों से सहला कर
पोंछने लगा है इस दृश्यावली से
आश्वस्त यह कुरुक्षेत्र कह रहा है कि
अब देवता बोलेंगे
वह कह रहे हैं कि
अब दूसरे महाभारत की यहाँ
पुनरावृत्ति न हो
पर देवता अभी तक मौन हैं।
कुरुक्षेत्र का ताजा और कच्चा खून
बिना कारण पीने को वाध्य होने के बाद
प्रत्येक दिन, प्रत्येक रात
लासों के ढेरों को गिनने में
व्यस्त होना पडता है कुरुक्षेत्र को
सत्य के नाम पर युदध में विजयी पाण्डव
कुरुक्षेत्र के परिभ्रमण के लिए
अभी तक आए नहीं हैं
इसीलिए हो सकता है
देवता अभी तक मौन हैं।
मौन स्थितप्रज्ञ देवता
मूर्तियों के ढलने के बाद
विवश देवता
पुजारी की अनचाही वंदना
लोकाचार के बंदी
आह्वान में बंधे आने को वाद्य देवता
विवश-लाचार देवता।
मित्रता का दाह-संस्कार कर
आए मित्रों से मित्रता
जैसे रिस न पाने की तरह
प्रत्येक बोली और शब्दों का
गर्भपात हो,
उल्टा अर्थ देने लगते हैं
हृदय को नोंचते मित्रों की तरह
वंदना,
आह्वान नीलामी की बोलियाँ
पुजारी व्यापारी बन
जोवत्व का व्यापार कर रहा है
मित्र दुकान ओढ कर
मित्रता बिचा रहा है
देवता अभी तक मौन हैं।।
रूपांतरित वृक्ष
प्रवीण राई जुमेली
जो सत्य कभी कहे नहीं गए
लिखे नहीं गए
उन्हीं का प्रत्यक्षदर्शी स्वरूप वट वृक्ष
निर्वाण प्राप्ति के लिए तपस्यारत बुद्ध की तरह
वर्षों से खडा है वहाँ, समय में।
समय, जिसकी मुट्ठी में
मौनता के अनगिनत इतिहास
संगीतबद्ध हो चुके हैं
ऐसे गीत जो कभी गाए नहीं गए
गा कर किसी को सुने नहीं जो सके।
गाँव की युवती हाट बाजार से लौटते
उसके हृदय की गहराई में
भरी जवानी बलि चढी इच्छाओं, उमंगों और संतुष्टियों को
वट वृक्ष ने देखा है।
उसी रास्ते से ढोर चराने वाले बूढे की झुर्रियों को
उससे भी विशाल बने वटवृक्ष बने पेड ने देखा है।
कुछ ऊपर सडक पर नारे का समय कंधों पर उठाए
भूखे पेट चिल्लाते जिंदाबाद और मुर्दाबाद के
बहते बरसाती नाले
ये आवाजें भी सुनी हैं वटवृक्ष ने
बच्चियाँ - भविष्य का आह्लाद लिए
अपने दिलों में स्कूल आते-जाते
पोस्टर - विरोध और समर्पण के छंदों में चिपकी
गुहार कहते चिल्लाती असहाय आवाजें
सडकों पर तेज रफ्तार में दौडने वाली सुंदर गाडियों से
सोलोमान राजा की कथाएँ
देखी हैं और सुनी हैं सभी
जो वर्तमान से किसी अनाम और मौन इतिहास में
निद्रामग्न हो गय़ी थीं।
अपने समय की मौनता की मेडें
उन तारसप्तक उसाँसों के वटवृक्ष थीं
आज हाट बाजार से लौटी वह युवती
ढोर चराने वाला वह बूढा और हम सभी
उन पीपल के पेडों में अनुवाद होते जा रहे हैं।
इतिहास की दराज में बंद कर रख दिया
मौनता की तपस्या में पीपल के पेड
श्रापित दर्शक और श्रोता बने
क्रांति की स्फुट ध्वनियाँ विस्मृति के भू-स्खलन में दब गईं।
प्रत्येक गाँव और शहर हम
पीपल के पेड बन खडे होते गए
जो सत्य कभी कहे नहीं गए
लिखे नहीं गए कभी भी।
कमरे के अन्दर एक और कविता
भूपाल कौशिक
मैं एक कविता लिख रहा हूँ
कमरे के अंदर
कमरे के अंदर ही कविता होती है
जन्म लेती है
बढती फूलती है
मरती है
कमरे के अंगर ही कविता नहीं होती।
कमरे में सिकुडना
कमरे के अंदर सीमित होना
खींच कर परिधि कमरे की
ठुँस जाना
और लिख सकना कविता है।
बाहर नहीं है कविता
वह भोग है
भोगना है
भोग कर बाहर
अंदर जन्म लेने वाली कविता है।
भोग्य नहीं है कविता
भोगने के प्रति सहजानुभूति है
कविता सीमित है
कविता कपरे के अंदर है।।
चंचल मन झूम उठा
सुवास दीपक
चंचल मन झूम उठा
मदक पलकें उठीं जब
सिरहन दौड़ गई, कंपकपी छा गई
नाजुक लबों की पंखुड़ियां खुलीं जब।
सुदूर उपवन में कोयल बोलती
जल-भरे दिल में शक्कर-सी घोलती।
तेरे उत्ताल वक्षस्थल की धड़कन
टूटे सितार में रागिनी-सी भरती।
पवन रुक गया, चांद भी शरमा गया
केवट पतवार चलाना भूल गया
झनन-झनन-झनन घुंघरू बजे जब
रुक गईं चौकड़ियां हिरणों की
चंचल मन झूम उठा
नाजुक लबों की पंखुड़ियां खुलीं जब।
प्रिय नदी
प्रद्युम्न श्रेष्ठ
निरंतर बहते रहने वाली
वह एक नदी है
मेरी जीवन घड़ी बन कर
झझकोरती रहती है मुझे
जीवन की उस नदी में
सुख-दुख के पानी
वही हर्ष और विमर्श की
लहरें और ज्वारभाटाएं
वही आनंद और विस्मय के
किनारे
नदी जीवन बन बहती है -
नीरस और सूखे
किनारों को पास में रख कर
रेत के ढेरों को पास में
साक्षी रख कर
कठोर चट्टानों और पत्थरों
को
तट पर छोड़ कर
नदी बहती जाती है
बहती जाती है नदी
मानव के मन की नदी
मानव के हृदय की नदी -
कितनी रम्य होगी
जब मानव के विचार बनेंगे
नदी।
प्रेम बहाने वाली,
आत्मीयता में प्रफुल्लित
होने वाली
वह नदी कितनी सुंदर होगी
प्रिय नदी अति प्रिय होगी।
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