सन्
1816 में नेपाल सरकार और अंगरेजों के बीच हुई सुगौली सन्धि
के परिणामस्वरूप सेनापति अमर सिंह थापा और नालापानी के वीर
बलभद्र को गम्भीर आघात लगा था। उन्होंने नेपाल जाकर एक स्वर
में उस सन्धि की एक दफा का विरोध किया जिसमें कालीगंगा से
सजलुज तक का राज अंगरेजों को हस्तान्तरण किया जाना था। लेकिन
उनके विरोध को रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जाने पर जनरल
वीरभद्र दुखी होते हैं। नेपाल
को विश्व विजेता बनाने का उनका
सपना चकनाचूर हो चुका था। उन्होंने अथक परिश्रम कर, अपने
अनगिनत सहयोगियों की कुरबानियाँ देकर पाई हुई उस जमीन को
छोड़ना पड़ा था। वह व्यथित थे और विरोधस्वरूप अपने एक हजार
सहयोगियों के साथ अपनी मातृभूमि को छोड़कर लाहौर पहुँचते
हैं। लाहौर उस जमाने में सिखों को अधीन था और महाराज रणजीत
सिंह उसके शासक थे।
महाराजा रणजीत सिंह और वीर
बलभद्र का सामना कांगड़ा में ही हो चुका था और गोरखाओं की
वीरता से वे बहुत प्रभावित थे। 1809 में महाराजा रणजीत सिंह
और गोरखाओं की सन्धि भी इतिहासप्रसिद्ध है। महाराजा रणजीत
सिंह ने उस वक्त कहा था - 'तुम
गोरखनाथ के शिष्य हो, हम नानक के। तुम जब भी मदद के लिए मुझे
याद करो मैं तैयार मिलूँगा।' वीर
बलभद्र ने लाहौर आकर महाराज रणजीत सिंह के साथ मुलाकात की।
महाराजा ने बलभद्र को अपनी फौज में नायक का पद देकर सम्मानित
किया। उस समय से ही कहा जाता है कि नेपाल से आने वाले गोरखा
को 'लाहुरे'
कहने का प्रचलन चला आ रहा है।
1833 की बात है। अफगानिस्तान
के करबुल के पदच्युत बादशाह शाह शुजा ने महाराजा रणजीत सिंह
की शरण में आकर अपने खोए राज्य को वापस पाने की अरदास की।
महाराजा रणजीत सिंह को गुप्त सूचना से पता चल गया था कि शाह
शुजा के पास कोहीनूर हीरा है। महाराजा रणजीत सिंह ने मदद के
एवज में कोहीनूर हीरा प्राप्त कर लिया। स्मरण रहे, आज वह
हीरा विलायत की महारानी के कोषागार में सुरक्षित है और भारत
सरकार उसे वापस लाने की कोशिश में है। क्योंकि वह हीरा
महाराजा रणजीत सिंह के देहान्त के बाद अंगरेजों के हाथों में
पड़ गया था।
कोहीनूर हीरे के बदले
महाराजा रणजीत सिंह ने बलभद्र को उनके एक हजार सहयोगियों के
साथ शाह शुजा को काबुल के राज सिंहासन वापस करने में मदद
करने के लिए कहा। बलभद्र ने महाराज के आदेश का पालन किया।
शाह सुजा को अपना सिंहासन वापस दिलाकर वीर बलभद्र जब लाहौर
वापस आ रहे थे तो उन्होंने एबटाबाद (अब पाकिस्तान में) के
नजदीक एक रमणीक जगह देखी। वहाँ की भौगोलिक स्थिति और जलवायु
उन्हें पसन्द आई। यह क्षेत्र महाराज रणजीत सिंह के अधीन ही
था। बलभद्र ने वहाँ बस जाने का अनुरोध किया। महाराजा ने
उन्हें अनुमति दे दी। बलभद्र ने वहाँ अपने एक हजार गोरखा
सहयोगियों और उनके परिजनों के लिए एक बस्ती आबाद की जिसका
नामकरण हजार गोरखाओं पर 'हजारा'
पड़ा। आज भी यह इलाका हजारा के नाम से प्रसिद्ध है।
देहरादून के इतिहासमर्मज्ञ
कर्नल शमशेर बहादुर थापा दूसरे महायुद्ध के समय एबटाबाद में
थे। उन्हें वहाँ के वाशिन्दों के नैन - नक्श नेपालियों की
तरह गोल चेहरे, छोटी आँखें और छोटे कद के लगे। पूछने पर
बूढ़ों - बुजुर्गों ने बताया था कि उनके पुरखो नेपाल से आए
थे।
ये वीर बलभद्र की एक हजार
गोरखाओं की सन्तानें हैं जो राजनीति के चलते मुस्लिम बन चुकी
हैं।
(दिसम्बर 2011)
नेपाली के पुरस्कार विजेता
इन्द्र
सुन्दास का भाषण
मैं साहित्य अकादेमी को
धन्यवाद देता हूँ कि उसने मेरे उपन्यास नियति को अपने
गौरवशाली पुरस्कार के लिए चुना और मैं इसे नेपाली भाषा और
साहित्य के प्रति सम्मान के रूप में तथा अपने साहित्यिक
कार्य की स्वीकृति के रूप में ग्रहण करता हूँ, जिसे मैंने
1935 में प्रारम्भ किया था, जब मैं स्कूल का छात्र था। यह
अपने आप शुरू हुआ था और मैं स्वयं अपना गुरु था।
मेरा उपन्यास नियति सिर्फ एक
कहानी नहीं है बल्कि जीवन की सच्चाई है। यह इस अर्थ में बहुत
ताजा है कि यह ऐसा
कालखण्ड लेकर चलता है, जो 1960 - 70 के
बीच में पड़ता है और इस कारँण इसमें महत्वपूर्ण ऐतिहासिक
घटनाएँ और दूसरे हालात भी सम्मिलित हैं, जो इस अवधि में हुए
थे। इस तरह इस पुस्तक का विषय आज की समस्याएँ हैं। हालांकि
यो समस्याएँ उस पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के रूप में
दिखाई गई हैं, जहाँ मैं हूँ। फिर भी, इसी तरह की समस्याएं
हमारे देश के दूसरे हिस्से में भी मौजूद हैं।
इस पुस्तक में मैंने
बीर्जमान नामक अपने नायक के प्रारब्ध का चित्रण किया है। साथ
ही, दूसरे चरित्रों का भी जो मिल -
जुलकर इस कहानी को
सम्पूर्णता प्रदान करते हैं। बीर्जमान ऊँचे
शिवालिक पर्वतों के बीच घने सुरक्षित सरकारी जंगल के पास बसे
हुए एक गांव का नवयुवक है। वह एक ईमानदार पहाड़ी लड़का है,
जिसके पास एक सशक्त संकल्प है और उसके इरादे हैं। ऐसा ही
उसके साथ की गांव की एक लड़की के साथ भी है। बीर्जमान उसके
मरते हुए मां - बाप को यह वचन दिया था कि वह उस लड़की और
उसकी छोटी बहन की देखभाल करेगा और समय आने पर उसकी बड़ी
लड़की से शादी कर लेगा। किन्तु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था
और उस लड़की को किन्हीं हालात के कारण, जिसकी वजह से
बीर्जमान को गांव छोड़ना पड़ा और जिसे लड़ाई में मरा समझ
लिया गया, किसी और आदमी से शादी करनी पड़ी। यह दूसरा आदमी एक
छोटा जंगल अधिकारी था, जिसे अकल्पनीय समस्यायों का सामना
करना पड़ा और एक नकली नाटक में कठपुतली जैसी भूमिका निभानी
पड़ी, जिससे उसे बहुत ज्यादा मानसिक पीड़ा हुई और जिसने उसे
करीब - करीब विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया। बीर्जमान ने
अपने भाग्य से समझौता कर लिया और वह इसी बात से खुश था कि
जिसकी उसने रक्षा की थी, वह आखिरकार एक सुचारू जीवन बिता रही
है। हालाँकि कहानी का अन्त थोड़ा बहुत सुखान्त है लेकिन उसका
संयोजन और प्रमुख स्वर सुखान्त से ज्यादा दुखान्त की तर्फ
उन्मुख करता है। यह प्रमुख विषय वस्तु है लेकिन मैंने इस
उपन्यास में और भी अन्य अच्छी सामग्री के भंडार का इस्तेमाल
किया है ताकि वह सच्चे अर्थों में वास्तविक लगे। इस सामग्री
में तिब्बत के साथ व्यापार सम्बन्ध समाप्त होने का उत्तरी
पहाड़ी इलाकों पर प्रभाव, चीनी हमला तथा उस दौरान हुए भारत -
पाक युद्ध, बेरोजगारी की समस्या आदि सम्मिलित हैं।
अब मैं साठ की दूसरी तरफ लग
चुका हूँ और दावा कर सकता हूँ कि मैंने आदमियों को अलग - अलग
दृष्टिकोणों से देखा - परखा है और कभी - कभी अपने आप से पूछा
है कि यही चीज क्यों हुई और दूसरी चीज क्यों नहीं हुई?
वही आदमी क्यों हुआ और दूसरा आदमी क्यों नहीं हुआ इत्यादि।
मैं समझता हूँ कि गीता के अठारहवें अध्याय के 61 वें श्लोक
में इसका उत्तर पा लिया गया है जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन से
कहते हैं - "हे अर्जुन, समस्त
प्राणियों के हृदय में बैठा ईश्वर अपनी माया के जकिए उन्हें
इस तरह घुमाता है जैसे वे एक पहिये पर बैठे हुए हों।"
मुझे ड्राइडन की एक कविता
मिला, जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ। कवि कहता है -
समुद्रों पर हवाओं की तरह,
आचरण है भाग्य के,
जब हम जिन्दगी की यात्रा से
गुजरते हैं
तब वह पतवार का कोण होता है
जो उसका लक्ष्य निर्धारित
करता है
क्रान्ति या युद्ध नहीं।"
यही कारण है कि मैंने इस
पुस्तक को नियति का शीर्षक दिया। एक और बात। मैं नहीं चाहता
था कि मेरा नायक बीर्जमान एक और रोमियो या मजनूं यो देवदास
या आज की बहुतेरी भारतीय फिल्मों के नायकों की तरह बने।
मैंने उसे एक 'आदमी'
की तरह जिन्दा रखा है और उसे उसके गाँव के पास एक बढ़ते हुए
छोटे - से शहर में नानबाई की दुकान खोलने पर राजी कर लिया
है। इस उपन्यास के प्रारम्भिक परिच्छेदों में पढ़े - लिखे
नौजवानों के बीच बेरोजगारी की समस्यायों का उल्लेख किया गया
है, जो सिर्फ दफ्तर में बाबूगिरी करना चाहते हैं या अफसर
बनना चाहते हैं। ऐसे लोगों के लिए मैंने खूब रोजगार खोलने का
संकेत देने की कोशिश की है। क्योंकि यह वक्त की मांग है।
इसलिए मैंने सोचा कि एक लेखक के रूप में मेरा यह प्रमुख
कर्तव्य है कि मैं अपने लेखन के माध्यम से दिशाहीन नवयुवकों
को कुछ रास्ते दिखाऊँ।
अब तक मेरी 13 पुस्तकें
प्रकाशित हे चुकी है, जिनमें तीन उपन्यास हैं। मेरे दूसरे
उपन्यास जुनेली रेखा को पश्चिम बंगाल की नेपाली अकादेमी ने
1980 में भानुभक्त पुरस्कार प्रदान किया था। तीसरा उपन्यास
यह नियति है, जिसके लिए मुझे आज साहित्य एकादेमी का यह
सम्मान मिल रहा है।
मुझे बहुत प्रसन्नता है और
मैं उस दिन और अधिक प्रसन्न होऊँगा जब नेपाली भाषा को भारत
के संविधान के आठवें अनुच्छेद में स्थान मिल जाएगा। इसलिए
आदरणीय प्रधानमन्त्री तथा अन्य समस्त नेताओं से मेरी अपील है
कि वे भारत के साठ लाख नेपाली भाषी नागरिकों की जायज मांग की
तत्काल पूर्ति के लिए आवश्यक कदम उठाएँ और उन्हें यह सन्तोष
दें, जिसके लिए वे पिछले बीस वर्षों से भी अधिक समय से वड़
रहे हैं और तरस रहे हैं। इस सन्दर्भ में मैं साहित्य अकादेमी
तथा विशिष्ट साहित्यकारों का भी सहयोग चाहता हूं।
(पुरस्कार विरतण समारोह 21
फरवरी, 1984, नई दिल्ली)
नवम्बर 2011
मनुष्य का अहं
बच्चन
वेदना
(Suffering) के बिना मनुष्य का
अहं नहीं टूटता, और अहं के टूटे बिना एक मनुष्य के हृदय से
दूसरे मनुष्य के हृदय तक पहुंच नहीं होती, सेतु नहीं बनता।
विचारों का सेतु एक दिमाग से दूसरे दिमाग तक बिना अहं के
टूटे भी बन सकता है, पर भावनाओं का कभी नहीं, और कविता
भावनाओं के सेतु पर चढ़कर ही एक हृदय से दूसरे हृदय तक जाती
है। हृदय - हृदय के बीच भावनाओं के सेतु का निर्माण किए बगैर
जो शब्दों का कारवाँ कागजों पर रवाँ कर देते हैं उसका परिणाम
इसके सिवा कुछ नहीं हो सकता कि उसका कारवाँ कागजों के
मरुस्थल में खो जाए। निर्थक ध्वनि बनकर शून्य में बिलीन हो
जाए। यह भावनाओं का सेतु बनाने से अधिक बन जाने पर निर्भर
है। इसी से कहा जाता है कवि जन्म लेते हैं, बनाए नहीं जाते।
जीवन की न जाने कैसी - कैसी सिथितिया परिस्थितिया अपने -
अपने आकर न जाने किसे तोड़, औरों को जोड़ जाती है। मैं तो
कहता हूं कि इतना होने से ही आदमी कवि बन जाता है। जीवन में
बहुत से कवि हैं जो शब्दों में कविता नहीं करते। शब्द कवि
का, वास्तव में बहुत से माध्यमों में से केवल एक माध्यम है।
मैंने कहीं पढ़ा था - अंग्रेजी में - हिन्दी अनुवाद दे रहा
हूं, 'कविता लिखने का उतना विषय
नहीं, जितना जीने का, औरकविता जीना जीने का सबसे दु:साध्य
रूप है।' यह बिल्कुल वही है जो
कबीर कहते हैं -
सीस काटि भुईं पै धरै तापर
धारै पाँव,
दास कबीरा यों कहै ऐसा होऊ
सौ आव।
इसका अर्थ सतही नहीं। इस पर
गौर करना होगा। शीश काटना तो शायद सम्भव भी हो जाए पर उसको
उठाकर भूमि पर धरना और फिर उस पर पाँव रखना तो तभी सम्भव हो
सकता है जब मरने के बाद भी कोई जीता रहे - जीने की चेतना
अपने हाथों में बचाए रहे। अहं को काटने के बाद जो चेतना शीश
को उठाती है, उसपर पाँव धरती है, उसी का नाम कवि है। और आप
मेरी बात मानें तो कवि को हर कविता लिखते समय यह दुर्धर्ष
चमत्कार करना होता है। या यों कहें कि जब भी सच्चे अर्थों
में कविता बनती है कवि उसी प्रक्रिया में गुजरा होता है। एक
आइरिश कहावत है - It is death to be a
poet. इसे मैं अर्धसत्य कहूंगा, पूर्ण सत्य यह है -
It is living after death to be a poet.
कवि मरता नहीं है - कवि मरकर सचेत रहता है।
(क्या
भूलूं क्या याद करूं
से साभार) -
अगस्त 2011
सिक्किम की पहली हिन्दी
पुस्तक 'बढ़ते बीस कदम'
सिक्किम राज्य भारत का एक
छोटा - सा राज्य है जो 1975 तक भारत का एक संरक्षित राज्य
था। 1970 के दशक तक इस राज्य की
आबादी मुश्किल से दो लाख भी
नहीं थी जो आज 6 लाख तक पहुंच गई है। सिक्किम में हिन्दी का
1850 के दशक से प्रचलन के छिटपुट
प्रमाण मिलते हैं जब ईसाई
मिशनरियों ने धार्मिक प्रचार के साख - साथ लोगों में शिक्षा
का भी प्रचार किया और इसके लिए हिन्दी भाषा के माध्यम की
सहायता ली। उस समय सिक्किम में दार्जिलिंग जिला बी शामिल था।
100 के दशक में शिक्किम दरवार के प्रयास से गंगटोक में
स्थापित पहले ही स्कूल में 1924 तक शिक्षा का माध्यम
था। जन
सम्पर्क की भाषा नेपाली होने के
कारण बाद में शिक्षाविद्
रश्मिप्रसाद आले के प्रयास से हिन्दी के माध्यम के स्थान पर
नेपाली कर दिया था यद्यपि हिन्दी एक विषय के रूप में पढ़ायी
जाती रही। सिक्किम में शतशतिप्रशत लोग हिन्दी भाषा समझते ही
नहीं बल्कि बोलते भी हैं।
1958 से सिक्किम में एक
नेपाली समाचारपत्र 'कंचनजंघा'
मासिक पत्रिका का प्रकाशन काशीराज प्रधान के प्रयास से शुरू
हुआ। इस पत्रिका में कभी - कभार हिन्दी रचनाएँ भी प्रकाशित
होती है। विद्यलयों की वार्षिक पत्रिकाओं में अन्य भाषाओं
(नेपाली, भुटिया, लेप्चा, लिम्बू, अंग्रेजी) के अलावा हिन्दी
खण्ड भी होता था जिसमें विद्यार्थियों और शिक्षकों की रचनाएँ
प्रकाशित होती थीं। गंगटोकस्शित सार्वजनिक पुस्कालय (स्थापित
1958) से ऊषा पत्रिका का एक अंक प्रकाशित हुआ था जिसमें
हिन्दी खण्ड रखा गया था।
सिक्किम से पहली हिन्दी
पुस्तक होने का श्रेय 'बढ़ते बीस
कदम' को जाता है जो 1976 में
शिक्षा विभाग, सिक्किम सरकार ने प्रकाशित की थी इसके लेखक एक
हिन्दी शिक्षक ध्रुवनारायण सिंह थे, जो बिहार के निवासी थे।
'बढ़ते
बीस कदम' एक गीति नाटक है।
इस नाटक की विषय - वस्तु से सम्बन्धित तत्कालीन शिक्षा
निदेशक डॉ. एन.के. जाँगिरा ने लिखा - 'लेखक
ने देश में घटी गत वर्ष (1975) की घटनाओं का नाटकीय ढंग से
वर्णन किया है। नाटक प्रतीकात्मक है। नाटक का गाँव प्रतीक है
हमारे समूचे देश का, गांव के लोग प्रतीक हैं हमारे देश के
लोगों के और गाँव की समस्याएँ प्रतीक हैं हमारे देश की
समस्याओं की। नाटक तीन अंकों में विभक्त है। प्रथम अंक में
26 जून, 1976 से पहले की स्थिति का वर्णन है। दूसरे क में
देश की विकट समस्याओं से रचनात्मक और कारगर ढंग से जूझने और
देश की समृद्धि के पथ पर अग्रसर करने के लिए
'बीस कदम'
अंकित हैं। तीसरे अंक में 'बढ़ते
बीस कदम' की एक साल की उपलब्धियों
का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है।... घटनाओं की भांति नाटक के
पात्रों का चित्रण भी प्रतीकात्मक ढंग से ही किया गया है। एक
ओर परिश्रम के पसीने में नहाए न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित
जनसाधारण है तो दूसरी ओर इनके परिश्रम पर आश्रित अनन्त
विलासी सुविधाओं से लथपथ देश की बुनियादों पर आघात करते हुए
मुट्ठीभर शोषक। क्या देश के भविष्य से खिलवाड़ करते हुए ये
मुट्ठीभर लोग मानव रूप में दरिन्दे नहीं?
अवश्य ही ये समाजविरोधी तत्व दरिन्दों से कम नहीं। इसलिए ठीक
ही लेखक ने समाजशोषक पूँजीपतियों, जमाखोरों, लुटेरों और
तस्करों को चूहे, चील, कौए, जंगली भैंसे और टिड्डीदल की
संज्ञा से सम्बोधित किया है। नाटक के पात्र हमारे सामने
चलते- - फिरते पुरुष - स्त्रियाँ ही तो हैं। ग्रामीण परिवेश
के अनुकूल नाटक में स्थान - स्थान पर ग्रामीण भाषा का प्रयोग
किया गया है। ग्रामीण भाषा ने नाटक को यथार्थवादी पोशाक
प्रदान कर पात्रों को सजीन बना दिया है।
'बीस
बढ़ते कदम' करोड़ों नर - नारियों
की आकांक्षाओं की ओर बढ़ते हुए भारतवर्ष का नाटक है। कहीं -
कहीं समाजविरोधी तत्वों के हृदय - परिवर्तन की झलक मिलती है।
यह एक शुभ संकेत है। अन्तिम अंक में पहुँचते - पहुँचते हम
सोचने पर विवश हो जाते हैं कि हमने अपने देश को चहुँमुखी
प्रगति और समाजवाद की ओर बढ़ते करोड़ों लोगों के उत्थान की
दिशा में 'बढ़ते बीस कदम'
में कहाँ तक अपने कदमों का सहयोग दिया?
इन बढ़ते बीस कदमों की गति तीव्र करने के लिए हम और क्या कर
सकते है ताकि अपने करोड़ों गरीब भाई - बहनों के आँसू पोंछकर
शीघ्रातिशीघ्र उनके उदास चेहरे पर मुस्कान की रोशनी बिखेर
सकें।"
सिक्किम से हिन्दी में
प्रकाशित होने वाली इस पहली कृति के प्रकाशन के अवसर पर
सिक्किम के तत्कालीन राज्यपाल बिपिन बिहारी लाल ने शुभकामना
सन्देश में लिखा - "बड़े
हर्ष का विषय है कि सिक्किम सरकार के शिक्षा विभाग ने श्री
ध्रुवनारायण सिंह द्वारा रचित नाटक 'बढ़ते
बीस कदम'के प्रकाशन का आयोजन कियी
है। नाटक में देश की वर्तमान स्थिति तथा प्रधानमन्त्री
श्रीमती इन्दिरा गाँधी की प्रगतिशील नीतियों का संदर्भ
प्रस्तुत किया है।
मुझे आसा है कि यह नाटक
मनोरंजन के साथ - साथ हम सबको सरकार के प्रगतिशील कार्यक्रम
को सफल बनाने हेतु कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए प्रेरित
करेगा।
मैं श्री ध्रुवनारायण सिंह
को 'बढ़ते बीस कदम'
की रचना के लिए तथा सिक्किम सरकार के शिक्षा विभाग को इसके
प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई देता हू।"
सिक्किम के तत्कालीन
मुख्यमन्त्री काजी ल्हेन्डुप ल्हेन्डुप दोर्जी खाङ्सार्पा ने
बधाई सन्देश में लिखा - "मुझे यह
जानकर अत्यन्त हर्ष हुआ कि सिक्किम सरकार का शिक्षा विभाग एक
नाटक 'बढ़ते बीस कदम'
का प्रकाशन कर रहा है, जो प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा
गाँधी के प्रगतिशील कदमें का प्रतीक है। इस नाटक का प्रकाशन
बड़े उपयुक्त समय पर हो रहा है क्योंकि बीस सूत्री कार्यक्रम
को कार्यान्वित होते अब लगभग एक वर्ष पूरा हो रहा है। मैं
आशा करता हीँ कि यह रचनात्मक कृति हम सबको सरकार के
प्रगतिशील कार्यक्रम की गति को तीव्र करने के लिए प्रेरित
करेगी। इस प्रकाशन के लिए मैं लेखक तथा शिक्षा विभाग को बधाई
देता हूँ।"
सिक्किम सरकार में तत्कालीन
शिक्षा एवं संस्कृति मन्त्री नयन छिरिङ् लेप्चा ने लिखा -
'शिक्षा
विभाग ने पिछले एक वर्ष में कई महत्वपूर्ण रचनात्मक
कार्यक्रम बनाए तथा कार्यान्वित किए हैं। इनमें बच्चों,
युवाओं तथा वयस्कों के लिए सादृश्य रचनाएँ भी सम्मिलित हैं।
श्री ध्रुवनारायण सिंह द्वारा रचित नाटक
'बढ़ते बीस कदम' का
प्रकाशन भी इसी रचनात्मक कार्यक्रम की एक कड़ी है। इस नाटक
में लेखक ने प्रतीकात्मक रूप से देश को लोकतान्त्रिक समाजवाद
के पथ पर तीव्र गति से अग्रसर करने की दिशा में
प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी की अथक कोशिशों की झलक
मिलती है। निश्चय ही यह रचना हम सबके लिए देश - समृद्धि की
दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी। इस
प्रभावकारी रचना के लिए मैं श्री ध्रुवनारायण सिंह को और
इसके प्रकाशन के लिए सिक्किम सरकार के शिक्षा विभाग को
हार्दिक बधाई देता हूँ। साथ ही आशा करता हूँ कि आगे भी
शिक्षा निदेशालय ऐसे रचनात्मक कार्यों को प्रोत्साहन देता
रहेगा।"
(कृति - बढ़ते बीस कदम।
कृतिकार - ध्रुवनारायण सिंह। प्रकाशक - शिक्षा विभाग,
सिक्किम सरकार, गंगटोक। संस्करण - प्रथम, जून 1976। मूल्य -
तीन रुपये। वितरक - इन्डियन पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली।)
-
रचनाकार ब्यूरो
(जुलाई 2011)
हमारी स्त्रियाँ
यानिस रित्सोन
(यूनानी कवि)
वे
हैं वहाँ हमसे दूर...
बहुत दूर.. रोज हमारे
सिकुड़न भरे बिस्तारे तहाती
हुईं
हर संध्या चौड़े चौड़े अवकाश
को चीरती उनकी बाहें
चली जाती हैं मेज पर खाना
लगाने
और हमें लगता है हम कहीं गलत
हो गये हैं
हम सहसा खड़े हो जाते हैं
अपने पाँवों पर, कहते हुए
'तुम्हें
आज बहुत मेहनत पड़ गयी' या
'रहने
दो दिया मैं खुद ही जला लूँगा'
माचिस सुलगाते हुए हमें
दीखती है एक आकृति
धीरे से मुड़कर रसोई घर को
जाती हुई... एक अभ्यस्त लय में
उसकी पीठ
एक पहाड़ तिक्तताओं का -
मृत्यु से लदा हुआ
मृत्युएँ परिवार के सगों की,
मृत्युएँ खुद उसकी और तुम स्वयं
उनमें एक, उसकी पदचाप तले
सुनायी देती है तुम्हें
चरमराहट फर्श की
दूर कहीं सुनते तुम आती हुई
रेल की सीटी
भागी चली जाती है मोर्चे की
ओर
(अंग्रेजी से रूपान्तर -
रमेशचन्द्र शाह)
- 15 - 21 नवम्बर'81
दिनमान
से साभार)
जीवन ऊर्जा है
ओशो
अठारहवीं
सदी के वैज्ञानिकों की घोषणा थी कि परमात्मा मर गया है।
आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। पदार्थ ही सब कुछ है। लेकिन
विगत तीस वर्षों में ठीक उलटी स्थिति हो गयी है। विज्ञान को
कहना पड़ा कि पदार्थ है ही नहीं, सिर्फ दिखायी पड़ता है।
ऊर्जा ही सत्य है, शक्ति ही सत्य है। लेकिन, शक्ति की तीव्र
गति के कारण पदार्थ का भास होता है। दीवारें दिखायी पड़ रही
हैंष अगर निकलना चाहोगे तो सिर टूट जाएगा। कैसे कहें कि
दीवारें भ्रम हैं? स्पष्ट दिखायी
पड़ रही हैं। उनका होना है। पैरों के नीचे जमीन अगर न हो तो
आप खड़े कहाँ रहेंगे?
नहीं, इस अर्थ में विज्ञान
नहीं कहता है कि पदार्थ नहीं है। इस अर्थ में कहता है कि जो
हमें दिखायी पड़ रहा है, वैसा नहीं है। अगर हम एक बिजली के
पंखे को बहुत तीव्र गति से चलायें तो उसकी तीन पंखुड़ियाँ
तीन दिखायी पड़नी बंद हो जायेंगी। क्योंकि पंखुड़ियां इतनी
तेजी से घूमेंगी कि उनके बीच की खाली जगह, इसके पहले कि आप
देख पायें, भर जायेंगी। इसके पहले कि खाली जगह आंख की पकड़
में आये, कोई पंखुड़ी खाली जगह पर जा जायेगी। अगर बहुत तेज
बिजली के पंखे को घुमाया जाये तो आपको टीन का एक गोल वृत्त
घूमता हुआ दिखायी पड़ेगा। पंखुड़ियां दिखायी नहीं पड़ेंगी।
आप गिनती करके नहीं बता सकेंगे कि कितनी पंखुड़ियां हैं। अगर
और तेजी से घुमाया जाए तो आप पत्थर फेंक कर पार नहीं निकाल
सकेंगे, पत्थर इसी पार गिर जायेगा। अगर और तेज घुमाया जा सके
तो आप मजे से उसके ऊपर बैठ सकते हैं। आप गिरेंगे नहीं। और
आपको पता भी नहीं चलेगा कि पंखुड़ियां नीचे घूम रही हैं।
क्योंकि पता चलने में जितना वक्त लगता है, उसके पहले नयी
पंखुड़ी आपके नीचे आ जायेगी। बीच के अन्तराल का पता न चले तो
आप मजे से खड़े रह सकेंगे। ऐसे ही हम खड़े हैं अबी भी। अमु
तीव्रता से घूम रहे हैं, इसलिए चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती
हैं। जगत में कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है। और जो चीजें ठहरी हुई
मालूम पड़ती हैं, वे सब चल रही हैं।
जितना ही विज्ञान परमाणु को
तोड़ता चला गया, उसे पता चलता गया कि परमाणु के बाद तो फिर
पदार्थ नहीं रह जाता, सिर्फ ऊर्जी कण, इलेक्ट्रॉन्स रह जाते
हैं। विद्युत कण रह जाते हैं। ऐसे कण कोईकोई चीज नहीं है। अब
विज्ञान की नजरों में यह सारा जगत ऊर्जा का, विद्युत की
ऊर्जा का विस्तार है, यही ऊर्जा जीवन है।
फिर पहाड़ सुलगने लगे हैं
श्री हर्ष
चाय
की हरी हरी पत्तियों को
चुनने वाली उँगलियों से
टपकती रक्त की बूँदें
सींचती हैं जड़ों को
नए सपनों को जिन्दा रखने।
हवा हिला डुलाकर तोड़ती है
पेड़ों में छिपी खामोशी को
पीठ पर लदी टोकरी में
खिलखिलाने लगती हैं अलसायी
कलियाँ
जिन्दगी का सफरनामा पहली
किरण के
साथ
आरम्भ होकर
थकी हारी सन्ध्या में सिमट
जाता है
दर्द भरी प्रतीक्षा को
सहलाने वाले हाथ
अन्धेरे में गायब होते जा
रहे हैं
पहाड़ फिर सुलगने लगे हैं।
(उत्तर
- पूर्वांचल/दिसम्बर 2000
से साभार)
(नवम्बर 2010)
यानिस रित्सोज
(यानिस रित्सोज:
जन्म 1909, यूनान के सुप्रसिद्ध कवि। पहला कलिता संग्रह 1934
में प्रकाशित हुआ और उसी के साथ वह नयी यूनानी कविता के
प्रमुख रचनाकारों के रूप में स्वीकृत हुए। 40 से अधिक कविता
संग्रह प्रकाशित। कविता के लिए उन्हें कई अन्तरराष्ट्रीय
पुरस्कार प्राप्त हो चुको हैं, विश्व की अनेक भाषाओं में
अनूदित)
वक्त
धीरे धीरे हम अभ्यस्त होते
जाते हैं
दाढ़ी और तेज बढ़ने लगती है,
नाखून भी।
यह पुराना दरवाजा रसोई
घर का आसमानी रंगा था -
चटख नीला गूँजता रंग
मेल नहीं खाता था
घर की सरोवर की शान्ति से।
इस की गंध भी
बहुत अधिक नंगेपन के कारण
कहीं गलत लगती थी, खैर
वह नया रोगन बी बहुत जल्दी
घुल गया
अब बाकी बचे हैं सिर्फ
ये नीले धब्बे फर्श पर
बचे खुचे चूरों से एक
विस्तीर्ण आकाश के, जिन्हें
राखिया रंगवाली काँटेदार
चोंच वाली अकालग्रस्त चिड़ियों ने
जल्दी जल्दी निगल लिया हो।
अंग्रेजी से रूपांतर -
रमेशचन्द्र शाह
((दिनमान,
15 - 21 नवंबर,1981 से साभार)
- अक्तूबर
2010
व्लागा दिमित्रोवा
(बल्गारिया की नयी पीढ़ी की
सशक्त कवयित्री व्लागा दिमित्रोवा नयी धारा की संस्थापक
स्वीकार की जाती है। कहानी लेकिका, उपन्यासकार और पत्रकार,
कुछ रचनाओं पर फिल्में बी बनी हैं)
परिमाप
पंछी
का
माप है
एक छोर से
दूसरे तक
विस्तृत हवाओं को काटना
अंतरिक्ष नापने के लिए
आदमी के एक कीलित हाथ से
दूसरे तक
सीमित है परिमाप
मानवी माप है
पूरी सृष्टि के लिए
(गंगाप्रसाद,
अमृता प्रीतम और
व्लागा दिमित्रोवा
द्वारा मूल बल्गारी
भाषा से अनूदित)
(दिनमान
19 - 25 अप्रैल 1981 से साभार)
(
विश्व
साहित्य)
{इस
स्तंभ में विश्व के चुने हुए साहित्यकारो की रचनाओं का हिंदी
में अनुवाद प्रस्तुत किया जाएगा। इस क्रम में भारतीय नेपाली
साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर सानु लामा के कुछ संस्मरण दिए
जा रहे हैं । साहित्य के क्षेत्र में उनकी
वि सरकार ने उन्हे पद्मश्री से विभूषित किया है।
सम्प्रति श्री लामा सिक्किम की शीर्ष साहित्यिक एवं
सांस्कृतिक संस्था "सिक्किम अकादेमी"
के अध्यक्ष हैं।
ी से अनुवाद:
सुवास दीपक
समर्पण
सानु लामा
सानु
लामा
साल में एक दफा हफ्ता दस दिनों के लिए
हमारे बीच रह कर वापस चले जाने वाले जीत काका हम बच्चों के
लिए एक मिसाल थे। किसी भी अच्छी बात की जीती-जागती मिसाल।
दंत-कथाओं में वर्णित किसी से भी पराजित न होने वाले पराक्रमी
वीर योद्धा की तरह थे हमारे जीत काका। हमारे लिए किसी वीर
पराक्रमी पुरुष की परिभाषा सिर्फ जीत काका ही थे। ऊंची
बलिष्ठ कद-काठी के, तीखी होने पर भी हम सभी को बहुत भाती थीं
जीत काका की आंखें। काले घने बालों की एक लट हमेशा माथे के
मध्य भाग में लटकी रहती थी। कुपुप (सिक्किम और तिब्बत की सीमा
पर स्थित एक छोटा-सा कसबा) में डाक व तार विभाग के कर्मचारी
थे हमारे जीत काका। कर्मचारी तो सिर्फ नाम के लिए थे दरअसल
वह देश के गुप्तचर विभाग के एक कर्मचारी थे - इस बात की
जानकारी मुझे काफी सालों के बाद मिली थी। उस जमाने में कुपुप
हमारे लिए हिमालय के उस पार कहीं स्थित लगता था। काका जब
हमारे यहां आते तो चमड़े के बोरे में ठूंस-ठूंस कर चावल और
घी लेकर आते थे। द्वितीय महायुद्ध चल रहा था। युद्ध की वजह
से राशन और दूसरी खाद्य सामग्री की मात्रा में काफी कटौती की
गई थी। चावल, दाल आदि की बड़ी भारी किल्लत थी। बड़े
कष्टपूर्ण दिन थे वे। शहर-बाजार में लोगों को काफी दिनों तक
चने-मटर खाकर गुजारा करना पड़ा था। गांव-बस्तियों की स्थिति
तो और बदतर और शोचनीय थी।
वर्फ से जले चेहरे पर जगह-जगह काले
दाग और बड़े-बड़े हाथ-पैरों को काका चमड़े के बोरे के एक कोने
में छेद करके बर्तन में चावल डालते तो एक निश्चित गति से
जर्ररर.... से बर्तन में गिरती लाल-लाल चावलों की धारा को
आसपास से सिर्फ हम ही नहीं, बड़े-बूढ़े बी बड़ी उत्सुकता से
देखते थे। उस चावल का भात लाल रंग का होता, किसी प्रकार के
स्वाद से रहित, फिर भी शरीर को सुन्न करके मार देने वाली ठंड
में ऊंची-ऊंची हिमालय चोटियों को लांघ कर हमारे पराक्रमी काका
द्वारा लाए हुए चावलों का भात खाकर हम अलाव के इर्द-गिर्द
बैठकर देर रात तक गप्पें मारते बैठे रहते थे। सर्दियों में
काका वर्फ बन चुकी छांगु (वास्तविक उच्चारण छोग्मो) झील को
घोड़े पर चढ़ कर बेफिक्र पार करते थे। सर्दियों में वर्फ
पड़ने पर सफेद बन चुकीं स्वच्छ सुंदर पर्वत मालाओं और वसंत
में किस्म-किस्म के फूलों के खिलने से रंगीन वादियों की
कल्पना में मैं डूबा रहता था। बुरांस फूल खिली श्वेत पर्वत
मालाओं पर बिखरी गोधूली की लालिमा को मैं अपने मन की आंखों
से देखता था।
काका कोई काम करने को कहते तो हम बच्चों
में खुशी का ठिकाना नहीं रहता। हम बच्चों के बीच धक्का-मुक्की
मच जाती। मनाने पर भी रोते रहने वाले बच्चे से काका कहते, "वह....
उ..स पैंयूं के पेड़ को छू कर जो पहले आएगा उसे मैं बाजार ले
चलूंगा।"
पेड़
को छू कर आने वाला वह हमेशा रोने वाला लड़का ही होता।
"यह शरण बड़ा होकर जरूर दौड़ने में
चैम्पियन होगा। देखो तो इसकी टांगें कितनी सुडौल और फुर्तीली
हैं।" काका बताते। शरण पर जब उनके कहने का असर पड़ता तो वह
अपना आशय बताते, "जा तो शरण, डौड़ कर एक आने की सुपारी तो
लेकर आ।"
शरण इस आज्ञा को सम्मानजनक मानता, एक
गर्व की बात समझता। काका का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि उनकी
आज्ञा का पालन करना हम बच्चे किसी सम्मान से विभूषित होने से
कम नहीं समझते थे।
इस परिवर्तनशील संसार में कुछ भी
स्थायी नहीं है। एक दिन काका का कुपुप में निधन हो गया। हम
सभी बच्चे ही थे, काम से लौट कर पिता जी ने वारिश हो रही इस
शाम को काका की मौत का समाचार सुनाया तो सुनकर हम सभी रो पड़े।
उनकी मृत्यु ने उनके और हमारे बीच एक बड़ी खाई पैदा कर दी।
सिर्फ यादें ही बाकी रहीं। वक्त बीतता गया, कुपुप हम लोगों
से दूर होता गया। अब यह कुपुप न होकर हमारे लिए एक ऐसा
विपदाजनक देश बन गया था जहां सिर्फ दंतकथाओं के पराक्रमी
पुरुष ही पहुंच सकते थे।
परिवर्तनशील संसार में घटनाएं घटती
रहती हैं। परिवर्तन को जारी रखने के लिए कहीं न कहीं कोई न
कोई घटना घटती ही रहती है। काका की मृत्यु के कोई पंद्रह साल
बाद 1962 के एक सर्द दिन को मुझे कुपुप जाने का सरकारी आदेश
मिला। माघ महीने की एक रात को वहां की प्रहरी चौकी तूफानी
अंधड़ से उखड़ गई थी। उसकी मरम्मत का शीघ्रातिशीघ्र कार्यभार
मुझे सौंपा गया था।
सरकारी आदेश से ज्यादा मुझे अपने अतीत
के गर्भ से निकल कर आयी काका की स्मृति ने ज्यादा उद्वेलित
किया। इतने सालों के बाद, अनेक परिवर्तन हो जाने के बावजूद
काका के पर्याय बन चुके कुपुप के विषय में मेरी धारणा में
किंचित परिवर्तन नहीं आया था। मेरे लिए कुपुप आज भी एक ऐसा
स्थान था जहां सिर्फ पराक्रमी वीर पुरुष ही पहुंच सकते थे।
हृदय में एक कुतुहल, एक उमंग और रोमांच लिए मैं अपने सहायकों
के साथ कुपुप के लिए रवाना हुआ।
गंगटोक से जितना ऊंचाई पर पहुंचते
हैं, सर्दी उतनी ही बढ़ती जाती है। भयंकर सर्दी के प्रकोप से
रास्ते के दोनों ओर के चांप, बुरांस और चिमल के नंग-मनंग पेड़
अरसे से जैसे रोगी लगते थे। वर्फ पड़ने से सफेद हो चुकी वादी
में एक प्रकार की निस्तब्धता छायी हुई थी।
हम छांगु झील पहुंचते हैं।
जिंदगी में पहली बार मैं छांगु झील के
दर्शन करता हूं। हम सभी गाड़ी से उतरते हैं। प्राय:
चारों
ओर से देवदार और अन्य वृक्षों से घिरी सुंदर छांगु झील को
देख कर मैं अवाक् रह गया। अत्यधिक स्वच्छ नीले जल में सफेद
बतखें विचरण कर रही थीं। बतखों की हर जोड़ी के तैरने से जल
में एक कोमल सी लहर उठती और दूसरी लहर से टकरा कर लोप हो जाती।
झील का दीर्घाकार, उसकी पवित्रता और वहां के शांत वातावरण को
देखकर अनायास ही मेरे मन में श्रद्धा और भक्ति की भावना
जागृत हो उठी। हम सभी प्रकृति की सुंदरता और श्रृंगार-कौशलता
पर मुग्ध काफी देर तक मौन खड़े रहे।
छांगु की सुंदर छवि को मन में अंकित
करने के बाद हम आगे बढ़ते हैं। झील को दायीं ओर छोड़ कर हमारी
गाड़ी कुपुप की ओर चल पड़ती है। सर्दी बढ़ती जाती है। सर्द
हवा के झोंके हमारे ऊपर आक्रमण करने लग जाते हैं। ठेगु,
सेराथाङ लांघ कर हम आगे बढ़ रहे थे। नाथुला की हिमाच्छादित
ऊंची-ऊंची चोटियों को गाड़ी में बैठे-बैठे ही देखता रहा।
दुपहर
को हम कुपुप पहुंच जाते हैं। गाड़ी से अभी उतरे ही थे कि
वर्फीली हवाओं के तीव्र झोंकों से तो हमें ऐसा प्रतीत हुआ कि
जैसे हमारी सांसें ही बंद हो गयी हों। बूंदाबांदी भी शुरू हो
जाती है और कुछ क्षणों के बाद बूंदाबांदी का अनुकरण वर्फ के
फाहों ने करना शुरू कर दिया। मैंने इधर-उधर देखा, कुछ
सपाट-समतल जमीन पर दो-चार घर और कुछ विश्राम-स्थल जैसे थे।
घर और विश्राम-स्थल बहुत पुराने प्रतीत होते थे। उचित
रख-रखाव न होने की वजह से पत्थरों की दीवारों और टीन की छत
वाले घर और विश्राम-स्थल बरसों से धूप, वारिश और वर्फीली
हवाओं से जूझते शब्दहीन और स्तब्ध दिखते थे।
सामने के घर से एक प्रहरी ने आकर हमें
अंदर चलने का अनुरोध किया। हम सभी अपने-अपने सामान उठा कर
अंदर पहुंचते हैं। विस्तीर्ण कुकुप की जमीन पर खड़े होकर चारों
ओर निर्मम चट्टानी ढलानों और दयनीय ऱूखे टीलों की ओर मैंने
देका। युगों से अचल खड़े कुछ कहने को उद्यत नंगे पहाड़ और
इन्हीं कंदराओं में उलझ कर ठिठके समय के सांकेतिक चिन्ह बड़ी
तादाद में मेरे इर्द-गिर्द बिखरे पड़े थे। वर्फ, वर्फीले
अंधड़, कलेजे को बींधने वाली वर्फीली हवाओं का सामना करते और
बरसात में अविरल झड़ी को बरदाश्त करते ऐसी नीरस ढलानों और
भू-स्खलनों से भरी जगह पर इतने साल कैसे बिताए होंगे जीत काका
ने? निर्जन,
उदास जगह पर जीत काका का निधन होने की स्मृति से तत्काल मेरे
गले में कुछ अटक सा जाने का अनुभव हुआ।
हमारे लिए सारा बंदोबस्त उन प्रहरियों
ने कर दिया था। रात को भोजन के बाद चिम्नी की आग तापते हुए
हम गप्पें लड़ा रहे थे। उस नीरस जगह पर ये प्रहरी कैसे रहते
होंगे, ऐसा प्रश्न हममें से एक व्यक्ति ने किया तो एक प्रहरी
ने गंभीर होकर कहा,"ड्यूटी! ड्यूटी तो करनी ही पड़ती है!"
उसने 'यह हमारा देश है, देश की रक्षा
के लिए अपना कर्तव्य-पालन सभी को करना चाहिए'
जैसा
लंबा-चौड़ा भाषण नहीं दिया। जितना कहना था, उससे ज्यादा वह
नहीं बोला किंतु उस छोटे वाक्य में उसका विश्वास बोला था,
उसका समर्पण बोला था।
प्रहरी का वह वाक्य सीधा मेरे
मस्तिष्क में घुस गया। और मुझे बोध हुआ कि हमारे जीत काका ने
कैसे इतने साल इस नीरस और विस्तीर्ण कुपुप में बिता दिए और
कैसे उनकी मौत ऐसी निर्मम जगह पर हुई होगी।
देवी-जलधारा
प्रेमलाखा गांव का सरकारी दौरा करने
का कब मौका मिले, इसका मुझे बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता।
सहायक कर्मचारियों से संपन्न हो सकने वाले कामों पर भी मैं
खुद कार्यक्रम बना कर दौरे पर निकल पड़ता। इसकी वजह थी
प्रेमलाखा का सौंदर्य और रमणीयता। इससे भी बड़ा कारण था
प्रेमलाका की देवी-जलधारा। गांव के बीच, कुछ ओझल पड़ी जगह पर
एक जलधारा थी जहां से निरंतर निर्मल और शीतल पानी बहता रहता
था। जलधारा के स्रोत के इर्द-गिर्द केले के गाछ, तितेपाती की
झाड़ियां और अन्य वनस्पतियां थी। दो पत्थरों के बीच से पृथ्वी
के गर्भ का पानी काफी लंबी यात्रा तय करने के बाद उबलता-सा
भुलुक-भुलुक आवाज निकालते हुए बाहर आता था। कुछ दूर तक बहते
जाने के बाद बांस की खपच्चियों से धारा के रूप में नीचे गिरती
थी वह जलधारा धरती की छाती पर। यह जलधारा नीचे कुछ गहरी हो
चुकी जमीन में इकट्ठे हुए छोटे से पोखर में गिरती थी जहां से
निरंतर मधुर आवाज निकलती रहती थी। जलस्रोतको प्राकृतिक
प्रकोप अथवा भू-स्खलन से बचाने के लिए किसी ने काफी साल पहले
पत्थरों की एक दीवार खड़ी कर दी थी जो आसपास उगी झाड़-झंखाड़
की वजह से स्पष्ट दिखाई नहीं देती थी। धारा के एक ओर कपड़े
धोने के लिए एक चिकनी सपाट चट्टान थी और दूसरी ओर पानी भर कर
रखने या नाम्लो (बोझ उठाने वाली रस्सी) से पानी उठाने की
सुविधा के लिए पत्थरों का एक लंबा चबूतरा बनाया गया था। यह
चबूतरा थके-मादों को सुस्ताने के लिए औऱ खास तौर पर पानी भरने
को आने वालों के लिए बैठने और गप्पें लड़ाने की सुविधा
प्रदान करता था।
प्रेंमलाखा की चढ़ाई वाले रास्ते को
तय करने के बाद मैं सबसे पहले देवी-जलधारा पहुंचता था।
स्वच्छ और शीतल पानी अंजलि भर भर कर तब तक पीता रहता जब तक
पूर्ण रूप से तृप्त न हो जाता। तृप्त होकर मैं उस चबूतरे पर
बैठ जाता। स्रोत से बहते पानी की आवाज और फिर बहते-बहते अंत
में जल-धारा में परिवर्तित होकर गिरने से निकलते संगीतमय
स्वर को मैं सुनता रहता। मेरी थकान दूर हो जाती। मैं
आनंदविभोर हो जाता। देवी जल-धारा का आकर्षण सिर्फ मेरे लिए
ही नहीं था, सभी इसके आकर्षण से खिंचे चले आते थे। घर में
पत्नी से तू-तू,मैं-मैं होने पर गुस्से को शांत करने के लिए
दौलत राई हाथ-पांव धोने के बहाने इसी जल-धारा के पास आ कर
बैठा रहता था। अब की बार भी अदरक की फसल बेच कर घले महाजन का
कर्जा चुका न सकने की समस्या से चिंतित जीतमान भी इसी धारा
पर आ कर बैठ जाता। रास्ते भर उगी घास और झाड़-झंखाड़ को
उखाड़ता, जल-धारा की ओर लटकी तितेपाती और अन्य झाड़ियों को
छांटता। वापस लौटते उसका चेहरा चमक रहा होता - वह अपनी समस्या
का हल खोज चुका होता। देवी जल-धारा के पास जगबीर घले का घर
था। पानी भरने विशेष रूप से घर की बड़ी बेटी सीता जाती थी।
घर से गागर उठाए वह पानी भरने निकलती। सरसों के लहलहाते खेत
की मेंढ से होते हुए तकरीबन तीन सौ कदम चल कर बड़े वट-वृक्ष
की दायीं ओर तोरी बोए हुए खेतों की तीन मेंढ़ों को लांघ कर
ढलान की ओर मुड़ती। उसके बाद कुछ दूर बाड़ को लांघ कर देवी
जल-धारा तक के पचास कदमों का टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता तय कर वह
शांत स्थल पर पहुंचती। गागर को रगड़-रगड़ कर धोकर धारा से
पानी भरती और खुद चबूतरे पर बैठ कर दोनों हथेलियों को ठुड्डी
पर रख कर गागर में गिरती जल-धारा की ओर देखती रहती। गागर भर
चुकने के बाद धारा का पानी गागर के मुंह से गोलाकार बन गिरते
जाने का उसे पता ही नहीं चलता। पनघट पर सहेलियां जब गप्पें
मारतीं और खिलखिलाती हुई हंसती उसके पास पहुंचतीं तो वह जैसे
नींद से जाग पड़ती।
जल-धारा के स्रोत तथा आसपास के
पेड़-पौधों को काटना सख्त मना था। वहां नाग-देवता का वास होने
का लोक-विश्वास था और ऐसा करने से नाग देवता
के श्राप का भय
था।
उस पवित्र मान लिए क्षेत्र के अंदर जाने तथा वहां गंदगी
फैलाने की गांववासी कल्पना तक नहीं कर सकते थे। एक शाम को
स्रोत क्षेत्र के केलों के पत्ते खाने को घुसी आरसी गाय (उन्नत
नस्ल की गाय) को निकालने के लिए ओली बाजे ने अपने नाती को
भेजा। गाय को तो निकाल लाया लेकिन उसी रात से बालक को बुखार
ने जकड़ लिया। नाग देवता के अति क्रोधित होने के कारण गांव
के धामी-झांक्री ( झाड़-फूंक करने वाले ओझा) की एक न चली।
अंत में स्वास्थ्य केन्द्र ले जाकर सुई लगाने और दो हफ्तों
तक दवाइयां खाने के बाद ही बालक स्वस्थ हो पाया। यह घटना काफी
पुरानी है किंतु आज भी प्रेमलाखा के बालक-बालिकाओं तक को यह
कथा याद है।
प्रेमलाखा गांव में पहले सिर्फ आठ-दस
घर थे लेकिन अब हर साल नए घर बनने लग गए। बेटे विवाह-शादी के
बाद अलग रहने लगे। खेती-बाड़ी तक्सीम हो गई, पगडंडियों की
संख्या बढ़ती गई और पनघट दूर होता गया। देवी जल-धारा अब सभी
के ले सुविधाजनक नहीं रही। किसी के लिए दूर तो किसी के लिए
नीचे से ऊपर पानी उठा कर लाने की समस्या आन पड़ी तो कई घरों
को जल-धारा जाने के लिए नए रास्तों की आवश्यकता पड़ने लगी।
इसी बीच सीता का विवाह भी हो गया। लड़का सुबह पैदल चलने पर
ढलती सांझ को पहुंच सकने वाले दक्षिण-पूर्व की दो पहाड़ियों
के पार बरबोटे गांव का रहने वाला था, यह बात घले महाजन ने
पहले ही मेरे कान में चुपचाप कह दी थी। सरकारी काम की
व्यस्तता में पड़ कर निमंत्रण मिलने पर और काफी दिन पहले जाने
का निर्णय कर चुकने के बावजूद मैं सीता के विवाह में शामिल
नहीं हो सका था।
पेयजल की समस्या को लेकर ग्राम पंचायत
में बहस चली। कई ग्रामवासियों ने किसी दूसरे स्रोत से पानी
लाने का अनुरोध किया। प्रेमलाखा की इस नई समस्या के विषय में
ग्राम पंचायत ने सरकार के समक्ष मांग-पत्र रखा।
करीब एक साल के बाद काम के सिलसिले
में प्रेमलाखा जाना हुआ। कई दफा गए रास्ते से होकर जा रहा
था। सितंबर का महीना खत्म होने को हो रहा था। मौसम में
शीतोष्ण की बराबर मात्रा थी। हवा में शरद ऋतु जैसी मीटी महक
थी। आसमान खुला नीला होने पर सारा गांव सुंदर दिखाई दे रहा
था। वातावरण में एक प्रकार की मादकता के कारण सभी पुलकित
दिखाई देते थे। नई फसल बोने के लिए तैयार की हुई जमीन की
सोंधी महक हवा में चारों ओर बिखरी पड़ी थी। धान के अलावा बाकी
फसलें उठा ली गई थीं। तारा गांव की तिरछी पगडंडी होते हुए
मैं चढ़ाई के रास्ते पर था। एक किलोमीटर के इस चढ़ाई के
रास्ते को तय कर चुकने के बाद प्रेमलाखा बस्ती शुरू होती है।
जब कभी मैं इस चढ़ाई के रास्ते आता हूं, देवी जल-धारा का
आकर्षण बड़ी मदद करता है।
शरद ऋतु के मनमोदक वातावरण में
प्रफुल्लित होकर चलते देवी जल-धारा पहुंचने का पता ही नहीं
चला। कानों में हमेशा सुनाई देने वाली झरने की आवाज से मेरी
तंद्रा भंग होती है। धारा पर जाकर हमेशा की तरह दोनों
अंजुलियों में पानी भर-भर कर तृप्त होने तक शीतल और मीठा पानी
पीता हूं। पानी पीने के बाद सिर ऊपर उठाते ही उसे देखता हूं।
वह मुझे देखकर धीरे-धीरे मुस्करा रही थी। वह सुंदर थी, शादी
के बाद और ज्यादा सुंदर दिख रही थी। काली घनी केश-राशि की
लंबी मांग में सिंदूर चमक रहा था। एक वेणी लंबे केशों की थी।
इस वक्त वह इसी वेणी का एक छोर हाथ में लिए हिला रही थी। मैं
उसके सामने वाले पेड़ के ठूंठ पर जा कर बैठ जाता हूं।
"सीता, कब आना हुआ?"
"कल शाम को।"
संक्षिप्त
उत्तर देकर वह एक क्षण के लिए मौन रही। फिर बोली, "बाबूजी की
तबीयत खराब होने की खबर पाकर आई हूं।"
"तुम्हारी शादी हुए एक साल तो हो गया
होगा न? निमंत्रण तो मिला था लेकिन काम ज्यादा होने की वजह
से आ नहीं सका।"
और धारा
की ओर देखते मैंने सीता से
पूछा,
"इस धारा को भूल नहीं पायी हो, है न?"
"कैसे भूल सकती हूं इस धारा को? दाजु,
कितना आनंद देती है यह धारा? क्या जादू है इस धारा में?....
मगर देखिए न, कितना झाड़-झंखाड़ उग आया है इसके इर्द-गिर्द?
लालनपालनविहीन
हो गई है यह जल-धारा। अनाथ बना दिया है इसे गांव वालों ने।"
मैंने धारा के इर्द-गिर्द देखा। उसकी
हालत देखकर मैं अवाक् रह गया। कुछ देर पहले पानी पीते ध्यान
नहीं दिया था। चारों ओर झाड़-झंखाड़ उग आने के कारण बांस से
गिरती धारा आधी ही दिखाई देती थी। तितेपाती तथा अन्य उद्भिद
फैलने से जंगल-सा उग आया था वहां। जिस कटे वांस के होकर धारा
नीचे गिर रही थी उस पर काई जम गई थी। कपड़े धोने वाले सपाट
पत्थर पर भी काई जम गई थी। पानी भरते हुए गांव की तरुणियों
जिस जगह पर बैठ कर गप्पें लड़ाती थीं, उसे तो पहचानना भी
मुश्किल हो रहा था। उसे झाड़-झंखाड़ ने ढक लिया था। धारा का
यह रूप मुझे वीभत्स प्रतीत हुआ। सिर्फ बांस की खपच्ची से
गिरता पानी और उसकी आवाज में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था।
"धारा की इस दुर्दशा के लिए मैं आपको
दोषी मानती हूं।"
सीता
ने अचानक कहा। मैंने उसकी ओर आश्चर्यचकित नजरों से देखा। कुछ
ज्यादा ही विस्मित होने की वजह से मैं अपने दोषी होने का
कारण भी नहीं पूछ पाया।
"धारा को देखकर मेरे अंदर बहुत मोह
उमड़ आया है", सीता कहने लगी,"कुछ देर पहले अकेली ही रो चुकी
हूं मैं।"
"आपने क्यों किर्नेभीर (ढलान का नाम)
से लोहे की पाइप से घर-घर पानी पहुंचाया?
अब
धारा पर कोई भी पानी भरने नहीं आता। युगों से इस धारा ने
गांव के प्राण बचाए थे, आज देख लीजिए इसकी हालत!
गांव
के लोग भी कितने निर्दयी हैं। विकास के नाम पर आपको
किर्नेबीर से पीनी नहीं लाना चाहिए था।"
इतना
कह कर जैसे वह थक चुकी हो, पीठ टिका कर बैठ गई। और एक टक देवी
जल-धारा की ओर देखने लग जाती है।
विकास क्या है?
मैंने
खुद अपने आप से पूछा। घर-घर में पानी के नल पहुंच गए। क्या
यही विकास है?
ग्रामवासी
विकास चाहते हैं, हम पानी के नल उनके घर-आंगन में पहुंचा देते
हैं। पैदल चलने में कठिनाई की शिकायत करते हैं, हम रास्ते,
सड़कें बना देते हैं, पुल बना देते हैं। ग्रामवासियों को हमने
बहुत बड़े भ्रम में उलझा कर रख दिया है। कुछ सुख-सुविधाओं को
विकास बता कर उन्हें स्वीकार करने को लगाते हैं। गांव की
आमदनी में बृद्धि लाकर उसकी आर्थिक-सामाजिक अवस्था में यदि
सुधार ला सकते होते तो विकास होने की बात पर हम गर्व कर सकते
थे। वन-जंगलों का संरक्षण विकास है। ऐसी जलधाराओं जैसी सांझी
संपत्ति की हिफाजत करना विकास है। विकास कुछ करने, कर सकने
का संकल्प है। अपने तथा दूसरों के लिए कुछ अच्छा काम करने का
संतोष विकास है।
इस जल-धारा का जीर्णोद्धार कर इसके
पूर्व स्वरूप में लाने का संकल्प मैंने मन ही मन में किया,
इसे पुन:
आकर्षण
का केन्द्र बनाने का संकल्प ताकि सभा को अपनी ओर आकर्षित कर
सके यह। दौलत राई आगे आए, जीतमान आगे आए।
ओह मार्गरिटा...!
"ओह लल्ला...ओह मार्गरिटा!
मैं
भी एक बार बैंकाक गया हूं। कितना सुंदर शहर है!..."
हमारे लिए नियुक्त किए गए संपर्क
अधिकारी सिनोर फ्रांसिस्को कोरदोबा ने मेक्सिको के हिदाल्गो
राज्य की राजधानी पाचुका के ग्रामीण जल वितरण संस्थान के
निदेशक सिनोर जावियर रोमेरो के साथ मेरा परिचय - (सिनोर जी.
एस. लामा, गान्तोक, सिक्किम से आए इंजीनियर) कराते समय सिनोर
रोमेरो के सुरीले कंठ से उपरोक्त शब्द निकले थे।
पैंतालीस-पचास के बीच की उम्र के रोमेरो मझौले कद के, हंसमुख
चेहरे वाले अधिकारी थे। सिर के आगे के बाल लोप हो जाने के
कारण उनका माथा चौड़ा दिखता था। कुर्सी से उठकर मेरी ओर हाथ
मिलाने आते हुए स्वगत बोली में छोटे-छोटे मधुर शब्द निकाल रहे
थे। उनके कहे शब्दों का मैंने अर्थ समझ लिया...'ओह थाइलैंड,
एक सुंदर देश... एंड...ब्यूटीफुल पीपुल...'
वह
कह रहे थे।
उनके साथ अगले सात दिन साथ साथ बिताने
थे अत:
उनके
भ्रम को दूर करना मैंने उचित समझा।
"मिस्टर रोमेरो, मैं सिक्किम से आया
हूं। सिक्किम, इंडिया से... आप से मिलकर खुशी हुई।"
"मुझे भी खुशी है आपसे ऐसे मुलाकात
होने पर"
सचमुच
खुश होते उन्होंने कहा, "वाह...चियांग माई की बात ही मत
कीजिए।"
मैं हार मानकर चुप हो जाता हूं।
कोरदोबा अन्य साथियों से परिचय कराने लग जाते हैं।
वर्ष 1983 के नवंबर महीने के एक धूप
भरे दिन हम चार देशों (भारत 3, नेपाल 1, श्रीलंका 1 और
इंडोनेशिया 2) के सात अभियंता उत्तरी अमेरिका और लातिन
अमेरिका की ग्रामीण जल वितरण एवं ग्रामीण शौचालयों तथा अन्य
ग्रामीण योजनाओं के अध्ययन परिभ्रमण के सिलसिले में मैक्सिको
पहुंचे थे। अन्य विकासशील देशों में ग्रामीण कार्यक्रम किस
प्रकार कार्यान्वयन किए जा रहे हैं और कोई लाभदायक प्राविधिक
तथा अन्य प्रबंधन संचालन पद्धति हो तो उसका अध्ययन-मनन करना
तथा उसे अपने-अपने देशों के ग्रामीण कार्यक्रमों में समावेश
करना उस परिभ्रमण का उद्देश्य था।
गांव-गांव में जाकर वहां निर्माणाधीन
तथा निर्माण हो चुकी योजनाओं का निरीक्षण करने से पहले
मैक्सिको के विषय में और वहां चलाए जा रहे ग्रामीण कार्यक्रमों
की जानकारी संस्थान ने हमें दी। सभाकक्ष में रोमेरो ने उक्त
विषय की विस्तृत जानकारी दी। लातिन अमेरिका में भाषा की बड़ी
भारी समस्या होती है। वहां सर्वत्र स्पेनी भाषा बोली जाती
है। इधर आने से पहले इस समस्या की जानकारी हमें वाशिंगटन में
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक अधिकारी से मिल चुकी थी।
फ्रांसिस्को कोरदोबा सिर्फ संपर्क अधिकारी ही नहीं थे वह
हमारे दुभाषिये भी थे। मगर सिनोर जावियर रोमेरो धाराप्रवाह
अंगरेजी में ही भाषण दे रहे थे।
करीब बीस लाश वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल
और सात करोड़ की जनसंख्या वाले मैक्सिको में इकत्तीस
छोटे-छोटे राज्य हैं।
"...मैक्सिको में पैंसठ प्रतिशत शहरी
क्षेत्र और तेत्तीस प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र है," निदेशक
रोमेरो बता रहे थे,"आपके देशों की तरह यहां हमारी सरकार भी
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्वच्छ पेय दल उपलब्ध
कराने का हर संभव प्रयास कर रही है। आज तक यहां सत्तर
प्रतिशत शहरी और चालीस प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र में पेय जल
की व्यवस्था हो चुकी है। आरोग्यता की दिशा में भी काम सुचारू
रूप से चल रहा है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्र में इस दिशा में
संतोषजनक प्रगति नहीं हो सकी है फिर भी ग्राम-सभाओं से,
संगोष्ठियों से और इलेक्ट्रानिक माध्यमों जैसे दृश्य व
श्रव्य साधनों से ग्रामीणों में चेतना लाने की कोशिश की जा
रही है और यह बताते हुए मुझे खुशी हो रही है कि हमारे प्रयास
लाभदायक साबित होने लगे हैं।"
"मिस्टर रोमेरो", नेपाल के अभियंता
श्री शाह ने पूछा, "ग्रामीण योजनाओं के निर्माण में ग्रामीणों
का योगदान इधर कितना है?"
"ओह डियर मार्गरिटा...", रोमेरो के
कंठ से फिर सुरीली आवाज निकली,"...बहुत बढ़िया सवाल पूछा आपने,
खूब सांदर्भिक।"
कुछ देर रुककर वह फिर कहने
लगे,"ग्रामीण क्षेत्र का विकास ग्रामीणों के सक्रिय योगदान
के बिना कभी सफल नहीं हुआ है और होता भी नहीं है लेकिन दूसरी
ओर देखें तो हमारे ग्रामवासी गरीब हैं। दो वक्त की रोटी का
जुगाड़ कर पाना उनके लिए एक कठिन प्रक्रिया है। ऐसी हालत में
वे आर्थिक योगदान तो दे नहीं सकते हैं मगर ग्राम में ही
निर्माण सामग्री का जुगाड़ कर सकते हैं... यह भी योगदान ही
है। योगदान का मुख्य उद्देश्य ग्रामवासियों को अपने अपने
गांवों के विकास कार्यों में खुद संलग्न होने का गर्व महसूस
कराना है। अब मैं सिनोर के प्रश्न की ओर मुड़ता हूं...
ग्रामवासियों का योगदान सहज प्राप्त नहीं होता। ऐसा हमारे
देश मैक्सिको में ही नहीं, मुझे विश्वास है अन्य विकासशील
देशों में भी ऐसी ही स्थिति होगी। लेकिन ग्रामवासियों का
विश्वास जीतना पड़ता है,उन्हें समझना पड़ता है। कहीं कहीं
ग्रामीणों की ओर से आनाकानी होने के बावजूद इधर हमारे देश
में ग्रामवासियों का सहयोग सराहनीय है।"
कलाई की घड़ी से समय देखते उन्होंने
चिंतित लहजे में कहा,"ओह डियर मार्गरिटा... अब यहां अधिक देर
तक बोलना मेरे लिए उचित नहीं होगा। आपको सिनोर कोरदोबा फील्ड
विजिट के लिए ले जाएंगे। पाचुका के गांवों में ग्रामीण
परियोजनाओं का किस प्रकार कार्यान्वयन हो रहा है, वह सब आप
खुद देख सकेंगे। मेरी ओर से शुभकामनाएं और शुक्रिया।"
हमारा अध्ययन कार्यक्रम तत्काल शुरू
हो गया। हमने अपने मैक्सिको प्रवास में मैक्सिको के तिहुआकान,
पुएब्ला उपत्यका, पाचुका, तोलुका, टैक्सिको आदि इलाकों में
जाकर ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण किया। कतिपय इलाकों में
पेयजल, संपर्क सड़कें, ग्रामीण शौचालय आदि के निर्माणाधीन
काम भी देखे।
भारत की तरह मैक्सिको में भी बढ़ती
आबादी की समस्या है। ग्रामीण जीवन की सुख-सुविधाओं के लिए वहां
भी संघीय सरकार ने कई उचित कदम उटाए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों
के किसी भी विकासमूलक कार्यक्रम के कार्यान्वयन में सरकार और
ग्रामीणों का संयुक्त प्रयास होता है। ज्यादातर योजनाओं के
कार्यान्वयन के लिए वित्तीय संस्थानों से कर्जे लेने की प्रथा
है। निर्धारित समय के अंदर कर्जा वापिस करने का दायित्व
सिर्फ सरकार का ही नहीं ग्रामीणों का भी होता है। तिस पर
निर्माणाधीन परियोजनाओं के रख-रखाव के लिए हर ग्रामवासी हर
महीने निर्धारित राशि देता है। किसी भी परियोजना के
कार्यान्वयन में ग्रामवासियों की सहभागिता अथवा योगदान उस
कार्यक्रम का अनिवार्य अंग माना जाता है मैक्सिको में। वहां
के अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार दस-पंद्रह परिवारों
के लिए पेयजल का एक नलकूप केंद्रीय स्थल में स्थापित कर दिया
जाता है और महीने में चार पेसो प्रति व्यक्ति के हिसाब से (उस
वक्त के विनिमय दर के अनुसार एक पेसो एक रुपये तीस पैसे के
बाराबर) पानी कर ग्रामवासी देतो हैं। सभी परियोजनाओं का
रखरखाव हमें संतोषजनक ही लगा।
ग्रामीण परियोजनाओं के कार्यान्वयन
में एक समय में सिक्किम में भी सरकार और ग्रामवासियों के बीच
मधुर संबंध रहा है। पच्चीस प्रतिशत तक का व्यय ग्रामवासी
उठाते थे मगर अभाग्यवश इस प्रणाली में शनै: शनै:
ह्रास
आना शुरू हो गया। ग्रामीण विकास कार्यक्रम की मूल पद्धति ही
विकृत होती गई। इस अवस्था में किसे दोषी मानें?
यह
कहां तक तर्कसंगत है, इसका मूल्यांकन करना अभी वाकी है।
पाचुका क्षेत्र के सुदूर पश्चिमोत्तर
में अवस्थित छोटे-से तूला गांव की मुझे अक्सर याद आती रहती
है। चिलचिलाती धूप में मैक्सिको के सपाट बीरान मैदानों से
होकर एक सौ तेत्तीस किलोमीटर की जीप की यात्रा तय करने के
बाद हम तूला के छोटे पहाड़ी गांव में पहुंचे थे। वहां एक सात
किलोमीटर लंबी संपर्क सड़क का निर्माण हो रहा था। बांसों की
गोलाकार लंबी टोपियां पहने मर्द और दोनों ओर बाल संवार कर
बीच में मांग निकाली औरतें सड़क निर्माण में व्यस्त थे।
परिचित अधिकारियों के साथ हम अपरिचित विदेशियों को देखकर वे
ग्रामवासी हाथों में अपनी-अपनी टोपियां पकड़े सड़क के किनारे
खड़े थे। औरतें शरमा कर दूसरी ओर मुड़कर बैठी हुई थीं। बरसों
से यहां की शुष्क आबोहवा से जूझते जीविका चलाने की प्रक्रिया
में कठिन परिश्रम की छाप उन ग्रामवासियों के हाथों व पांवों
और चेहरों पर साफ दिखाई देती थी। इस सड़क का निर्माण सरकार
के सत्तर और ग्रामवासियों के तीस प्रतिशत योगदान से होने की
जानकारी हमें अल्बेरो ने दी। निर्माण के पश्चात सड़क का
रख-रखाव ग्रामवासी 'ग्राम कर' उठा कर करेंगे, यह जानकारी भी
हमें उसने दी।
दुपहर के भोजन का समय हो जाता है।
ग्रामवासियों ने अल्बेरो और अन्य अधिकारियों के साथ लंबी बातें
कीं। एक ग्रामवासी, जो उनका मुखिया हो सकता है, के साथ
अल्बेरो हमारा परिचय कराता है।
"यह सिनोर पेपे लोबो हैं, इस गांव के
कम्युनिटी प्रोमोटर।"
हमने
बारी-बारी से लोबो के साथ हाथ मिलाए। "दोपहर के भोजन में आपकी
ओर से हमें निमंत्रण है।"
हम
कुछ देर के लिए दुविधा में पड़ गए। लोबो के साथ अन्य ग्रामीण
स्त्री-पुरुष हमारे उत्तर की प्रतीक्षा में थे। दूसरे किसी
के न बोलने पर मैंने लोबो की ओर देखते 'ठीक है।'
कह
कर सिर हिला दिया।
बच्चों की तरह खुशी व्यक्त करते हुए
लोबो ने कहा, "ग्रासिस् सिनोर, ग्रासिस्।"
अन्य ग्रामीणों ने पता नहीं लोबो से
क्या-क्या कहा। स्विच दबाने की तरह जैसे सभी एक साथ हरकत में
आ जाते हैं, इधर-उधर आने-जाने लगते हैं। हम कुछ पत्थरों पर,
कुछ कंकड़ों के ढेर पर तो कुछ ऊंची जमीन पर बैठ जाते हैं।
कुछ दूर कम्युनिटी किचन था। भुनी हुई हरी मक्की के साथ
बड़े-बड़े मगों में काली काफी परोसी गई हम सभी को। हमारी
मेजमानी करने का अवसर पाने की खुशी में वे ग्रामीण खुद खाना
भूल रहे थे। मैंने ओल्बेरो से उन ग्रामीणों को खाने के लिए
कहा। उसने मेरा आशय लोबो को सुनाया। लोबो ने हाथ के इशारे से
कहा,"आप खाइये, हम तो खा ही लेंगे।"
गरीब हर जगह एक समान होते हैं। सिर्फ
अमीर ही अलग-अगल जगहों पर अलग-अलग होते हैं। एक समान जिंदगी
ही गरीब की पहचान है, अस्तित्व भी। अपने पास जो है उसे बिना
बांटे गरीब खा नहीं सकता। यह उसका अलिखित इतिहास है। सिक्किम
के सुदूर दुर्गम इलाकों के मेहनतकश किसान हों या कैक्टसों की
भरमार वाली अर्ध-मरुस्थली जमीन को सींचकर मक्का, फापर, आलू
आदि उपजाने वाले उद्यमी मैक्सिको के किसान हों, ये लोग जिंदा
हैं तो अपनी सरलता के सहारे। सरलता ही इनके जिंदा रहने की
शक्ति है, जिंदगी की प्रेरणा है और सामुदायिक एकता की पताका।
हम कुछ समय के बाद विदा लेकर वापस चल
पड़ते हैं। वे मैक्सिको के ग्रामवासी एक जगह पर इकठ्टे होकर
हाथ हिलाते हैं।
सिर्फ किसान ही नहीं मैक्सिको के
शहर-बाजार के लोग भी सरल स्वभाव के, हंसमुख और खुले दिलों
वाले लोग हैं। दो-चार दिनों में ही कोरदोबा, कार्लोस, ओल्बेरा,
मैनुअल लोपेज आदि के साथ हमारी अंतरंग मित्रता हो गई थी। हम
'आप'
से
'तुम' की
घनिष्टता तक पहुंच गए थे। शाम को वासस्थान पर बीयर पीते,
गप्पें मारते हम दिन भर की थकान भूल जाते थे।
एक दिन तोलुका के गांवों में भ्रमण के
लिए गए थे। आठ-दस किलोमीटर पैदल और तिस पर दिन भर धूप में
चलने से हम सभी थकावट से निढाल हुए जा रहे थे। शहर से कुछ
दूर बाहर स्थित निरीक्षण भवन में हमारे ठहरने की व्यवस्था थी
उस दिन। नहा-धोकर हम सभी तरोताजा होकर भवन के बरामदे में
बैठकर बीयर पी रहे थे। मुझे पता नहीं कहां से सिनोर जावियर
रोमेरो की याद आ जाती है। उस शाम की यह मेरी पहली भूल थी।
"कोरदोबा", मैंने बिना सोचे-समझे
पूछा,"सिनोर रोमेरो क्यों बार-बार 'डियर मार्गरिटा, ओह,
मार्गरिटा' कहते हैं?
मार्गरिटा
कौन हैं?"
कोरदोबा ने हैरानी से कुछ क्षणों के
लिए मेरी ओर देखा, फिर अचानक वह ठहाके मारकर हंसने लग पड़ा।
हंसते-हंसते स्पेनी भाषा में उसने औरों को पता नहीं क्या कहा।
कोर्लोस, लोपेज और ओल्बेरा भी हंस हंस कर निढाल हो जाते हैं।
हम चारों देश के लोग विस्मय से उन चार भाइयों को हंसते देख
रहे थे। मुझे यकीन हो गया कि उक्त प्रश्न उस शाम की मेरी
दूसरी भूल थी।
बाकी हंस रहे थे लेकिन बड़ी मुश्किल
से अपनी हंसी रोककर कोरदोबा ने उठाए बीयर के मग की ओर देखते
कहा,"मार्गरिटा?...ओह मार्गरिटा! तुम चलोगे?
हम
तुम्हें मार्गरिटा के पास ले चलेंगे।"
अपनी
भाषा में उसने अपने साथियों से कुछ कहा। अबी तक हंस रहे वे
'हां' 'हां'
कहने
लगे।
"अच्छा तो सभी तैयार हो जाओ", कोरदोबा
ने गंभीर लहजे में कहा,"यह बीयर अब छोड़ो, मार्गरिटा के पास
जाना है।"
अपनी गलती का सुधार करने का प्रयत्न
करते हुए मैंने कहा,"नहीं, मैंने तो सिर्फ कौतुहलवश पूछा था।
मेरे प्रश्न से तुम लोगों की भावनाओं पर चोट लगी हो तो मैं
क्षमाप्रार्थी हूं, दुखी हूं।"
बिना रुके स्पेनी में कही लोपेज की
बात का उल्था करते हुए कोरदोबा ने कहा,"एक बार मार्गरिटा का
नाम ले चुकने के बाद उसके पास न जाने का तो सवाल ही नहीं उठता"
और खुद अपनी ओर से जोड़ दिया,"तुम्हारे सवाल से हमारी भावनाओं
पर कोई चोट नही पहुंची लेकिन अब यदि मार्गरिटा के पास नहीं
चले तो अवश्य पहुंचेगी।"
"हगं,हां, भई चलते हैं, एक नया अनुभव
ही तो होगा", इंडोनेशिया के अभियंता ने जाने की इच्छा जाहिर
की। सभी हां हां करते अपने-अपने मगों की बीयर को जल्दी-जल्दी
खत्म करने लगे।
सुर्ख चेहरे वाला और स्थूल ओल्बेरा
बोला इस बार। कोरदोबा ने तत्काल उल्था कर दिया,"तुम लोगों का
परिचय मार्गरिटा से करवा देते हैं। हम सभी कुछ क्षणों के लिए
रुकेंगे, उसके बाद तुम्हें मार्गरिटा के पास छोड़कर वापस आ
जाएंगे।" सभी हंसने लगे। कोरदोबा कह रहा था,"इच्छा हो तो रात
भर मौज-मस्ती के लिए मार्गरिटा के साथ ठहर सकते हो। तुम्हें
लेने अगली सुबह हम लोग आ जाएंगे।"
मैंने विनयपूर्वक ओल्बेरा को संबोधित
करते हुए कहा,देखो, में तो ठहरा शादीशुदा आदमी, पत्नी और
बच्चों का धनी। मुझे माफ कर दो। बल्कि यह राघवन", मैंने हमारे
साथी केरलवासी अभियंता की ओर इशारा करते हुए कहा,"यह जो सकता
है, यह बैचलर भी है।"
मेरे कहे का कोरदोबा अभी तक उल्था भी
न कर पाया था कि एक ओर से राघवन और दूसरी ओर से ओल्बेरा
तीव्र विरोध करने लग जाते हैं।
"मैं फोन से एपाइंटमेंट मिलाता हूं,
तुम लोग फटाफट तैयार हो जाओ।"
कहते
हुए कोरदोबा अंदर की ओर चला गया। सभी जाने के पक्ष में थे।
मैंने सोचा, जाने भर से क्या बिगड़ जाता है, बाकी लोग भी तो
हैं। इन्हीं के साथ वापस आ जाऊंगा। वहां सिर्फ मेरे अकेले
ठहरने का तो सवाल ही नहीं उठता।
उस जगह का नाम मुख्य द्वार के बाहर
दायीं ओर छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा हुआ था - कोकोयोक 22। (अंगरेजी
के हिज्जे थे सी ओ सी ओ वाई ओ सी, और उसके बाद बाइस का अंक)
होटल था या रेस्तुरां, कह नहीं सकता। बड़ा-सा कमरा था,
सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया हुआ। अंदर के कमरे में जाने का एक
दरवाजा बायीं ओर था। दायीं ओर का छोटा-सा दरवाजा शायद किचन
में जाने वाला होगा। हमारे अलावा कमरे में और कोई नहीं था।
कोरदोबा की अगवाई में हम कमरे के बीच सोफों पर बैठ जाते हैं।
सामने चार कोणों वाले टेबल पर शराब की बोतलें, छोटी-छोटी (
एक घूंट भर की) कांच की प्यालियां, एक प्लेट में दो भाग कटे
हुए निंबू तथा दूसरी प्लेट में एक मुट्ठी भर नमक सजा कर रखे
हुए थे। मार्गरिटा यह शराब परोसने वाली होगी, ऐसा मुझे लगा।
हम सभी बैठ जाने के बाद कोरदोबा ने
अपनी उल्लासपूर्ण आवाज में कहा,"कोकोयोक 22 में आप सभी का
स्वागत है।"
उसके 'कोकोयोक'
बोलने
की ध्वनि हमारे यहां कबूतरों की गुटरगूं की तरह लगती थी।
टेबल के बीचों-बीच रखी बोतलों से एक
चपटी बोतल हाथ में लेकर उन छोटी-छोटी प्यालियों में शराब
डालने लगता है कोरदोबा। न तो कह सकता था और बिना कहे रह भी
नहीं सकता था - ऐसी अवस्था थी मेरी। कनखियों से मैं कभी उस
अंदरूनी कमरे के दरवाजे की ओर तो कभी दायीं ओर के छोटे दरवाजे
की ओर देखता। लेकिन वहां से कोई प्रकट नहीं हुआ। कोरदोबा
ग्यारह प्यालियों में शराब भरने ही वाला था कि वह अंदरूनी
दरवाजा खुला हुआ-सा लगा मुझे। लेकिन यह मेरा सिर्फ भ्रम था,
वहां कोई नहीं आया।
सभी अपने-एपने हाथों में शराब की
प्यालियां लिए हुए थे। शराब साफ सफेद रंग की थी। एक प्रकार
की मीठी सुगंध आ रही थी प्यालियों से।
"टु डियर मार्गरिटा..."
कहते
हुए कोरदोबा ने अपनी प्याली ऊपर उठायी। बाकी लोगों ने कोरदोबा
का अनुसरण किया। मेरो साथी भी मार्गरिटा की प्रतीक्षा में
अधीर थे लेकिन कोई बात आगे नहीं बढ़ाना चाहता था।
मैं अपने कौतुहल को और ज्यादा थाम न
सका। पूछा कोरदोबा से,"मार्गरिटा...मार्गरिटा कहां है?"
यह सुनकर चारों मैक्सिकी ठहाके मारकर
हंसने लगे। हम हैरान-परेशान से उनकी ओर आंखें फाड़े देखते रहे।
सवाल पर सवाल पूछकर लगातार गलती करने पर मैंने खुद को
धिक्कारा। कोरदोबा ने जोर से हंसते हुए चपटी बोतल उठाकर उसका
लेबल मेरी ओर घुमा दिया। मैं स्थितप्रज्ञ मुंह फाड़े उसकी ओर
देखता रहा। उस लेबल पर एक सुंदरी का रेखाचित्र अंकित था और
उसके अर्धनग्न वक्षस्थल से टेढ़े-मेढ़े सुंदर अक्षरों में
लिखा था - 'मार्गरिटा।'
मैं ज्ञान-शून्य-सा कभी उस बोतल की ओर
तो कभी हंसते लोटपोट होते उन चार भाइयों की ओर देख रहा था।
बाकी साथी भी अवाक् थे। मेरा मन-मस्तिष्क वास्तविकता को पचाने
के बाद भी खुद को रोक न पाया। अचानक मैं जोर से हंस पड़ता
हूं और अपनी प्याली उठाकर 'सालुद्'
कहता
हूं। बाकी साथी मेरे बाद 'सालुद्'
कह
ही नहीं पाए थे कि मैंने उस छोटी-सी प्याली की मार्गरिटा को
एक ही घूंट में उदरस्थ कर दिया। मेरे पीने की गति अति द्रुत
होने के कारण मेरी जीभ उस तरल पदार्थ के स्वाद को उतनी अच्छी
तरह अनुभव नहीं कर सकी। एक प्रकार का मीठा नशा मेरे मुंह और
नाक में फैल गया। गले से नीचे भोजन नली में एक मादक उत्तेजना
देता वह तरल पदार्थ पेट तक पहुंचने का अनुभव हुआ। इस अनुभव
की प्रशंसा में मैंने जीभ का चटकारा लिया। यह शराब तकरीबन
हमारे सिक्किम की सिरिबदाम बस्ती में पायी जाने वाली पानी
डालते ही सफेद हो जाने वाली सौंफ की शराब की तरह थी। सभी ने
अपनी-अपनी प्यालियां खाली कीं।
शराब का घूंट पीकर कोरदोबा ने
कहा,"मार्गरिटा सेवन की विदा के दूसरे चरण में अब इस प्रकार
करना चाहिए",और उसने एक चुटकी नमक जीभ पर रखकर कटे हुए निंबू
के टुकड़े को निचोड़कर जीभ पर रस टपकाया। आंखें बंद कर और
मुंह बिगाड़ते हुए कोरदोबा ने मुझसे भी जोर से जीभ चटकायी।
उसके साथी भी उसी का अनुसरण कर रहे थे और हम सात भाइयों की
नजरें सिर्फ कोरदोबा पर टिकीं थीं। मैंने जल्दी ही जीभ का
चटकारा ले लिया था। हम सातों ने भी जल्दी-जल्दी नमक और निंबू
का सेवन किया। कुछ क्षणों के बाद उस कमरे में ठहाकों और जीभ
के चटकारों की आवाजें गूंजने लगीं।
हम काफी देर तक पीते रहे। वासस्थान पर
कैसे और किस हालत में पहुंचे, मुझे तो कुछ भी पता नहीं चला।
आंखें खुलते सुबह होने का आभास हुआ। लग रहा था जैसे भारी
हथौड़े से सिर पर कोई प्रहार कर रहा हो। फूट जाने की हद तक
सिर में दर्द हो रहा था। काफी कोशिश करने के बाद मैंने आंखें
खोलीं लेकिन आंखों के आगे मार्गरिटा का वही अर्धनग्न
रेखाचित्र तुरंत नाचने लगा। जल्दी-जल्दी लिहाफ तानकर गठरी बन
सो गया। उस समय मुझे मार्गरिटा नहीं बल्कि आराम के साथ मर
सकने के उपाय की आवश्यकता थी।
मैक्सिको में सप्ताह बीत जाने का पता
ही नहीं चला। विदा होने का दिन आ रहा था। मैक्सिको के बाद
हमारा अध्ययन-भ्रमण कोलंबिया और अन्य लातिन अमेरिकी देशों का
था। कोरदोबा, अल्बेरा, कार्लोस और लोपेज चारों भाई हमें हवाई
अड्डे तक छोड़ने आए थे।
नीले सूट पर गाढ़े लाल रंग की टाई
बांधे जावियर रोमेरो संस्थान के भवन के आगे इधर-उधर टहलकदमी
कर रहे थे। एक नजर में अपनी उम्र से काफी छोटे लगते थे वह।
आंखों के नीचे तनिक कालिमा, माथे पर कुछ रेखाएं और पतले होते
जा रहे केशों की ओर ध्यान न दें तो रोमेरो की छरहरी काया पर
टिका चेहरा एक नन्हे बालक की तरह लगता था।
खुद को मुश्किल से खुश दिखने की कोशिश
करते हम सात भाइयों से वह हाथ मिला रहे थे।
"ओह लल्ला...एडिओस्", उनका स्वर भिन्न
था,"आपका प्रवास लाभदायक और शिक्षाप्रद हुआ होगा, ऐसी मैं
उम्मीद करता हूं। हमें याद रखिएगा।"
मैं सबसे पीछे था। मेरे साथ हाथ मिलाते
उन्होंने मीठी महीन आवाज में कहा,"ओह डियर मार्गरिटा! आप तो
इन दो चार दिनों में काफी मोटा गए हैं।"
और
दार्शनिकों की तरह गंभीर बनते भावुक आवाज में कहा, "बिछड़ने
के लिए ही तो हमारा मिलन हुआ है। एडिओस्...गॉड ब्लेस् यू आल...।"
"ग्रामिस्, सिनोर रोमेरो", मैंने कहा।
मैं सिर्फ इतना ही कह पाया और अपने कंधे पर भारी झोला लाद कर
आगे बढ़ गया।
"एंड द ब यू टी फु ल कंट्री थाइलैंड..."
पीछे से एक महीन आवाज मेरे कानों से टकराई। बिछोड़ की वेदना
से मेरा गला रुंध गया फिर भी यह आवाज सुनकर एक मीठी मुस्कान
मेरे होठों पर तैर गयी।