|
आदि सन्त की वाणी
भाष्यकार - अनन्त श्री सदगुरु
सदाफलदेवजी महाराज
पहिले दाता शिष्य भया, तन मन अरपा शीश।
पीछे दाता गुरु भया, नाम दिया बकशीश।
अर्थ - साहेब का उपदेश है कि प्रथम शिष्य दाता होता है। वह
शिष्य तन, मन, शीश, गुरु - चरणों में अर्पण करता है। पीछे गुरु
दाता हुए, जिन्होंने नाम (सारशब्द) को पुरस्कार में दिया। भाव यह
है, प्रथम शिष्य मन, वच, काया से पुनीत गुरु - चरणों में अपना
सर्वस्व अर्पण कर देता है अर्थात् अपने जीवन की डोरी सदगुरु कर -
कमलों में धरा देता है एवं अपने कुछ नहीं रह जाता व अपना कुछ
अधिकार नहीं रखता कि यह मेरा है, मैं हूँ। वह मन, वच, काया से
शरणागत हो जाता है, आस्तिक्यभाव अनन्यभाव ऊँच पद को प्राप्त हो
जाता है। पीछे सदगुरु अपना भक्त अधिकारी, अनुरागी समझकर उस भक्त को
सारशब्द नि:शब्द का उपदेश करते हैं। फिर
अब उस शिष्य को क्या शेष रह जाता है?
गुरु ने अपनी अमूल्य धन, गुप्त निधि अपने शिष्य को दे देते हैं,
जिसके द्वारा उसका कल्याण कृतकृत्यता होती है। जिस नाम का अर्थात्
जिस तत्व को ऋषि, मुनि, सन्त, महन्त तथा विवेकी विद्वान् सभी खोजते
- फिरते हैं, उस नाम परमतत्व को सदगुरु अपने प्रिय शिष्य को देते
हैं। जैसे समिधा, प्रदीप्त अग्नि - ज्वाला में अपने धधाकर कूदती
है, तब उसको अग्निदेव अपना रूप बना लेते हैं, उसी प्रकार शिष्य को
गुरुदेव अपने समान बना लेते हैं। जब तक शिष्य गुरु से अपने को
पृथक् समझता है, अपने को स्वतन्त्र समझता है, तब तक गुरु - स्वाती
से बहुत दूर है, वह सन्त कदापि न हो सकेगा। शिष्य जब अपने को मिटा
देता है, जब वह गुरु का रूप होता है, अन्यथा नहीं। जैसे
शुद्ध लोहे को पारसमणि कञ्चन बनाती है, मुर्चा - मिट्टी लगा हुआ
सड़ा - गला नहीं। वैसे ही जब शिष्य अपने शुद्ध हृदय से अपने पवित्र
हृदय में अपने गुरुदेव को स्मरण करता है, तब वह पवित्र हंस सदगुरु
का रूप होता है, ऐसे नहीं।
(विहंगम योग सन्देश, जन. - फर. 2012 से साभार)
बालकृष्ण सम
ईश्वर बराल
आधुनिक नेपाली साहित्य के पथिकृत और सुधी समाज के प्रथम श्रेण्य
एवं अग्रगण्य बालकृष्ण सम 21 जुलाई को अपराह्न एक भरापूरा परिवार
छोड़कर दिवंगत हो गए। उस समय वह 79 वर्ष के थे। पाँच वर्ष पूर्व
उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। संज्ञाशून्य ही वह वेलौर ले जाए गए
जहां से कुछ महीने की चिकित्सा से भले चंगे होकर स्वदेश लौटे। उसके
अनन्तर वह बाहर से स्लस्थ दीखने पर भी अन्दर अन्दर टूट चुके थे
जिसकी झाँकी उनके मलिन चेहरे और फीकी मुस्कान में मिल जाती थी।
उनके शरीर का दाहिना भाग पक्षाघातग्रस्त हो गया था। उनकी
सम्रणशक्ति भी क्षीण हो गयी थी। अपने विगत जीवन के एक एक दशक के
वृतान्तों को मेरो कविताको आराधना शीर्षक से वह आठ भागों में
प्रकाशित करना चाहते थे। मन होने पर भी वह मस्तिष्क और शरीर से
लाचार थे। अभी तक उनकी आत्मकथा के केवल दो भाग प्रकाशित हुए हैं।
मृत्यु से 15 दिन पूर्व उन्हें फिर दिल का दौरा पड़ा था। इस बार वह
संज्ञाशून्य होकर ही दिवंगत हो गए। उनके निधन और करीब दो महीने
पूर्व एक और साहित्य महारथी भिक्षु के निधन से नेपाली लेखक समाज
टूअर - सा हो गया है।
काठमाडौ के प्रसिद्ध शासक राणाकुल में 1902 में जन्मे बालकृष्ण सम,
सुविधा, ऐश्वर्य तथा वैभव के बीच ही पले। वह कोई बड़ी शैक्षिक
उपाधि नहीं ले पाये परन्तु उनका स्वाध्याय बहुशाखीय और विस्तृत था।
वह एक साथ चित्रकार, छायाकार, संगीतकर्मी, रंगमंच निर्देशक,
अभिनेता, निबन्धकार, कहानीकार, नाटककार और कवि थे। परन्तु नेपाली
समजा ने उन्हें मूलत: कवि के रूप में ही
ग्रहण किया। वह वस्तुत: क्रान्तदर्शी
थे। उनका ज्ञान विश्वकोषीय था।
अनेक अर्थों में बालकृष्ण नेपाली पुनर्जागरण के अगुवा थे। 1914 -
18 के प्रथम विश्वयुद्ध के अनन्तर नेपाली समाज में उभरते अभिनवीकरण
की प्रक्रिया राणा प्रधानमन्क्षी महाराज चन्द्रशमसेर जंगबहादुर का
स्वेच्छाचारपूर्ण क्रूर प्रशासन (1901 -18), महात्मा गाँधी के
नेतृत्व में उभरता भारत का स्वातन्त्र्य आन्दोलन, अपने देश के
अग्रजों, लेखनाथ पौड्याल, शम्भुनाथ ढिंग्याल और धरणीधर कोइराला की
राष्ट्रवादी काव्य - रचनाएँ, और 1936 - 40 की राणा प्रशासन को
अपदस्थ करने की देशव्यापी राजनैतिक हलचल - ऐसे करिपय घटकों से
बालकृष्ण प्रभावित हुए थे। इन घटकों के प्रभाव से उनके मानस में
परम्परा विद्रोह की चिंगारियाँ दहकने लगीं। यह उनकी परम्परा विपरीत
शैलीयुक्त रचनाओं में अनेकधा परिलक्षित हुआ है। 1929 में सर्वप्रथम
प्रकाशित पुस्तक मुटुको व्यथा (दिल का दर्द) इसका साक्ष्य है।
यह त्रासदी सामाजिक नाटक नेपाली सामाजिक विषयवस्तु की प्रस्तुति से
ही नहीं, शैली से भी एक विद्रोह था। इसके द्वारा बालकृष्ण ने नेपाल
में अबूतपूर्व त्रासदी ही नहीं सर्वप्रथम प्रस्तुति की बल्कि नाटक
में चमत्कारपूर्ण शेक्सपीअरीय नाटकीय मुक्तछन्द के प्रभाव को
संस्कृति के अनुष्टुप छन्द में सँजो कर और इब्सेनीय सरल गद्य को
अपनाकर नेपाली गद्य को अर्थ गौरवमय बना दिया। काठमाडौ में तत्कालीन
उच्चवर्गीय राणा और खानदानी भद्रलोक अपनी ऐयाशी के लिए एक खास
किस्म का दरबारी 'नाचघर'
(रंगमंच) रखते थे जहाँ संस्कृति तथा हिन्दी के पारसी रंगमंच के
नाटकों के भोंडे नेपाली अनुवाद अथवा रूपान्त मंचित होते थे। ये
अनूदित तथा रूपान्तरित नाटक नेपाली जनजीवन से तनिक भी सम्बद्ध नहीं
होते थे। बालकृष्ण ने 'मुटुको व्यथा'
से तत्कालीन दरबारी रंगमंच की नींव इस तरह हिला दी कि शनै:
शनै: वह कमजोर होता गया। इस दिशा
में उनके परवर्ती नाटकों मकुन्द इन्दिरा (सामाजिक कामदी, 1937) और
अंधवेग (समाजिक कामदी, 1939) तथा पौराणिक कथावस्तु के ध्रुव (1929)
और प्रह्लाद (1938) नेपाली नाटक साहित्य के उच्च कीर्तिमान हैं।
पौराणिक तखावस्तु समन्वित होते हुए भी ध्रुव और प्रह्लाद सामाजिक
सन्दर्भ के ही आरसी हुए। वस्तुत:
बालकृष्ण का जो ऊर्जस्थल राष्ट्रवाद मुकुंद इन्दिरा में अभिव्यक्त
हुआ था वह अन्य अनेक परवर्ती नाटकों में स्थायी रहा। इन परवर्ती
नाटकों में उनकी पूर्वकालीन चमत्कारपूर्ण काव्यातम्क शैली का
अत्यधिक ह्रास होने पर भी राष्ट्रवाद की उदघोषमा गम्भीरतर होती गई
- अमरसिंह थापा (1955) इसका साक्ष्य हैं।
बालकृष्ण के अधिकांश नाटक उनके अपने ही निर्देशन में समय समय पर
मंचित हुए हैं। इन नाटकों के मुख्य चरित्र की भूमिका में वह स्वयं
ही अवतरित होते थे।
बालकृष्ण में सौन्दर्य और रंगमंच कला की संवेदना कूट कूट कर भरी
हुई थी। साथ साथ अपनी कृतियों में वह दर्शन तत्वज्ञान और वेदान्त
भी गढ़ते थे। नियमित आकस्मिकता (अव्याखेय रहस्य विज्ञान का प्रबन्ध
गर्न्थ, 1946) और खंडकाव्य आगो र पानी (आग और पानी 1956) से उनके
दार्शिक पक्ष, महानाटक प्रेमपिंड (सामाजिक त्रासदी, 1953) और
सामाजिक महाकाव्य चिसो चूल्हो (ठंडा चूल्हा, 1958) से उनके
उदारवादी सामाजिक सैद्धान्तिक पक्ष परिलक्षित हुए हैं। 1951 में
राणाशाही के ढहने पर वह विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला के समाजवादी
व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी कौलिक उपाधि
'शमशेर जंगबहादुर राणा'
त्यागकरघटाटोपविहीन सरल 'सम"
उपाधि ली थी। परन्तु एक ओर आभिजात्य तथा शासकीय संस्कार से उनका
व्यक्तित्व इस तरह निर्मित हो चुका था और दूसरी ओर अपनी विशिष्ट
चमत्कारपूर्ण शैली से उनका अनन्य सदृश 'मुरारिपन्थ'
इतना दृढ़ बन चुका था कि वह सर्वसाधारण नेपाली जनता की पंक्ति में
बैठे ही नहीं। विगतकाल में राणा शासक कुल के सदस्य होने के नाते वह
राजनैतिक दृष्टि से मनसा वाचा कर्मणा आजीवन सत्तापोषी ही रहे। वह
वस्तुत: बहुरूपी थे। तत्कालीन राजनैतिक
यथास्थितिवाद से समझौता करना उनके लिए वायें हाथ का खेल था। इस
दृष्टि से उनकी उक्ति 'आग को बुझकर/
पानी को तप्त हो कर/ एक दिन उन्हें मेल
मिलाप करना ही होगा/ गिरने वाले को उठकर/उठने
वाले को झुककर/पारस्परिक चुम्बन का आदान
- प्रदान करना ही होगा/'(आगो र पानी)
उनके पूर्वकालीन राजनैतिक विद्रोह का एक महज मुखौटा प्रतीत होता
है। 1951 से उनके बैठकखाने को देखने वालों को
नेपाल की राजनैतिक तस्वीर साफ दीख पड़ती थी। वहाँ तत्कालीन
सत्तासीन व्यक्ति की तस्वीर ही केन्द्रीय आकर्षण के रूप मे रखी
जाती थी।
बालकृष्ण अपनी प्रखर प्रतिभा के कारण आग के समान
थे, जिसका ताप दर्शक को अनुभूत तो होता था परन्तु जिसका सामीप्य
उसे दाहक था। वह आजन्म प्रकृति के दो परस्पर विरोधी तत्वों - सत और
असत्, प्रेम और घृणा, क्रूर और कोमल, यथार्थ और स्वप्न, जागृति और
सुषुप्ति, अन्धकार और प्रकाश, संहार और सृजन, जीवन और मृत्यु - के
ऊहापोह में भटकते रहे। वह आस्तिकवाद को पूर्णत:
त्यागकर निरीश्वरवादी भी नहीं हो सके। यह उनके नाटकों, खण्डकाव्य,
महाकाव्य, निबन्धों और स्फुट काव्यों से ज्ञात होता है। उनके
सम्पूर्ण स्फुट का संचयन मृत्यु से कुछ ही महीने पूर्व प्रकाशित
हुआ था।
सिक्किम के पुस्तकालय
सन् 1920
- 21 से भारत में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में राजनैतिक आन्दोलन
ने जोर पकड़ा था, जिसका असर छिटपुट सिक्किम में भी पड़ना शुरू हो
चुका था लेकिन अति अल्प मात्रा में। सन् 1947 को भारत के स्वतन्त्र
होने के बाद, भारत के स्वतन्त्रका संग्राम की सफलता से सिक्किम में
भी जबरदस्त असर पड़ा तथा राजनैतिक आन्दोलन शुरू हुआ था।
राजनैतिक आन्दोलन के साथ साथ सिक्किम की जनता ने
शिक्षा में भी अभिरुचि बढ़ाकर, जहीं - तहीं प्राथमिक पाठशालाएँ
खुलने लगी थी। खुद अनपढ़ रहने पर मजबूर अपने बच्चों को अपनी
सामर्थ्य के अनुसार शिक्षा देने, उनको ज्ञान चक्षु खोलने और उनका
भविष्य उज्ज्वल बनाने की चाह में सिक्किम की आम जनता ने प्रयास
करने शुरू कर दिए थे। सरकारी सहायता के लिए भी जोरदार मांगें उठने
लगीं। शिक्षा की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ने पर सिक्किम सरकार ने भी
अपने राजस्व से तथा भारत सरकार से प्राप्त आर्थिक सहायता से बच्चों
के लिए स्कूल खोलने के लिए सहायता देना शुरू कर दी। सरकार की ओर से
प्राथमिक और उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता के रूप में
छात्रवृत्तियो की शुऱूआत की गई। प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों की भी
स्थापना की जाने लगी। सरकारी तथा सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से
सरकारी और गैर सरकारी पुस्तकालयों और वाचनालयों की स्थापना भी होने
लगी। इन पुस्तकालयों और वाचनालयों के लिए पुस्तकें और
पत्रपत्रिकाएँ उपलब्ध कराई जाने लगीं।
सिक्किम में इस समय जिन पुस्तकालयों और
वाचनालयों की स्थापना हुई है, उनकी सूची इस प्रकार है -
1) नया बाजार, गंगटोक में -
भारत सरकार का सूचना तथा अध्ययन केन्द्र।
2) गंगटोक में -
सिक्किम सरकार का समाज केन्द्र पुस्तकालय और वाचनालय।
3) गंगटोक में - अपतन
पुस्तकालय।
4) गंगटोक स्थित ठाकुरबाड़ी
में - सार्वजनिक पुस्तकालय।
5) गंगटोक में - सिक्किम साहित्य
सम्पर्क समिति पुस्तकालय और वाचनालय।
तेमी
(दक्षिण सिक्किम में)
7) मनोविज्ञान पुस्कालय।
रंगली
(पूर्व सिक्किम में)
8) जनहित पुस्तकालय।
रम्फू
(पूर्व सिक्किम में)
9) मन्दिर के पास दीर्घ
पुस्तकालय और जीतेन्द्र वाचनालय।
कञ्चनजङ्घा
जून 1970 से
(जनवरी 2011)
रामचन्द्र गिरी:
संक्षिप्त परिचय
नेपाली भाषा और साहित्य की श्रीवृद्धि में लगभग छह दशकों तक सक्रिय
योगदान देने वाले स्व. रामचन्द्र गिरी प्राज्ञ, राजनीतज्ञ, सुललित
कवि, सुदक्ष शिक्षक एवं संस्कृत, हिन्दी, बंगला
औरअंग्रेजी भाषाओं
के जानकार थे।
गाँधीवादी गिरी नि:स्वार्थ, देशप्रेमी,
कर्मठ, निडर, आत्मविश्वासी और त्यागी थे। लेकिन उनके जीवनकाल में
ही समाज उनकी प्रतिभा, अध्ययन एवं महानता को पहचान नहीं सका।
समुद्र में छिपे मोती की तरह वह हमेशा अज्ञात ही रहे।
रामचन्द्र गिरी का जन्म उस समय हुआ था जब सम्पूर्ण भारत राजनीतिक
संघर्ष से गुजर रहा था। देशप्रेमी भारतीय जनता अत्याचारी शोषक
ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एकजुट होकर जूझ रही थी। दिन प्रतिदिन
बढ़ती जनशक्ति को दुर्बल बनाने के लिए सन् 1903 से ही शासकवर्ग
कूटनीति खेलते हुए बंगाल विभाजन करने की योजना बनाता जा रहा था।
बंगाल के सशक्त
जनआन्दोलन को शिथिल बनाने के लिए 13 जुलाई 1905
को उसने बंगाल विभाजन की घोषणा की। इस विभाजन के विरोध में 7 अगस्त
1905 को स्वदेशी आन्दोलन की शुरूआत हुई। मेनचेस्टर क्लोथ और
विवरपूल साल्ट बहिष्कार करते हुए सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने सारे देश
का भ्रमण किया लेकिन यह आन्दोलन बंग भंग को रोक नहीं सका। अन्त में
1 दिसम्बर 1905 को 16 अक्तूबर से बंगाल विभाजन लागू होने का निर्णय
शासक वर्ग ने कर ही दिया।
बंगाल के विभाजन के तनावपूर्ण वातावरण में आसाम के गारो हिल्स के
तुरा सैन्यवास में उच्च मध्यमवर्ग परिवार में 17 अगस्त 1905 को
रामचन्द्र गिरी का जन्म हुआ।
उनके पिता का नाम तीर्थलाल गिरी और माता का नाम देववती गिरी था।
माता - पिता विद्याप्रेमी थे। इसीलिए अपने बच्चों को उच्च शिक्षा
प्रदान करने के लिए रामचन्द्र के साथ उनके बड़े भाई हेमलाल,
जुड़वाँ भाई लक्ष्मण और बड़ी बहन ललिता देवी को लेकर दार्जिलिंग आ
गए।
उस समय तक दार्जिलिंग शहर में शिक्षा की ज्योति फैल चुकी थी। गिरी
के नाना का घर भी दार्जिलिंग के मध्य में चौक बाजार में ही था।
उनके मामा 1905 के आसपास मैट्रिक पास कर चुके थे। इसलिए उनके मामा
दार्जिलिंग के शिक्षित व्यक्तियों में गिने जाते थे। ज्येष्ठ मामा
अगमसिह गिरी (रेंजर), दूसरे मामा दलबहादुर गिरी (स्वतन्त्रता
सेनानी), तीसरे मामा मनबहादुर गिरी (कांग्रेसी नेता) थे। माता
स्वयं एक शिक्षित महिला थीं। उन्होंने कुछ समय के लिए महारानी
बालिका विद्यालय (बंगला माध्यम) दार्जिलिंग में अध्यापन कार्य भी
किया था। बच्चों को सिर्फ विद्या का महत्व ही नहीं बल्कि देश प्रेम
की शिक्षा भी दी जाती थी। माता देववती गीता का अध्ययन करती थीं और
नानी रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनाती थीं। मामा आपस में
तत्कालीन देश की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक अवस्था के बारे में
चर्चा करते थे। आदर्श महापुरुषों की जीवनियाँ सुनाते हुए देशभक्ति
और चरित्र - गठन में बच्चों को शिक्षा दी जाती थी।
ऐसे पारिवारिक परिवेश में पले - बढ़े रामचन्द्र गिरी ने
बाल्यावस्था से ही आदर्श पुरुष, देशभक्त, कर्तव्यनिष्ठ, त्यागी
एवं नि:स्वार्थी
बनने की शिक्षा प्राप्त की। यह प्रभाव उन पर जीवन भर रहा।
गिरी का शिक्षारम्भ दार्जिलिंग की कन्या पाठशाला (बोर्डिंग स्कूल)
से हुआ। स्कूल के तत्कालीन नियम के अनुसार बड़ी बहनें उस स्कूल की
छात्राएं हों तो उनके छोटे भाइयों को वहाँ पढ़ने की अनुमति थी।
इसलिए बड़ी बहन ललिता देवी उस स्कूल की छात्रा थीं और राम और
लक्ष्मण (रामचन्द्र गिरी और लक्ष्मण गिरी) को वहाँ दाखिल करवाया
गया। उनके सहपाठी थे गोरखा दु:ख निवारक
सम्मेलन के कर्मठ व्यक्ति हर्कधोज लामा। उसके बाद टर्नुल स्कूल में
पढ़ते - पढ़ते आन्दोलन में कूद पड़े। उस समय देश की रक्षा करने,
अस्तित्व का रक्षा करने, भविष्य को स्वर्णिम बनाने के लिए
स्वाधीनता आन्दोलन में सहयोग न देकर स्वाभिमानी पुरुष - नारी,
किशोर - किशोरियाँ सुख की सांसें कैसे ले सकते थे?
सम्पूर्ण भारत यहाँ गाँधीजी के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा था, वहीं
दार्जिलिंग जिला दलबहादुर गिरी के नेतृत्व में घुटनों के बल चल रहा
था। ऐसी परिस्थिति में किशोर रामचन्द्र गिरी अध्ययन - क्रम जारी
रखकर कर्तव्य से मुँह नहीं फेर सकता था। संग्रामी मामाओं का
संग्रामी भान्जा रामचन्द्र दलबहादुर गिरी, अगमसिंह गिरी और
मनबहादुर गिरी से कंधे से कंधा मिलाकर असहयोग आन्दोलन के मैदान में
कूद पड़ा।
ठीक उसी समय असहयोग आन्दोलन में सहयोग प्रदान करने के लिए भारत के
विभिन्न प्रान्तों में भ्रमण कर अनुभव प्राप्त करने का अवसर उन्हें
प्राप्त हुआ।
दार्जिलिंग जिले में दलबहादुर गिरी के नेतृत्व में ब्रिटिश
सरकार के विरुद्ध विभिन्न सभाएँ, जुलूस होने लगे। पहाड़ के आन्दोलन
को दबाने के लिए इसके नेता दलबहादुर गिरी को ही जोल में डाल दिया
गया। उनके साथ साथ रामचन्द्र गिरी के छोटे भाई लक्ष्मण गिरी को भी
जेल में डाल दिया गया। दार्जिलिंग जिला कांग्रेस कमेटी का कार्यभार
अगमसिंह गिरी, मनबहादुर गिरी और अन्य संग्रामी भाइयों ने संभाला।
दूसरी बार की जेल यात्रा में दलबदादुर गिरी रोगग्रस्त हो जाते हैं।
जेल की अस्वास्थ्यकर कोठरी, पौष्टिक आहार और औषधि - उपचार के अभाव
में पहाड़ी गाँधी (दलबहादुर गिरी) क्षयरोग के शिकार बन अत्यन्त
दयनीय अवस्था में पहुँच चुके होते हैं। शातिर शासकों ने उन्हें
कालिम्पोंग भेज दिया। वहीं देशभक्त संग्रामी का 1923 में प्राणान्त
हुआ। उस समय रामचन्द्र गिरी कालिम्पोंग आ पहुँचे थे अपने पथ -
प्रदर्शक मंझले मामा, देशभक्त नेता, नि:स्वार्थ,
निर्भीक, महात्मातुल्य सेनानी की अकाल मृत्यु ने उनके हृदय में
ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आग में घी का काम किया। ऐसे अत्याचारी -
आततायी शासन का घोर विरोध करने का दृढ़ संकल्प लेकर वह स्वतन्त्रता
संग्राम में जी - जान से कूद पड़े।
वह सन् 1923 में दार्जिलिंग जिला कांग्रेस कमेटी
के प्रतिनिधि के रूप में मनोनीत होकर दिल्ली अधिवेशन में पहुँचे,
जहाँ बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अनेक कार्यकर्ताओं से उनका
सम्पर्क हुआ। पुरुषोत्तम राय, मदनलाल मिश्र, मदन वर्मा, गंगा
प्रसाद भौमिक आदि कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं के साथ मुलाकातें
और विचारों का आदान - प्रदान हुआ। सन् 1924 में सम्पन्न बेलगाँव के
कांग्रेस अधिवेशन के सभापति थे मोहनदास कर्मचन्द गाँधी। उन्होंने
स्व. दलबहादुर गिरी के भान्जे और कांग्रेस के कार्यकर्ता के रूप
में पहली बार गाँधीजा से मुलाकात की। इस मुलाकात में वह गाँधीजी के
परमभक्त हो गए और उनके नेतृत्व में नि:संकोच
देश के लिए तन, मन, धन न्योछवर करने के लिए अग्रसर हुए। 1925 में
सम्पन्न नागपुर के अधिवेशन में भी शरीक हुए। 1926 के आसपास आसाम
जाकर सामाजिक कार्यकलापों में संलग्न हुए और वहीं से बर्मा पहुँचे
तथा नान्टू में नेपाली जाति और समाज की सेवा में जुट गए। सने 1928
को फिर कलकत्ता वापस आ गए। कलकत्ता अधिवेशन में उपस्थित हुए। इसी
तरह विभिन्न प्रान्तों और देशों का भ्रमण कर उन्होंने अल्पाधिक
ज्ञान - अनुभव बटोरे। कलकत्ता वापस आकर वह राजनीतिक कार्यकलापों के
अलावा विद्याध्ययन की ओर अग्रसर हुए और आई.ए. पास किया।
असहयोग आन्दोलन में सहयोग देने वाले रामचन्द्र
गिरी यद्यपि सुचारू रूप से विद्याध्ययन न कर पाए लेकिन देश - विदेश
भ्रमण, महान नेताओं के संसर्ग में रहकर तर्कशक्ति, भेद नीति,
संगठनशक्ति, वाकपटुता, कार्यकुशलता का अधययन - मनन करते हुए
उन्होंने पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया था। इसके अलावा गाँधीजी की
इच्छा के अनुसार उन्हें अध्ययन और प्रशिक्षण के लिए साबरमति आश्रम,
अहमदाबाद जाना पड़ा। आश्रम में चर्खा कातना, सूत कातना, स्वावलम्बी
बनने का प्रशिक्षण प्राप्त किया। विद्वान काका कालेलकर की सेवा में
रहकर संस्कृत भाषा, साहित्य और हिन्दू धर्म का गहन अध्ययन किया।
काका कालेलकर से ही हिन्दू धर्म की मीमांसा की पुस्तक, गीता
मीमांसा, पंचतन्त्र की कथाओं से उपदेशात्मक तथ्यों के स्पष्टीकरण
में सहयोग प्राप्त किया। आश्रम की तालीम और अध्ययन समाप्त कर
गाँधीजी के आदेशानुसार कलकत्ता आकर फिर आन्दोलन में सक्रिय हो गए।
सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में ब्लैकहोल मानुमेन्ट अपसारण आन्दोलन
में मानुमेन्ट को तोड़ने के लिए हाथों में मार्तोल लेकर चलने वाले
उत्साही युवाओं में अग्रणी थे रामचन्द्र गिरी और उनके जुड़वाँ भाई
लक्ष्मण गिरी। अन्य युवाओं की तरह दोनों भाइयों को भी जेल की हवा
खानी पड़ी। उस समय की याद करते हुए वह कहते हैं - अमृता बाजार
पत्रिका के सम्पादक मोतीलाल घोष ने फोटो सहित उक्त मुख्य समाचार को
छापा था। अपने जीवन का एक चौथायी भाग राजनीतिक संघर्ष में बिताने
के बाद गाँधीजी की आज्ञा के अनुसार वह दार्जिलिंग वापस आ गए।
दार्जिलिंग के नेपाली समाज में शिक्षक जीवन की शुरूआत की। शिक्षण
कार्य के साथ साथ भाषा और साहित्य की सेवा में भी लीन रहे। 1968
में सेवा निवृत्त हुए और 17 नवम्बर 1988 में उनका निधन हुआ।
(प्रस्तुति - सुवास दीपक)
दिसम्बर 2011
डॉ. महाराज कृष्ण जैन स्मृति
सम्मान 2011
नव - लेखकों के प्रेरणा - स्रोत एवं कहानी लेखन महाविद्यालय,
अम्बाला के संस्थापक डॉ. महाराज कृष्ण जैन की स्मृति में
पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी द्वारा आगामी 25 मई 2012 से 27 मई 2012
तक मेघालय की राजधानी शिलांग में आयोजित राष्ट्रीय हिन्दी विकास
सम्मेलन एवं पर्यटन शिविर के अवसर पर सम्मान हेतु हिन्दी लेखकों से
किसी भी विधा में प्रकाशित पुस्तक की एक - एक प्रति, पाँच फुटकर
रचनाओं की फोटो कॉपी, साहित्यिक योगदान का विस्तृत विवरण स्पीड
पोस्ट अथवा रडिस्टर्ड डाक से 31 दिसम्बर 2011 तक इस पते पर
आमन्त्रित है -
सचिव पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी, रेडियो कॉलोनी, पो, रिन्जा,
शिलांग - 79 3006 (मेघालय)।
व्यर्थ का खेल
रजनीश
यह
व्यर्थ का खेल अब बन्द भी कर, मैं थक गया हूँ और मेरे चरण जवाब दे
रहे हैं।
जब विश्व के निर्माण का स्वप्न भी अनिर्मित था
और निबिड़ चिर नीरव अन्धकार के पलकों से ज्योति का एक कण - यात्री
भी परिचित नहीं था, हमने काल की उन जन्म तिथियों में इस व्यर्थ के
खेल की योजना का निर्माण किया था।
अंधेरे की कोरों में तेरी छाया को फिसलते देखा,
मैं तेरे पीछे हो लिया पर न जाने कब तेरे स्पर्श का पागल मोह मेरी
आत्मा में आ समाया मुझे याद नहीं है... और फिर जब से आजतक तेरे
आलिंगन की विशेषता से बोझिल मैं ज्ञात, अज्ञात लोकों में तुझे
खोजता भटकता रहा हूँ।
तारों और नक्षत्रों की परिधि में तेरी छाया को
देख बार - बार लगा कि अब तेरी पकड़ से भागना संभव नहीं है पर जब जब
मैं निकट पहुँचने के अन्यन्त करीब था तू स्वप्न की तरह फसलकर कब और
कैसे नीचे बिखरे असीम तम में विलीन हो गया है, यह आजतक रहस्य है।
पर अब उस रहस्य को समझने की मन में कोई लालसा शेष नहीं है, क्योंकि
सत्य को देख पाने की यह अंधी लालसा ही इस सारी व्यर्थ दौड़ - धूप
का कारण थी, यह मैं समझ गया हूँ।
मेरे चरणों की तरफ देखो। उनसे झरे लहू की सुर्खी
अब बी दूर - दूर तक गीली है। मेरे चिर - अपरिचित मीत, कभी - कभी
मेरा मन डरता है कि कहीं तारों की झिलमिलाहट के निर्माण में तू
अपनी आँखों की ज्योति तो नहीं खो बैठा?
इसके पहले कि मैं मरण की अनन्त निद्रा में विलीन हो जाऊँ, आ!
हम सारे विरोधों और जिद्दों को दूर कर गले मिल लें। मैं थक गया हूँ
और किस क्षण मिट्टी अपने रजकण वापस ले लेगी यह कोई भी नहीं
जानता। (जयहिन्द, 21
सितम्बर, 1952 से साभार)
अक्तूबर 2011
कौम पे लुटाए जा
कदम कदम
बढ़ाए जा
खुशी के गीत गाए जा
यह जिन्दगी है कौम की
तू कौम पे लुटाए जा
तू शेरे हिन्द आगे बढ़
मरने से फिर भी तू न डर
उड़े के दुश्मनों का सर
जोशे वतन बढ़ाए जो
कदम कदम ...
हिम्मत तेरी बढ़ती रहे
खुदा तेरी सुनता रहे
जो सामने तेरे अड़े
तू खाक में मिलाए जो
कदम कदम...
चलो देहली पुकार के
कौमी निशान संबार के
लाल किले पे गाड़ के
लहराए जा लहराए जो
कदम कदम...
(25 अक्तूबर 1943 को एक विशाल
सम्मेलन में जब नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने इंगलैंड और अमेरिकी के
विरुद्ध युद्ध की घोषणा की, उसी अवसर पर इस गीत को प्रथम बार गाया
गया। बाद में यही गीत आजाद हिन्द फौज के मार्चिंग - गीत का ल्वर बन
गया जिसे स्वतन्त्र भारत की जनता भी अभी तक उसी जोश और उल्लास के
साथ गाती है।)
शब्द एवं संगीत - कैप्टन रामसिंह ठकुरी
सितम्बर 2011
जर्मनी में हिन्दी की लोकप्रियता
बढ़ी
यूरोप के
देश जर्मनी की भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रति दिलचस्पी काफी
पुरानी है। 19 वीं सदी में एक ऐसा भी दौर था जब पूरे यूरोप में
संस्कृत को लेकर दिलचस्पी काफी बढ़ी हुई थी। ऐसा इसलिए भी हुआ था,
क्योंकि जर्मन लोग लातिन भाषा सीखने को लेकर उत्सुक रहते थे और
लातिन और संस्कृत वे काफी समानताएं पाते थे। संस्कृत के प्रति
दिलचस्पी की वजह यह भी थी कि विलियम जोंस नामक एक जर्मन विद्वान ने
1800 ई. में कालीदास की 'अभिज्ञान
शाकुन्तल' कृति का जर्मन भाषा में
अनुवाद किया था, किन्तु आज के बदले हुए समय में जर्मनी में संस्कृत
के प्रति रुचि में कमी आई है, किन्तु यह राहत की बात है कि वहां आज
भी हिन्दी के प्रति दिलचस्पी बनी हुई है, लेकिन यह जानना भी
दिलचस्प होगा कि जर्मनी में हिन्दी को लेकर यह दिलचस्पी अब साहित्य
की बजाय बॉलीवुड की फिल्मों और योग के कारण है। इसके अलावा, यह भी
तथ्य है कि जर्मन लोग हिन्दी को अब भी एशियाई आबादी के एक बड़े
तबके से संपर्क साधने का सबसे बेहतर माध्यम मानते हैं। विदित हो कि
जर्मनी के हाइडेलवर्ग, लोअर सेक्सोनी के लाइपंजिंग, बर्लिन के
हंबोलडिट और बॉन विश्वविद्यालय में कई दशकों से हिन्दी और संस्कृत
पढ़ायी जा रही है। इन भाषाओं की पढ़ाई करने वाले सभी विद्यार्थी
जर्मन ही होते हैं।
भारतीय भाषाओं को सहेजेगा कैंब्रिज
विश्वविद्यालय
भारत तथा दुनिया के किसी बी हिस्से में विलुप्ति
की कगार पर खड़ी तथा बोलचाल में इस्तेमाल से दूर हो रही भाषाओं की
लोगों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने
एक विशेष परियोजना शुरू की है। यह डेटाबेस कैंब्रिज विश्वविद्यालय
के अध्ययनकर्ताओं ने वर्ल्ड ओरल लिटरेचर प्रोजेक्ट की वेबसाइट ओरल
लिटरेचर डॉट ओआरजी पर तैयार किया है। इस परियोजना के तहत केरल के
पलक्कड़ जिले के मुदुगर और कुरूम्बर समुदायों के साहित्य और
संस्कृति, संस्कृति को डिजिटल वीडियो, डियो और फोटोग्राफी को शामिल
किया गया है। - अगस्त 2011
भारतीय संस्कृति: एक या अनेक
हुसैनुर्रहमान
भारतीय संस्कृति उतनी ही पुरानी है, जितना कि यह विश्व। लेकिन इसका
स्वरूप बेहतर है। केवल यही नहीं, भारत में यह माना जाता है कि किसी
को किसी खास प्रकार के रूप में नहीं देखा जा सकता। हर व्यक्ति जन्म
से, वातावरण से, संस्कृति से कम से कम तीन व्यक्ति हो सकता है।
इसलिए भारत ने शताब्दियों से अपने लोगों को समृद्ध एवं विभिन्न
जीवन शक्तियों का सम्मान दिया है। ऐसा करते समय उसने राजनीतिक एकता
या धार्मिक अनुरूपता पर सामाजिक एकता को तजरीह दी है। वास्तविकता
यह है कि भारत के कवियों और चिन्तकों, सन्तों और दार्शनिकों ने इस
तथ्य को कभी नहीं भुलाया कि भारत इस ब्रह्माण्ड का एक जीवन्त घटक
है। भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृति का दीर्घीकरण है।
सभ्यता का जन्म
दुनिया के देशों से इस बहुविकास के ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनकी
जड़ें अब भी एक साझा बीज कोष में जमी हुई हैं। हमने देखा है कि
अमरीका को छोड़कर सभ्यता का प्रसार केवल तीन केन्द्रों - भारत, भू
- मध्य क्षेत्र और चीन से हुआ। क्या इन सभ्याता केन्द्रों में कोई
सम्बन्ध है? हाँ, इन सभ्यताओं में
समानता है। एक सभ्यता दूसरे से इस कदर जुड़ी हुई है कि एक के बिना
दूसरी जीवित नहीं रह सकती। इस सन्दर्भ में एक या दो उदाहरण दिए जा
सकते हैं। इटली से जापान तक अगर कोई यात्रा करे तो एक क्षण के लिए
भी उस मिट्टी से जुदा नहीं होगा, जिस पर मनुष्य ने अपनी संस्कृति
का निर्माण किया है और इस सभ्यता के विभिन्न स्वरूपों को जन्म दिया
है। रोम से टोकियो की दूरी काफी लम्बी है लेकिन श्रृँखला की
कड़ियाँ टूटी नहीं हैं क्योंकि फारस की सीमा भारत से लगी है, जो कि
आधी दूरी तक स्याम और अन्नाम में हिन्द- चीन तक चली गई है। इसी
प्रकार रोम यूनान पर निर्भर रहा है और यूनान खुद कम से कम मध्यकाल
के युद्धों के बाद फारस का पड़ोसी रहा है। प्राचीन जातक कथाओं में
हमने पढ़ा है कि व्यवसाय के लिए हमारे व्यापारी बेवीलोन जाया करते
थे जिससे पता चलता है कि भारत और मेसोपोटामिया के बीच सम्बन्ध रहे
हैं और चीन के साथ भारत के सम्बन्ध कम से कम ईसा पूर्व 50 वं
शताब्दी से इस सभ्य विश्व ने एक विशाल परिवार का रूप ले रखा था जो
कभी - कभी अलग - अलग हिस्सों में बंटा लगता था - हालाँकि ये हिस्से
कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं हुए।
इसलिए इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि मुख्य रूप से केवल एक ही
सभ्यता रही है। इसकी उत्पत्ति
कहाँ से हुई, इसकी खोज अभी बाकी है।
लेकिन यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भू - मध्य सागर और चीन के
मध्य कहीं इस सभ्यता का जन्म हुआ होगा और यहीं से इसका अन्य
क्षेत्रों में विस्तार हुआ।
भारतीय प्रकृति
भारतीय मानस मनुष्य और संगठन, संस्कृति और समाज को सर्वोच्च महत्व
देता है। धर्म भारतीयों के लिए एक जीवन्त आस्था है। वे अपनी
इच्छानुसार धार्मिक विशेवासों को अपनाते हैं। यह पूर्णकालिक समर्पण
है, अंशकालिक सामाजिक - राजनीतिक कार्य नहीं। भारतीय मानस
ब्रह्माण्ड को भारतीय परिस्थियों के अनुसार समझाने में सक्षम हैं।
हमने यह महसूस करना शुरू कर दिया है कि विकास और संसाधनों की एक
सीमा है - लेकिन मनुष्य की आत्मा सीमा से परे है। मनुष्य निर्माण
या ध्वँस कर सकता है, आदेश दे सकता है या प्रशंसा कर सकता है।
मनुष्य को क्षुद्रताओं और संप्रेषणों पर काबू पाना होगा। यह
वैचारिक जामा ओढ़े रहता है क्योंकि उसे पता है अन्तिम विश्लेषण यह
है कि विश्व आगे की ओर बढ़ रहा है और इसे कोई रोक नहीं सकता और अगर
ऐसा की करेगा तो मानवता का विकास रुक जाएगा। साथ ही प्रकृति
के आसपास के मूल्यों और सुन्दर हृदयों, पृथ्वी पर सभी जीवों के साथ
हमारे सम्बन्धों, मानवीय गुणों और मानव जाति की पिछली पीढ़ी के
चमत्कारी सृजन को जानने - समझने की उत्सुकता लोगों में बढ़ रही है।
भावी पथ
भारत को ऐसे समय में यह तय करना है कि वह अपने चरम लक्ष्य या नियति
तक किस रास्ते से पहुँचे। कोई भी धर्म या संस्कृति चरम लक्ष्य के
रास्ते को नहीं दिखा सकती। इसलिए भारत जैसे देश में पूर्ण
सांस्कृतिक अनुरूपता उसकी जीवनी शक्ति को निचोड़ लेती है। अगर उसने
सदियों पुरानी संस्कृति और सभ्यता की स्वत:स्फूर्त
विविधताओं को त्याग दिया तो वह कहीं का नहीं रहेगा।
अनेक लोगों और धार्मिक विश्वासों ने भारतीय संस्कृति एवं विरासत को
मजबूत बनाया है। मेलों और त्योहारों ने तथ्यों और विश्वासों को और
पुष्ट किया है। भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्र ने हमें विश्व
नागरिक समाज के रूप में तैयार किया है। समाज कुछ खास मूल्यों,
विचारों और व्यवहारों को अपनाता है। इससे एक - दूसरे से जुड़ने का
अवसर मिलता है। साथ - साथ मिलकर चला एक नया दृष्टिकोण है। इसका
मतलब यह हुआ, हमें साथ - साथ रहकर भी अपनी पहचान कायम रखनी है।
हमें दूसरे लोगों की पहचान का सम्मान करने की जरूरत है।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि किसी व्यक्ति को यह सीखना
चाहिए कि वह अपने आपको किसी दूसरे व्यक्ति में आत्मसात कैसे कर
सकता है। यही वह समझ है जो संस्कृति से उपजे ज्ञान, रवैये और कौशल,
परिवार और समुदाय के बीच सांमंजस्य, परिवार और सामुदायिक श्रम तथा
प्राकृतिक या आध्यात्मिक साधनों से प्राप्त विनम्रता और दयालुता
जैसे सांस्कृतिक - धार्मिक मूल्यों के प्रति आदर के भाव को सबल
बनाता है।
यह उचित ही कहा गया है कि ऐसे किसी भी समाज को सहन नहीं किया जा
सकता जिसमें मनुष्य की आत्मा को महत्व न दिया जाए। मस्तिष्क
सार्वभौम है। केवल मन के मिलने से ही यह काम सम्भव है। भारत को एक
समुदाय के रूप में इतिहास बनाना होगा। मानवता या शान्ति की तरह ही
समुदाय भी एक अवधारणा है। हमें यह समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि
समुदाय का एक मूल्य है। किसी समुदाय को जो मूल्य सौंपे जाते हैं,
वे भावात्मक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक होते हैं जो सहज वाचिक हैं
और इसे पवित्रता का विषय बनाते हैं। इसलिए धर्म केवल विश्वास की
पद्धति नहीं है। यह सांस्कृतिक प्रणाली भी है। हमारे अपने स्वभाव,
विश्व के बारे में विचार और प्रतीक हैं जो धर्मनिरपेक्ष तथा जीवन्त
हैं।
यहाँ महात्मा गाँधी सबसे ज्यादा सार्थक लगते हैं। उनका विचार था कि
विवाद, अव्यवस्था और निरर्थक होड़ मनुष्य की आत्मा को मार देती है।
गाँधीजी का कहना था कि धर्म को चाहिए कि वह हम सभी के कार्यों को
ढक ले। इस सन्दर्भ में धर्म का मतलब समुदायवाद नहीं है। इसका मतलब
ब्रह्माण्ड की नैतिक सरकार में विश्वास करना है। धर्म, हिन्दुवाद,
इस्लामवाद और ईसाईवाद आदि से श्रेष्ठ है। यह उन्हें पीछे नहीं
छोड़ता, बल्कि एक करता है और हर तरह से उसके महत्व को उजागर करता
है। (पीआईबी फीचर) - जुलाई 2011
मनुष्य सर्वाधिक शक्तिशाली प्राणी
है
डॉ. बोढन मेहता 'विहारी'
मेरे देखे, इस धरती पर अनगिनत प्राणियों में केवल मनुष्य ही अपने
को श्रेष्ठ प्राणी कहता है। मनुष्य के सिवा कोई प्राणी अपनी
श्रेष्ठता की घोषणा नहीं करता है। मनुष्य अन्य प्राणियों की नजर
में सर्वाधिक
दुष्ट, चालाक, छली, क्रूर और अविश्वसनीय है।
मनुष्य का पालतू बैल, गाय, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली आदि अपने ही पालक
द्वारा अपनी आँखों के छूने से बिदकते हैं। आँखें मूंद लेते हैं।
लेकिन वही इत्मीनान से, सुसान्त रहकर कौवे को अपनी आँखें, अपने कान
और अपने मुँह क्रमश: कींच, मैल और
दाँतों में फँसे खाद्यांश निकालने के लिए सुपुर्द कर देते हैं।
गाय के बथान से साँप शान्त भाव निकल जाता है। लेकिन वह आदमी से दूर
भागता है। कौवा गाय, भैंस और बकरी की पीठ पर बड़े इत्मीनान से
बैठकर उनके बदन में अपनी चोंच रगड़कर साफ कर सकता है। लेकिन मनुष्य
के बच्चों पर भी इतना भरोसा नहीं करता है। इस प्रकार हम कह सकते
हैं कि पालतू साँप पर भरोसा किया जा सकता है, लेकिन आश्रित और
नियोजित व्यक्ति पर भरोसा करना बुद्धिमानी नहीं, जुआ खेलने जैसा
जोखिम उठाना है।
बुद्धि बेइमानी का सुपर फाइन रूप है, फिनिश गुड्स है और बेइमानी
बुद्धि की प्रारम्भिक प्रक्रिया है। वस्तुत:
समाज में धन और शिक्षा के विकास के साथ - साथ बेइमानी भी बढ़ती है।
बौद्धिक विकास का दूसरा पहलू बिल्कुल काला है - वहाँ छल,
प्रपंच, झूठ, विश्वासघात, ठगी, बेईमानी आदि विषाणु पलते हैं जो
महाविनाश के कारक बनते हैं।
एक बात तो बिल्कुल सत्य है कि शाश्वत सत्ता के अधीन मनुष्य अपनी
बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण सर्वाधिक शक्तिशाली प्राणी है। मानव को
अपने मन के सिवा कोई परतन्त्र नहीं बना सकता है। जब तक उसका मन
राजी होता नहीं होता है, तब तक कोई परतन्त्र नहीं हो सकता है।
मनुष्य को जब जान प्यारी हो जाती है तो वह कमजोर हो जाता है। लेकिन
यदि स्वतन्त्रता प्यारी होती है, तब व्यक्ति हर कुरबानी देने को
तत्पर रहता है।
हाँ, एक बात की घोषणा हम कर सकते हैं कि मनुष्य सर्वाधिक बलशाली
प्राणी है। मनुष्य की शक्ति के समक्ष प्रकृति भी हार मान जाती है।
उसमें गजब की शक्ति होती है। वह प्रतिकूल परिस्थिति को अनुकूल
बनाने में सक्षम होता है। वह अवसर पैदा करता है। अवसर का दोहनकर्ता
है। वह स्वयं को अच्छा और कुछ बनाने में पूर्णत:
सक्षम है। वह अच्छा और बुरा भी स्वयं बनता है। अपनी रजामन्दी के
बगैर कोई अच्छा - बुरा नहीं बन सकता। चाहे जो भी कारण हो, व्यक्ति
अच्छा या बुरा बनता है।
मनुष्य अपना भाग्य विधाता है। लोगों में यह कथन प्रचलित है कि
मनुष्य का भाग्य उसकी हथेली और ललाट पर, माथे पर लिखा होता है। इस
कथन का तात्पर्य यह नहीं कि किसी को हथेली और माथे पर भाग्य की
लकीरें ईश्वर खींचता है। वास्तव में ऐसा तात्पर्य आलसी लोगों ने
गढ़ रखा है। उद्यमशील मनुष्य कथमपि इस तात्पर्य से सहमत नहीं होगा।
माथे पर भाग्य की लकीरों का मतलव है, भाग्य बौद्धिक क्षमता से
खुलता है तथा भाग्य की लकीरें हथेली पर उगी होती हैं, का तात्पर्य
हुआ कि किसी भी कार्य योजना का कार्यान्वयन सही तरीके से होने पर
वांछित लाभ होता है अर्थात् भाग्य फलीभूत होता है।
मनुष्य को प्रकृतप्रदत्त और हाथ का होना उसे सर्वशक्तिमान बना देता
है। इस माइने में मनुष्य का दूसरा प्रतिद्वन्द्वी नहीं है।
चिम्पांजी और बन्दर - भालू अपने अगले दो पंजों को हाथ की भांति यदा
- कदा प्रयोग करते हैं, लेकिन उनसे अधिकतर पैरों की भांति ही कार्य
करते हैं।
इसलिए इस पृथ्वी पर समस्त प्राणियों में मनुष्य प्रकृतिप्रदत्त
मस्तिष्क और हाथ की वजह से सबसे अधिक शक्तिशाली, सबसे अधिक
बुद्धिशाली और सबले अधिक सम्पत्तिशाली है। यह पृथ्वी पर अतुलनीय
प्राणी है। इसका दूसरा पहलू भी है , जिसकी वजह से यह धूर्त और
चालाक, छली और प्रपंची, ठग और बेईमान, झूठा और विश्वासघाती प्राणी
है। दूसरे शब्दों में सृष्टि में मानव से अधिक अविश्वसनीय दूसरा
कोई प्राणी नहीं है। वह सर्वाधिक क्रूर प्राणी है।
पशु प्यार करते हैं। प्यार में धोखा नहीं करते। मनुष्य ही एक ऐसा
प्राणी है जो झूठा प्यार भी करता है। वह सर्वाधिक पूज्य के साथ -
साथ सर्वाधिक घृणा का पात्र भी है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि
मनुष्य अपने विशिष्ट गुण - दोषों की वजह से अनुपम प्राणी है। वह
राजनीति करता है। राजनीतिज्ञों में वही परिपक्व राजनीतिज्ञ कहा
जाता है जो यह जानते हुए राजनीति करता है कि राजनीति भरोसे का खेल
नहीं और ऐसा खेल मनुष्य ही खेल सकता है। लेकिन मनुष्य को इस कथन से
घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो
भगवत्ता को उपलब्ध होता है। भगवान बन जाता है। और, अपना विकल्प
चुनने के लिए स्वतन्त्र है। आप दूसरा विकल्प चुनेंगे और
मृतयोर्माअमृतगमय: के पंथ पर आरूढ़
होंगे। (जून 2011)
सिक्किम में हिन्दी साहित्य लेखन एवं प्रकाशन की स्थिति
अमर बानियाँ लोहोरो
पूर्वोत्तर परिषद् का आठवाँ राज्य सिक्किम साम्प्रदायिक एकता
एवं सांस्कृतिक सौहार्द का एक जीता - जागता उदाहरण है। 7096
वर्गमील में फैले और 5,40,857 की आबादी के इस छोटे से राज्य में 12
भाषाओं को सरकारी मान्यता प्राप्त है। अमन - चैन और भाईचारे की
मिसाल बन चुके इस राज्य के इतिहास में कभी
भाषा या धर्म को लेकर
पारस्परिक तनाव उत्पन्न हुआ हो, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं
मिलता। पारस्पारिक एकता इसका ज्वलन्त उदाहरण है।
सिक्किम में हिन्दी को लेकर किसी भी प्रकार की समस्या नहीं है।
इस प्रदेश के शत - प्रतिशत लोग हिन्दी न केवल समझते हैं, बल्कि
बोलते भी हैं। सिक्किम में हिन्दी साहित्य लेखन और प्रकाशन का
प्रारम्भ पिछली शताब्दी के पाँचवें दशक से होने के कुछ प्रमाण मिले
हैं। इस विषय पर अभी तक कोई शोधकार्य नहीं हुआ है, यद्यपि 1957 में
गंगटोक से 'कंचनजंघा'
नामक एक पाक्षिक नेपाली पत्रिका निकलती थी जिसमें कभी - कभार
हिन्दी रचनाएँ )विशेष रूप से कविताएँ) छपती थीं।
गंगटोक स्थित भारतीय राजनीतिक अधिकारी के कार्यालय में स्थापित
सार्वजनिक पुस्तकालय से 'उषा'
नामक पत्रिका में भी हिन्दी रचनाएँ छपती थीं। स्कूलो व कालेजों की
पत्रिकाओं में भी हिन्दी रचनाएँ छपती थीं। सभी स्कूलों व कॉलेजों
की पत्रिकाओं एवं स्मारिकाओं में 'हिन्दी
खण्ड' होता है जिसमें विद्यार्थियों की
स्वरचित रचनाएँ छपती आ रही हैं।
प्रथम हिन्दी पुस्तक
सिक्किम से प्रकाशित प्रथम हिन्दी पुस्तक है
चन्द्रचूड़ नारायण शर्मा 'चिन्तक'
की 'जय बांग्ला'
(1972 में प्रकाशित)। इसके पश्चात ध्रुव नारायण
सिंह
की 'बीस बढ़ते कदम'। यह एक गीति नाटक है और
इसका प्रकाशन 1976 में शिक्षा विभाग,
सिक्किम सरकार ने किया था।
1992 में सिक्किम के नेपाली महाकवि तुलसीराम शर्मा
'कश्यप' का
हिन्दी खण्डकाव्य 'इन्द्रकील'
तथा कृपाल सिंह द्वारा लिखित और प्रकाशन विभाग सूचना और
प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा 1997 में प्रकाशित
'सिक्किम संस्कृति और जनजीवन'
अब तक की हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की सूची है।
इसके अतिरिक्त अस्सी के दशक से सिक्किम से हिन्दी
साहित्य लेखन एवं हिन्दी पत्रकारिता का प्रारम्भ होता है। सुवास
दीपक की हिन्दी रचनाएँ 1970 के बाद छपनी शुरू हो चुकी थीं। उनकी
पहली हिन्दी रचना 1972 को 'सारिका'
पत्रिका में छपी थी। कहानी लेखन महाविद्यालय, अम्बाला छावनी की
पत्रिका शुभ तारिका (तब केवल 'तारिका')
के 1973 - 74 के एक अंक में उनकी एक लधु कथा 'आवाजों
के बीच' भी छपी थी। 1977 के
'सारिका' के
युवा कथाकार विशेषांक में सुवास दीपक की कहानी
'पड़ोस' प्रकाशित है।
सिक्किम के प्रथम हिन्दी उपन्यासकार, कवि और कहानीकार होने का
श्रेय सुवास दीपक को ही जाता है। उनका 1985 में प्रकाशित
'अरण्य रोदन'
सिक्किम का प्रथम हिन्दी उपन्यास है। इसके अतिरिक्त
'खुला दरवाजा और पेड़'
(1995 में प्रकाशित) कविता संग्रह तथा 2004 में प्रकाशित कहानी
संग्रह 'चक्रव्यूह तथा अन्य कहानियाँ'
सिक्किम से प्रकाशित इन विधाओं की पहली हिन्दी पुस्तके हैं।
राष्ट्र भाषा हिन्दी की स्वर्ण जयन्ती के
अवसर पर विश्व के दस राष्ट्रों के 293 कवियों का अन्तर्राष्ट्रीय
हिन्दी काव्य संकलन (1999), ध्रुव प्रकाशन, अहमदाबाद में सुवास
दीपक की 'एकता और सदभावना का नीर'
कविता सम्मिलित है।
अनुवाद
भारतीय नेपाली साहित्य की अवधारणा को
विस्तार देने वाले लेखकों और अनुवादकों में सुवास दीपक का योगदान
उल्लेखनीय और ऐतिहासिक माना जाता है। 1970 से नेपाली साहित्य को
हिन्दी अनुवाद के माध्यम से सर्वप्रथम प्रस्तुत करने का श्रेय
सुवास दीपक को जाता है। उन्होंने 1974 में 'साहित्य
निर्झर' (चण्डीगढ़ से प्रकाशित के
'भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक'
का न केवल सम्पादन किया, बल्कि इस विशेषांक की एक दो कहानियों को
छोड़कर बाकी कहानियों का हिन्दी अनुवाद भी किया। भारतीय नेपाली
कहानियों का हिन्दी में प्रकाशित यह पहला विशेषांक गिना जाता है।
पटना से प्रकाशित 'प्रस्ताव'
पत्रिका को 1981 के अंक में 'भारतीय
नेपाली कथा खण्ड' में छह भारतीय नेपाली
कहानियों के अनुवाद प्रकाशित हुए। 'भारतीय
नेपाली कहानियाँ' 1996 में सिक्किम के
अग्रणी प्रकाशन समूह निर्माण प्रकाशन से प्रकाशित सुवास दीपक
द्वारा हिन्दी में अनुवादित कहानियों की पुस्तक भारतीय नेपाली
कहानियों की प्रथम पुस्तक गिनी जाती है। इसके अतिरिक्त 1996 में ही
प्रकाशित पवन चामलिङ 'किरण'
की नेपाली कविताओं का हिन्दी अनुवाद 'क्रूसीफाइड
प्रश्न और अन्य कविताएँ' पुस्तक भारतीय
नेपाली कविताओं की हिन्दी अनुवाद के रूप में पहली पुस्तक है।
कमलेश्वर द्वारा सम्पादित 'शिखर कथा कोश'
के प्रथम एव द्वितीय भाग में सुवास दीपक के 35 भारतीय नेपाली
कहानियों के हिन्दी अनुवाद सम्मिलित किए गए हैं। 2001 में नेपाली
उपन्यासकार लैन सिंह बाङदेल का चर्चित उपन्यास
'लंगड़ाको साथी' का
'सहयात्री'
शीर्षक में, पी. अर्जुन के खण्डकाव्य 'क्रमश:'
का 2003 में तथा बिन्ध्या सुब्बा के साहित्य अकादेमी
पुरस्कारप्राप्त उपन्यास 'अथाह'
का 2003 में हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं।
अमर बानियाँ लोहोरो के तीन भाषाओं अर्थात
नेपाली, हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित कविता संग्रह
'जीवन चित्र'
में हिन्दी अनुवाद कार्य सुवास दीपक ने ही किया है।
भारतीय नेपाली लेखकों की कुछ अन्य
पुस्तकें भी हिन्दी में अनुवादित होकर सिक्किम में पिछले वर्षों
में प्रकाशित हुई हैं। जिनमें प्रमुख हैं - खडगराज गिरी द्वारा
हिन्दी में अनूदित वीरभद्र कार्कीढोली की दो पुस्तकें
'तुमने जीवन तो दिया लेकिन...'
(कविता) और 'शब्दों का कोहरा'
कहानी संग्रह।
सुवास दीपक ने हिन्दी से नेपाली में भी
महत्वपूर्ण अनुवाद कार्य किया है। डॉ. गोपीचन्द नारंग की चर्चित
पुस्तक 'संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद एवं
प्राच्य काव्यशास्त्र' का नेपाली अनुवाद
साहित्य अकादेमी द्वारा 2007 में तथा निर्माण प्रकाशन से अटल
विहारी बाजपेयी की 'मेरी इक्यावन
कविताएँ' का 2006 में नेपाली अनुवाद
प्रकाशित हो चुके हैं।
सुवास दीपक की अभी तक नेपाली से हिन्दी
में अनूदित दर्जनों रचनाएँ विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी
हैं जिनमें प्रमुख पत्रिकाएँ हैं - 'समकालीन
भारतीय साहित्य' , 'भाषा'
आदि।
सुवास दीपक द्वारा संचालित सिक्किम की
प्रथम द्विभाषी वेबसाइट
www.rachanakaar.com में
मौलिक एवं अनूदित रचनाओं को स्थान दिया जाता है। इस माध्यम से
नेपाली साहित्य को हिन्दी में और हिन्दी साहित्य को नेपाली में
प्रस्तुत करने के एक सार्थक प्रयास में सुवास दीपक जी - जान से
जुटे हैं।
सिक्किम में हिन्दी पत्रकारिता
1987 से गंगटोक से श्रीमती सन्तोष निराश
'जमाना सदाबहार'
(हिन्दी साप्ताहिक) का नियमित प्रकाशन/
सम्पादन कर रहीं हैं। यह सिक्किम से प्रकाशित इकलौता हिन्दी
साप्ताहिक है जिसमें केवल स्तानीय समाचार ही प्रकाशित होते हैं।
सिक्किम में किसी हिन्दी संस्था के अभाव
के कारण योजनाबद्ध रूप से हिन्दी साहित्य की सृजना नहीं हो पायी
है। ले देकर केवल एक सुवास दीपक ही हैं जो हिन्दी में मौलिक लेखन
के अतिरिक्त अनुवाद के माध्यम से हिन्दी के प्रचार - प्रसार में
निरन्तर योगदान दे रहे हैं। हिन्दी पत्रकारिता में श्रीमती सन्तोष
निराश, नीता निराश एवं शीला दाहाल का योगदान उल्लेखनीय है।
2008 से सिक्किम की राजधानी गंगटोक से
'अनुगामिनी'
नामक हिन्दी दैनिक का प्रकाशन हो रहा है। सिलीगुड़ी से प्रकाशित
राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्रों में स्थानीय अहिन्दी भाषी
संवाददाता हिन्दी में समाचार संलन कर रहे हैं। इन संवाददाताओं में
प्रणय लामिछाने, प्रवीण खालिंग, जोसेफ लेप्चा आदि प्रमुख हैं।
सिक्किम से हिन्दी में लिखने वाले कुछेक
लेखक/कवि हैं - चन्द्रचूड़ नारायण शर्मा
'चिन्तक',
के.एन. शर्मा, श्याम प्रधान, पदम क्षत्री (अनुवाद भी करते हैं),
ऐशा किरण आदि।(
मई 2011)
09832092104
1835 में मैकाले ने स्पष्ट कह दिया था -
"हम
हिन्दुस्तान में ऐसी शिक्षा देना चाहते हैं जिसे
हासिल करने वाले रक्त और
रंग से तो हिन्दुस्तानी हों
, लेकिन रुचि, विचार, नैतिकता
और सूझबूझ से अंग्रेज
बन जाएँ।"
सिक्किम राज्य में राष्ट्रभाषा
हिन्दी की दशा और दिशा
सुवास दीपक
1975 तक एक सिक्किम भारत का
संरक्षित अधिराज्य था। 16 मई 1975 को सिक्किम भारतीय गणराज्य
का 22वाँ राज्य बना। इसका क्षेत्रफल 7096 वर्गमील है और जनसंख्या
5,40,857 है।
सिक्किम का इतिहास केवल 200 वर्ष पुराना है। भारत में विलय होने
के पश्चात् ही इसके योजनाबद्ध विकास का सिलसिला शुरू होता है।
विलय से पूर्व सिक्किम के स्कूलों में हिन्दी को एक विषय के रूप
में पढ़ाया जाता रहा है। 1925 तक सिक्किम में केवल एक सरकारी हाई
स्कूल था, वह भी राजधानी गंगटोक में। इससे पहले ईसाई मिशनरियों के
द्वारा स्थापित स्कूलों में हिन्दी के माध्यम से शिक्षा दी जाती
थी। मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य धर्म प्रचार होने के बावजूद इस
समूचे पर्वतीय क्षेत्र में (उस समय सिक्किम का क्षेत्रफल काफी
विस्तृत था, जिसमें आज का समूचा दार्जिलिंग जिला शामिल था और उसकी
सीमाएँ कूचविहार और पश्चिम में मेची नदी तक फैली हुई थीं) शिक्षा
के प्रचार - प्रसार में इन ईसाई मिशनरियों की भूमिका को नकारा नहीं
जा सकता। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों तक शिक्षा का माध्यम
हिन्दी रहा। सिक्किम और दार्जिलिंग में स्थापित स्कूलों में बाद
में बिहार और उत्तर प्रदेश से हिन्दी शिक्षक नियुक्त किए जाते थे।
चूँकि वे स्थानीय भाषाएँ नहीं जानते थे, इसलिए जनजातीय और नेपाली
भाषी विद्यार्थियों को वर्णमाला सिखाते हृस्व व दीर्घ की मात्रा को
'छोटा इ',
'छोटा उ','बड़ा
उ', श, स ष के उच्चारण को ध्वनि के
स्थान पर 'तालव्य',
'मूर्धन्य'
और 'दन्त्य'
कहकर सिखाते थे जिनका उच्चारण कालान्तर में केवल
'स' (दन्त्य
स) ही रह गया। 'न'
और 'ण' के
उच्चारण के साथ भी ऐसा ही हुआ। केवल 'न'
ही रह गया। इसका प्रभाव अद्यावधि देखा जा सकता है।
सिक्किम की आबादी में पिछले डेढ़ सौ वर्षों में नेपालीभाषियों
की बहुतायत रही है। नेपाली भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में सिक्किम की राजधानी
गंगटोक के इकलौते हाई स्कूल में अंग्रेजी के साथ - साथ हिन्दी भी
एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती रही। 1925 से 1950 तक तीसरी भाषा के
रूप में। पहली अंग्रेजी, दूसरी नेपाली और तीसरी हिन्दी।
1950 में सिक्किम भारत - भारत मैत्री सन्धि हुई जिससे भारत
सरकार ने सिक्किम के योजनाबद्ध विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की
व्यवस्था की। सिक्किम में तब से शिक्षा विकास की सुदृढ़ नींव रखी
गई। दसवीं तक पश्चिम बंगाल बोर्ड के अधीन हिन्दी की पढ़ाई की
व्यवस्था थी परन्तु सी.बी.एस. ई.( सेन्ट्रल बोर्ड आफ सेकेन्डरी
एडुकेशन) प्रणाली लागू होने पर हिन्दी विषय को ऐच्छिक बना दिया गया
जो अध्यावधि कायम है।
सिक्किम के स्कूलों में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा
आदि से आए व्यापारियों, जो स्थायी रूप से सिक्किम में बस गए हैं,
के बच्चे स्कूलों में हिन्दी विषय लेते ही हैं, अभी धीरे - धीरे
जनजातियों और नेपाली भाषी विद्यार्थी भी हिन्दी में उच्च शिक्षा
प्राप्त करने के लिए आगे आ रहे हैं। वर्तमान में सिक्किम के
स्कूलों में 8 - 9 ऐसे अहिन्दी भाषी शिक्षक हैं जिन्होंने हिन्दी
में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है।
हिन्दी के प्रति झुकाव का एक प्रमुख कारण है नागरी लिपि जिससे
यहाँ की शतप्रतिशत जनता (साक्षरता दर 82 प्रतिशत) परिचित है।
बहुसंख्यक नेपाली भाषी लोगों और हिन्दीभाषी लोगों में भाषिक
संस्कृति की समानता के कारण बनारस में संस्कृत पढ़ने के लिए जाने
वाले विद्यार्थी हिन्दी की स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर की
परीक्षाएँ देते आ रहे हैं। इसके पीछे आर्थिक कारण भी हैं क्योंकि
ऐसे विद्यार्थियों के विभिन्न स्कूलों में जीविका के स्थायी अवसर
प्राप्त हो जाते हैं।
1978 में सिक्किम का प्रथम महाविद्यालय स्थापित हुआ था जिसमें
हिन्दी विभाग रखा गया था। उत्तर प्रदेश के लम्बोदर झा महाविद्यालय
के प्रथम हिन्दी व्याख्याता नियुक्त हुए थे परन्तु 1982 - 83 में
विद्यार्थियों की कमी के चलते हिन्दी विभाग को समाप्त कर दिया गया
था।
1981 से स्थापित आकाशवाणी गंगटोक में स्थानीय भाषाओं के साथ -
साथ हिन्दी में कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं।
सिक्किम स्थित केन्द्र सरकार के विभागों एवं उपक्रमों में
हिन्दी अधिकारी नियुक्त हैं।
गंगटोक स्थित शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के माध्यम से
राष्ट्रीय हिन्दी संस्थान आगरा से हिन्दी के विषय विशेषज्ञों के
द्वारा स्थानीय शिक्षकों को हिन्दी शिक्षण के विशेष प्रशिक्षण की
प्रति वर्ष व्यवस्था की जाती है। इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष 30 से
50 शिक्षकों को आगरा में हिन्दी शिक्षण का प्रशिक्षण दिया जाता है।
सिक्किम के सभी 780 स्कूलों में तृतीय कक्षा से आठवीं कक्षा तक
अनिवार्य रूप से हिन्दी विषय लेना पड़ता है। नवीं कक्षा से ऐच्छिक।
सिक्किम में हिन्दी को लेकर किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं है।
शतप्रतिशत लोग हिन्दी समझते हैं, बोलते हैं।
बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक सिक्किम की राजधानी गंगटोक व
कुछ अन्य प्रमुख शहरों में स्थानीय नाटक मण्डलियाँ एवं बिहार और
उत्तर प्रदेश से आई रामलीला पार्टियाँ धार्मिक नाटकों द्वारा लोगों
का मनोरंजन करती थीं। बिहार के सीताशरण दूबे की रामलीला पार्टी ने
1945 से 1980 तक सिक्किम के विभिन्न स्थानों पर रामलीला के माध्यम
से हिन्दी का प्रचार - प्रसार किया।
भारत में विलय के पूर्व सिक्किम में भारत सरकार के राजनीतिक
अधिकारी का कार्यालय था। उसने छठे दशक में एक अध्ययन केन्द्र की
स्थापना की थी जिसमें नेपाली, भुटिया, लेप्चा भाषाओं के साथ - साथ
हिन्दी में कविता पाठ का आयोजन किया जाता था।
गाँधी शताब्दी समारोह (1969) के अवसर पर तत्कालीन सिक्किम सरकार
ने गाँधी दर्शन पर अखिल सिक्किम निबन्ध प्रकियोगिता का आयोजन किया
था जिसमें नेपाली, भुटिया, लेप्चा, लिम्बू भाषाओं के साथ - साथ
हिन्दी में भी निबन्ध आमन्त्रित किए गए थे।
1975 से पूर्व प्रकाशन विभाग, भारत सरकार से सिक्किम के
पुस्तकालयों और स्कूलों के लिए बड़ी संख्या में विभाग के प्रकाशन,
विशेष तौर पर हिन्दी साहित्य तथा भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास
सम्बन्धी पत्र - पत्रिकाएँ व पुस्तकें वितरित की जाती थीं जिसमें
'आजकल'
पत्रिका भी आती थी। (मई 2011)
सन् 1952 को भारत के प्रथम
प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रथम
सिक्किम भ्रमण के अवसर
पर सिक्किम निवासियों की ओर से सर टाशी
नामग्याल हाई स्कूल मैदान
में काशीराज प्रधान द्वारा पठित
अभिनन्दन
- पत्र
भारत सरकार के
प्रधानमन्त्री
माननीय श्री जवाहरलाल नेहरू
की सेवा में सादर एवं
सप्रेम समर्पित
महामान्यवर,
सारे संसार में प्रसिद्ध हिमालय के हिमगिरि शिखरों से शोभित भगवान
शिव की क्रीड़ास्थली कैलाश का प्रवेशद्वार, लामाओं की पवित्र भूमि
तिब्बत से आने जाने का केन्द्रस्थल, वीरों की जन्मभूमि भूटान के
मध्य स्थित सिक्किम में रहने वाले हम लेप्चा, भोटिया, नेपाली,
भारतीय आदि सब मिलजुलकर आपके इस प्रथम शुभागमन के सुअवसर पर आपका
हृदय से स्वागत करते हैं।
हमारे श्रद्धेय नेता,
आज हम सिक्किम के निवासियों के लिए बहुत ही सौभाग्य एवं खुशी का
दिन है कि मुद्दत की इन्तजारी और कई बार की निराशा के बाद आज वह
दिन आ गया जिसकी प्रतीक्षा हम बहुत दिनों से कर रहे थे और आपके
दर्शन हमें घर बैठे मिल गए।
यों तो देश या विदेश जहाँ कहीं भी श्रीमान् का जाना या ठहरना होता
है, वहाँ के निवासी अपने आपको भाग्यशाली व खुशकिस्मत समझते ही हैं,
किन्तु सिक्किम जैसे एक कोने में छिपे हुए जंगल के लिए जहाँ के
यातायात की कठिनाइयों के कारण आने जाने का सवाल बहुत टेढ़ा रहता
है, वहाँ यह दिन इसके इतिहास में सोने
से भी मूल्यवान अक्षरों में
लिखने लायक होगा, जिस सुदिन में लाखों मुसीबतें रहने पर भी भारत
माता के प्यारे लाल ने यहाँ आने का कष्ट उठाकर इस जगह को पवित्र
बनाकर इसको दुनिया के सामने गर्दन ऊँची करने का सौभाग्य व सम्मान
प्रदान किया।
कर्मवीर,
हाल के देशव्यापी चुनावों में कांग्रेस की जो विजय हुई, वह आप ही
के नेतृत्व का फल था और जिसके लिए हम आपको बधाई दिए बगैर नहीं रह
सकते।
आपकी शिक्षा और संस्कृति में जो पूरव और पश्चिम की सभ्यताओं का एक
सुन्दर मेल देखा जाता है वह संसार के किसी भी नागरिक के लिए उत्तम
आदर्श व नमूने का काम कर सकता है। प्रात:
स्मरणीय भगवान बुद्ध व महात्मा गाँधी के मूल मन्त्र सत्य और अहिंसा
के रास्ते से आगे बढ़ते हुए देश का शासन - सूत्र व परराष्ट्र नीति
की बागडोर का संचालन आप जिस तरह कर रहे हैं उससे मामूली से मामूली
आदमी पर भी साफ असर जाहिर होता है कि विशाल भारत का इस नाजुक समय
में ऐसे ही नेता की आवश्यकता थी।
परम पिता परमात्मा आपको देश की अधिक से अधिक
सेवा करने के लिए लम्बी जिन्दगी दें व आपको चिरंजीवी करें।
हमारे देश के रक्षक,
सिक्किम की सांस्कृतिक, आर्थिक, व्यापारिक,
राजनैतिक आदि समस्याएँ चिरकाल से भारत से सम्बन्धित ही नहीं
बल्कि उसी पर अवलम्बित हैं। आय के कमी के कारण से हमारी उन्नति की
किसी भी योजना में हम सफल नहीं हो पाते हैं। हमारी हर मुसीबत में
तथा हर अभिलाषा की पूर्ति में हमें आप ही का मुँह ताकना पड़ता है।
अतएव हम पूरी आशा करते हैं कि आप हमारी आर्थिक, औद्योगिक,
व्यापारिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, यातायात सम्बन्धी समस्याओं का हल
करने में और दुनिया के हर प्रगतिशील देख के तथा हमारे संरक्षक भारत
के नमूने पर शीघ्रातिशीघ्र महाराजा साहब के वैधानिक शासन के अन्दर
जनप्रिय शासन एवं स्वतन्त्र न्यायालय आदि से युक्त प्रजातान्त्रिक
शासन की सुव्यवस्था करने में हर प्रकार की मदद करेंगे।
आदरणीय अधिनायक,
आज आपको अपने बीच देखकर हम लोगों की खुशी का
ठिकाना नहीं है। हमें भाषा या साहित्य का उतना ज्ञान नहीं है कि
अपने मनोगत भावों की आपके सामने उचित शब्दों में पेश कर सकें। आप
जैसे पूज्य व प्यारे अतिथि की हम लोगों को सेवा करने का मौका मिला,
यह हमारे लिए गर्व की बात है। आप जैसे महानुभाव के स्वागत के लिए
इस हिमालय की गोद में जीवन व्यतीत करने वाले हम प्रकृति के बालकों
के पास एक जंगली हृदय के सिवा और कुछ नहीं है, इस लिए हम उसी को
आपकी सेवा में बिछा रहे हैं। इस हिमांचल में खिले फूलों की एक माला
और विनम्र सम्मानसूचक स्थानीय खादा आपको अर्पण करते हुए हम फूले
नहीं समा रहे। इस तुच्छ पर सच्चे हृदय की भेंट को स्वीकार कर हमें
अनुगृहीत करें और आशीष दें।
कृपाभिलाषी,
सिक्किम निवासीगण।
अभिनन्दन पत्र के लिए
प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू का धन्यवाद ज्ञापन
उत्तरी भाग कश्मीर से आसाम तक ढाई हजार वर्ग
मील तक हमारा देश फैला हुआ है। इसके बीच में कितनी अनेकता है, अलग
- अलग देश हैं, राज्य हैं, भाषाएँ हैं और कितनी समानताएँ हैं जो
बड़े - बड़े देशों में होती हैं। अनेकता जब ज्यादा बढ़ गई तो फिर
गिर गए। और अब एकता ज्यादा बढ़ी तो हम आजाद हुए, आगे बड़े। आपस की
लड़ाई - झगड़े से देश गिर गया था। महात्मा गाँधी ने देश की शक्ति
बढ़ाई, अहिंसा और सत्य से मिलजुलकर काम करना सिखाया। हमारे देश में
अनेक जातियाँ हैं, धर्म हैं, हम संगदिल होकर आगे बढ़े और सफल हुए।
दुनिया के सामने यह एक इम्तिहान है। सम्भलकर ठीक रास्ते पर चलने की
शक्ति चाहिए। इस इम्तिहान में हम यात्रा को आगे बढ़ावें। आजकल की
दुनिया बड़ी क्रान्तिकारी है।
संभलकर ठीक रास्ते पर चलने की शक्ति होनी चाहिए। इस इम्तिहान में
हम यात्रा को आगे बढ़ावें। आजकल की दुनिया बड़ी क्रान्तिकारी है।
बड़े - बड़े देश लड़ाई के लिए तैयारी में हैं। अगर लड़ाई आई तो नाश
होगा, हमने कोशिश की है कि हमेशा लड़ाई - झगड़ों से बचा जाये,
शान्ति हो। हम सारी दुनिया को संभाल नहीं सकते हैं, लेकिन हम उन
सिद्धान्तों पर चल सकते हैं। मैं यहाँ आया। सिक्किम हिमालय की गोद
में है। यहाँ बहुत तरक्की हो सकती है, जैसे भारत में हो रही है।
यहाँ के रहने वाले चाहे तरक्की कम करे पर वे अपनी जगह से उखड़ न
जावें, नहीं तो वे न इधर के रहेंगे, न उधर के ही रहेंगे। आपस में
लड़ने से कुछ भी काम नहीं बनेगा। भारत या सिक्किम को अपने ढंग से
आगे बढ़ना है। मैं जानता हूँ, यहाँ तरह तरह की प्राचीन संस्कृतियाँ
हैं। यहाँ लेप्चा, भोटिया और नेपाली हैं, छोटी सी रियासत है। आबादी
शायद डेढ़ लाख से कम है, लेकिन कशमकश खैंचातानी ज्यादा है। वह आगे
या पीछे जावें, तराजु पर तोला जावे रुपया, चार आने, दो आने का
हिसाब ठीक नहीं। लेकिन मैं यह सोचता हूँ कि तराजु पर तौलने के
माइने ये होते हैं कि अलग अलग खेमे बनाना, इससे एकता कैसे होगी,
हमारी राष्ट्रीय कांग्रेस बनी, उसने देश को आगे बढ़ाया।
राष्ट्रीयता के माइने हैं कि देश के सब लोग चाहे वे किसी धर्म के
हों, वे एक राष्ट्र के हैं। आज हम राष्ट्रीयता के टुकड़े करें,
प्रान्त - प्रान्त को अलग - अलग करें, तो वह तो भारत की
राष्ट्रीयता नहीं रहती, वह तो प्रान्तीयता रह जाती है। हिन्दू व
बौद्ध, मुसलमान व सिख सब एक राष्ट्र के भिन्न - भिन् अंग हैं। आप
धर्म व जाति को राजनीति में मिलाना चाहरे हैं तो वह धर्म के लिए
अन्याय है। राष्ट्र के सारे रहने वालों का अधिकार है कि वह जिस
धर्म में चाहें चल सकते हैं। अपने - अपने रिवाजों को अपना सकते
हैं। राजनीति में जब आते हैं तो खाने बनाने से आप
राष्ट्रीयता के नाम पर साम्प्रदायिकता पर आते हैं। हमारे इतिहास को
देखिए, यहाँ बहुत बड़े - बड़े वीर पुरुष हुए तो फिर हमारा देश
क्यों गिरा? छोटी - छोटी बातों
में अनबन हो गई और वे बड़ी हो गईं। दुश्मन ने फायदा उठाया। हम
लोगों में जाति - भेद बढ़ गया। राष्ट्रीयता को हमने गिरा दिया।
प्राचीन समय का इतिहास आप पढ़ें तो आप देखेंगे कि भारत का नाम
दुनिया में किस तरह प्रसिद्ध हुआ, तंग ख्यालों से कुएँ के मेंढक की
तरह रहेंगे। प्राचीन काल से दुनिया के लोग भारत की सभ्यता, कला
लेकर एसिया के देश - देश में गए। सबले बड़ा तोहफा बौद्ध धर्म बहुत
- बहुत दूर तक गया। 23/24 सौ वर्ष पहले
सम्राट अशोक ने संसार में प्रचार के लिए दूत भेजे। प्रेम का, धर्म
का सन्देश लेकर वे गए. उसमें जाति - भेद न था। अगर आप जाति - भेद
के खाने - कोठरियों में कैद हो जाएँगे तो कैसे काम चलेगा?
अब जमाना आया है, हमें देश का काम - काज करना है। अपने - अपने
रिवाज व धर्म राजनीति में लाने से वह दोनों को गिराना है। आप जानते
हैं कि हमने विधान बनाया, उसमें हमने अंग्रेजों के जमाने में जो
जाति - भेद बनाया गया था, उसे गिरा दिया।
उस खराबी को निकाल दिया, इससे देश की शक्ति बढ़ेगी। पुराने तजर्बे
से मैं आपको बताना चाहता हूं, सिक्किम
छोटी और सुन्दर रियासत है,
आप इसे और सुन्दर सुन्दर बना सकते हैं। लेप्चा, भोटिया और नेपाली
सब मिलकर सिक्किम की सेवा करें। इस ढंग से आप इसे सुन्दर बना सकते
हैं। बड़े बाई की हैसियत से मैं यह कहता हूं, मैं बहुत दिनों से
राजनीति में और देश के काम करने से आप से कुछ कहना चाहता हूँ। मैं
चाहता हूं कि जो दिन और हैं, कुछ काम करें। बड़ी मात्रा में देश को
बढ़ाना, दरिद्रता को दूर करना हमारा काम है। एक सिद्धान्त को लेकर
मैं देश को अव्वल बनाना चाहता हूं। मैं भारत का दूसरे देशों से
मुकाबला नहीं करता। देश में धन ज्यादा हो, दुश्मन का हमला न हो।
लेकिन प्रथम देश तब होगा जब सिद्धान्तों का पालन पूरी तरह से होगा।
भारत ने पिछले 20/22 वर्षों में
एक नाम हासिल किया क्योंकि देश में एक महान पुरुष पैदा हुआ। दुर्बल
शरीर, मुट्ठी भर आदमी दुनिया को कैसे हिला सकता है। यह सब एकता से,
मिलकर काम करने से, जो पिछड़े हैं, उन्हें उठाने से हुआ। भारत में
महात्मा जी ने सबसे अधिक जोर दिया कि गिरे हुए लोगों को उठाएँ। हम
कहते हैं कि अंग्रेजों ने हमें दबाया था। लेकिन हमें क्या अधिकार
है कि हम अपने भाइयों को दबाएँ, जो हरिजन कहलाते हैं। महात्मा जी
ने बहुत दिनों तक हरिजन उद्धार किया। सबको बराबर अधिकार दिया। आजकल
की दुनिया में ऊँच - नीच नहीं चल सकते। रजनीति में सब वर्गों
कासमान अधिकार है। हमारा कर्तव्य है कि जो
भाई पीछे हैं, उन्हें
उठावें।
सरकार का कर्तव्य हो जाता है कि हम उस ध्येय के सामने सारी जनता को
बराबर का अधिकार दें। मेरे पास कुछ लोग नौकरी के लिए भी आए हैं।
लेकिन मेरे सामने 35 करोड़ आदमियों की नौकरी का सवाल है। भारत की
सारी प्रजा उठे। 35 करोड़ आदमियों को उठाने से ही लाभ होगा। इससे
ज्यादा धन पैदा होगा। इसके माने सोना चाँदी नहीं। वह कोई साहूकार
धन पैदा करें, नहीं है। वह है व्यापार। चाहे जमीन से हो, कारखानों
से, अमेरिका में कल, मशीन व कारखाने हैं, ङमने उसकी नकल नहीं करनी
है।
लेकिन हमने अच्छी बातें लेनी हैं। देश में
बेकार कोई न हो, जो धन पैदा हो, उसे फैलाना चाहिए। मैंने आपसे कहा
कि सिक्किम बहुत दिनों तक एक बड़ा द्वार, दरवाजा है, तिब्बत की
तर्फ का, यह द्वार है। जो परिवर्तन हुए हैं, उससे सिक्किम की
आवश्यकता बढ़ जाती है आपकी, वह मेरी निगाह में हमारे देश का नक्शा
बदलता है। हिमालय पहाड़ देश की रक्षा करता है। हम होशियार नहीं
होंगे तो पर्वत क्या करेंगे? आजकल की
क्रान्तिकारी दुनिया में हम धोखे में न पड़ें, गफलत में पड़ने से,
आराम करने से देश की रक्षा नहीं हो सकती। स्वराज के माने आगे बढ़ना
है। हमारी मित्रता दुनिया में सबसे है। तिब्बत से हमारा मित्रों का
सम्बन्ध है। चीन महान देश है, वहाँ बड़े बड़े परिवर्तन हुए। एशिया
के बड़े देश चीन और भारत हैं। अगर हमारे बीच मित्रता है तो भलाई
है, नहीं तो बुराई है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारी मित्रता
रहे। लेकिन इसके माने यह नहीं हैं कि हमारी इज्जत न रहे, आजादी न
रहे। भारत में हजारों मील की सरहद है। वह सब भारत भूमि है। वहाँ
कोई कदम दुश्मन नहीं रख सकता। आप भी कामों में झगड़ों में फसे रहते
हैं। अगर जनता का राज चाहते हैं, उसके काबिल होना चाहिए, सरकार
बनाना 4 - 5 आदमियों को कुर्सियों पर बिठाने से पहले उन प्रश्नों
को समझाना है। मैं आपके दिल में असर रखता हूँ, आप और हम मिलकर सहीं
रास्ते पर चलें। दुर्बलता, जातिभेद छोड़ आगे चलें। अभी सात - आठ
दिन में एक बहुत बड़ा त्योहार दुनिया में होगा बैशाख की पूर्णिमा।
जब 2500 वर्ष पहले दुनिया का एक बड़ा आदमी भगवान बुद्ध हमारे देश
में हुआ। हम भी उसी मिट्टी में पैदा हुए लेकिन हम अपना कर्तव्य
कितना पालन करते हैं। बड़े सिद्धान्त उन्हीं ने सिखाए, उन पर हम
कितना चलते हैं। खाली मन्त्रों को गुनगुनाने से क्या लाभ होगा।
महाराजा साहब, महाराजकुमार, बहिनों और भाइयो, स्वागत के लिए
धन्यवाद।
जय हिन्द। (कंचनजङ्घा
से साभार)
नित नए जीवन
ओशो
लेकिन
तुम्हारे जीवन लकीर के फकीर हो जाते हैं। तुम तो बस बैठ जाते हो।
और तुम्हारी इस पकड़ के कारण नया प्रभात जब होता है तो तुम देख ही
नहीं पाते, नया बुद्ध जब आता है तो तुम पहचान ही नहीं पाते। तुम तो
पुराने बुद्ध की प्रतिमा से ऐसे भरे होते हो कि नए बुद्ध की
प्रतिमा तुम्हारी समझ में ही नहीं आती। तुम तो पुराने ही बुद्ध को
बार - बार देखना चाहते हो। तुम ऐसे दकियानूसी हो कि तुम चाहोगे कि
बस बुद्ध उसी तरह जैसै आएँ वही के वही आते रहेंगे।
जरा सोचो तो, यह दुनिया कितनी ऊब से न भर गई
होती, अगर यहाँ बस एक ही तरह के बुद्धपुरुष आते रहते!
बस समझ लो कि बुद्ध ही, गौतम बुदध् बार - बार आते रहते, यह दुनिया
कितनी ऊब से न भर गई होती! यह दुनिया
बड़ी सुन्दर है। कभी कृष्ण आते हैं, तो बुद्ध से कृष्ण का क्या
लेना - देना? कभी कृष्ण को किसी वृक्ष
के नीचे ध्यान करते देखा है? पूरे चांद
की रात, वृक्षों के तले, बाँसुरी बजाते जरूर देखा है। और फिर
महावीर हैं, उनका ढंग और, उनका रंग और। और फिर क्राइस्ट हैं, और
फिर मुहम्मद हैं, फिर मंसूर हैं, मूसा हैं, जरथुस्त्र हैं, लाओत्सु
हैं, च्वांगत्सु हैं, कबीर हैं, नानक हैं, सहरपा हैं। ये अलग - अलग
ढंग, मगर तुम्हारी जिद कि तुम चाहते हो कि बस एक टकसाल में आने
चाहिएँ बुद्ध। तो जरा हेर - फेर हुआ कि बस तुम अड़चन में पड़े।
तुम जरा गौर से तो देखो, दुबारा कभी भी कोई
बुद्धपुरुष दोहराया नहीं गया है। गौतम बुद्ध दो बार नहीं
होते. बस एक बार। न जीसस दो बार होते हैं, बस एक बार। और न ही
महावीर दो बार होते हैं, बस एक बार। इससे तुम्हें कुछ बात समझ में
आती है कि नहीं, कि परमात्मा रोज नए रूप लेता है, रोज नए आविर्भाव
होते हैं?
सागर में लहरें उठती हैं, एक - सी दो लहरें कभी
उठती देखी हैं? सागर रोज - रोज नई - नई
लहरें उठाता है, नए - नए गीत गाता है।
हिमाचल के लोक देवता पहाड़िया
उदय ठाकुर
लोक
जीवन में लोक देवता का एक महत्वपूर्ण स्थान है। जीवन में बहुत सारी
घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो अपने पुरुषार्थ पर अवलम्बित न होकर भाग्य,
प्रारब्ध और देव कृपा पर निर्भर करती हैं। अपने दैनिक जीवन की
समस्यायों के समाधन तथा कार्यों की सफलता में जब व्यक्ति स्वयं को
अक्षम पाता है तो वह दैवी शक्ति का आश्रय लेना चाहता है। इसके लिए
वह किसी देवता की अर्चना - पूजा और अपने कार्य की सफलता के लिए
मनौती आदि भी मानता है। कार्य के सफल होने पर उन देवताओं के प्रति
वह अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है और उसकी आस्था स्वभावत:
सुदृढ़ होने लगती है। वह दूसरों को भी उनकी पूजा - अर्चना के लिए
प्रेरित करता है। इस प्रकार उनका प्रचार - प्रसार होना स्वाभाविक
है। वे स्थान देवता, ग्राम देवता तथा कुल देवता के रूप में
सुप्रतिष्ठित होते हैं। प्राय:
प्रदेशांचलों में प्राचीन परम्परा के अनुसार किसी विशिष्ट देवता की
आराधना - पूजा वहाँ के निवासियों के कुल देवता, ग्राम देवता, स्थान
देवता के रूप में होती चली आती है। हिमाचल की जनता पर
स्थानीय लोक देवताओं का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। वेद, पुराण एवं
शास्त्रों में वर्मित विभिन्न देवी - देवताओं के साथ - साथ लोक
देवताओं की मान्यता भी सुदीर्घकाल से यहां के समाज में प्रचलित है।
हिमाचल प्रदेश के स्थानीय ग्राम देवता, जन देवता और लोक देवता में
पहाड़िया का महत्वपूर्ण स्थान है। कांगड़ा के पहाड़िया और हमीरपुर
के बाबा बालक नाथ यहाँ के जनप्रिय लोक देवता हैं। कहा जाता है कि
हिमाचल प्रदेश में पहाड़िया ग्राम देवता न होकर लोक देवता के रूप
में मान्य हैं। इतना ही नहीं, इनके बारे में ऐसी मान्यता है कि
भगवान शंकर तथा माँ पार्वती के मानसपुत्र के रूप में ही पहाड़िया
लोक देवता पूजित होते हैं।
हिमाचल प्रदेश के निवासियों की
लोक मान्यता है कि लोक देवता पहाड़िया के दो रूप होते हैं - भीरू
और घरू। भीरू यानी जो एकदम स्वछन्द है और वनों में स्थित पीपल
वृक्ष पर निवास करता है। जबकि घरू जैसा कि नाम से ही जाना जाता है,
घरों में कोठों पर रहता है। हिमाचल प्रदेश में देहरा - गोपीपुर,
ज्वालामुखी मार्ग पर चलाली, टिबरी तथा जयसिंहपुर में पहाड़िया लोक
देवता के प्रसिद्ध स्थान हैं, जहाँ दूर - दूर से भक्तजन मनौतियाँ
करने के लिए आते हैं। घरू पहाड़िया लोक देवता का सबसे प्रसिद्ध
स्थान मण्डी नगर के राजमहलों में है। वहाँ पर पहाड़िया लोक देवता
बाबा कोट के नाम से जन - जन में जाने जाते हैं। इस पहाड़िया लोक
देवता के मन्दिर के परिसर में सिंह व वृषभ की मूर्तियों के
अतिरिक्त भैरव, काली तथा चौंसठ योगिनियों की भी प्रतिमाएँ स्थापित
हैं। पहाड़िया लोक देवता की प्रसन्नता के लिए उन्हें नैवेद्य के
रूप में कड़ाह (हलवा) चढ़ाने की विशेष परम्परा है। स्थानीय भाषा
में इसे 'पतली'
कहा जाता है और मुख्यत: शनिवार को यह
प्रसाद चढ़ाया जाता है। सबसे रोचक बात यह है कि जिस घर में
पहाड़िया लोक देवता की स्थापना हुई रहती है, उस घर की लड़कियों की
जब शादी हो जाती है, जब वे ससुराल से आने पर वहीं से लाई सामग्री
से देवता को 'पतली'
चढ़ाती हैं। यह परम्परा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर
तथा विलासपुर में आज भी होती चली आई है।
इस प्रकार हिमाचल प्रदेश में
वैदिक और पौराणिक देवताओं के साथ - साथ ऐसे लोक देवताओं को मान्यता
भी समाज में प्रचलित है। यद्यपि इन लोक देवताओं की पूजा - अर्चना
शास्त्रीय विधि के अभाव में बहुत ही सहज, सरल और सुविधाजनक होने के
कारण स्थानीय ग्रामीण जनता का उनके प्रति झुकाव अधिक होता है। लोक
देवताओं के लोकोत्तर दिव्य स्वरूप से यहाँ की जनता की धार्मिक
भावनाओं को तो संबल मिला ही, साथ ही अनेक कष्टों के निवारण में भी
लोक देवताओं को सहायक माना जाता है। मुंडन, उपनयन, विवाह आदि शुभ
अवसरों में इन लोक देवताओं को विशेष रूप से याद किया जाता है और
पूजा की जाती है।
(मार्च, 2011)
अखिल भारतीय लेखक सम्मान समारोह 2001
एवं
राष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मेलन
शुक्रवार, दिनांक 03 से रविवार, दिनांक 05 जून 2011 तक
सम्मान - पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी सम्मान 2011
(एक), डॉ. महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान 2011 (तीस), 8 जीवनराम
मुंगी देवी गोयनका स्मृति सम्मान 2011 (पाँच), श्री केशरदेव बजाज
सम्मान 2011 (पाँच)
1. परिचय
पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी, शिलांग द्वारा विगत 8
वर्षों में 76 क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों का
आयोजन सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से किया जा चुका
है। तीसरी बार शिलांग में अखिल भारतीय हिंदी लेखक सम्मान समारोह,
पर्यटन शिविर एवं राष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मेलन का आयोजन
प्रतिभागियों के सहयोग से दिनांक 3 - 5 जून 2011 तक किया जा रहा
है।
2. उद्देश्य
क) पूर्वोत्तर भारत के
विभिन्न राज्यों में राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रचार - प्रसार की गति
को तीव्र करना।
ख) इस क्षेत्र की
विभिन्न भाषाओं के साहित्य को राष्ट्रभाषा हिंदी में अनुवाद कर
उसका समुचित प्रसार करना।
ग) पूर्वोत्तर की
संस्कृति और साहित्य का विकास करना।
घ) हिंदी लेखकों को
उनके साहित्यिक योगदान के आधार पर पुरस्कृत करना।
ङ) पर्यटन के माध्यम
से लेखकों को प्रोत्साहित करना।
3. सम्मान
हिंदी विकास सम्मेलन
में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को स्मृति चिह्न अवं प्रशस्ति
पत्र तथा सम्मान के लिए आमंत्रित लेखकों को डॉ. महाराज कृष्ण जैन
स्मृति सम्मान पत्र. स्मृति चिह्न, पारंपरिक शॉल आदि प्रदान किए
जाएंगे। चार विधाओं की तीन - तीन कृतियों के लेखकों को डॉ. महाराज
कृष्ण जैन स्मृति पुरस्कार भी दिए जाएंगे। अकादमी के किसी एक
संरक्षक सदस्य को पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी सम्मान 2010 तथा जिन्हें
डॉ. महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान पूर्व में दिया जा चुका है,
यदि वे दुवारा इस समारोह में शामिल होते हैं तो उन्हें जीवनराम
मुंगी देवी गोयनका स्मृति सम्मान 2010 (पांच प्रतिभागियों को),
श्री केशरदेव बजाज स्मृति सम्मान 2010 (पांच प्रतिभागियों को)
प्रदान किए जाएंगे। किसी
भी लेखक या कवि को सम्मान अथवा पुरस्कार
के रूप में किसी तरह की नकद राशि नहीं दी जा सकेगी। पूर्वोत्तर
हिंदी अकादमी नकद राशि प्रदान करने की स्थिति में नहीं है। कृपया
इसे अन्यथा न लें।
4. बहुभाषी काव्य गोष्ठी
हिंदी विकास सम्मेलन
के दौरान बहुभाषी काव्य गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। इस गोष्ठी में
भारतीय भाषाओं के कवि अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ करेंगे। कविता
पाठ के इच्छुक कवि अपना नाम पहले से ही कवियों की सूची में दर्ज
कराएं। इस सत्र के लिए अपनी कविता की एक प्रति प्रेषित करें।
भविष्य में इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा सकता है।
5. विचार संगोष्ठी (ये आलेख पूर्वोत्तर
वार्ता में प्रकाशित किए जाएँगे)
हिंदी विकास सम्मेलन
के दौरान जो लेखक या प्रतिनिधि यदि अपना शोध पत्र पढ़ना चाहते हैं
तो निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर अपना आलेख तैयार कर
अग्रिम भेज सकते हैं। यदि समारोह में आप नहीं नहीं शामिल होते हैं
तो बी आप आलेख भेजें।
क)
पूर्वोत्तर भारत में हिंदी का विकास - समस्या और समाधान।
ख)
पूर्वोत्तर भारत में हिंदी साहित्य।
ग)
राष्ट्रीय एकता में हिंदी भाषा और नागरी लिपि की भूमिका।
घ)
राष्ट्रभाषा हिंदी के विकास में पर्यटन की भूमिका।
ङ)
पूर्वोत्तर भारत के किसी एक राज्य की हिंदी की दशा और दिशा/राजभाषा
नीति और कार्यान्वयन।
च)
सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग।
छ)
संचार माध्यम और हिंदी/ मेरा प्रिय
लेखक।
6. स्मारिका
हिंदी
विकास सम्मेलन के दौरान पूर्वोत्तर वार्ता नामक स्मारिका का विमोचन
किया जाएगा। इस स्मारिका में पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी द्वारा
आयोजित कार्यक्रमों की रिपोर्ट सहित कुछ रचनाकारों की रचनाएँ तथा
प्रतिभागियों द्वारा भेजे गए आलेख, सुझाव एवं प्रतिक्रिया भी
प्रकाशित की जाएगी।
7. प्रतिभागी
इस समारोह में
देश के विभिन्न राज्यों के मात्र 60 लेखकों सहित पूर्वोत्तर के
साहित्यकार, हिंदी - प्रेमी, हिंदी - सेवी, पत्रकार, शिक्षक, शोध -
छात्र, विद्यार्थी, विभिन्न कलाकार, हिंदी क्षेत्र में कार्यरत
अधिकारी एवं कर्मचारियों को भाग लेने के लिए (मात्र 25
प्रतिनिधियों को) आमन्त्रित किया जाएगा। निर्धारित तिथि के बाद
भेजे गए शुल्क को स्वीकार करने का उत्तरदायित्व अकादमी का नहीं
होगा। अत: आपसे निवेदन है कि आप अंतिम
तिथि से पूर्व अपना
पंजीयन पत्र, सम्मेलन शुल्क, प्रतिभागी - विवरण
आदि प्रेषित कर दें।
8. पर्यटन
हिंदी विकास सम्मेलन
में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को बस द्वारा शिलांग से 56
कि.मी. दूर वर्षा के लिए प्रसिद्ध चेरापूँजी, मौसमाई की गुपा,
एलेफैंटा
जलप्रपात, नोहकालिकाई (जल प्रपात), थांगख्ररांक पार्क आदि
विभिन्न दर्शनीय स्थानों का भ्रमण कराया जाएगा।
9. देश के विभिन्न राज्यों के कुछ प्रमुख
विद्वान भाग लेंगे
डॉ. देवेनचन्द्र दास
(असम), डॉ. जमुना बीनी (अरुमाचल प्रदेश), आचार्य डॉ. रादागोविन्द
थोंङाम (मणिपुर), डॉ. सुशील कुमार शर्मा (मिजोरम), डॉ. प्रमोद
कोवप्रत (केरल), डॉ. सुमन अग्रवाल (उत्तर प्रदेश), डॉ. सृजना राणा
(उत्तराखण्ड), श्रीमती कांति अय्यर (गुजरात), डॉ. अनुसूया अग्रवाल
(छत्तीसगढ़), सुश्री भावना वर्मा (झारखण्ड), डॉ. रवि शर्मा मधुप
(दिल्ली), श्री योगेशचन्द्र बहुगुणा,
संपादक लोकगंगा (उत्तरांचल),
डॉ. प्रेमचन्द पाण्डेय (बिहार), डॉ. पाण्डुरंग अमृतराव पराते,
श्रीमती तारा सिंह (महाराष्ट्र), श्री कृष्ण कुमार यादव
(पोर्टब्लेयर),
संतोष (मेघालय), श्री गोवर्धन यादव, डॉ. जगदीश
चन्द्र चौरे (मध्य प्रदेश), डॉ. अमर सिंह बधान (चण्डीगढ़), डॉ.
भैरुलाल गर्ग, संपादक बालवाटिका (राजस्थान), सुश्री उर्मि कृष्ण,
निदेशक, कहानी लेखन महाविद्यालय, डॉ. मुक्ता, निदेशक, हरियाणा
साहित्य अकादमी (हरियाणा)।
इसके अतिरिक्त अन्य 73 विद्वान
भी शामिल होने के
लिए अपना पंजीयन करा चुके हैं और पूरी संभावना है कि वे भी इस
समारोह में शामिल होकर पूर्वोत्तर भारत में हिंदी के विकास में
अपना योगदान देंगे।
10. पुस्तक एवं पत्रिका प्रदर्शनी
सम्मेलन के दौरान पुस्तक अवं पत्र - पत्रिका प्रदर्शनी के आयोजन का
भी प्रस्ताव है। इस प्रदर्शनी हेतु आप अपनी पुस्तकें और पत्रिकाएँ
ला सकते हैं।
11. पंजीकरणCशुल्क
हिंदी विकास सम्मेलन में
भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को
पंजीकरण शुल्क के रूप में 100.00 रुपए जमा करने होंगे। यदि आप
पंजीकरण शुल्क जमा कर चुके हैं तो सिर्फ आप को सम्मेलन शुल्क जमा
करना होगा। पंजीकरण शुल्क जमा होने की स्थिति में सम्मेलन शुल्क
भेजते समय अपनी पंजीयन शंख्या अवश्य लिखें। साथ आने वाले बालक,
मित्र या सम्बन्धी को पंजीकरण शुल्क नहीं देना होगा। उनकी भागीदारी
के लिए उनका सम्मेलन शुल्क एक साथ संलग्न करें।
12. सम्मेलन
शुल्क
सम्मेलन
शुल्क (जिसमें तीन दिनों तक के लिए आवास, भोजन, चाय - नाश्ता अवं
भ्रमण आदि का व्यय शामिल है) प्रत्येक प्रतिभागी को 1500.00 रुपए
(एक हजार पाँच सौ रुपए) अग्रिम भेजने होंगे। शिलांग से बाहर के
प्रतिभागी यह राशि पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी (PURVOTTAR
HINDI ACADEMY) के नाम में क्रॉस्ड डिमान्ड ड्राफ्ट द्वारा
दिनांक 31 मार्च तक भेजें। यदि आपके साथ आपके परिवार का कोई सदस्य,
मित्र अथवा सम्बन्धी इस समारोह में शामिल होना चाहते हैं तो उनके
लिए भी समारोह शुल्क 1500.00 (एक हजार पाँच सौ रुपये) प्रति
व्यक्ति ड्राफ्ट या चेक (चेक भेजने पर 50 रुपये अतिरिक्त जोड़ें)
द्वारा एक साथ ही आपको भेजने होंगे। आपके साथ आए प्रतिभागियों को
प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया जाएगा। 12 वर्ष
तक की आयु के प्रतिभागियों के लिए समारोह सुल्क 900.00 (नौ सौ)
रुपये निर्धारित हैं। यदि आपका कोई मित्र या सम्बन्धी सम्मान के
लिए आवेदन करना चाहते हैं तो 31 मार्च तक सशुल्क अपनी प्रविष्टि
भेज सकते हैं। कोई भी शुल्क यदि मनीआर्डर से भेजते हैं तो कूपन पर
अपनी पंजीयन संख्या, नाम और पूरा पता अवश्य लिखें। फोन द्वारा
जानकारी प्राप्त कर लें कि आपका मनीआर्डर मिला या नहीं। ड्राफ्ट
किसी व्यक्ति के नाम से न भिजवाएँ और न ही किसी कूरियर से भेजें।
ड्राफ्ट/चेक/पत्र
विवरण स्पीड पोस्ट या रजिस्ट्री पोस्ट से ही भेजें।
पंजीकरण अथवा समारोह शुल्क,
पुरस्कार के लिए प्राप्त पुस्तकें अथवा प्रकाशित रचनाओं की फोटो
कॉपी किसी भी दशा में लौटाई नहीं जाएँगी और न इस सन्दर्भ में किसी
तरह का पत्राचार किया जाएगा। इस समारोह में शामिल होने पर ही आपको
सम्मानित किया जाएगा। इस समारोह में शामिल होने पर ही आपको
सम्मानित किया जा सकेगा। आपका समारोह शुल्क प्राप्त होने के पश्चात
कार्यक्रम का पूरा विवरण, स्थान, शिलांग पहुँचने के लिए मार्ग आदि
की पूरी जानकारी स्पीड पोस्ट से प्रेषित की जाएगी। यदि आप इस
राष्ट्रीय महत्व के सम्मेलन में शामिल होने का मन बना चुके हैं तो
31 मार्च से पूर्व अपना सम्मेलन शुल्क अवश्य भिजवा दीजिए ताकि समय
पर आप आमंत्रण पत्र प्राप्त कर अपनी यात्रा के लिए आरक्षण करा
सकें।
अग्रिम सम्मेलन शुल्क भेजने
वाले प्रतिभागियों को ही आमंत्रण पत्र भेजा जाएगा। सम्मेलन शुल्क
के अभाव में आपका स्थान सुरक्षित नहीं कर पाएँगे। सम्मेलन के दौरान
किसी प्रकार के शुल्क की प्राप्ति अथवा वापसी नहीं की जाएगी।
13. सहयोग एवं समर्थन
यह सम्मेलन प्रतिभागियों और स्वैच्छिक संस्थाओं के आर्थिक सहयोग से
आयोजित किया जाता है। इस सम्मेलन को सफल बनाने के लिए आप के पूर्ण
सहयोग एवं समर्थन की हम आशा रखते हैं। यदि आप अकादमी को स्वेच्छा
से आर्थिक सहयोग देना चाहते हैं तो सहयोग राशि ड्राफ्ट या मल्टी
सिटी चेक द्वारा भेज सकते हैं अथवा बैंक में जमा कर सकते हैं। खाता
संख्या सचिव को फोन करके प्राप्त कर सकते हैं। आर्थिक सहयोगियों को
अकादमी का संरक्षक सदस्य बनाने और उन्हें पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी
सम्मान से सम्मानित करने के लिए विचार किया जा सकता है।
14. अंतिम निर्णय
संयोजक की सुविधा के लिए कार्यक्रम में परिवर्तन किया जा सकता है,
जिसकी सूचना प्रतिभागियों को समयानुसार दी जाएगी। कार्यक्रम अथवा
सम्मान संबंधी आयोजन समिति का निर्णय अंतिम एवं सर्वमान्य होगा। इस
संबंध में यह अकादमी किसी तरह का विवाद बिल्कुल नहीं चाहती है। कोई
शिकायत अथवा सुझाव होने पर आप लिखित रूप में दे सकते हैं।
16. सहयात्री
आप ऐसे सहयात्री या सहभागी
को साथ न लाएँ या पंजीकरम न कराएँ, जो दमा, उच्च रक्तचाप अथवा
हृदयरोगी हैं। समारोह के दौरान मद्यपान, धूम्रपान एवं मांसाहार
निषेध हैं।
पत्र - व्यवहार के लिए पता -
सचिव,
पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी,
रेडियो कॉलोनी, पो. रिन्जा,
शिलांग - 793006 (मेघालय)
Purvottar
Hindi Academy
P.O. Rynjah,
Shillong - 793006 (Meghalaya)
मोबाइल - 09436117260,
09774286215, 09862201449
इ - मेल
hindiacademy1@gmail.com
http://
purvottarhindiacademy.blogspot.com
परिपत्र - 03 - 02/सम्मान
- 10/ दिनांक 10 जनवरी 2011
चामत्कारिक घटना
विश्वनाथ मुखर्जी
यह घटना
1810 की है जब तैलंग स्वामीजी मंगलदास के अनुरोध पर पंचगंगा घाट पर
आए। दशाश्वमेध घाट के बाद पंचगंगा घाट का काशी में विशेष महत्व था।
धार्मिक लोगों के अलावा इस घाट पर सैलानी लोग भी आते थे।
इन्हीं दिनों वाराणसी में एक नया जिलाधीश आया जो
प्रशासन के मामले में अत्यन्त सख्त था। दो - तीन अंग्रेज महिलाओं
की शिकायत पर उसने तैलंग स्वामी की गिरफ्तारी का आदेश जारी किया।
स्वामीजी को गिरफ्तार कर थाने में बन्द कर दिया
गया। इस घटना के कारण शहर में सनसनी फैल गई। इसके पूर्व की घटना की
जानकारी अधिकांश लोगों को थी। जनता की अपार भीड़ थाने के सामने आकर
खड़ी हो गई। इस बात की सूचना जिलाधीश को मालूम हुई। उसने सोचा कि
जनता के उग्र विरोध के कारण कहीं बाबा को छोड़ न दिया जाए। वह
तुरन्त थाने पर हाजिर हो गया। वहाँ आने पर उसने देखा - तैलंग
स्वामी थाने के बाहर आंगन में टहल रहे हैं।
यह दृश्य देखकर वह थानेदार तथा सिपाहियों पर
बिगड़ने लगा। थानेदार ने कहा - "हजूर,
हमारी कोई गलती नहीं है। आप स्वयं देख लें, दरवाजे में डबल ताला
बन्द है। पता नहीं, बाबा कैसे बाहर निकल आए?
हम उन्हें पकड़ने जाते हैं तो वह गायब हो जाते हैं और फिर थोड़ी दे
बाद दिखाई देते हैं। बाबा के भाष में आप कोई जादूगर हैं।"
जिलाधीश को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने
आगे बढ़कर दरवाजे में तालों को टटोला। भातर झांकने पर अजीब दृश्य
दिखाई दिया। कमरे में चारों ओर पानी फैला हुआ था। अजीब बू आ रही
थी।
जिलाधीश ने पूछा - "हवालात
में पानी कैसे आ गया?"
पहरेदार के जवाब देने के पहले ही स्वामी जी ने
कहा - "इसे मालूम नहीं। रात को पेशाब
करने की इच्छा हुई तो थोड़ा - सा कर दिया। उस समय बाहर आने की
इच्छा नहीं हो रही थी। भोर के वक्त मन में आया कि बाहर निकलकर टहल
लिया जाए तो निकल आया। पहरेदार नें मुझे नहीं निकाला।"
जिलाधीश को इस बात पर भी विश्वास नहीं हुआ। वह
इस बात को जानता था कि भारतीय लोग साधु - फकीरों पर आस्था रखते
हैं। उसने आदेश दिया - "साधू को पकड़कर
मेरे सामने बन्द करो। देखूँ, वह कैसे बाहर निकलता है?"
स्वामीजी पुन: हवालात
में बन्द हो गए। जिलाधीश कुंजी अपने साथ लेकर रवाना हो गए।
उसी दिन जिलाधीश अपनी अदालत में किसी मुकदमे की
बहस को सुन रहे थे। अचानक उसने देखा कि इलजास वाले कमरे से तैलंग
स्वामी बाहर निकल आए। इस वक्त वह पूर्ण दिगम्बर थे। यह दृश्य देखकर
वह हक्के - बक्के रह गए।
तैलंग स्वामी ने कहा - "भारतीय
सन्तों के बारे में पश्चिम के भोगवादी जानते ही कितना हैं। तुम लोग
मुझे बन्दी बनाकर रख सकोगे? आइन्दा किसा
सन्त के साथ छेड़छाड़ मत करना, वरना नष्ट हो जाओगे।"
इस चमत्कार को देखकर जिलाधीश भय से पीला पड़ गया
और बेहोश हो गया। चारों ओर अफरा - तफरी मच गई। स्वामीजी कब, कैसे
अन्तर्ध्यान हो गए, इसे कोई जान नहीं सका। सारे शहर में इस घटना की
चर्चा होती रही।
होश में आने के बाद जिलाधीश ने आदेश दिया कि
काशी के महान सन्त तैलंग बाबा नगर में अपनी इच्छा अनुसार रहने को
स्वतन्त्र रहेंगे। उनके साथ भविष्य में कोई भी जिलाधिकारी छेड़छाड़
न करे। जिन्हें उनका रहन - सहन पसन्द नहीं, वे उनके सम्पर्क में न
आएँ।"
( श्री गंगा संग्रह,
नवम्बर - दिसम्बर 2010 से साभार)
फरवरी 2011)
निराले थे निराला
साहित्य
अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित वयोवृद्ध कवि त्रिलोचन ने निराला से
अपनी पहली मुलाकात का दिलचस्प किस्सा सुनाते हुए बताया कि सन् 1934
में लखनऊ के रास्ते में ट्रेन में उनकी सीट के सामने एक हट्टा -
कट्टा आदमी आ बैठा जिसे वह कोई पहलवान समझ बैठे। उस व्यक्ति ने
मेरे हाथ में पन्त की पुस्तक
'पल्लव'
देखकर मुझसे परिचय कर लिया, पर अपना परिचय छिपाए रखा।
त्रिलोचन ने बताया कि उस व्यक्ति ने मुझे लखनऊ उतारकर अपने घर पर
दो दिन रख लिया और सेवा - सत्कार भी किया। दो दिन बाद रास्ते में
रामरतन 'हसरत'
नामक एक साहित्यकार ने जब निराला कहकर पुकारा तो मुझे पता चला कि
मैं जिसे पहलवान समझ रखा था वह तो हिन्दी का जाना - माना कवि
निराला है। मैंने उनसे पूछा, "आपने मुझे
बताया क्यों नहीं कि आप ही निराला हैं?
इस पर वह बोले, " धीरे - धीरे जानना
अच्छा होता है" इसके बाद निराला ने मेरे
लिए फैजाबाद का टिकट कटवा दिया और इस तरह मुझ जैसे एक अपरिचित
व्यक्ति को विदा किया।
(शुभ
तारिका, जुलाई 2010 से
साभार) - नवम्बर 2010
अंधविश्वासों के
अंधेरे
रजनीश
यह
पृथ्वी अंधविश्वासों के धेरे से भरी है। और अंधविश्वास इतना
प्राचीन है कि ऐसा लगता है कि अंधविश्वास ही जीवन है। ईश्वर को तुम
मानते हो तो अंधविश्वासी हो। ईश्वर को जानना होगा, मानने से कुछ
काम नहीं चलेगा। मानना बड़ी सस्ती बात है। मानना बिल्कुल ही दो
कौड़ी की बात है। जो मानता है वह अधार्मिक है। जानना होगा, जानने
से कम में काम नहीं होगा। लेकिन जानने की हिम्मत जुटानी पड़ती है।
जानने के लिए तो परवाने को शमा बन जाना होता है। और जानने के लिए
तो अपने प्राणों की आहुती देनी होती है। जानने के लिए तो दांव पर
लगाना होता है जीवन को।
धर्म कोई
कुतुहल नहीं है, धर्म कोई खाज की खुजलाहट नहीं है - धर्म है
प्राणों की बाजी। इसलिए थोड़े से साहसी लोग ही धार्मिक हो पाते
हैं। धर्म भयभीतों के लिए नहीं है, कायरों के लिए नहीं है। कायर तो
भगोड़े हो जाते हैं। धर्म तो उनके लिए है जो जीवन के युद्ध में.
जीवन की चुनौती को, उसकी समग्रता में स्वीकार करते हैं। जो जीवन को
जीते हैं, पूर्णता से जीते हैं। जो भागते नहीं। जो डरे हुए नहीं
हैं। जो कंपे हुए नहीं हैं। जो पैर जमाकर जीवन में संघर्ष लेते
हैं। उसी संघर्ष से आत्मा का जन्म होता है। उन्हीं चुनौतियों में
आत्मा पकती है, सबल होती है।
गोरख के सूत्र
तुम्हारे जीवन को मधुशाला बना सकते हैं। गोरख के सूत्र तुम्हें
परवाना बना सकते हैं - और ऐसा परवाना कि अगर शमा न मिले तो तुम खुद
शमा बन जाओ।
ये सूत्र अदभुत
हैं। एक एक सूत्र में खूब डूबना, पीना। एक एक सूत्र को प्याली में
भर लेना हृदय की।
मन मैं रहिणा
भेद न कहिणा बोलिया अमृत - बाणी।
आगिला अगनी
होइबा अवधू, तौ आपण होइबा पाणी।।
मन मैं रहिणा!
अभी तुम बाहर रह रहे हो। अभी तुम्हें भीतर रहने की कला नहीं
आती। इसी से दुखी हो। जो बाहर है वह दुखी, जो भीतर है वह सुखी। जो
बाहर है वह नर्क में है, जो भीतर है वह स्वर्ग में। बाहर रहने का
अर्थ होता है: वासनाओं में रहना।
(मरौ
हे जोगी मरौ से)
-अक्टूबर 2010
(झरोखा )
सिक्किम की नेपाली कविता
जीवन थीङ
(जीवन थीङ सिक्किम के युवा कवि।
जन्म - 19 दिसम्बर,1955, गंगटोक (सिक्किम में), शिक्षा -
राजनीतिशास्त्र में स्नातकोत्तर, उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय,
नेपाली की 'सुधा'
व 'नव-ज्योति'
पत्रिकाओं का सम्पादन किया। सिक्किम की नेपाली कविता पर
उनकी यह टिप्पणी और दो कविताओं के अनुवाद छपने से ही कुछ दिन पहले
उनका 4 जुलाई, 1978 को अचानक निधन हो गया था - सुवास दीपक)
नेपाली
कविता के संदर्भ में 'सिक्किम
की नेपाली कविता' के विषय में बोलते हुए
अथवा विचार करते हुए निश्चय ही स्वयं को हल्का महसूस करता हूँ। फिर
भी हमारा अपना इतिहास, सामाजिक मूल्य एवं वैचारिक सत्य के कारण
आँचलिक विशेषता की कसौटी में देखा जाना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है।
आधुनिक नेपाली कविता, सिक्किम के संदर्भ में मृत
मान्यताओं के आग्रह में प्रतिध्वनित होती हैं। आज के सिक्किम के
नेपाली के कवि को किसी विशिष्ट कवि तथा परम्परा की कमी बुरी तरह
खटकती है। वह सत्य को जी सकने की बात नहीं है, धरारहित आधुनिकता ही
सिक्किम की कविता का आज का रूप है।
नेपाली कविता ने प्रतीकों को छोड़कर बिम्बों के
संसार में प्रवेश कर लिया है। परम्परावादी गद्य कविता को समझने
वालों की कमी से कवि को दु:ख होता है। यह
मानते रहने की बात भी नहीं है। परम्परावादी कविता के मर्म तक को न
समझने वालों के सामने आधुनिक संवेदना और अभिव्यक्ति के नए माध्यम से
किसी भी प्रक्रिया का जन्म होने की बात संभव वस्तु नहीं लगती
परन्तु इस प्रकार की वस्तुता के वातावरण में आज के कवि औरों के साथ
दौड़ने और अपनी असीम अनुभूति के लिए सम्प्रेषण खोजते रहने से वंचित
करना स्वयं को और पिछड़ा बनाने के सिवा कुछ नहीं है। नेपाली
साहित्य में कलतक आधुनिक समझे जाने वाले कवि पुराने हो चुके हैं।
सिक्किम के कवि को अपने छोटे से समुद्र का प्रतिनिधित्व करने पर
अन्त तक पहुँचने के लिए इसी समग्र धारा को पकड़ना जरूरी होने के
कारण साहित्यिक प्रयोग और सूक्ष्मता से अलग होने की बात नहीं है।
मेरे कहने का तात्पर्य साहित्य लिखने के विस्तृत परिवेश में अब
हमें दुगुनी प्रगति करनी पड़ रही है और कवि की संवेदनसीलता और
अभिव्यक्ति कला से वह संभव होने पर भी अपने ही परिवेश वालों के न
समझने के कारण एक क्षोभ पैदा होता है, हो भी रहा है।
नीचे दी गई दोनों कविताओं के संदर्भ में कवि का
वक्तव्य -
नार्सिसस
नार्सिसस ग्रीक मिथोलॉजी का वह युवक है जो अपनी
सुन्दरता पर मोहित होकर पानी में अपने प्रतिबिम्ब को देख-देखकर
प्राण त्याग देता है। हम भी अपनी निष्क्रियता और अपनेपन में
मस्त रहने के कारण आज अस्तित्वहीन हो चुके हैं। युग को अपने अनुसार
चलाने वाले मुट्ठी भर शक्तिशालीयों के नियंत्रण में हमारे भाग्य
निर्धारित हो रहे हैं।
मैं बैतलहम शहर को हिप्पोपोटामस
शोषण के विरुद्ध प्रथम उदघोषणा करने वाले
युग-पुरुष (जिसे अंधों ने हजारों संज्ञाएँ दीं) ईसा मसीह के
जन्मस्थल बैतलहम शहर की तरह इस पवित्र एवं शान्तमय भूमि में हम
हिप्पोपोटामस की तरह असंतुष्टि में जी रहे हैं। अपनी दासत्व
प्रवृत्ति के कारण आज हम घृणित जीवन स्वीकार करके भुजाएँ काटकर दे
चुके हैं और स्वयं को बुख्याँचा (Scare Crow)
की तरह शव बनाकर अपने इतिहास को बदनाम कर रहे हैं।
हमारी परम्परा और जीवन के शाश्वत मूल्यों पर जो
अतिक्रमण हो रहा है, उसी के विरुद्ध हमारा युवा विचारधारा प्रभावित
है। हमारा जीवन एक ऐसी स्थिति में है, जहाँ जटिलताएँ हमें यही
निर्देशन देती हैं कि हमारे ऊपर आरोपित सामाजिक, राजनैतिक एवं
आर्थिक व्यवस्था का सिर्फ विरोध ही नहीं, बल्कि उपयुक्त विकल्प भी
खोज निकालना है जो वर्गहीन समाज की परिकल्पना के अतिरिक्त और क्या
हो सकता है?
मानव मूल्यों के प्रति सचेत रहकर एवं शोषणरहित
समाज के निर्माण में सदैव प्रयत्नशील रहना ही हम युवा साहित्यकारों
की प्रतिबद्धता है, हमारा यही एक लक्ष्य भी है।
नार्सिसस (अपूर्ण खण्डकाव्य)
युग को बिस्तर बनाकर जी सकने
वालों से
मेरी प्रार्थना है, अपनी मुक्ति
के लिए
एक खतरनाक आगजनी के भीतर
लगता है जल रहा हूँ मैं अपनी ही
आँखों में
कैसी विवशता है यह मेरी
शायद समझ नहीं सकते मेरी तरह
अपने ही मुल्क की आगजनी को
पीछे मुड़कर देखने वाला मैं
शायद अकेला ही हूँ
कौशी की इस यात्रा में।
कुछ दिन मैं जीना चाहता हूँ
बिनती है सभी से
मेरी आँखें निकालकर
कुछ दिनों तक मुझे ऐसी जगह पर
रख दो जहाँ
कोई मुझे मिल न सके
क्योंकि युग की शैय्या में मैं
काफी थक चुका हूँ।
हिमालय की छाया में अपनी
निर्जीव मुहब्बत को
गले लगाकर शायद मैं जी रहा हूँ
अपनी मुहब्बत खुद को लगना
ईश्वर!
तुझमें बेफिक्री के अलावा और कुछ नहीं है
क्योंकि मैं चाहता था
दूब की पहली कोंपल की तरह
चाँदनी रात में हिमपात हुए मैदान में
ऐसी खुशियाँ मनाना जिनका कोई इतिहास न हो।
गुराँस-डाँडे आज भी मेरे साथ हैं
पर मैं युद्ध की हार के बोझ से दबा पड़ा हूँ
एक देवदार, एक साल, एक युक्लिप्टस
मैं एक पेड़ नि:शब्द,
अगतिमय
ओ दिन घंटों का व्यापार करने वालो
दौड़ता पेड़ देखा है?
पेड़ इतिहास बना देखा है?
फटा हुआ झोला यह पेड़
फटा हुआ झोला यह युग
फटा हुआ झोला यह मेरा मुख!
खाली बंदूक की नाल
आकाश की ओर ताकने वालो!
मृत्यु शैय्या में मनुष्य को
डराने में असमर्थ है यह युग भी!
सभी की मनौतियाँ मैं ही हूँ यदि
आरोपित अपराध मैं ही हूँ यदि
कलुषता की जिन्दा तस्वीर मैं ही हूँ यदि
नग्न सत्यों का उदघोषक मैं ही हूँ यदि
तुम्हारी सामर्थ्य के पहाड़ मेरे सिर को कुलचने
में असमर्थ हैं
तुम्हारी गंगोत्री और कामधेनुएँ मेरे पापों को
धोने में असमर्थ हैं
यदि मैंने पाप किया है तो भी
मेरा पाप तुम्हें एक दिन निगल जाएगा
क्योंकि मेरे साथ सभी के श्रापों से फालतू उम्र
के
पले हुए रक्तबीज के अलावा कुछ भी नहीं है!
तुम चाहते हो
मैं प्लास्टिक के फूल बन जाऊँ
यदि सच कहूँ तो तुम चाहते थे कि
मैं बादल बनूँ, पत्थर का अभिनय करूँ
लो आओ मैं तुम्हारी हर हाँक को स्वीकारता हूँ
पर एक बात मैं भी समझ नहीं सकता
क्योंकि तुम मुझे गीत न गाने को कहते हो
फिर क्यों तुम मुझे
हिमालय की बात न करने की बात कहते हो?
यह हिमालय:
आओ हम सभी नतमस्तक हो जाएँ इसके आगे
देवता नतमस्तक हुए इसके आगे
गन्धर्वों और मेनकाओं ने नमन किया इसे
वेद और पुराण बनकर
चीथड़ा कोट पहना रखा इसने हमें
कल तक पानी भी इसने बाँट दिया हमारे लिए
आज यह उल्टा पड़ा है
आकाश की ओर स्तन और नुचड़ा शरीर लिए
छाती में बलात्कार के संघातों के रिस्ते जख्म
और जरूरत से भी ज्यादा बूढ़ी विश्वासहीन आँखें
बिछाकर
देख रहा है तुम्हारे रास्तों को, मेरे रास्तों
को
आओ हम तीतेपाती रखकर करें इसे
इस बूढ़ी दादी माँ को!
मुझे आशीर्वाद नहीं चाहिए!
पहाड़ों के कोने-कोने में बादलों की लुकी चोरी
खेलने की याद
लगता है मन के अन्त:स्थल
में है
विसंगति इसी मन का रूप है
मुझे तुम्हारी घृणा नहीं चाहिए
प्रशंसा भी नहीं चाहिए
प्रेमी-प्रेमिका के तलाकनामे की तरह
नामर्द आंसू है यह जवानी
इसीलिए आशीर्वाद नहीं चाहिए मुझे
आशीर्वाद अपनी असमर्थता और दूसरों की
आस बटोरने के अलावा कुछ नहीं है।
शायद मेरा एक ही अपराध
मैं निर्वासित नहीं हो सका
युक्लिप्टस का पेड़ नहीं हो सका
मैंने कैसी बातें कीं निर्माण की
पर बेहोशी इतनी थी उन्माद की
कि मैं प्रलय नहीं हो सका
इसीलिए नदी के किनारे के घरों को
जड़मूल से उखाड़कर
फिर एक शुरूआत नहीं लिख सका
अपनी भूलों को तुम्हारे श्यामपट पर
बीजारोपण नहीं कर सका
मुट्ठी भर प्रलय, अंजुली भर हतोत्साह लेकर
सच्चे अर्थों में डायोनिसस बनकर
तुम्हें निगल नहीं सका!
कल्वरी का डाँडा भी नहीं
था
पर क्रूस उठाकर ईसा मसीह को
कंचनजंघा पर चढ़ने के लिए दौड़ते मैंने देखा है
सच सच कहता हूँ
धतूरा खाकर कंचनजंघा गिरने ही वाली ती
खाँसते खांसते गिरने ढहने वाली ही थी
तो उसी वक्त सालिगों का जुलूस निकला
क्षितिज ओझल होता गया
शीशे टूटते लगे
बाढ़ से उपजाऊ आँगन घर के पास ही बह गया
शायद तुम जरथ्रस्तु
लुसिपस के साथ उसकी बेटियों को देख रहे थे।
पिरामिड ही थे
बंद मेरी छाती में
पिरामिड ही हैं अब भी
रीती मेरी आँखों मे
घुटता मैं देख रहा हूँ गिरता पानी और बाढ़
भाई लोग शिकार खेलने के लिए
धनुष-वाण संभाल रहे हैं
मैं एक कंटीली झाड़ी बना खड़ा हूँ
एक जरथ्रस्तु, मारिजुआना की कथा कहते
इस शहर से किनारा हुए
पीछा करने वालों की गर्दो-गुबार से
एक और क्षितिज ओझल हो गया।
मैं बैतलहम शहर का हिप्पोपोटामस
भुजाएँ काटकर दे चुकने के बाद की कथा है यह।
छाती और आत्मा को टकटका कर, झाड़कर
एक पहाड़ पर खड़े होकर
डूबते सूरज को देखते
दो आँसू गिराकर पेड़ हो जोने के बाद की कथा है
यह।
मैं सालिग हो रहा हूँ
पद्मासनरत बुद्ध की आँखों का निर्जीव प्रकाश
मेरा आजतक का उन्नत आकाश है
भुजाएँ और हथेलियाँ उठाकर चढ़ते चढ़ते
देवालय बन टूटे सपने
आजतक मेरे हृदय तक पहुँची हुई वातास हैं।
मेरे साथ अब तुम जिन्दगी की बातें मत करना
डर लगता है जिन्दगी से
क्योंकि युक्लिप्टस की तरह आँखों में
इसकी एक नहीं अनेक परिभाषाएँ नंगी हो चुकी हैं
धान फलने वाली सुरम्य घाटी के इतिहास
की तरह
मेरी मीमांसा बन थर थर काँपती हैं आँखें
इस भावावेश में स्वयं को संभाल न सकने पर
बुद्ध की आँखों से प्रकाश कर्ज लेने जाते
कंचनजंघा भी मेरी तरह तथागत के आगे
झुक कर रो चुकने पर
वापस ली हुई अपनी कसम के कारण
आज मैं जल रहा हूँ, घाव दुखते हैं
फिर भी
दरवाजे तक पहुँचकर
वापस आ चुकने की कथा है यह।
हथेलियाँ उगी हैं आकाश में
मेरे खड़े होकर पूछ लेने के बाद की कथा है यह।
वैयक्तिक प्रौढ़ता धूल बनकर
संदिग्धताएँ सिरों में गूंथकर
म्यूजियम में लटकाई नीरो की वीणा की तरह
खुद एक कील में लटककर
सभी आँसू रो चुकने के बाद
दुखते रिसते घावों के सिवा
मरणासन्न जीवन की कथा है यह।
गैस चैम्बरों में झुलस चुके सपनों के बीच
एक मुल्क है मेरा, सपनों का एक मुल्क।
मैं घोषणा करके पीता हूँ अपने मुल्क की कथा को
पर्वतों का घेरा है एक
छिपकलियों की जमात के अलावा
केंकड़ों के प्रयासों के अलावा
सड़कों के किनारे पर फेन्स है
फेन्स की लाल लाल आँखें हैं
इन्हीं लाल लाल आँखों में घिरता कोहरा
माथे पर उग आया पसीना
सन्नाटों में रोती भावनाओं के कफन के साथ
हम चहलकदमी करते हैं।
सुबह पत्तों की डोलियों में
यहाँ आँसूओं के गीत रोकर आती है
मध्याह्न में मोड़ की हवाएँ
बहक-बहक रोती हैं
साँझ-भर देवदार अपने सिर झुकाते हैं
हर रात तारे अपनी लाशें उठाकर
सुबह की प्रतीक्षा करते हैं
बुख्याँचों (बज्जरबट्टूओं) के इतिहास की कथा है यह
प्रहरियों के सिरहाने सोया है यह मुल्क
बुख्याँचों का शहर, बदनामी का मुल्क!
उम्र कैद की घोषणा
एक बहती नही की बाधा
बैतलहम शहर का हिप्पोपोटामस
मेरी छटपटाहट की कथा, मेरी मेहरुन्निसा,
मेरा मुल्क!
अभाग्य के रीते सपने
आकाश-गंगा की तरह आँखों के आगे चकाचौंध हुए
वैकल्पिक झिन्गे
मैं भोगता हूँ पुरखा बनकर
बालू के प्यासे होंठ
समूह संभोग से थकित कोठों की तरह
धूमिल सूरज के प्रयासहीन हाथ
पिटे हुए थुल-थुल नुचड़े शरीर लेकर
स्वर्ग को दस्तक देने वाली अँगुलियाँ
नर्क को दस्तक देने वाली अँगुलियाँ डुबोते
तुषार और ओस में धुली चमकती वातास से
देख रहा हूँ किनारे खड़े होकर
फिर एक सांस ली है मेरे मुल्क ने!
भुजाएँ काटकर दे चुकने के बाद की कथा है यह
छाती और आत्मा को टकटकाकर, झाड़कर
पहाड़ पर चढ़कर
डूबते सूरज को देखते
दो बूँदें आंसू गिराकर पेड़ हो चुकने की कथा है यह।
(पहल - 12, संपादक ज्ञानरंजन, 1978 में प्रकाशित
(अनुवाद
एवं प्रस्तुति - सुवास
दीपक)
डा. महाराजकृष्ण
जैन की साहित्यिक उपलब्धियाँ
रमेश
प्रसून
डा. महाराजकृष्ण
जैन सरीखी बहुआयामी साहित्यिक प्रतिभा के कृतित्व की रचनाधर्मी
विशिष्टताओं का विषयबद्ध एवं क्रमबद्ध सूक्ष्मता से विधिवत्
साहित्यिक मूल्यांकन किया जाना अभी भी शेष है, अपेक्षित है एवं
वांछनीय है।
शारीरिक संदर्भ एवं
पारिवारिक प्रसंग की असहज एवं असामान्य स्थितियों में प्राप्त
सहयोग एवं कृत संघर्ष की मानसिक रूप से ऊर्जित एवं सकारात्मक
वैचारिकता से सुसम्पन्न डा. जैन द्वारा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष
रूप में सृजित साहित्य की उपलब्धियों के परिप्रेक्ष्य में उनका
महत्वपूर्ण योगदान अविस्मरणीय है एवं विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
प्रथमत:
उल्लेखनीय है उनके द्वारा कहानी - लेखन महाविद्यालय की स्थापना एवं
उसके अंतर्गत लागू किए गए विभिन्न पाठ्यक्रमों के सुसंचालन के लिए
लगभग पांच हजार पृष्ठीय पाठों का स्वसृजन एवं स्वलेखन। ध्यान देने
योग्य तथ्य है कि साहित्यिक विधाओं के प्रशिक्षण हेतु पाठ्यक्रमों
के पाठों का स्वसृजन स्वयं ही एक विशिष्ट साहित्यिक विधा का
उत्सर्जन है। हिन्दी में उनके द्वारा उत्सर्जित की गई यह
'विधा'
प्रचलन एवं परंपरा से हटकर थी। अत:
हिन्दी साहित्य में इस 'विधा'
का प्रामाणिकता के साथ विश्लेषण व विवेचन किया जाना तात्विक
अनिवार्यता एवं सामाजिक आवश्यकता है।
उनके
द्वितीय उल्लेखनीय योगदान में उनके द्वारा कहानी-लेखन महाविद्यालय
के माध्यम से लगभग चार हजार प्रशिक्षार्थियों से निर्नतर पत्रचार
सम्मिलित है। उनके पत्रों में साहित्यिकता का मर्म एवं कोई न की
साहित्यिक संदेश अवश्य छुपा हुआ रहता था। यदि पाठकों अवं
प्रशिक्षुओं को प्रेषित उनके विभिन्न पत्र संग्रहीत किए जाने संभव
हो सकें तो साहित्योदगम की एक उत्कृष्ट विधा का सुसंगत स्वरूप
सम्मुख आएगा। वैसे भी प्रतिष्ठित एवं स्थापित साहित्यकारों द्वारा
परस्पर अथवा विभिन्न स्तर के पाठकों के साथ किए गए पत्राचार के
संकलन अवं साहित्यिक विधा के रूप में स्वीकार्य किए जा चुके हैं।
इस
प्रकार इतनी बड़ी संख्या में स्वयं रुचि लेकर उद्देश्यपूर्ण एवं
सार्थक पत्राचार किया जाना न तो मात्र साधारण सी बात है और न ही हर
किसी साहित्यकार के लिए सम्बव है। अत:
उनके पत्र-व्यवहार, जिनमें उनके सुझाव, दिशा-निर्देश एवं कथोपकथन
में व्याप्त साहित्यिक अवदारणा की सुनिष्चित सन्निहिति विद्यमान
रहा करती थी, को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों में आगणित किया जाना
पूर्णत: औचित्यपूर्ण है।
तृतीय
उल्लेखनीय उपलबेधि है उनके द्वारा अपने सम्पादन में विस्व प्रसिद्ध
विदेशी लेखको की श्रेष्ठ कहानियों का 'विश्व
की प्रसिद्ध कहानियाँ' नाम से संकल्न
अवं स्वयं किया हुआ अनुवाद देशी लेखकों अवं पाठकों तक सुलभता से
उपलब्ध कराना। इस अनुवाद से विश्वस्तरीय लेखन में विस्तृत
दृष्टिकोण के व्यापक परिवेस के अन्तर्गत कथानक व कथ्य के अज्ञात
आयाम भारतीय लेखकों की सृजनात्मक क्षमता को सुदृढ़ करते हुए सुगति
प्रदान करने में समर्थ सिद्ध हुए। निश्चित रूप से कहानी- कला के
व्यापक विकास का मार्ग उनके महत्वपूर्ण कार्य से प्रशस्त हुआ।
उनकी
चतुर्थ उल्लेखनीय उपलब्धि है 'ज्योति
कलश' नाम से मन को उद्वेलित करने वाली
विचारणीय सूक्तियों का संकलन। संकलित सूक्तियाँ कर्म-कर्ता एवं
कर्मण्यता के प्रति व्यावहारिक जागरूकता उत्पन्न करने वाली
साहित्यिक संचेतना को उत्प्रेरित करने की उदभावना बनी हुई हैं।
उनकी
अविस्मरणीय उपलब्धि है विविध विषयों पर गहन चिंतन एवं मनन से युक्त
विषयगत संवेदनात्मक अभिव्यक्कि हेतु विभिन्न विधाओं यथा
कथा-लघुकथा-बोधकथा-साहसकथा-सत्यकथा-प्रेत कथा-पौराणिक कथा-ऐतिहासिक
कथा, कविता, गजल, आयुर्वेद-स्वास्थ्य-वनस्पति-वन्यजीवन व
मनोविज्ञान पर केन्द्रित लेखन, बाल लेखन, यात्रा-पर्यटन,
रेखाचित्र, फीचर, हास्य-व्यंग्य, रेडियो-टीवी प्रहसन एवं नाटक के
साथ- साथ गवेषणात्मक निबन्ध, लघु निबन्ध, लेख-आलेख-संपादकीय,
आलोचना-समीक्षा-तात्विक विवेचन-व्याकरणसम्मत एवं भाषा सम्बन्धी
विश्लेषण आदि के रूप में लगभग तीन हजार की संख्या में रचनाओं का
व्यापक लेखन जिसमें कुछ प्रकाशित हैं, कुछ प्रकाशनाधीन।
उनकी
रचनात्मक ऊर्जा, क्षमता एवं सामर्थ्य का सुस्पष्ट परिचय देने के
लिए उनके द्वारा ज्वलन्त - सामयिक एवं विवादास्पद तक ऐसे विषयों पर
जिनके प्रति अधिकांश लेखक पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह रखते, स्पष्ट
धारणा के साथ प्रामाणिकता सत्यापित करते हुए बिना किसा प्रभाव के
प्रभावित हुए अथवा बिना किसी की बलात् इच्छा से किया गया
दायित्वपूर्ण लेखन पर्याप्त है। इस हेतु उनके द्वारा चयनित विषयों
का अवलोकन करने पर विस्मय होता है कि एक व्यक्ति एक ही समय में
विविध रूपी इतने व्यापक विषयों पर इतनी सटीक टिप्पणियां करने में
ऐसे कैसे इतना पारंगत हो सकता है। उनमें अन्तर्निहित संवेदनाओं के
विचारोत्तेजक उद्वेलन का प्रगटन करने के लिए उनके चयनित विषयों की
शीर्षकबद्धता के कुछ आवेगात्मक उद्धहरण दृष्टव्य हैं -
-
'नपुंसकों के देश में स्त्री का सच'
( विचारोत्तेजक लेख)
-
'पुरुष और नारी'
(विचारोत्तेजक लेख)
-
'रूखा सूखा खाय के'
(विचारोत्तेजक लेख)
-
'अश्लील पोस्टर जला दो'
(विचारोत्तेजक लेख)
-
'सरकार तो कुछ नहीं करती'
(विस्तृत आलेख)
-
'स्मृति रस कविताएँ'
(काहे होत अधीर) (मर्मान्तक लेख)
-
'कद्दूनामा'
हास्य' - व्यंग्यात्मक काव्य)
- 'सुखी जीवन की नींव'
(धनात्मक विचार)
-
'अनुकरणीय'
(संस्मरण)
-
'प्राथमिक शिक्षा में रंगकर्म की भूमिका'
(रंगमंच की उपादेयता पर आलेख)
-
'संतोष जड़िया के विमुग्धकारी रेखांकन'
(रेखांकन की कला पर आलेख)
-
'आइये नागालैंड चलें'
(यात्रावृत्त)
-
'दर्द जंगल का'
(वनस्पति एवं पशु संरक्षण पर आलेख)
- 'पहाड़ों
की शोभा वनों से' (पर्यावरण संरक्षण पर)
- 'मुल्ला
नसरुद्दीन' (हास्य-परिहास)
- 'मेरा
भी अवमूल्यन हुआ' (हास्य)
- 'देश
के लिए दौड़ न पाने का गम' (हास्य-कथा)
- 'धर्म
निरपेक्षता का महाकुंभ' (व्यंग्य)
- 'हिन्दू
आतन्कवाद' ( एक पत्र)
- 'पत्रकारिता
और भाषा' (लघु निबन्ध)
- 'पत्रकारिता
में भाषा की सावधानी' (लघु निबन्ध)
- 'समाचार
पत्र की भाषा' (लघु निबन्ध)
- 'सम्पादकों
को सताने के अनुभूत प्रयोग'
(व्यंग्यात्मक निबन्ध)
- 'क्या
है सृजनशीलता' (गवेषणात्मक निबन्ध)
- हिन्दी लघुकथा का
परिक्षेत्र' (गवेषणात्मक निबन्ध)
- हिन्दी कहानी'
(विरासत को स्वीकारने का प्रश्न और युवा लेखन - विचारोत्तेजक
निबन्ध)
- 'आंचलिक
कहानी और स्थानीय भाषा' (विवरणात्मक लघु
निबन्ध)
- 'कहानी
का कलापक्ष' (विश्लेषणात्मक लघु निबन्ध)
- कहानी लिखने से पहले'
(विश्लेषणात्मक लघु निबन्ध)
- 'नई
कहानी - कलापक्ष, कुछ और बातें' (विश्लेषणात्मक
लघु निबन्ध)
- 'क्या
है नई कहानी' (विश्लेषणात्मक लघु
निबन्ध)
स्पष्ट है कि डा. महाराजकृष्ण जैन
का साहित्य-सृजन आज भी कितना प्रासंगिक है। इन प्रश्नों का उत्तर
स्वयं मिल जाता है कि डा. साहब साहित्य में वाक्य विन्यास एवं
भाषा-शैली के प्रयोग में सरलता, सहजता एवं बोघगम्यता के प्रबल
पक्षधर थे। सार्थक एवं सोद्देश्य चिन्तन-मनन के चतुर चितेरे थे।
उनकी उत्कट अभिलाषा थी कि हिन्दी में लोग शुद्ध अवं सुपाठ्य लिखें
- पढ़ें। उक्त बातों के प्रति उनका आग्रह उनके द्वारा लिखे गए
विभिन्न लेखों - आलेखों - निबन्धों अवं पत्रों में स्पष्ट रूप से
झलकता है। डा. साहब अन्त तक हिन्दी साहित्य को पांडित्य की कैद से
छुड़ाकर जनसाधारण की सुविधा के सापेक्ष साधारण रूप में सुलभ कराने
के लिए प्रयासरत थे। सामाजिक समरसता के द्योतक अवं
'वाद-विवाद'
से परे समन्वयवाद के रूप में भाषा-शैली, व्याकरण व वर्तनी की
शुचिता के प्रति सचेत करते हे पाठकों पर अपनी असीम अनुकम्पा बरसाते
हुए दृष्टिगत होते हैं।
इन सारी उपलब्धियों के अतिरिक्त
जिस अनुपम उपलब्धि के विषय में चर्चा करना आवश्यक है, वह है उनकी
अन्यतम साहित्यिक उपलब्धि उनकी सहधर्मिणी श्रीमती उर्मि कृष्ण।
साहित्यिक उपलब्धि इसलिए कि डा. साहब के सम्पूर्ण साहित्यिक
सरोकारों को श्रीमती उर्मि कृष्ण ने इस प्रकार हृदयंगम कर सतत
प्रक्किया में कार्यरूप में परिणत कर लिया है कि डा. साहब की सारी
रचनाधर्मिता उर्मि जी की निजी रचनाधर्मिता के साथ जुड़कर युग्म रूप
में एकाकार होकर साहियाकाश के निरन्तर प्रभावित कर रही है, जिसके
आलोक से साहित्यविज्ञ स्वयं को आलोकित अनुभूत कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि श्रीमती उर्मि
कृष्ण का नाम देश के प्रतिष्ठित लघु कथाकारों, कहानीकारों में एवं
सफल सम्पादकों में पूर्ण गरिमा के साथ प्रतिस्थापित है।
डा. महाराजकृष्ण की साहित्यिक
उपलब्धियों के परिप्रेक्ष्य में डा. साहब की पुण्य स्मृति को
शत्-शत् नमन।
(शुभ
तारिका, कृष्णांक - 09, मई
2010 से साभार)
ध्वनियों का आनन्द
(ओशो)
तुम
जीवन में उन रागों को पहचानना शुरू करो।
मनुष्य का सारा संगीत अस्तित्व को
रागों से पैदा हुआ है। मनुष्य के सारे वाद्य अस्तित्व की नकल से
पैदा हुए हैं। पक्षी गाते हैं, झरने गाते हैं, हवाएं गाती हैं,
आकाश में बादल गरजते हैं, इन्हीं सभी से नाद पैदा हुए मनुष्य के।
सारी राग-रागनियां पैदा हुईं। इनसे ही सारे वाद्य निर्मित हुए।
अस्तित्व में राग को पहचानने की
कोशिश करो। सुबह उठकर पहला ध्यान चारों तरफ से हो रही ध्वनियों पर
डालना। और अगर तुम्हें ध्वनियां सुनाई पड़ने लगें, तो तुम पाओगे कि
दिनभर तुम्हें सुनाई पड़ती रहेंगी। क्योंकि वे सदा जारी हैं। सिर्फ
तुम बहरे हो।
रात के सन्नाटे में बैठ जाना और
सुनना सन्नाटे को। सन्नाटे का नाद बहुत निकट है ओंकार के। इसलिए जब
भी तुम्हारे भीतर ओंकार बजेगा, तो पहले तो तुम्हें सन्नाटे का नाद
ही सुनाई पड़ेगा। सन्नाटे की झांई, जैसे झींगुर बोलते हों और रात
बिल्कुल चुप हो, वैसी झांई तुम्हें पूरे वक्त सुनाई पड़ने लगेगी -
चौबीस घंटे। बाजार में, दुकान पर, दफ्तर में तुम पाओगे कि वह झांई
बजती ही जाती है। क्योंकि वह बज ही रही है। बाजार के शोरगुल में दब
जाती है, बजना बंद नहीं होता। उपद्रव में खो जाती है, समाप्त नहीं
होती। और तुम्हें पकड़ में आ जाए, तो तुम उसे कभी भी पहचान लोगे।
और जैसे-जैसे तुम्हारी पकड़ साफ होती जाएगी और पहचान निखरेगी,
वैसे-वैसे तुम पाओगे चौबीस घंटे, अहर्निश उसके द्वार पर
राग-रागनियों का मेला लगा हुआ है।
ध्यान रखो, जिन्होंने भी उसे जाना
है, उन्होंने उसे सच्चिदानन्द कहा है। जब भी कोई आनन्द से भर जाता
है, तो गीत से भर जाता है। गीत और आनन्द में बड़ा नैकट्य है। बड़ी
समीपता है। दु:ख में की नहीं गाता,
सिवाय फिल्मों को छोड़कर! दुख में आदमी
रोता है, गाता नहीं। दुख में आंसू बहते हैं, गीत नहीं। जब कोई
आह्लादित होता है, आनन्दित होता है, जब गाता है। और तब अगर आंसू भी
बहें, तो भी उन आंसूओं में गीत होता है। आनन्द के क्षण में तुम जो
भी करोगे उसमें गीत होगा, उसमें गीत की भनक होगी। तुम्हारे
उठने-बैठने में गीत होगा। तुम्हारे चलने-फिरने में गीत होगा।
तुम्हारे श्वास लेने और छोड़ने में गीत होगा। तुम्हारे हृदय की
धड़कन में नाद होगा। जैसे - जैसे तुम आनन्द के समीप पहुंचते हो,
वैसे-वैसे गीत के करीब पहुंचते हो। निश्चित ही गीत उसका द्वार है।
क्योंकि भीतर परमानन्द है।
ऐसी भी घड़ी आती है जब गीत बंद हो
जाता है। क्योंकि गीत द्वार है। जब तुम द्वार के भीतर प्रविष्ठ हो
जाते हो, तो गीत भी खो जाता है। क्योंकि ऐसी घड़ी भी आती है जब गीत
भी बाधा मालूम पड़ता है तब उसका ही गीत चलता है, तुम्हारा गीत
बिल्कुल को जाता है। तब तुममें अनन्त ध्वनियां गूंजती हैं।
तुम्हारी अपनी की ध्वनि नहीं होती। तुम सूने घर हो जाते हो।
राष्ट्रीय
एकता में राष्ट्रभाषा हिन्दी की भूमिका
गोविन्द पाल
सन् 1857 से लेकर 15 अगस्त 1947 तक जो आजादी की लड़ाई लड़ी गई
थी, इन सबके पीछे एक राष्ट्रीय भावना, भारतीय संस्कृति, भारतीय
भाषा की अहम भूमिका रही। भारतीय होने के नाते इस विषय पर गंभीर
चिंतन करने का समय अब आ चुका है, कि आजादी की लड़ाई में हिन्दी का
महत्वपूर्ण योगदान रहा। परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि आज आजादी के
63 साल बाद भी हम सिर्फ औपचारिकता निभाने तक ही सीमित रह गये। 14
सितम्बर आते ही हमारे मन में हिन्दी की चिन्ता सताने लगती है और
पूरे देशभर में हिन्दी दिवस के आयोजनों के माध्यम से रोना रो लेते
हैं। लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि एक राष्ट्र की अखंडता, उसके
विकास एवं स्वाभिमान के लिए राष्ट्रभाषा की कितना आवश्यकता है।
आज विश्व में जितने भी देश हैं, हर देश की अपनी अपनी राष्ट्र
भाषा है तथा उसी भाषा में प्राथमिक शिक्षा से उच्च् शिक्षा का
ज्ञान प्राप्त करते हैं। चाहे वह कला हो या विज्ञान। चाहे वह
जर्मनी हो, फ्रांस, इटली, रूस. चीन, जापान ही क्यों न हों परन्तु
हमारे यहां अंग्रेजी का बोलबाला है। लोगों में यह गलत धारणा है कि
तकनीकी, विज्ञान या उच्च शिक्षा हिन्दी भाषा में नहीं हो सकती।
जबकि यह पूर्णत: निराधार है। हमारे देश
में हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसे राष्ट्र के बहुसंख्यक लोगों
द्वारा बोली या समझा जाता है। ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में विस्तृत
और उच्च कोटि का साहित्य हिन्दी भाषा में उपलब्ध है। हिन्दी का
शब्द भंडार तथा विचार क्षेत्र व्यापक है। इसमें दूसरी देशज भाषाओं
और बोलियों से शब्दों को ग्रहण करने की सहज क्षमता है। इसकी
लिपि सरल है। हिन्दी साहित्य में राष्ट्र की आत्मा मुखरित होती है तथा
संपूर्ण राष्ट्र को भावनात्मक एकता में
बांधे रखने की क्षमता है।
अर्थात् हिन्दी राज भाषा ही नहीं बल्कि राष्ट्र भाषा के रूप में
पूर्ण सक्षम है। पर हम हैं कि अंग्रेजियत की गुलामी की मानसिकता से
आजतक उबर नहीं पाए हैं। राष्ट्रीय एकता में हिन्दी की भूमिका कितनी
महत्वपूर्ण हो सकती है, हमारी ओछी मानसिकता के चलते कभी हमने इस पर
गौर नहीं कर पाए। दरअसल समस्या हमारी मानसिकता और हमारा झूठा अहम
है, दाग चेहरे पर लगा है,
ऐना साफ करने से क्या फायदा?
हमारे देश के क्षेत्रीय नेताओं ने अपने व्यक्तिगत राजनीतिक स्वार्थ
के चलते क्षेत्रवाद, जातिवाद और भाषायी उलझन में उलझाकर रख दिया
है। हाल ही में इसका जीता जागता उदाहरण
महाराष्ट्र में देख चुके हैं और देख भी रहे हैं। इन नेताओं ने
हमारे पूर्वज नेताओं से कभी सीख ही नहीं ली। हिन्दी के विकास एवं
उसे समृद्ध बनाने में अहिन्दी भाषियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
राष्ट्रीय संदर्भ में हिन्दी की बातें जिन्होंने उठाईं, वे अधिकांश
अहिन्दी भाषी लोग ही थे। जैसे स्वामी दयानन्द सरस्वती, मदनमोहन
मालवीय, माणिकलाल
मुन्शी, काका कालेलकर एवं महात्मा गांधी गुजराती
थे। राजा राम मोहन राय, केसर चन्द, भूदेव
मुखर्जी, सुभाषचन्द्र बोस, जस्टिस शारदा चरण मित्र आदि बंगाली थे।
लाला लाजपत राय पंजाबी, गोपबंधु चौधरी असमिया, लोकमान्य तिलक
मराठी, सुब्रमण्यम भारती तमिल, रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर कन्नड़,
हरेकृष्ण मेहताब उड़िया। इन अहिन्दी भाषी लोगों ने हिन्दी को
राष्ट्रभाषा के रूप में मानते हुए प्रचार प्रसार किया था। नेताजी
सुभाषचन्द्र बोस ने यहां तक कहा कि हिन्दी राष्ट्र व स्वतंत्रता का
मूल मंत्र है। इन महापुरुषों को हिन्दी के प्रति अगाध आस्था थी।
राष्ट्र का मूल मंत्र ही राष्ट्र भाषा है। देश को अखंड एवं एकता के
सूत्र में बांधे रखने के लिए तथा राष्ट्र भक्ति भावना को जगाने के
लिए एक राष्ट्र भाषा की आवश्यकता होती है, हिन्दी में वह
सारी क्षमता विद्यमान है जो राजभाषा का ताज पहन सके। हमारे
मूर्धन्य साहित्यकारों ने हिन्दी को समृद्ध करने में कोई कसर बाकी
नहीं छोड़ी। हमारे साहित्यकारों ने हिन्दी के विकास में अपने अपने
दायरे में हर संभव प्रयास किया, जिनमें प्रमुख रूप से भारतेंदु
हरिश्चन्द्र, मुन्शी प्रेमचन्द, निराला, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,
जैनेन्द्र, अज्ञेय, महादेवी वर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी आदि।
इनके अलावा भी अनेक साहित्यिक मनीषियों ने हिन्दी के विकास के लिए
महत्वपूर्ण योगदान दिया। पं. रामविलास शर्मा ने तो हिन्दी के
विभिन्न पहलुओं पर शोध ग्रंथ लिखते हुए हिन्दी को राष्ट्र चिंतन के
साथ जोड़ दिया। बावजूद इसके सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में
आज हिन्दी की यह दुर्दशा बनी हुई है। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने
पूरे विश्व में साम्राज्य स्थापित करने के लिए अपनी भाषा को
विश्वव्यापी बना दिया। पूरे विश्व में भाषाई आदान-प्रदान अंग्रेजी
माध्यम है तो अंग्रेजी सीखना गुनाह नहीं है। परन्तु इसका मतलब यह
नहीं कि हम उस भाषा के गुलाम हो जाएं। रूस, चीन जापान, फ्रांस,
जर्मनी इन देशों को तो अंग्रेजी का मोहताज नहीं होना पड़ा। सन्
1801 में मैकाले ने हम भारतीयों के मन-मस्तिष्क में जो अंग्रेजी
सिक्षा पद्धति का बीज बो दिया था, हम उस मानसिकता से अब तक छुटकारा
नहीं पा सके। जबकि अपनी भाषा, अपनी बोली में जितनी ग्राह्य क्षमता
होती है, विदेशी भाषा में वह नहीं हो सकती। महात्मा गांधी ने एक
बार नागरी प्रचारिणी की सभा में अपने व्याख्यान में कहा था कि
हिन्दी ही हमारी राष्ट्र भाषा हो सकती है, क्योंकि हिन्दी को बोलना
एवं समझना सरल है. जबकि अंग्रेजी एक झरोखे के समान है जिससे बाहर
की हवा एवं रोशनी अंदर आ सकती है, परंतु उसे अगर दरवाजा बना दिया
जाए तो घर कमजोर हो जाएगा।
हिन्दी दुनिया की महानतम भाषाओं
में एक है। पूरे विश्व में अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दी
का तीसरा स्थान है। हिन्दी का महत्व आज इसलिए बढ़ गया है कि पूरा
विश्व आज अत्याधुनिक तकनीक का विकास कर रहा है। सही तकनीकी विकास
के माध्यम से भारत को विकसित देश बनाने के लिए अपनी भाषा में
तकनीकी ज्ञान की अधिक आवश्यकता है, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान
देश है, जो कि गांव के किसान ही इसका मुख्य स्रोत है। उन्हें अधिक
से अधिक कृषि तकनीकी ज्ञान देने के लिए हिन्दी तकनीकी का विकास
अनिवार्य है। इन गांव के किसानों को कृषि तकनीकी शिक्षा हिन्दी में
ही दी जा सकती है। अत: हिन्दी को आज
प्रगति पथ पर निरन्तर बनाए रखने की एवं मौलिक कारणों से हमारी
राष्ट्र भाषा है। कोई भी राजनैतिक कारण कितने ही प्रबल क्यों न
हों, हिन्दी भाषा के उत्थान के आड़े नहीं आ सकते हैं, क्योंकि
जन-जन की इस भाषा को जन - जन के मुख से सुनने की जन - जन की इच्छा
है।
अन्त में यही कहना चाहूंगा कि हम
सभी को खास तोर पर साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय
एकता तथा अखंडता बनाए रखने के लिए हिन्दी की भूमिका के महत्व को
समझते हुए इस दिशा में गंभीर चिंतन करते हुए राजनीतिज्ञों पर दबाव
डालते हुए कि हिन्दी के विकास में अधिक से अधिक जोर दें।
(22 मई 2010 को शिलांग में
पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी द्वारा आयोजित हिन्दी विकास सम्मेलन में
प्रस्तुत)
(203/बी,
न्यू रूआबांधा सेक्टर, भिलाई नगर, जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़)
|