Gangtok, Sikkim,
Editor: Subhash Deepak
 
 

 

पक्षपात

 

 

पुष्पधर शर्मा

 

सूँघ रहा है जैसे

पक्षपाती हाथ

शब्दों में

अर्थों को विचलित करते हुए।

 

कहती हैं

पथ - भ्रष्ट नीतियाँ

फूलों को खिलने से रोकना

नियम है।

 

'बीजों को अंकुरित होने न देना'

घड़ी की सुई के परिभ्रमण में

घसीट घसीट कर

बना हुआ नियम है।

 

अत:

पक्षपाती हाथ के कारण

पक्षपाती है धरती

पक्षपात करता है आकाश भी।

 

(नेपाली से अनुवाद - लक्ष्मण अधिकारी)                   जनवरी 2012

 

नेपाली कहानी

दासत्व की प्रेतात्मा

 

कृष्ण गिरी

 

मालिक हो तो ऐसा। अपने परिवार के प्रति कितनी श्रद्धा! कितना उदार हृदय!

मेमे साहब भी तो कितनी अच्छी हैं। 'आप' कहकर पुकारती हैं।

काश! हमारा भी ऐसा ही मालिक होता। तनख्वाह के अलावा गर तीज - त्योहार में उसे और उसके बच्चों को साहब अपने पुराने कपड़े देते हैं। बूढ़ा मजे में है।

कल उसका मालिक कह रहा था, बूढ़ा बहुत बीमार है और अस्पताल में है। पर देवता जैसे मालिक का उपचार पाने पर बूढ़ा जल्दी ही तगड़ा हो जाएगा।

 

बूढे के सहकर्मियों में साहब इसी प्रकार प्रशंसा का पात्र है।

 

...चौकीदार को देखकर लौटे साहब ने आराम से कुर्सी पर बैठकर चुरुट जलाया। उनका बैठने का, चुरुट पीने की अदा और चेहरे पर की अप्रसन्नता से ऐसा आभास होता है कि साहब काफी सोच में हैं।

मेम साहब प्रवेश करती हैं।

 - क्या हुआ आज आपको?

 - क्यों क्या हुआ? पर उनकी आवाज के भारीपन को मेम साहब महसूस करती हैं।

 - चौकीदार की बीमारी और बढ़ रही है।

 - दूसरा चौकीदार रख लेने से भी तो काम चल जाएगा।

 - यही तो सोच रहा हूँ। पर दूसरा चौकीदार लाने से कोई फायदा नहीं है।

बूढ़े की तरह और कोई इतना खटने से रहा।

 

ऐसा नहीं है कि बूढ़े को गाँव के युवकों ने न भड़काया हो। वे कहते, 'देख, तुम्हारा काम रात की चौकीदारी ही है, दिन की नहीं। तनख्वाह सिर्फ रात के काम की मिलती है तुन्हें, दिन के काम के एवज में क्या मिलता है? कोठी की चौकीदारी तुम्हारा मुख्य काम है, घास काटना और ईंधन लाना नहीं।' पर बूढ़ा बत्तीसी दिखा देता।

 

 - दरअसल, दूसरा चौकीदार लाने में  हमें नुक्सान है। नया चौकीदार रात की चौकीदारी के अलावा और क्या काम नहीं करेगा। तब हमें नए चौकीदार के साथ - साथ माली और ग्वाला भी तो लाना पड़ेगा। खर्च तीन गुणा बढ़ जाएगा। आज तो वे सभी काम एक ही चौकीदार करता आया है और हम मस्ती में थे न!

 - हाँ।

 - तुम्हें पता है बूढ़ा इतना क्यों खटता था?

 - भोला - भाला है न!

 - नहीं, दरअसल, वह भी जानता कि हम उस पर अत्याचार करते हैं। हमारे पुराने कपड़े - लत्ते पाकर उसे गर्व नहीं, नीचता का बोध होता है। पर गरीब बेचारा करे क्या? एकमात्र नौकरी हाथ से छुट जाने का डर है उसे। हम उसकी गरीबी और लाचारी का फायदा उठा रहे हैं। हम उसका शोषण कर रहे हैं क्योंकि इससे हमें फायदा होता है। चौकीदार को स्वस्थ बना सकें तो अभी और चार - पाँच साल तक उससे लाभ उठा सकते हैं। माली और ग्वाले पर होने वाला खर्च भी बचा सकते हैं। (अनुवाद - सुवास दीपक, प्रस्ताव, 1981 से साभार)                दिसम्बर 2011

 

 

प्यास जो मिटी नहीं, यात्रा जो पूरी नहीं हुई

 

थीरू प्रसाद नेपाल

 

था प्यासा  मैं

प्यासा ही यात्रा पर निकल पड़ा

गंगा - जमुना

कृष्णा - कावेरी - गोदावरी

टिस्टा - रंगीत

मेची - महाकाली

सभी का पानी पीता रहा

और चलता रहा।

 

मेरी तरह प्यासे होंगे

सोचकर पुरखों को

यात्रा के हर पड़ाव पर

छत्तीस अंजुलियाँ पानी चढ़ाता रहा।

 

मैं भटकता रहा लापरवाह

कैलाश - मान सरोवर की ठंडी हवाएँ

सगरमाथा के शिखर पर

वर्फीली हवाओं के थपेड़े झेलता।

 

पहाड़ मैदान जहाँ भी गया

अपनी कौम की तरह

कहीं सुख मिला तो कहीं दुख।

 

जल राशियों और नद - नालों का पानी पीता रहा

नियति को कोसते कोसते

श्राप मोचन के लिए ठंडे पानी से नहाते

मैंने कोई जगह नहीं छोड़ी

(ऐसी कोई जगह नहीं बची जहाँ मेरे पाँव न पड़े हों)

 

- कौम पर लगे अनेकता के श्राप के मोचन के लिए

कोई तीर्थ नहीं छोड़ा

कोई मन्दिर, मस्जिद, गिरजा नहीं छोड़ा।

 

लेकिन श्राप यथावत है।

 

न जाने क्या ढूँढ रहा है यह मन

न जोने कैसी प्यास दे यह जन्म - जन्मान्तरों की

न तो प्यास मिटी

न यात्रा ही पूरी हुई।। (अनुवाद - सुवास दीपक)   नवम्बर 2011

 

भारतीय नेपाली कविता

 

उजाले से

 

मीना सुब्बा

 

समान पर घुमड़ते कोहरे को देखकर

हताश भी नहीं होना है

कुछ क्षणों में हवा बहा ले जाती है

फूलों में काँटे हैं कहकर

शिकायत भी नहीं करनी है

फूल तोड़ने के लिए

आगे बढ़े हाथ को काँटे रोक लेते हैं

जीवन एक भ्रम होने पर भी

हौसले से इसे जीना पड़ता है

जीवन की यात्रा कंटकमय होने पर भी

अब तो मन की गली खाली नहीं है

हँसते - हँसते रोने की नियति बी नहीं है।

 

बढ़ता एक पौधा थी मैं

उखाड़ने पर दूसरी मिट्टी में जाने से

कुछ समय के लिए मुरझाकर

मिट्टी ही में लिप गई मैं

मुसीबतों के पहाड़ों को उठाते हुए भी

इन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा

लेकिन भारी हिमपात के बाद

धरती के चेहरे पर उजाला छाने की तरह

निरन्तर वर्षा थमने के बाद

क्षितिज पर इन्द्रधनुष लगने के बाद

अमावस्या की काली रात के बाद

पूर्णिमा का चाँद निकलता है

समय का चक्र इसी तरह घूमता रहता है

समय की हथेली पर इसी तरह खड़ी हूँ मैं आज।

 

उजाले में हूँ आज

उजाले की उँगली पकड़कर

उठने की कोशिश कर रही हूँ मैं।

 

(अनुवाद - सुवास दीपक)              अक्टूबर 2011

 

दो हाथ परे

 

राजेन्द्र भण्डारी

 

क लय बुला रही है मुझे हमेशा

घर में, रास्ते में, जहीं - कहीं।

वह भागती है, मैं उसका पीछा करता हूँ।

मैं खड़ा होता हूँ, वह भी तनकर खड़ी हो जाती है।

कहीं दूर चले जाने की इच्छा होती है,

वह फिर अचानक आ जाती है।

 

सोचता हूँ चारों ओर जमीन पर

बिखरे शब्दों को चुनकर कविता बनाऊँ

चुनने के लिए झुकता हूँ - ।

उँचाइयों को चुनने के लिए पेड़ों पर चढ़ता हूँ

कहाँ है पकी नाशपती?

गहराई की तलाश में जमीन खोदता हूँ

वह स्वादिष्ट तरुल कंदमूल कहाँ है?

फेंक देता हूँ कान आसपास।

किस कोने से आ रहा है यह संगीत?

 

झिलमिलाहट हँसती है चिरैचिरा क्रंदन करता है।

वह उसकी पीठ, उसकी चाल, वह कोट, वह ऐनक।

उसे देखता चल रहा हूँ

टीलों, भीहड़ों - ढलानों, सड़कों, गलियों, शहर - दर - शहर।

'रुको न' चिल्लाते हुए कंधे पर लटके झोले को फेककर दौड़ता हूं।

 

कभी - कभी आकर सफेद रोशनाई से दस्तखत किए हैं वक्त ने

तुम्हारे ललाट पर।

तमाम उम्रों को गठरी में बाँधकर उसका पीछा कर रहा हूँ।

हमेशा के जवान तंदरुस्त टाँगों से वह फटाफट चलता है।

हमेशा रसीला ज्यामिर फल वह।

 

कभी तो मुलाकात होगी इसीलिए चल रहा हूँ मैं

लेकिन तनकर खड़ा हो जाता है वह

मुझसे ठीक दो हाथ परे।

(भावानुवाद - सुवास दीपक)      अक्तूबर 2011

 

मौनता

 

प्रद्युम्न श्रेष्ठ

 

कांत कमरे में मौनता छायी है

मैं कविता लिखने का प्रयत्न करता हूं

शब्दों की सृष्टि करता हूं

मेरे भूखे विचार यहां सृजना करते हैं

कविता के जन्म से मुझे आनंदित बनाते हैं

मैं रोमांचित बन संतोष की सांस लेता हूं

मैं कविता दुहराता हूं, पढ़ता हूं बार - बार

इसी क्रम में मस्त निद्रा में चला जाता हूं

सुबह कमरे के सुहाग से बलात्कार करती है

सूर्य विचारों से संभोग करता है

और जन्माता है कविता

मैं उस गहरी नींद के सपने

ढूंढ़ रहा होता हूं

उन खोयी रातों को और दिनों को

ढूंढ़ने का प्रयत्न करता हूं

मैं तुम्हारी तस्वीर की ओर तनिक देखता हूं

मेरी मौनता में आंधी आई होती है

मैं फिर कविता लिखता हूं

दूसरे सफेद कागज पर

उस जीवन की मौनता में

दूसरी कविता फिर जन्म लेती है।

(अनुवाद - सुवास दीपक)       सितंबर 2011

 

 

नेपाली कहानी

बढ़ते कदम

 

धनवीर पुरी

 

शान्त और सुललित पर अन्दर ही अन्दर उग्र दरिया के बहाव की तरह एक लम्बे जुलूस को देखकर अभी वह पहुँचा ही था कि उसे घर बदला - बदला सा लगा। सूर्य पश्चिम के आकाश को गरमाहट पहुंचा रहा था और कहीं - कहीं सुर्ख और पनीलेपन की छटा आकाश में दृष्टिगोचर हो रही थी।

 

चिथड़े झोले को पटककर एक दफा अपने चकित शरीर का मुआयना करने पर उसे लगा कि उसका शरीर भी साँझ के पनीलेपन की तरह हो चुका है।

 

'तुम भी उसी चिल्लाने वाले जुलूस से मिलकर आए हो क्या?' चेहरे की उड़ी रंगत को देखकर तारालाल की पत्नी ने पूछा।

 

समझकर भी अनजान की तरह तारालाल उल्टे पत्नी से पूठता है - 'तूने घर बैठे कैसे लोगों को देख लिया री? काम से थककर चकनाचूर होकर आया हूं, जल्दी ला, कुछ भूख टालने के लिए है?'

 

'क्या दूं, वापस आते कुछ दुकान से ले आते। मैं ही रोज कितना करूँ?'

पत्नी का ठंडा पर यथार्थ उत्तर था।

 

'इससे बेहतर तो मुझे जुलूस में चले जाना चाहिए था।' ठंडा नि:श्वास मुंह से निकलते उपर्युक्त शब्द भी मुंह से निकल पड़े। पत्नी की समझ में कुछ भी नहीं आया और वह मूर्खों की तरह उसे देखती रही।

 

'एक बार जोर से चिल्लाने पर कम से कम भूख तो टलनी थी।' तारालाल मन ही मन में फुसफुसा रहा था।

 

भूख टालने के लिए ऐसा ही उपक्रम करना पड़ रहा था।

 

...साँझ के अन्धकार ने डेरे को एक ही ग्रास में निगल लिया। तारालाल को घर के अन्दर और बाहर एक ही जैसे अन्धकार का बोध हुआ।

 

'नीरू, देख, हम बाहर भी रह सकते हैं। आखिर हम जैसों का अन्दर होता ही क्या है?' अन्धेरे में ही घर के अन्दर का पूरा अवलोकन करने के बाद उसने कहा।

 

पर आज उसकी बातें पहले जैसी नहीं थीं क्योंकि नीरू की समझ में नहीं आ रहा था कि तारालाल - उसका पति उसे कौन पहेलियां बुझा रहा है।

 

'उस तरफ का ठेकेदार पूछ रहा था कि तुम उन लोगों के साथ मिलते - जुलते तो नहीं?' नीरू बता रही थी।

 

'अब पूछेगा तो कहना, आता है।' आवेश से उसके मुंह से शब्द फूट पड़े थे। बाद में तारालाल कुछ चौंका था। घर के अन्दर उसे और अंधेरा घिर जाने का आभास हुआ।

 

'उस जुलूस को इतना छोटा नहीं होना चाहिए था, समझी नीरू? हम चुपचाप रहकर कितने महल खड़े कर चुके हैं? देख, छाले पड़े इन हाथों में कितने जीवों को आराम पहुंचाते - पहुंचाते जंग लग चुका है।'

 

दरअसल ये शब्द अंधेरे में बोले जाने पर न तो नीरू समझ सकी और न ही तारालाल के हाथों के छाले ही देख सकी। तारालाल की आँखों के सामने लोगों का लम्बा जुलूस अंधेरे में जाता दिखाई पड़ रहा था।

 

'मैं नए रास्तो बनाता हूं पर मेरे खुद चलने वाले रास्ते टूटते जाते हैं। मैं नए घरों का निर्माण करता हूं पर मेरा अपना ही घर आँधी - तूफान की थपेड़ों से नष्ट हो जाता है। मेरा निर्माण...!' वह लम्बा नि:श्वास छोड़ता है। अन्धकार को उजाले में तब्दील करने की नाकाम कोशिशें करता हुआ जुगनू कभी टिमटिमाता है तो कभी बुझ जाता है।

 

'आज तुम्हें हुआ क्या है? अंधेरे में क्या बड़बड़ा रहे हो?' नीरू पूछती है।

 

'नीरू, मेरा उस जुलूस में शामिल होना जरूरी था। ठेकेदार को पता चल जाएगा तो सिर्फ सत्तू खाने का बन्दोबस्त भी तो खत्म हो जाएगा न!'

 

'तुमने देखा नहीं, वीरमान को ऐसे लोगों के साथ चिल्लाने की क्या सजा मिली? उसे काम से बी हाथ धोना पड़ा और कितने दिनों तक भूखा रहने के बाद अब न जाने वह कहाँ चला गया है।'

 

'नीरू, ऐसी बस्तियाँ सिर्फ यहही नहीं, देश भर में हैं। और हमारी तरह इन बस्तियों की झोंपड़ियों में रहने वाले यहां ही नहीं हैं, देश भर में हैं। नीरू, हमारे जैसे लोग कभी महलों में बास नहीं कर सकते, सिर्फ आँधी - झड़ी से अपने को बचाने के लिए जहां - तहां डेरा जमा सकते हैं। पर अब यह मेरा रहने लायक नहीं रह गया है। हमारे खून - पसीने से वहां नए - नए महल खड़े होते हैं पर रोजाना हमारी झुग्गी - झोंपड़ियां खत्म होती जा रही हैं।' अन्तिम वाक्य को कह पाने में तारालाल को काफी जोर लगाना पड़ा था।

 

नीरू ढिबरी चलाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। चूल्हा ठंडा पड़ा था। तारालाल को अपना यह घर घर की तरह न लगकर डरावनी गुफा की तरह लग रहा था।

 

'यह भी कोई जीना है, नीरू? खून - पसीना एक करके भी एक जून की रोटी तक मयस्सर नहीं होती। खून हमारा सूखता है, सुख और मिठास के भागीदार और होते हैं। नीरू, सिर्फ मुझे ही नहीं, हम सभी को मिलकर उस जुलूस में शामिल होकर आवाज उठानी चाहिए थी।'

 

'हमारी बातें सुनेगा कौन? और अब तो उल्टे जेल में ठूंस देते हैं। गरीब का तो भाग्य ही फूटा होता है।'

 

'ऐसा नहीं, गरीब का सहारा गरीब ही होता है। मूक बने रहना ही हमारी मूर्खता  है। सन्तोष करने से जिन्दगी में कोई बदलाव नहीं आएगा।...इसी झोंपड़ी में दबकर मरने की नौबत आ जाएगी। एक गरीब की मौत की कथा सुनता ही कौन है?तारालाल भी मेहनत करते - करते एक दिन अपने परिवार के साथ भूखों मर जाएगा...।'

 

इस देश के बड़े - बड़े आलीशान महलों के साथ न्याय के सम्बन्धों की असलियत पा जाने पर ही तारालाल के अन्दर सच्चाई अंकुरित हो रही थी।

 

निचट अंधेरे के शाथ रात घिसटती जा रही है। सच्चाई हमेशा सच्चाई ही होती है। निचट अंधेरे को चीरकर भी तारालाल की आँखें उस जुलूस को देख रही थीं... नीरू और तारालाल की तरह के अनगिनत शोषित - पीड़ितों की आवाजें वह सुन रहा था। जुलूस में शामिल होने की उसकी इन्छा बलवती हो उठी। कदम अपने आप आगे बढ़ते गए।

 

नीरू ने देखा, निचट अंधेरे में भी सहज ही दीख सकने वाला उसके खसम का आकार अंधकार को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था....

                                                   (अनुवाद - सुवास दीपक)        अगस्त 2011

 

नेपाली कविता

 

गाँव की नदी

 

मंजुल

 

मैं गाँव की नदी

बहने से नहीं रोक सकता मुझे कोई

मैं गाती हूँ

लेकिन कुछ कहने की लालसा से नहीं

कुछ समझाने के लिए नहीं

लेकिन सुनने वाले

अपने- अपने दु:ख सुनते हैं

अपनी अपनी पीड़ा समझते हैं

समाधान भी पाते हैं

विलक्षण बात है!

 

लेकिन कुछ कहने को

मैं कभी नहीं गाता

मैं गाने के लिए गाता हूँ

प्रकृति की भाषा

समझने की कोसिश करने पर सभी की

समझ में आने वाली

 

मैं गाँव की नदी

कहने से

कोई भी नहीं रोक सकता मुझे

 

(अनुवाद: डॉ. संजय बान्तवा ) जुलाई 2011

 

नेपाली कविता

 

तुलना

 

दिलमान राई चोट

 

मेरी आँखों में

सुन्दर संसार था

लेकिन आज एक अन्धे ने

शहर की सड़क पार कराई

मेरे कानों में संगीत - लहर थी

लेकिन आज एक बहरे ने

सुर का महत्व समझाया

मेरे कण्ठ में कोयल का सुमधुर स्वर था

लेकिन आज एक मूक - वधिर ने

गाना सिखाया

मेरे दोनों पाँव साबूत थे

लेकिन आज एक लंगड़े ने मुझे दौड़ में हराया।

 

(नेपाली से अनुवाद - सुवास दीपक)  जून 2011

 

पंजाबी कहानी

 

कत्ल

 

जिंदर

 

स रात में कमरे में अकेला था। बापू का अस्तित्व में लिए होने न होने जैसा था। वैसे भी बापू को कोई सुधि न थी। बाजू या टाँग जिस तरफ भी उठाकर रख दी, वहीं की वहीं टिकी रहती - निर्जीव! दोपहर को तो बार बार ऐसा लगता था कि वह आज की शाम बमुश्किल निकालेगा। वह कठिन - कठिन लम्बे साँस ले रहा था। उसका पेट जरूरत से अधिक फूल जाता था।  गले से घर्र -  घर्र की आवाज आती तो माँ सिरहाने की ओर पड़े मेज पर रखी लुटिया में से जल चम्मच भर - भरकर उसके मुँह में डालना सुरू कर देती। काफी देर तक पानी मुंह में ही बना रहता। जब वह आह भरने जैसा साँस लेता तो पानी गले से नीचे उतरता। माँ निहारती, पायजामा देखती और विचारों में खोई - खोई 'वाहेगुरु - वाहेगुरु' करते हुए कमरे से बाहर हो जाती। फिर वह बेचैन हो उठती। शायद इस कारण कि बापू का अंत समीप था। अब फर्क पड़ने की आशा धुंध में खोई हुई वस्तु की तरह थी तथा डॉक्टर जगदीश ने जवाब देने की मुद्रा में कह दिया था कि बुजुर्ग की सेवा में ही तुम सबका भला है। फिर माँ ने बापू के कमरे की अगरबत्ती बुझने नहीं दी थी तथा स्टीरियो पर भोर से लेकर रात तक 'रहरास' का पाठ चलता रहता। इन क्षणों के दौरान मां की आंखें बन्द होतीं, वह चुपचाप चलती - फिरती तथा बापू को कंधे से पकड़कर झकझोरती हुई कहता, "तुम आवाज के पीछे - पीछे पाठ करते रहो। शायद अगले जन्म में तुम्हारा भला हो जाए।"

 

माँ का बार - बार यह दोहराना मुझे बहुत बार हँसा दिया करता। इन क्षणों में मुझे अपने आप पर नियन्त्रण रखना बड़ा कठिन लगता तथा मैं अपना सिर टखनों तक झुका लेता, कदाचित् मां कह न दे - तुम्हारा बापू मौत  से जूझ रहा है और तुम्हें हंसी सूझ रही है। वैसे माँ का ऐसा करना मुझे अजीब लगता, आश्चर्यजनक!

 

अब भी अजीब लग रहा था। अब  ही क्यों, जब से मैंने होश सम्भाला है तब  से ही अजीब लगता आ रहा है। फिर कॉलेज में जाते हुए इन सब बातों के कुछ दूसरे ही अर्थ समझ में आए थे। बापू मनमौजी था। जो मन में आता, वही करता। फिर चाहे लाभ हो या हानि, इससे उसका कोई सरोकार नहीं था। उसने अपना हठ तब तक  निभाया जब तक उसकी चलती रही। चली ही क्यों, तब तक जब तक उसे अपनी सुध - बुध रही। अन्तिम समय से तीन दिन पहले तक।

 

पेशाब करने के लिए मैं उठा तो बापू का दायाँ बाजू खाट से नीचे लटक रहा था। मैंने आगे बढ़कर बाजू को उठाया और उसे फिर से खाट पर रख दिया। तभी, मेरा ध्यान बापू के चेहरे की ओर दायें - बायें चला गया। उसके नेत्र बन्द थे तथा कोरें गीली थीं, नाक के दोनों ओर मैल की पपड़ी जमी हुई थी। दाढ़ी के बाल बिखरे हुए थे। एकाएक मैंने उसके झुरिर्यों - भरे चेहरे की ओर से अपना ध्यान हटा लिया। मुझसे उसकी ओर देखा ही नहीं गया। इसलिए नहीं कि उसका अन्त समीप आ गया था तथा उसके गालों के नीचे वाली हड्डियाँ बाहर को झाँकने लगी थीं या मुझे उसके चेहरे से भय लगा था या उससे दुर्गन्ध आ रही थी, परन्तु दुर्गन्ध जैसा कुछ नहीं था। माँ तो दोनों समय गरम पानी से उसका मुख पोंछती रही थी तथा दूसरे दिन कपड़े भी बदलती रही थी - चादर और दरी समेत। स्वयं बाहर वाली खिड़की खोलती तथा शाम को बन्द कर देती थी वह। कांता या मेरे भरोसे कोई काम नहीं छोड़ा था उसने।

 

पता नहीं कितने साल हो गए। शायद मेरी नौकरी लगने से पूर्व हो सकता है, तब से ही जब मेरा कॉलेज में प्रथम वर्ष था। प्रवेश - शुल्क तथा खर्च सरवन भाई साहब ने दिए थे। आगामी सैशन का शुल्क जमा करवाना था। बापू अपनी बैठक में बैठा गीत सुन रहा था। अपने मूड में। उस समय वह घर के प्रत्येक सदस्य की इच्छा पूर्ण कर देता था, सिवाय माँ के। माँ तो उसके कमरे में जाने का साहस ही नहीं करती थी। रोटी देनी हो तो कांता जाती, चाय पूछनी हो तो मैं पूछता। पता नहीं बापू मां से इतनी घृणा क्यों करता था। कई बार मन करता कि पूछूँ, परन्तु पिता और पुत्र के मध्य की दीवार मैं पार नहीं कर पाता था। बुआ के यहाँ जाना होता था किसी के शोक पर, बापू कांता द्वारा संदेश भेज देता, 'अपनी मां को बोल देना, जल्दी चलना है। यूँ ही समय न बर्बाद करती रहे। समय से लौटना भी है।' तथा चलते समय आदेश देता, "मैं जा रहा हूं।" बापू बस - स्टॉप पर पहुंच चुका होता तब कहीं मां घर से निकलती। वापसी पर भी आगे - पीछे ही लौटते, हम चारों बहन - भाई छुप - छुपकर हँसते।

 

गीत समाप्त होने तक मुझे चुप रहना पड़ा था। बापू ने आँखें मूंद रखी थीं। ऐसे जैसे कोई साधु भक्ति में लीन होता है। दीवार के साथ लगाए तकिए से उसने पीठ लगा रखी थी। सिर पर साफा लपेट रखा था। घुटनें को बाहुपाश में बाँधे और ऊपर शॉल लपेटे।

 

"बापूजी, मुझे 120 रुपये फीस के देने हैं, कल तक।"

 

उसने आँखें खोलीं, जलती हुईं। आज उसकी आँखें बिना पिये ही लाल थीं। शायद पहले से ही लाल हों, इस विषय पर मुझे अधिक ज्ञान नहीं क्योंकि मैं उसकी ओर कभी सीधा नहीं देख पाया था आज तक।

"अपनी माँ से ले लेना," उसने फिर आँखें बन्द कर लीं तथा अगले गीत के साथ - साथ वही शब्द गुनगुनाने लग पड़ा।

 

मेरे पास कमरे से बाहर तले जाने के अतिरिक्त और कोई चारा न था। मुकेश के गीतों के दौरान वह किसी प्रकार की दखलअंदाजी पसन्द नहीं करता था। यदि मैं प्रत्युत्तर में बोलता तो वह सीधा ही मुझे कमरे से 'दफा हो जा' कह देता। द्वार के पास आकर मैंने उसकी ओर देखा था। उसका चेहरा मुझे किसी फकीर जैसा लगा था। पहुँचे हुए फकीर की तरह शांत - गंभीर!

 

शायद माँ ने भी उसकी बात सुन ली थी। मुझे संकेत से अपने पास बुलाकर कहा था, "खबरदार जो भविष्य में इससे कभी एक पैसा भी माँगा...जितनी देर तुम पढ़ोगे तुम्हारा खर्च मैं दूंगी, समझा! जीता रहे सरवन, अब तो ईश्वर की कृपा से वह प्रोफेसर लग गया है...यह कमाई उसके...।" और उसने चर्खे की हत्थी को जोर से घुमा दिया था। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया था। मैं जानता था कि वह कोई बात करने जा रही थी। मैं पाँच मिनट वहाँ खड़ा रहा था यह सोचकर कि आगे वह कुछ बोलेगी। जिसे वह बंती झीमरी से अपनी सौत कहा करती है, उसका आगा - पीछा उघाड़ने लगेगी, पर उसने न तो अपना सिर ऊपर उठाया था, न होठों में बड़बड़ाई थी। जैसे इसको वह अपनी किस्मत मान बैठी हो।

 

स्कूल को जाते समय तथा वापसी पर बापू का कारखाना रास्ते में पड़ता था। उन दिनों वह खेती मजदूर का काम करता था। एक दिन पूरी छुट्टी के समय मैं 'मेरे पिताजी' वाला प्रस्ताव याद करते हुए घर लौट रहा था। कई वाक्य याद आ जाते, कई भूल जाता। ऐसे ही भूलते - याद करते हुए बापू का कारखाना आ गया था। उसने आरन तपाया हुआ था। करमसिंह पंखा घुमा रहा था। लेकिन मैं वहाँ अधिक देर नहीं रुका क्योंकि बापू मुझे पंखा घुमाने के काम पर लगा देता। फिर घर तक मेरे प्रस्ताव में काफी कुछ जुड़ता चला गया था - 'मेरे बापू जी बहुत श्रम करते हैं। वह सवेरे - सवेरे आरन तपा देते हैं... घर अंधेरा होने पर ही लौटते हैं, रोटी घर से जाती है... चाय - पानी वहीं चलता रहता है।' ऐसी कई पंक्तियाँ और जुड़ गई थीं। मेरा प्रस्ताव नया था, बाकी लड़कों से भिन्न। मुझे प्रसन्नता हुई थी। मुझे बापू पर गर्व था, उसके श्रमिक होने का।

 

मुख्य द्वार के पास आया तो माँ कुछ बड़बड़ा रही थी। मौसी करतारो उसे समझा रही थी, "ले, अरी! तुझे क्या चिन्ता है। इकलौती बेटी कांता, वह तो चावलों से ही ब्याही जाएगी। राजी रहें उसके मामे, तुम ज्यादा चिन्ता न किया करो। पुरुष जाति ऐसी ही होती है... जितना किसी का ढका रह जाए, अच्छा ही समझो।"

 

कल रात भी माँ और बापू झगड़ रहे थे, आधी रात तक। एक बोलता था, तो दूसरा चुप हो जाता। घूम - घूमकर बात वहीं आ जाती जहाँ से शुरू हुई थी। हम चारों बहन - भाई दालान में बैठे सुनते रहे थे।

 

"बता, तुझे कौन - सी चीज नहीं मिलती।" बापू चिल्लाया था।

"चीजों को मैंने चाटना।"

"मेरे से यह नहीं हो सकता।"

"फिर सो भी वहाँ जाया कर।" कलपती हुई माँ दालान में आ गई थी तथा ऊँची आवाज में बोली थी जैसे हमें समझा रही हो, "समझ लिया न!"

 

फिर माँ ने बापू की बैठक में कभी प्रवेश नहीं किया। बापू के लिए घर का अर्थ केवल बैठक रह गया था तथा मेरे प्रस्ताव के अर्थ बदल गए थे।

 

घड़ी ने ग्यारह बजने की सूचना दी थी। मेरी नजरें बार - बार कमरे में पड़ी वस्तुओं का निरीक्षण कर रही थीं। जितनी इस कमरे में सफाई थी, शायद शेष घर में न हो। प्रत्येक वस्तु सलीके से टिकी तथा संवरी हुई। बापू को सफाई पसन्द थी। यह बैठक उसने अपने लिए बनाई थी जिसमें दीवान पड़ा था, सोफानुमा पाँच कुर्सियाँ थीं, एक कोने में लकड़ी की छोटी - सी कोरनिस पर स्टिरियो पड़ा था तथा नीचे कैसेट। कमरे के बाहर मैट थी, किसी को भी अन्दर जूते लेकर आना सख्त मना था। एक बार उसका लंगोटिया यार मोहना अपने जूतों समेत भीतर आ घुसा। शायद वह अपने जूते ही बापू को दिखाना चाहता था। बापू कुछ नहीं बोला, बस छड़ी उठाई और एक - एक करके जूते दरवाजे से बाहर फेंक आया। लौटकर बोला, "ले भाई मोहन सिंह, यदि बच गए तो तेरे, कोई ले गया तो समझ लेना कि उसकी लाटरी निकल गई।" यह बात सारे गाँव में फैल गई थी और बापू के दूसरे किस्सों में एक यह भी शामिल हो गई थी।

 

दुपट्टा समेटे माँ अन्दर आई तथा बुझी अगरबत्ती को देखकर मेरी तरफ देखा। ऐसे मानो कह रही हो - बेटा, दूसरी अगरबत्ती लगाने में कौन से पैसे लगते हां। उसने एक और अगरबत्ती लगाई और आधी रजाई खींचकर घुटनों तक ओढ़ ली।

मैंने माँ की ओर देखा। वह सीधे बापू की ओर देख रही थी। उसकी आँखों में नमी थी। वह रोना चाहती थी, पर मेरे सामने रो नहीं सकती थी। इस कारण कि यदि वह रो पड़ी तो मैं तत्काल कह दूँगा, "माँ, तुम किसलिए रोती है? उसके लिए जिसने कभी तुम्हें पैर की जूती नहीं समझा।"

कांता चाहती थी कि वह रोए, दहाड़ मारकर। इससे उसके भीतर बंधी गाँठ की परतें खुलनी शुरू हो जाएँगी या वह इतना जोर से हँसे कि सारा गाँव देखे। इससे भी उसका बोझ हल्का हो सकता था। लेकिन वह कुछ नहीं कर सकती थी। यह बात बार - बार मुझे कटोच रही थी।

 

"विजय, नींद नहीं आ रही है क्या?"  माँ ने मुझे चुप देखकर पूछा।

"ऊँ...हूँ...।"

"फिर चाय बना लाऊँ?"

"तुम्हारा पीने का मन करता है?"

"मेरा मन तुझसे अलग तो नहीं।"

"मैं बना लाऊँ?"

"तू कहाँ माथापच्ची करेगा।" कांता भी सो गई थी, कल की उनींदी थी। बेटा भी उसका चंचल है।

वह खड़ी हो गई। जाते - जाते दरवाजे के पास लौट आई। बापू की रजाई ठीक की तो उसे नाक के पास जमी पपड़ी दिखाई दे गई। पास पड़ी कतरन से उसने धीरे - धीरे पपड़ी साफ की और दाढ़ी के बिखरे बालों को ठीक करने लगी।

"माँ, मैं चाय बनाकर लाता हूँ।" मैंने उसे अपने उठने का आभास नहीं होने दिया था। चाय में उबाल आने तक न जाने क्या - क्या सोचता रहा था। इसी बीच मुझे एक बात खटकती रही थी कि अब जबकि बापू के जीवन का कोई भरोसा नहीं रहा, फिर भी माँ ने सरवन भाई साहब को पत्र नहीं लिखा था, न ही किसी अन्य के हाथ सन्देश भेजा था। मैं उससे पूछता - पूछता रह गया था। इस समय उन दोनों को यहाँ होना चाहिए था। सरवन भाई साहब राजकीय कॉलेज में प्रवक्ता थे तथा कुलदीप भाई साहब रोडवेज में आडिटर। दोनों पहुँच वाले थे। सरवन भाई साहब के पास अपनी गाड़ी भी थी और वह बापू को नगर के किसी भी अस्पताल में दिखा सकते थे। फिर कोई सलाह भी करनी होती है। तीनों इकट्ठे होते तो किसी एक पर बोझ न पड़ता तथा पीठ पीछे कोई किसी को कहने वाला न रहता। प्रत्येक अपना कर्तव्य पूरा करता, गाँव वाले गर्व करते, माँ को चिन्ता न होती, कांता वक्त से अपने घर जाने वाली बनती। जिस दिन से बापू ने खाट पकड़ी है, कांता ही उसके पास थी। शायद इसलिए कि वह हम सबसे अधिक नजदीक रहती थी। माँ ने आस - पड़ोस के किसी लड़के के हाथ सन्देश भेजकर उसे बुलवा लिया था। मेरा आगमन तो कारणवश ही हुआ था। मेरी बच्ची को मक्की की रोटी बड़ी पसन्द थी। मक्की की मेथी वाली रोटी और अच्छी मक्की तो गाँव में ही मिल सकती थी। फिर जस्सा जब भी मिलता, गाँव आने का आग्रह करता रहता। शनिबार - इतवार का अवकाश था। इतवार शाम तक मैंने बोरा लेकर लौट जाना था। अगर मैं न आता तो मुझे बापू की बीमारी का क्या पता चलता।

 

कल शाम ही माँ को दिखाई देने लगा था कि बापू का अन्त सिर पर खड़ा है।उसने मुझे समझाने के अन्दाज में कहा था, "किसी को बुलाने की आवश्यकता नहीं, यह चाहे जैसा भी था, किसी की मृत्यु पर पीछे नहीं हटा। अगर किसी मृतक को स्नान कराने का साहस किसी में नहीं होता तो यह आगे हो जाता। तुझे पता है, अपने गाँव वाले दूनी पंडित का, वही जो खेत मजदूरी करता था, लंगड़ा दूनी, वह अपनी कोठड़ी में ही मर गया। दो दिन बाद पता चला। भय के मारे कोई पास नहीं जा रहा था। इस शेर के बच्चे ने दरवाजे को धक्का मारकर कब्जों समेत उखाड़ दिया। अन्दर से दुर्गन्ध का भभका उटा। बाहर तो भीड़ लग गई थी लेकिन कोई भड़वा आगे नहीं बढ़ा। यह अन्दर से बाहर आया और पड़ोसियों से बोला, "तुम ईंधन गिरवाओ, बाकी मैं जानूँ, मेरा कान। यदि कोई अर्थी को हाथ लगाने से डरता है तो मैं अकेला उठाकर ले जाऊँगा।"

मैं बापू की प्रशंसा सहन न कर सका। मैंने तो सदा ही यह चाहा कि मेरे सामने बापू की कोई निन्दा करे, उसकी दुर्बलताओं की कहानियाँ सुनाए, वह भी बढ़ा - चढ़ाकर।

परसों जब मैं अड्डे पर उतरा तो लंबरदार का प्यारा मिल गया। उसने पूछा, "ताऊ का क्या हाल - चाल है?"

"मैं तो खुद आठ महीनो बाद गाँव लौटा हूँ। यह गाँववालों को पता होगा।"

मैं खीझ उठा था।

"लो, बाप तुम्हारा है, कहता है, गाँववालों को पता होगा।" उसने व्यंग्य में कहा तो मैंने अपनी चाल की गति तेज कर दी। मैं जानता था कि प्यारे के बापू मोहने के साथ बापू का खाना - पीना रहा है और ये बापू की स्तुति के बिना और कुछ नहीं कहेंगे। वैसे भी ये बापू का उपकार मानते हैं। एक मैं था जिसने बापू को कभी कुछ नहीं समझा और बापू ने मुझे। गाँव छोड़े दस वर्ष होने जा रहे थे। बापू एक बार भी मेरे घर नहीं आया था। मेरे इकलौते बेटे मनदीप की छठी पर भी नहीं, तब केवल माँ गई थी। मैं डिब्बा लेकर स्वयं आया था। अखंड पाठ का कार्ड लेकर। बापू बैठक में बैठा था। मैं माँ को कार्ड पर छपे अक्षर ऊँची आवाज में पढ़कर सुनाने लगा ताकि बापू भी सुन ले - "सरदार मलकीयत सिंह की ओर से अपने पोते की..." अगले शब्द सुनने से पहले ही उसने स्टीरियो की आवाज ऊँची कर दी थी। मैं सचमुच समझ गया था। मैं न तो अखंड पाठ करवाने के पक्ष में था और न कार्ड पर बापू का नाम लिखवाने के। लेकिन नीलम ने मेरी एक न मानी थी। वह बार - बार कहती रही - बड़ों का नाम कार्ड पर आना ही चाहिए। इससे बापू जी शायद मान जाएँ, पर बापू भी अपने आदर्शों का पक्का था। माँ चाय बनाकर लाई थी और मैंने अपना मन बापू के पास जाने के लिए पक्का कर लिया था। लेकिन बापू ने खटाक से दरवाजा बन्द कर लिया और मुख्य द्वार से बाहर निकल गया। मुझे पता था कि अब वह कारखाने पर जाएगा। ऐसे अवसरों पर उसकी अंतिम मंजिल उसका हवेली में बनाया हुआ कारखाना ही होता है जहाँ कभी काम से उसे फुर्सत नहीं मिला थी। माँ के पास चुप के अतिरिक्त कोई चारा न था। मुझे इस बात का भी आभास था कि यदि मैं बापू को कारखाने जाकर निमंत्रण देने न गया तो माँ की मूकता लम्बी हो जाएगी। इस समय मुझे बापू से अधिक नीलम पर क्रोध आ रहा था। व्यर्थ में मुझे भेज दिया। साथ चलने को कहा तो बोली, "आपको मेरी स्थिति का तो पता ही है। मैं सफर कैसे कर सकती हूँ?" यहाँ आना मेरी मजबूरी बन गई थी और अब यही मजबूरी मुझे कारखाने तक ले गई। बापू एक बैड की टेक पर लगाने के लिए प्लाई नाप रहा था। मुझे देखकर बोला, "तू कारड सैल्फ पर रख दे और अपनी औरत के पास लौट जा।" बापू के रूखे स्वर ने मुझे कँपा दिया था। बापू के क्रोध में कोई फर्क नहीं आया था। कारखाने के घर तक का सफर मुझे कोसों दूर लगा था। पता नहीं क्यों जब कभी बापू क्रोध में बोलता था, उस समय मुझे बैठक में बैठे हुए मोहने के बापू के कहे शब्द बार - बार याद आते थे,"औरतें समझती हैं जब बेटे बराबर के हो जाएं तो उनकी सरदारी चलनी चाहिए। क्योंकि वे समझती हैं कि जब कभी बेटा बोलेगा तो अपनी माँ के पक्ष में ही बोलेगा। फिर तो बेटे शरीक हे गए। मैं तो ऐसे शरीकों को... पर भी नहीं मारता।"

 

दोनों हाथों मे चाय के गिलास पकड़े मैं आँगन में आया तो माँ बापू पर झुकी खड़ी थी। उसके हाथ बापू की गर्दन के पास थे। मैं आहिस्ता - आहिस्ता खिड़की के पास जा खड़ा हुआ। मुझे माँ घबराई हुई - सा प्रतीत हुई। वह बार - बार अपनी चुन्नी ठीक कर रही थी और उसे फैला भी रही थी। ऐसे जैसे वह जो कुछ भी कर रही हो, किसी दूसरे को दिखाई न दे। किन्तु उसने एक बार भी दरवाजे की ओर न देखा था।

माँ की अंगुलियाँ अभी बापू की गर्दन के पास थीं। मेरे मन में विचार कौंधा कि अब वह बापू का गला घोंट देगी। सारी उम्र बापू ने उसकी एक न सुनी, अपनी ही चलाई। शायद माँ का क्रोध बाहर निकलना शुरू हो गया हो या वह भी अपना बदला लेना चाहती हो। फिर इससे अच्छा अवसर और कौन - सा हो सकता है। मुझे यह अहसास होता जा रहा था कि माँ केवल जी रही थी, जीने के लिए। इससे अधिक कुछ भी नहीं। जब माँ की अंगुलियों की गाँठें दिखाई दीं तो मुझे खुशी हुई, अपार खुशी! मैं स्वयं चाहता था कि बापू मर जाए। इसे तो आज से पन्द्रह वर्ष पहले ही मर जाना चाहिए था। फिर यह जीवित क्यों रहा?

अब माँ का हाथ बापू की नाक के पास था। शायद वह बापू की गर्दन दबाने में असमर्थ रही हो और अब वह उसका साँस बन्द करके उसे मारना चाहती हो। मारने का यह ढंग भी बढ़िया हो सकता है। एक हाथ मुँह पर रख दो और एक से नथुने बन्द कर दो। पाँच मिनट में टैं बोल जाएगी। हाथों में पकड़े गिलास मैंने किनारे रख दिए। मेरे मन में आया कि इस काम में माँ की सहायता की जानी चाहिए। उसकी दुर्बल अंगुलियों में अब पहले जितनी शक्ति नहीं रही थी। कांता दालान में सो रही थी अपने बेटे को लिए। फिर मेरे सिवाय उसकी सहायता कौन कर सकता था? पर दूसरे क्षण मन में आया कि मेरे जाने से कहीं वह अपनी योजना बदल ही न दे। उसी क्षण माँ की देह काँपी। इस प्रकार जैसे किसी को ठंडे पानी में गोता लगवाकर बाहर ला खड़ा किया गया हो। मुझे लगा कि बापू पूरा हो चुका था। इसके बाद मुझे कोई होश नहीं रहा था क्योंकि माँ की चीख 'अरे लोगो, मैं बरबाद हो गई रे... मैं लुट गई... अरे मैं मारी गई..." ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया था।

 

बापू की देह को जमीन पर उतारकर रखते समय मेरी आँखें उसकी गर्दन पर केन्द्रित हो गई थीं लेकिन मुझे कुछ भी ऐसा वहाँ दिखाई न दिया जिससे मैं निर्णय कर सकता कि बापू अपनी मौत मरा था कि माँ ने...।

 

(जिंदर,समकालीन पंजाबी कहानी में एक बहुचर्चित और स्थापित नाम। अब तक पाँच कहानी संग्रह पंजाबी में तथा दो कहानी संग्रह हिन्दी में प्रकाशित। इसके अतिरिक्त दो रेखाचित्र भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी अधिकांश कहानियों का हिन्दी, तेलुगु, बंगला, मराठी, शाहपुरी लिपि (पाकिस्तान), अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित। संप्रति पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका 'शबद' का सम्पादन। यह कहानी उनके सद्य: प्रकाशित चुनिंदा पंजाबी कहानियों के संग्रह 'जख्म, दर्द और पाप', जिसका पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद सुभाष नीरव ने किया है, से ली गई है। सुभाश नीरव पिछले 35 वर्षों से हिन्दी लेखन और पंजावी से हिन्दी अनुवाद कर्म से जुड़े हैं।)

(मई 2011)

 

भारतीय नेपाली कविता

 

शब्द सार्थक सर्वदा

 

संजय बान्तवा

 

मेरे सत्य से टूटकर गिरते हैं

शब्द;

 

अकेले दंड भोग रही है दीवार मेरे साथ।

 

और मैं सत्यबीजों में उग रहा हूँ

चारों ओर आसमान

अपने इर्द - गिर्द एक क्षुद्र विराटता।

 

अनगिनत सरहदों पर पहुँच रहै हूँ।

 

फैल सकने वाली सीमित सामर्थ्य में

शब्द मुझे कविता कहता है

खड़ा हूँ शिव की तरह

 

सत्य हमेशा

हमेशा ही तुम्हारी आँखों की मृत देह में।

 

शब्द नहीं देखता सत्य के गरुड़ को;

वास्तव के जंगल के भीतर

पशुत्व की राजधानी।

 

एक जीवन मेरे अलावा

पता नहीं अक्षरों की सीमाओं को,

सच्चे देह और विराट की मृत्यु भी

पल रहे हैं पर शब्दकोश के संस्कार के साथ।

 

गिर रही है दीवार मेरे अंगों से

सुन्दरता की आंतरिक कोमलता को त्यागने

अकेले ही मुझे मेरे अकेले शब्द से सर्वथा और सर्वदा।।

 

अप्रैल 2011 (अनुवाद - सुवास दीपक)

 

मेरे लौट जाने के बाद

 

सुधा  एम. राई

 

भी इस कविता को मत छेड़ना

अस्वस्थ विचारों की भीड़ में

दुकान लगाकर मत रखना

किसी पुरस्कार के चयन के लिए

अंधे आदमी को मत थमाना

कहीं किसी के चाहने पर ही देना।

 

आलीशान गाड़ी से

हाथ में पुलिंदा लिए उतरा आदमी

भीड़ है वहां कविता की प्रति पाने की उम्मीद में

"बहती नदीं में ही हाथ धोना"

ठीक ही कहा है।

 

लेकिन मनु, समझ लो

कविता आग नहीं होती

यह तो पाठक को सिर्फ संदेश देती है।

 

बहती नदी में हाथ धोने का अर्थ

सूखे में सुलगी आग की तरह है।

 

बरसात में आई बाढ़ की तरह है।

 

कविता शरद् की होनी चाहिए

गुनगुनी धूप और तपिश की चाह में

ठिठुरते मन

प्रकृति की तरह पारदर्शी और समय की कविता

और अतिरिक्त बातें हमारे तुम्हारे बीच की

इसलिए तुम मत ढूँढना कभी भी

बम और आग मेरी कविता में

मेरे लौट जाने के बाद

शरद् के किसी फुर्सत के क्षण में

खोलकर देखना

 

"मेरे मन के फानूस में अभी भी जल रहे हैं

उम्मीद के तंतु

तुम्हारे तक पहुँच न सके दो कदम

बेवुनियाद अंधविश्वास

तुम और मेरे होने पर भी

बन न सके निर्बोध हमारे हजारों अप्रसांगिक तत्व और घात में

लुप्त हो चुके मन के रिश्ते

कविता के बाजार में कविता नहीं बन सके

कविता के मानवीय मूल्य।"

 

अभी इस कविता को मत छेड़ना

अस्वस्थ विचारों की भीड़ में

दुकान लगाकर मत रखना

किसी पुरस्कार के चयन के लिए

अंधे आदमी को मत थमाना

कहीं किसी के चाहने पर ही देना।

मेरे लौट जाने के बाद ही

शरद् के किसी फुर्सत के क्षण में

इसे खोलकर देखना।

 

अनुवाद - सुवास दीपक अप्रैल 2011

 

पर्वत

 

 

बैरागी काइँल

 

र के भीतर भी सिर तले में चढ़ते समय

ऊँचे - ऊँचे पहाड़ सीढ़ी के प्राय: ही चढ़ता हूँ।

आजकल सपनों में हरहमेशा मैं पर्वत चढ़ रहा होता हूँ!

 

जो झुकते नहीं हैं पर्वत, पहाड़

टेकते हुए झुकाता हूँ पैरों से हर कदम की देहरी पर

मेरी सड़क पर!

उफ! टूट कर बिखर जाती है

हिमालय की पीठ -

ताल ही ताल वमन कर मेरी सड़क पर!

 

आकाश की दीवारों से टकरा कर ढेर हो जाता है

प्रतिध्वनि का वज्र

दौड़ रही रेल के ऊपर मूल सड़क पर!

आईने के टुकड़ों में पड़े खून के कतरों के भीतर

डिब्बे पिचके हुए

 

 

जिन्दगी के क्षण...

टूटी हुई रेल की लीक पर

 

 

दहकती आग की लपट के भीतर से

मैं बटोरता हूँ, मैं ढोया करता हूँ...

जेब के भीतर और कंधों पर!

 

ढेर सारे बच्चों को स्कूल तक पहुँचा कर

ढेर सारे बेटों को सीमान्त के मोर्चे से घर वापस पहुँचा कर

ढोर सारे बापों को दफ्तर से वापस पहुँचा कर

अब तो थक गये हैं रास्ते...

हाँ, इन सब सड़कों को

मैं ने कुम्भकरण कंधों पर जिन्दगी की लाश उठाई है!

 

मेरे कंधों के ऊपर से

मेरे प्रेम के घनत्व तथा आस्था के उत्ताप से

पकी हुई जिन्दगी की लाश

कण - कण किरणों में टूट कर गिरती है

एक - एक वरदान ले कर उजाले में बिखर कर गिरती है

 

मेरे एक - एक कदम के बीतर: मेरी सड़क पर!

एक आँख गिरती है: एक रात शेष होती है

पाँव गिरता है: एक राह भर जाती है

पंजे गिरते हैं: पृथ्वी से आकाश तक पुल लटकता है

दो हाथ आलिंगन में गिरते हैं:

असीमित आयतन में धरती पर

और इतिहास में फिर एक दूसरा फाटक खुलता है!

 

फाटक के ललाट पर सारे

लोगों की जानकारी की खातिर

'धूपी' की पतली पत्तियाँ बीच - बीच

डालियों की गाँठ की आँखों के अक्षरों में

दौड़ते हुए आ कर लिख देता है समय: सूचना की चन्द पंक्तियाँ -

 

 

स्वागत है - पर्वतारोहियों का,

स्निग्ध कदमों का,

प्रत्येक जिन्दगी का!

 

अब प्रत्येक आदमी शुरू करे

अपनी - अपनी यात्रा फिर यहाँ से

इस फाटक से

 

सूर्य को भर कर

तीसरी आँख के बृहत् घूम रहे बल्ब के भीतर

उत्तान समुद्र को दोनों हाथों से टेक कर

फाटक की टाँग के नीचे से

शार्क और व्हेल के मत्स्य - आक्रमण से

बार - बार सामुद्रिक डाकुओं की लूटपाट से

धनमाल तथा जहाज को बचा कर

और उंगलियों में उठा कर गोवर्धन

 

खुद भी इस फाटक से

आजकल सपनों में हरहमेशा मैं पर्वत चढ़ रहा होता हूँ।

 

आजकल सपनों में हरहमेशा

मैं पर्वत चढ़ रहा होता हूँ।

 

(नेपाली से अनुवाद - बिर्ख खडका डुवर्सेली)

तनाव, अंक 80, 2001 से साभार

 

 

विचारों की आहुती

 

गंगा कप्तान

खिड़की से बाहर देखते सोचता हूँ मेरे मन की खिड़की खुली है जिससे आती हवा में मेरे विचार विलीन होते जा रहे हैं। कुछ सिमल की रुईं की तरह हल्के हल्के ऊपर उड़ रहे हैं तो कुछ विद्युत गति से। मेरे विचार बीच - बीच में टेढ़े - मेढ़े रास्तों से होकर आत्म - सन्तुष्टि के राजमार्गों का निर्माण करते उड़ते हैं।

एक ऐसा समय था जब मैं वैचारिक शब्द - चित्रों को उड़ते सिमल के फाहों की तरह लक्ष्यहीन न छोड़कर जतन के साथ संजोकर रखता था। और उन्हें किसी कविता, कथा या निबन्ध में जतन के साथ जड़ान करने की ख्वाहिश रखता था।

 

पर अब? कभी कभी मैं बैठा सोचता रहता हूँ, सिर्फ सोचता रहता हूँ। विचार उड़ते हैं, हवा में विलीन हो जाते हैं। आकाश की गहराईयों में उतरते हैं, चढ़ते हैं। यह प्रक्रिया सहजता के साथ सम्पन्न होती रहती है।

पर ऐसा नहीं है कि वैचारिक शक्ति से मेरा विश्वास पूर्ण रूप से उठ गया हो। मैं ने अपनी वैचारिक तरंगों को लिपिबद्ध करने की तत्परता दिखाई है पर मैं सोचता हूँ - विचार अमर होते हैं ... और इनके अमरत्व को स्वीकारने से ही हो सकता है इन्हें लिपिबद्ध करने की मुझे जल्दबाजी नहीं होती क्योंकि मुझे लगता है सभी विचार स्वतन्त्र नहीं होते।

विचारों की जितना स्वतन्त्रता दी जा सकती है, उतने ही वे स्वतन्त्र होते हैं। स्वतन्त्र विचारों से जगत की भलाई होती है। मानसिक तरंग के अन्दर स्वस्थ विचारों का प्रवेश निश्चय ही स्तुत्य होता है। हाँ, आजकल मैं ऐसे ही विचारों के यज्ञ में आहुती देने को उद्यत होता हूँ।

एक दिन की बात है, मानसिक आनन्द का लुत्फ उटाने के लिए मैं नजदीक के जंगल में प्रवेश करता हूँ। मन्द - मन्द समार ने वातावरण को ताजगी से भर दिया है। लताएँ और पेड़ आपस में आलिंगन और चुंबन कर रहे होते हैं। मुझे लगता है कि मैं अमरावती पहुँच गया हूँ और मानसिक चिन्तन में आकण्ठ डूब जाता हूँ।

पर अंधड़ एक ही क्षण उग्र रूप धारण कर लेता है। वह शैतान का रूप धारण कर लेता है। पेड़ उखड़ने लगते हैं, शाखाएँ टूटने लगती हैं। ऐसी स्थिति में अंधड़ से बचते भागते मैं एक गुफा में शरण लेने को बाध्य हो जाता हूँ।

एक घण्टा और बीत जाता है। बाहर आता हूँ पर शैतान रूपी अंधड़ का आखेट अभी तक जाती है।

मैं हँसता हूँ और दूसरी तरफ निकल पड़ता हूँ। भगवान बुद्ध पर भी कई बार शैतान ने वार किया है। प्रभु ईसा मसीह को भी शैतान ने सताया ही है। मैं भागता हूँ और युग - पूर्व को क्रियाकलापों के बारे में सोचता हूँ। वह समय था अध्यात्म और भौतिकवाद के सम्मिश्रण का। कौन कितना हासिल कर सका? पुरुषत्व, भोग, भजनादि की खोज आदि...।

... मेरी सोच पर अचानक परदा गिर पड़ता है। मैं चौंक पड़ता हूँ। पता चलता है कि मैं पता नहीं कब एक खाई में गिर चुका होता हूँ।

हँसते उठता हूं। पास की पहाड़ी से निर्मल जल बह रहा होता है। हृदय में कहीं - कहीं खुशी की लहर उठती है, आँखें बंद होना चाहती हैं। मैं आगे बढ़ता हूँ। आह! कितनी मिठास है इस जल में? l: प्रकृति की स्निग्ध धारा से मैं हार मान लेता हूँ। आँखें खोलता हूँ। संध्या अपनी प्रचुर छटा क्षितिज को लुटा रही होती है। मैं झरने के आलिंगन से मुक्त हो जाता हूँ तनिक सर्दी लगने लगती है पर लगता है तृष्णा अभी तक मिटी नहीं।

मैंने झरने के निमंत्रण पर तन के कपड़े तक नहीं उतारे और कूद पड़ा।

मुझे हँसी आ जाती है। मन ही मन में सोचता हूँ मैं खुद ही बुढ़बक हूँ। मन की खिन्नता को मिटाने के लिए जल्दी- जल्दी घर की ओर चल पड़ता हूँ।

ढिबरी का मरियल उजाला कमरे के अंदर घुस आए अंधकार को विकट संघर्ष के साथ बाहर धकेल रहा होता है। मेरे पिताजी देसी चुरुट सुलगा कर पी रहे होते हैं। शरीर के भीगे कपड़ों में ही मैं कमरे के अंदर घुसता हूँ। उनकी नजर मुझ पर पड़ती है। पर वह कुछ बोलते नहीं। मैं बगल के कमरे में घुस जाता हूँ। अंधेरे में ही कपड़े बदलता हूँ।

कपड़े बदल कर पिता जी के समक्ष उपस्थित होने में मुझ कठिनाई होती है। अंधेरे कमरे में ही ऊँघता बैठा रहता हूँ।

"प्रकाश...", पिताजी बुलाते हैं।

मैं झटपट उठकर उनके सामने उपस्थित हो जाता हूँ।

"अंधेरे कमरे में क्यों बैठा ता? कटुवा (देसी चुरुट) का लंबा कश खींचते हुए वह पूछते हैं, "अब तो तुम्हें उजाले से भी डर लगने लग गया है क्या?"

पिताजी का दूसरा प्रश्न मुझे व्यंग्य प्रहार - सा लगता है। लगता है शरीर पर कोई सुई सी चुभ गई है पर उसकी चुभन आत्मीय - सी लगती है और मैं विचलित नहीं होता हूँ। जवाब के बदले सिर्फ हँस देता हूँ और मन ही मन में सोचता हूँ वास्तव में संसार खुद को देख न सकने पर मैं धेरे में ही बैठा उजाले की परिकल्पना करने का प्रयास कर रहा था।

"बैठ, खड़ा क्यों है?" पिताजी का आदेश।

मैं उनके पास मौन बैठ जाता हूँ।

कुछ गंभीर मुद्रा में वह पूछते हैं, "प्रकाश, तुम इस घर की बत्ती को कुछ चमकती ही देखना चाहते हो या इसी प्रकार मरियल टिमटिमाती हुई ही?"

पिताजी के भौतिक लालच को देखकर मैं स्तब्ध रह जाता हूँ।

"उजाले के लिए ही इतनी ठोकरें खा रहा हूँ। उपलब्ध उजाले का त्याग कर कल्पना के उजाले को तलाशने का काया प्रयोजन?" मेरा जवाब होता है।

"तूने कॉलेज जाना क्यों छोड़ दिया? उजाले की तलाश का तेरा सिद्धान्त क्या यही है?" पिताजी प्रश्न दाग देते हैं।

"पिताजी, वैयक्तिक स्वतन्त्रता एक प्रकृति है। प्रकृति स्वयं एक शोध का विषय है। इसलिए यहाँ उजाले की तलाश का दूसरा सिद्धान्त लागू नहीं होता।"

"तू प्रकृति के साथ उसकी तुलना करता है?" पिताजी क्रोधित हो उठते हैं।

"प्रत्येक व्यक्ति स्वयं प्रकृति है पिताजी! सहस्र तत्व प्रकृति सृजन की पारमात्मिक विशेषता हैं। क्या इस विशेषता की तुलना व्यक्ति से नहीं की जा सकती?"

"मुझ सत्तर साल के बूढ़े को तेरे जैसे गधे को आत्मिक और पारमात्मिक सिद्धान्त सिखाने की जरूरत नहीं।" पिताजी क्रोध से आग - बबूला हो उठते हैं।

"तूने बी.ए. पास करके कौन सी जंग जीत ली है? मैंने पाँच किताबें भी नहीं पढ़ीं फिर भी इतने बड़े परिवार का भरण - पोषण कर तेरे जैसे कालिदास को बी.ए. तक पढ़ाया। भविष्य के लिए भी कुछ बचा कर रख छोड़ा है। अब मेरे हाथों में ताकत नहीं रही, क्या इसीलिए तू यह उपदेश देने की गुस्ताखी कर रहा है?"  क्रोध से चूर वह रसोई घर की ओर चल देते हैं।

"हे ईश्वर!"   मैं अपना सिर पकड़ लेता हूँ। मस्तिष्क पर जैसे वज्र प्रहार हो गया है। छटपटाता हूँ। हृदय मोमबत्ती की तरह पिघलने लगता है। सोचता हूँ क्या मैंने उजाले का सही अर्थ लगाया है? क्या भौतिक वस्तुओं के पीछे दौड़ना उजाले की सही परिभाषा है? इसका अर्थ यह हुआ कि इससे पहले का इतिहास, इतिहास नहीं? मेरा मस्तिष्क फटने लगता है। मैं दीवार का सहारा लेता हूँ। मेरी सोच मुझे ललकार रही होती है - शायद व्यक्ति - विशेष की प्रशस्ति ही अध्यात्म है,शायद व्यक्ति - विशेष का कृपा पात्र बनना ही उजाले को पाना है, शायद वेद, पुराण, बाइबल और कुरान मनगढ़न्त बातों की पोथियाँ हैं। शायद मैं इन्हीं का अनुयायी बनने के प्रयास में पिताजी की आँखों में नालायक, भाई - बहनों की नजरों में उल्लू तो नहीं बना हूँ? यदि ऐसा है तो मुझे संसार को पहचानने, उसमें उजाला बनकर सभी की आँखों में हीरा बन जीने के लिए व्यक्ति - विशेष की आराधना करनी पड़ेगी क्या? क्या ऐसा होने पर ही मैं अपने माँ - बाप की नजरों में योग्य सुपुत्र, भाई - बहनों की नजरों अकलमन्द भाई और पत्नी की नजरों में एक सामर्थ्यवान पुरुष बन सकता हूँ?...

और ..और इसके बाद मैं कुछ भी नहीं सोच सका। सिर चकराने लगता है। खुद पर नियन्त्रण रख न सकने का कारण चेतना - शून्य हो मैं शायद गिरने ही वाला हूँ। सायद मेरे मस्तिष्क से जुड़े तार निष्क्रिय होते जा रहे हैं। क्या होने जा रहा है, मुझे कुछ पता नहीं चलता।

"प्रकाश! प्रकाश!" कहीं से कोई आत्मीय मीठी आवाज में मुझे बुला रहा है पर मीटी नींद मुझे छोड़ना नहीं चाहती। आलस्य का अनुभव कर रहा हूँ उठने में।

"छप...छप...छप...।" मेरे मस्तिष्क पर आहिस्ता - आहिस्ता झरने का माधुर्य शीतलता प्रदान करता है। अलसायी नींद भागने लगती है। अचानक आँखें खोलता हूँ। अहो! यह क्या? मां - बाप, पत्नी, भाई - बहन सभी मेरे इर्द - गिर्द? सभी की आँखें नम हैं। मैं निस्तेज खाट पर पर पड़ा हूँ। स्थित् बोधगम्य नहीं है।

"प्रकाश! तुम्हें क्या हो गया है? माँ की आँकों से अविरल आँसू बह रहे हैं। पत्नी और भाई - बहन भी मेरी ओर देखते रो रहे हैं। मैं चारों ओर नजरें दौड़ाता हूँ।

"मैं बिल्कुल ठीक हूँ पिताजी!" मरियस हँसी में कहता हूँ।

हृदय भर में कंचनजंगा समेटे पिताजी कहते हैं, "मेरी पिछली बातों का बुरा मत मान बेटा। तू जैसे भी खुश रह, यही हमारी कामना है।" पिताजी की आँखें भर आती हैं। मुझे भी रोना आ जाता है।

काफी वक्त मौनता में बीत जाता है।

"पिताजी मैंने अपनी सम्पूर्ण मान्यताओं को त्याग दिया है। अब हम भी उसी तरह जीवनयापन करेंगे जैसे दूसरे सम्पन्न लोग करते हैं।" मेरे अन्त:करण से ये शब्द फूट पड़ते हैं।

सत्तर साल के बूढ़े बाप की झुर्रियाँ हँसती हैं। सभी के चेहरे खिल उठते हैं। मैं बुदबुदा रहा होता हूँ - "पिताजी, जिस आँधी ने मेरा पीछा किया, उसके आगे मैंने कभी समर्पण नहीं करना चाहा। मेरी यही भूल है पर अब आँधी को मेरा पीछा करना पड़ेगा। मैं कुद उसके पीछे - पीछे भागूँगा जैसे अन्य सम्पन्न लोग भागते हैं।"

सभी के चेहरे खिल पड़ते हैं।

आज का भोजन मुझे सबसे स्वादिष्ट लगता है। खाना खाने के बाद बैठक में सभी इकट्ठे हो गप्पें हाँकने लगते हैं। सचिव पद पर आसीन मेरे मामा जी को अच्छी नौकरी की व्यवस्था कर देने के लिए पत्र लिखने का निर्णय लिया जाता है। उसके बाद ही सभी अपने कमरों में सोने के लिए चले जाते हैं।

पाँच साल पहले नितान्त मेरी होकर आई मेरी पत्नी आज पहली बार, लगा सिर्फ मेरी है। भरे - भरे उसके गाल आज मुझे पके लाल सेबों की तरह लगते हैं। बेतरतीब दाँत अनार के पुष्ट दानों की तरह लगने लगते हैं। मैं ठिठौली करता हूँ और इसी प्रकार पूर्णतय: खुद को आज के भौतिक यज्ञ की आहुती बनाकर आधुनिक सभ्य और सम्पन्न आदमी बनने के लिए कल की परिकल्पना में डूब जाता हूँ।

सांसारिक किंवा भौतिक यज्ञ की आहुती खुद को बनाते हुए वर्तमान क्षण के बारे में सोचता हूँ कि यह स्मृति और आकांक्षा के बीच का शुद्ध क्षण है - दोनों के मिश्रण से मुक्त जीवन - क्षण।

इसी आत्मचिन्तन के माध्यम से मैं बलपूर्वक तृष्णा के चौराहे पर भटक रहा हूँ। अब सिर्फ एक ही मार्ग दिखता है आँखों के सामने.... शायद यही हो सकता है सात्विक जीवन का मार्ग।

इस निष्कर्ष पर पहुँचते और उसमें किसी विकल्प की गुंजाइश न रहने पर .... आहा! जीवन कितना सहजा हो जाता है...शायद!

(नेपाली से अनुवाद - सुवास दीपक, भारतीय नेपाली कहानियाँ, निर्माण प्रकाशन,1996 से साभार)

जनवरी - फरवरी 2011)

 

भारतीय नेपाली कहानी

सड़क

राजेन्द्र भण्डार

 

खनऊ एक्सप्रेस की तीखी चीख से बूढ़े की नींद टूट जाती है। चेहरे पर सूर्य की तेज किरणें छितरा जाती हैं। फर्श पर बिछी चटाई पर थाल रखकर सुमति एक दो मुट्ठी मुड़ई - भात के दो - चार लड्डू गूँथ रही होती है। अँगीठी पर रखी केतली से चाय की भाप निकल रही होती है। अपने आगे रखी खाद्य - सामग्री को व्यग्रता से वह पेट के हवाले करने लगता है। अपने हड्डियों के चेहरे पर एक - दो अँजुली पानी छड़ककर सुमति एक चिथड़ों की गठरी खोलती है और बेटी सुनन्दा को पार साल महावीर स्थान में सेठ करोड़ीमल द्वारा दान दी गई लाल साड़ी निकालती है और खुद एक मैली चादर से तन ढँकती है। रामदीन चाहता है कि यह साड़ी सुमति खुद पहने। कहता है - "उसको क्यों देती है, खुद क्यों नहीं पहनती?"

सुमति कुछ नहीं बोलती, चुपचाप अपने काम में व्यस्त रहती है। फिर बूढ़े की ओर जाकर उसके कान में फुसफुसाती है, "बेटी अब जवान हो चुकी है, मुझसे ज्यादा उसे अपनी लाज ढँकनी पड़ती है, गुँडों की नजर पड़ चुकी है उस पर, समझे?

बूढ़ा सुनन्दा के शरीर पर एक बार सरसरी नजरों से देखकर मन ही मन कहता है - सुनन्दा जवान हो चुकी है, पर कितनी जल्दी! सुनन्दा को नजदीक बुलाकर कहता है, "सुन, यह साड़ी अब तेरी हो चुकी है। जतन से पहनना, अँधेरी गलियों में अकेले मत जाना।"

आसमान पर सफेद - स्याह बादलों के झुण्ड इधर - उधर बिखरे होते हैं। शायद वे भी हाथों में ठीकरे उठाए चौरस्ते की ओर जा रहे हैं। रेल के लगातार धुएँ से ऊपर का आसमान ढँक - सा गया है। अधसोए यात्री आँखे मलते, हाथों में सामान उठाए रेल की ओर झपट रहे होते हैं। कुछ वेटिंग रूम की ओर चाय - नाष्ते के लिए जा रहे होते हैं। कुत्ते ताजे झाड़ों के सपने संजोए नालियों में तैनात खड़े होते हैं। रामदीन सरीखे भिखारी यात्रियों के रास्ते रोककर अपना - अपना ठीकरा हिलाना शुरू कर देते हैं।...

रामदीन को लगता है कि अचानक सभी यात्री, रेलें आसमान पर चक्करघिन्नी की तरह घूम रहे हैं। समूचा शरीर सैंकड़ों लोहे की सूईयों के दर्द से बुरी तरह तड़पने - दुखने लगता है, फिर जबरदस्ती मन को मजबूत बनाकर कमर के हैंगर से छाते की छड़ी की तरह जिस्म को लटकाकर कोढ़ से गल चुके हाथ में टीन का डिब्बा लेकर हमेशा की तरह खुद को आज भी अपने चिपरिचित चित्तरंजन मोड़ की ओर घसीटने लगता है।

विधान रोड़ से होते हुए सुमति कहती, "इस विधान रोड़ पर चलने वालों की जेबें पैसों से भरी होती हैं।" रामदीन विश्वस्त है, सुमति बिना सोचे - विचारे नहीं बोलती और उसी के आग्रह पर एक साँझ वे एक चटाई, दो - तीन थाल और कटोरियाँ उठाकर इस रेलवे प्लेटफार्म पर जम गए। नई जगह पर जाने का साहल रामदीन को नहीं होता। उसे डर है कहीं विधान रोड़ के शाप से उन्हें बीच सड़क पर चित्त न होना पड़ जाए।

एक ही जगह पर एक ही आवाज से 'सरकार, दया कीजिए' कहते हुए सड़क पर टहलकदमी करते लोगों की जेबों से अपनी जिन्दगी का बाकी हिसाब माँगता बूढ़ा रामदीन इस चित्तरंजन रोड़ पर इतना सामान्य हो चुका है कि वह उस बड़ी दवा की दुकान की दीवार की तरह है, उसका सिर नम्बर टेन सिगरेट के पोस्टर की तरह....। इस बिछी सड़क की तरह...इस पीपल के बूढ़े पेड़ की तरह...। उसकी आँखें इस सड़क की प्रत्येक घटना की साक्षी बन चुकी हैं। सड़क पर उजाला है। सड़क पर कुत्ते घूम रहे हैं। एक आदमी दूसरे को पीट रहा है। एक आदमी का हाथ गाड़ी से कट गया है। एक आदमी एक नवयौवना की कमर में हाथ डालकर प्रेमालाप में व्यस्त है।... अब सड़क पर एक जुलूस जा रहा है। सड़क पर हत्या हो रही है। दो बच्चे गुत्थमगुत्था हो रहे हैं। सड़क पर रात होती है। जोखिम ही जोखिम है चारों ओर। सड़क पर चोरी होती है। बलात्कार होता है। पास एक प्रौढ़ा भिखारिन चिल्ला रही है। उसके जिस्म से सटी दो काली काली आकृतियाँ भी हैं। झड़प हो रही है, 'यह तेरे सोने की जगह है? लो बिछा दो और अपनी सन्तोनों को।' पुरुष स्वर सुनाई पड़ता है।

इस सड़क पर ऐसी कोई घटना नहीं है जो घटित नहीं हो। न होने वाला कुछ भी नहीं है। धड़ सिर पर होते हुए भी सिरहीन धड़ को ढोते लोगों का हजूम कुलबुलाने लग जाता है। ये बदनाम गलियों, फुटपाथों और कोने - कन्दराओं में कितनी - कितनी जिन्दगियाँ कुलबुला रही हैं - किसी की नजर इन पर नहीं है। सभी ऊपर आसमान की ओर थूथने उठाकर चलते हैं। कितनी काई जम चुकी है, कितनी जमी काई उखड़ चुकी है। कितना खोखला हो चुका है वह उगने और उखड़ने की वजह से...। पहले की तरह इतना आसान कहाँ है दया करना। बदल चुके हैं लोग आजकल। सभी को पहले की तुलना में हताशा ज्यादा है, जल्दी है। किसी की जेब में रेजगारी नहीं है तो किसी की जेब में होते हुए भी मन नहीं है, दया नहीं है। इन शरारती लड़कों से भी उतना ही डरना पड़ता है। कई बार टीन से पैसे उठाकर ये चम्पत हो जाते हैं।

रामदीन के मन का दूसरा पक्ष उघड़ता है - कितनों को दें ये लोग भी। उनकी संख्या रोजाना बढ़ती ही जा रही है। कदम - कदम पर भेंट होती है अपने वंशजों से। किसी के हाथ ही नहीं हैं, किसी की टांगें ठूँठों की तरह, किसी की गर्दन और सिर कन्धों के बीच...। किसी की आँखें ही नहीं हैं... कई रोगों से जर्जर हो लुढ़के हैं। उनकी बहू - बेटियाँ चूसी ही गुठली की तरह फेंकी हुई हैं - अंधेरे में और गलियों के किनारों पर उग रही हैं उनकी सन्तानें। कभी - कभार उसे लगता है कि सरकार उन्हें महानदी के किनारे इकट्ठा करके इन शब्दहीनों को माँस - भात का भोज देकर और क्षण भर के लिए सच्चिदानन्द में लीन होने का उपदेश देकर फिर महानदी के प्रवाह में धकेल दे तो कम - से - कम इन्हें इस नारकीय जीवन से छुटकारा तो मिलता! जिससे ये सड़क पर चलने वालों को तंग तो न करते। सिर्फ भरे पेट वाले ही सड़कों पर होते, भूखे पेट वाले नहीं। सांस लेते समय इन भरे पेट वालों को कठिनाई न होती। उनके न रहने पर वह चिल्लाती भी नहीं कि कहाँ गए मेरे वंशज? मेरे सहजीवी? यह सड़क दो इनकी पैतृक सम्पत्ति है, विछावन है, कूड़ेदानी है, घर है, मुक्तहस्त दी गई जमीन है, वेश्यालय है, फुलबारी है, आँगन हा, शमशान घाट है।

सुमति से उसने एक दिन कहा, "चलो सुमति, महानदी में डूबकर मर जाएँ। कितने दिन तक दूसरों का मोहताज रहा जाए? मरने से पहले भगवान से कहेंगे कि अगले जन्म में हमारे लिए रोटी, कपड़े और मकान का उचित बन्दोबस्त होना चाहिए..।"

सुमति ने बड़ी - बड़ी आँखें दिखाकर उससे कहा था,"धत्, यह भी कोई कहने वाली बात है? जो लाया है वह तारीख आने पर उठाकर ले जाएगा।"

उसके बाद फिर रामदीन ने सुमति से ऐसा प्रसंग नहीं छेड़ा था।

जन्म से वह भिखारिन नहीं है इसलिए सुमति हौसले की बातें करती है। एक दिन दुर्गापुर स्टील फैक्टरी में दायाँ हाथ कट जाने पर वह किस प्रकार गृहविहीन हुई, बेकाम ही, सुनन्दा और दीपू समेत जिन्दगी चलाने के लिए कौन - कौन से पापड़ बेले, किस - किस मोड़ पर इन्तजार में बैठी और किस प्रकार एक दिन रेल के पिछले डिब्बे में घुस कर वह सिलिगुड़ी आ पहुँची...। रामदीन ने यह सभी सुमति के मुख से सुना है। एक दिन विधान रोड़ से होते हुए प्रधानमन्त्री की गाड़ी गुजरी थी। चौरस्ते में भाषण भी हुआ था। सारे शहर की पुताई की गई थी। जगह - जगह पर गेट बनाए गए थे और लोगों की अपार भीड़ इकट्ठा हो गई थी। भीड़ में दीपू ने सुनन्दा की कमर पकड़ रखी थी और भीड़ आगे - आगे 'मालिक दया हो' कहते हुए सुनन्दा को सुमति ने दूर से ही देखा था। सुमति ने हर्ष से गद् गद् होकर सोचा था, 'मेरे बेटे अब भूखों नहीं मरेंगे।' उस रात दीपू और सुनन्दा मीठी नींद सोए थे। प्रधानमन्त्री के 'देश','जनता','गरीबी', 'प्रगति' बड़े भारी - भरकम शब्द कानों में निरन्तर गूँज रहे थे। पर दूसरे दिन मूसलाधार वर्षा होने लगी थी। तीन - चार दिनों तक न रुकने पर सुनन्दा और दीपू घुटनों तक पानी में इधर - उधर घूमने लग गए थे। अचानक दीपू भूख और सर्दी से बेहोश होकर गिर पड़ा था उस शाम सुमति ने दीपू को अपनी गोद में अन्तिम बार देखा था। आस - पास लोग - बाग इकट्ठे हो गए थे। वह खूब रोई थी और ऐसे ही में रामदीन अचानक वहाँ आ पहुँचा था। उसने सुमति को सान्त्वना दी थी। रात भर बगल में बैठा रहा था। एक पुरुष का सहारा मिलने पर सुमति का भी हौसला बढ़ा था और आखिरी पहर वह एक नींद सोई भी थी। नींद में उसने डरकर रामदीन को जोर से भींच लिया था।

... सपने के वीभत्स दृश्य से वह काँप गई थी। सपने में उसने जर्जर, पीप भरे जख्मों और कीड़े पड़े जर्जर वृद्धा के शरीर को देखा था। वृद्धा चिल्ला रही थी -  ऐ मेरे जिस्म का व्यापार करने वालो, मेरे पापी बेटो, कोई है जो मुझे आकर बचाए। अभी तो मैंने तुम्हें माफ कर दिया है... अभी तो तुम्हारे मस्तकों पर मेरे शापों की रेखाएँ नहीं उभरी हैं... कहते - कहते जोर से चिल्ला कर उस वृद्धा ने करवट बदली थी तो उसकी आँखों की पुतलियाँ पथरा गई थीं...।

सुमति ने सोचा था यह सपना शुभ नहीं है।... सुबह ही उन्होंने लड़के की लाश को महानदी में बहा दिया था। और तब से वे एक साथ रहने लग गए थे।

...बूढ़ा तरंगित हो उठता है। मन के ताने बाने के साथ खेलते दिन काफी नीचे उतर चुका होता है। साँझ की ठंडी हवा बहने लग गई होती है। टीन में पाँच - पाँच, दस - दस पैसों के काफी सिक्के इकट्ठे हो गए थे। वह धीरे - धीरे स्टेशन की ओर चल पड़ता है। अन्धेरा घिर जाने पर भी सुनन्दा वापस नहीं आई होती है। सुमति के मन में हाहाकार मचने लगता है। एक मील तक खोज आने पर भी सुनन्दा का कोई अता - पता नहीं चलता। वह भारी मन से वापस आती है। रात भर सुनन्दा - सुनन्दा जपती रहती है।

काफी दिन बीत जाते हैं। अबी भी सुनन्दा की याद में सुमति पागल होने लगती है। इधर पिछले तीन दिनों से रामदीन जमीन पर समानान्तर बिछा है, खाना - पीना छोड़ चुका है। छाती और पसलियों के दर्द और बुखार से प्राय: बेहोश हो चुका है। तीन दिन हुए हैं, उसने चित्तरंजन पथ से होकर आते पण्डित तथा सूटधारी सरकारी अधिकारी से पाई जाने वाली दवा भी खो दी है। तीन दिनों में ही गन्दे - गलीज लड़कों का उसके टीन से सिक्के छीनने की सिलसिला भी टूट चुका है।

दिन भर की धूप में झुलसती इधर - उधर भटकती सुमति प्लेटफार्म पर आ पहुँचती है। रामदीन की गिरी अवस्था को देखकर भयभीत होकर जल्दी - जल्दी वह दिन भर की मिली रेजगारी से बिस्कुट खरीदकर लाती है और चाय से भिगोकर खिलाती है। रामदीन निगल नहीं पाता, कै कर देता है। मध्यरात बीतने तक सुमति को नींद नहीं आती। समय - समय पर रेल की तीखी सीटी से सन्नाटा भंग होता है। अचानक उसके कानों में एक औरत के चिल्लाने की आवाज टकराती है। वह तरंगित हो उठती है - कहीं यह सुनन्दा तो नहीं? यह कौन रो रही है, चिल्ला रही है? जो भी हो पर सुनन्दा भी कहीं ऐसी ही हालत में होगी!...और वह चुपचाप उठकर उस ओर जाती है। देखती है - एक प्रौढ़ा अपने जिस्म को ढंकने में असमर्थ दोनों टाँगें फैलाकर जमीन पर अस्त - व्यस्त पड़ी है। दोनों हाथों से उसने अपने पेट को बड़े जोर से पकड़ रखा है। सुमति को वस्तुस्थिति समझने में देर नहीं लगती। पास जाकर बैठ जाती है। प्रौढ़ा का शरीर ढँक देती है, पेट दबा देती है। चीथड़ों की तकिया बना देती है। रात बीतती जाती है। क्रमश: प्लेटफार्म पर उजाला छितराने लगता है। हमेशा की तरह लखनऊ एक्सप्रेस घिसटती आती है। स्त्री एक बार जोर से चिल्लाती है और चीख के साथ जिस्म के निचले हिस्से से एक नवजात शिशु चीं - चीं करता निकलता है। जरूरी मदद करके सुमति शिशु को चीथड़े में लपेटती है और स्त्री की बगल में लिटा देती है। वापस आते रामदीन को अपनी जगह पर न पाकर आस - पास आँखें फाड़ - फाड़ कर देखती है। कुछ दूर रामदीन को चित्त पड़े देककर वह सिर से पाँव तक काँप उठती है, अपने को सम्बाल नहीं पाती। लम्बा नि:श्वास छोड़कर निर्निमेष देखती रहती है और सोचती है - शायद रामदीन ने फिर जन्म लिया है उस नवजात शिशु के रूप में...।

(अनुवाद: सुवास दीपक, नेपाली कहानी का रचनाकाल - 1977), (दिसम्बर,10 - जनवरी 2011)

 

भारतीय नेपाली कहानी

अनुताप

 

इन्द्र सुन्दास

क मोटर असम - बंगाल राजपथ पर पूर्व से पश्चिम की ओर जा रही थी। मोटर में ड्राइवर के अतिरिक्त पिछली सीट पर मालिक रामधन और उनका हितैषी मित्र जयधन बैठे थे।

 इनका जन्म एक ही गाँव में हुआ था। बचपन साथ - साथ बीता और मौट्रिक तक एक ही स्कूल में पढ़े थे।

उनके असली नाम हैं रामबहादुर और जयबहादुर पर गाँव के पुराने काइते (कायस्थ) मास्टरजी द्वारा बाल्यकाल से प्यार से उनके नाम स्कूल के रजिस्टर में रामचन्द्र और जयचन्द्र दाखिल किए जाने से यही नाम प्रचलित हो गए और 'बहादुर' हमेशा के लिए लोप हो गए। बाद में बाल सहपाठियों ने रामचन्द्र को रामधन और जयचन्द्र को जयधन का संक्षिप्त रूप प्रदान कर दिया। इन्हीं नामों से उन्हें आज तक पहचाना जाता है।

रामधन धुब्री को एक विशिष्ट वाशिन्दे हैं। ब्रह्मपुत्र स्टीम नेविगेशन कम्पनी लिमिटेड की एजेन्सी पाने के बाद उनकी किस्मत चमक उठी, वैसे मैट्रिक पास करने के बाद वह कोई खास तरक्की नहीं कर सके थे। परन्तु 'पुरुषस्य भाग्यम्... देवो न जानाति कुतो मनुष्य:'। उनकी इस उन्नति में अवश्य असम में बस चुके उनके ससुराल वालों का यथेष्ठ योगदान रहा है।

रामचन एक संकट में पड़े हैं। उनका एक मात्र पुत्र पद्मनाथ गुवाहाटी निवासी एक अहोमिया ठोकेदार की बेटी रीना को भगाकर धुब्री ले आया था। रामचन और उनकी पत्नी को कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि पद्मनाथ तो उनके नाना के पदचिन्हों पर चला था, दूसरे रीना पढ़ी - लिखी, सुन्दर और सुशील थी। रीना के माता - पिता कट्टर और तंगदिल नहीं थे और उन्हें यह भी पता था कि रामचन के घर में रीना सुखी रहेगी पर लोकापवाद से अपनी नाक कट जाने का वहम उन्होंने पाल रखा था। रीना का मामा काशीकान्त बड़ा विचित्र आदमी था। उसने अदालत में पद्मनाथ के विरुद्ध नारी अपहरण का अभियोग लगाकर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 366 और दो तीन सहयोगी धाराओं को जोड़कर गिरफ्तारी का वारन्ट निकलवा लिया था और साथ ही रीना के उद्धार के लिए पुलिस को भेजने की तजवीज की थी। इसी केस के सिलसिले में एसओएस संवाद पाकर जयचन धुब्री पहुंचे थे। धुब्री आकर उन्होंने काशीकान्त को समझाने की कोशिश की, अनुनय - विनय की मगर काशीकान्त टस से मस नहीं हुआ। जयचन भी आसानी से हार मानने वाले वकील नहीं थे। काशीकान्त को मनाने के प्रयास में सफल न होने को आसार देखकर वह वकीली हुँकार प्रयोग करने को बाध्य हुए। काफी देर तक सोच विचार करने के बाद उन्होंने कहा - 'काशीकान्त बाबू, इतने अनुनय - विनय करने पर भी आप हमारे बेटो को गिरफ्तार करवाकर, सेशन्स में अपराधी साबित करके जेल भिजवाने के बाद ही संतुष्ट होंगे न! देखिए, मैं एक एडवोकेट हूँ। इतना याद रखना, निचली अदालत में ही यह केस टिक नहीं पाएगा।'

'देख लेंगे मि. एडवोकेट, मैंने भी हाई कोर्ट के बैरिस्टर, अपने मित्र... को यह केस सौंपा है। केस टिकता है या नहीं, उसी वक्त पता चलेगा।'

'देखिए, काशीकान्त बाबू, आपकी यदि यह राय है तो लड़के और लड़की को आज ही अदालत में आत्मसमर्पण करवाते हैं और मैं डंके की चोट पर कहता हूँ कि आज ही वे रिहा हो जाएँगे क्योंकि रीना नाबालिग नहीं है, भोली - भाली नहीं है ग्रैजुएट है, सहज ही अपहरण की हुई लड़की नहीं है। कोर्ट में बयान देने के लिए तैयार है।'

यह सुनकर काशीकान्त और ज्यादा क्रोधित हुआ, पर बोला नहीं। जयचन भी चुप रहे। काशीकान्त का पारा कुछ नीचे उतरने के बाद उन्होंने एक बार मीठी जबान में कहा, "आखिर, इन दोनों युवक - युवती के एक दूसरे को पसंद करने पर ही यह घटना घटी है। इसके अतिरिक्त रामचन एक प्रतिष्ठित नेपाली, पद्मनाथ भी होनहार युवक हैं। अच्छी गुण - सम्पन्न नेपाली और अहोमिया या किसी अन्य जाति के बीच विवाह - शादी होने में किस तरह की बाधा, कैसा निषेध? पुराने संकीर्ण विचारों को त्यागना आप जैसे सुशिक्षित सज्जन का धर्म है।"

"वकील साहब, ये बड़ी - बड़ी बातें हैं, इन्हें कृपया मत सुनाइए। रीना की शादी पद्मनाथ से कदापि नहीं हो सकती। रीना की उसके साथ शादी होने का अर्थ उसे जिन्दा ब्रह्मपुत्र में फेंक देने के बराबर है। अब अपने बचाव के लिए यह तरकीब सोची है आपने, मैं क्या नहीं समझता? रिहाई के कुछ महीनों के बाद रीना को बेहाल बनाकर दरबदर ठोकरें खाने के लिए छोड़ देने पर कौन बरदाश्त कर सकेगा?  बल्कि अभी ही विजातीय पंजे से रीना का उद्धार करना हमारा धर्म है। तुम्हारे बेटे को जेल में क्यों न भेजूँ?

"धर्मी राजा! इतने कठोर क्यो होते हो? इन दोनों बच्चों की जिन्दगियाँ बरबाद हो जाएँगी, उनकी यह हत्या जैसी होगी, जिसके लिए जिम्मेदार आप होंगे। मान लीजिए, पद्मनाथ को जेल भेज दिया गया, तो रीना का क्या होगा? जीवन में न लगने वाला कलंक लगाकर उसके भविष्य को क्यों बरबाद करना चाहते हो?  और यदि वह आत्महत्या कर ले तो?

काशीकान्त संकटमय स्थिति में पड़ गया। पर ठीक उसी वक्त वहाँ रामचन की सास अपने बृद्ध पति के साथ मोटर से उतरती है। जयचन ने उन्हें चुपके से बुला भेजा था। जयचन और काशीकान्त के बीच हुई बातचीत का सारांश सुनने के बाद रामचन की सास ने काशीकान्त के साथ अहोमिया भाषा में अपना परिचय देते हुए कहा, "मैं भी अहोमिया हूँ बाबू! डिगबोई के लीलाकान्त की बेटी। हमारी शादी हुए पचास साल होने को हैं, सुख और चैन से जिन्दगी बीती है। शंकरदेव को पुकारकर कह सकती हूँ (बूढ़ी शंकरदेव को मन में नमस्कार करती है) नेपाली दगा नहीं देते बाबू! रीना सुखी रहेगी।"

बुढ़िया की बातों से काशीकान्त प्रभावित हुआ। और नर्म पड़ गया। डिगबोई के प्रख्यात लीलाकान्त का नाम उसने सुना था। अन्त में काशीकान्त ने हार मान ली और केस वापस ले लिया।

इसी काम को निपटाकर जयचन धुब्री से मोटर द्वारा नीलकुटी में हवाई जहाज पकड़ने के लिए जा रहे थे। रामचन उन्हें वहाँ तक पहुँचाने के लिए गए थे। रास्ते में अनेक बाते हुईं -  बचपन से आजतक की।

रामधन ने कहा - "जेसी तुमने सचमुच मुझे संकट से बचा लिया। अहोमिया लोगों ने पद्मनाथ को तकरीबन जेल में डाल ही दिया था। तुमने आकर वकालती चाल न चली होती तो काशीकान्त मुझे दिन में ही तारे दिखा देता। कितनी बदनामी और चिन्ता की बात होती।"

"अब इन बातों को दुहराने की क्या जरूरत? किस्मत वाले हो, सर्वगुणसम्पन्न बहू मिली है अब और क्या चाहते हो? बेटे की शादी धूमधाम से कर दो - हम भी आएँगे।"

"भई, तुम्हें तो आना ही पड़ेगा।"

असम - बंगाल सीमा पर राजपथ की मरम्मत जोरों से हो रही थी। तकरीबन एक मील सड़क के किनारे कई मजदूर पत्थर तोड़ रहे थे। कोई अलकत्रे के पीपों को कुल्हाड़ी से काट रहे थे, कई बालू - रेत छान रहे थे तो कई अलकत्रा पका रहे थे। वहाँ विभिन्न जातियों के मजदूरों में नेपाली औरतें और मर्द भी इधर - उधर दिखाई दिए। काम करते मजदूरों के बीच से उबड़ - खाबड़ सड़क पर मोटर आगे निकलती है। उसके बाद ड्राइवर ने एक्सिलेटर दबाकर मोटर की रफ्तार बढ़ा दी। पर मोटर अभी ज्यादा आगे बढ़ी नहीं थी कि अचानक बंदूक से गोली चलने की आवाज सुनाई देती है और मोटर घर्र - घ्रर्र करती सड़क के किनारे रुक जाती है। मोटर रोकने में तनिक देर हो जाती तो नीचे खड्ड में पहुँच जाती या सड़क पर ही पलट जाती। अचानक ब्रेक लगाने से दोनों अपनी - अपनी सीट के आगे जोर से टकराए। दोनों की धड़कनें बढ़ने लगीं, पर चोट नहीं लगी। एक क्षण के लिए जैसे दोनों के होश उड़ गए। गाड़ी की आवाज सुनकर काम कर रहे दो - चार मजदूर वहाँ दौड़ते हुए पहुँचे। एक बोला, चक्का पिचक गया है। ड्राइवर ने उनसे गाड़ी पीछे की ओर धकेलने को कहा। एक नेपाली मजदूर ने रामचन और रामधन को बाहर निकालने के लिए दरवाजा खोल दिया। दोनों मोटर से बाहर निकले। मजदूरों ने मोटर को धकेलकर निरापद जगह पर पहुँचा दिया। बाद में ड्राइवर ने चक्का बदलने का काम शुरू किया। उन नेपाली मजदूरों में से एक दो अन्य मदद के लिए आगे आए।

"जान बची तो लाखों पाए..." कहते रामचन और जयचन सर्दियों की गुनगुनी धूप सेंकते धीरे - धीरे टहलकदमी करते आगे तक चले जाते हैं। कुछ दूर बूढ़ी राइडक नदी पर एक विराट पुल बन रहा था। कुछ आगे की ओर एक नेपाली औरत पेड़ के नीचे बैठी सिर झुकाकर पत्थर तोड़ रही थी। पेट पालने के लिए अपने वतन से लोग परदेस में आकर इस तरह कष्टमय जीवन बिता रहे हैं, ऐसी बातें करते करते वे चल रहे हैं। अचानक उस औरत ने सिर उठाकर उन दोनों की ओर देखा। उसके देखने पर वे दोनों एक दूसरे की ओर देखकर अचानक रुक जाते हैं। उधर वह औरत पीठ फेर लेती है।

"क्या ऐसा हो सकता है?" मन में यकीन होने पर भी परदेस में अचानक इस हालत में उस औरत को देखते ही रामधन के मुँह से विपरीत शब्द निकला। जयचन का मन वास्तविकता से प्रतिरोध करने की इच्छा रखते हुए भी वास्तविकता को मिथ्या - भ्रम मानकर अस्वीकार करने में असमर्थ था। फिर भी उसने 'नहीं'  कहा और उसका सारा शरीर जैसे एक ताप से भभक उठा। भावावेश को थाम न सकने से उसके मुँह से निकला - "ताराकुमारी।"

उस औरत ने विद्युत गति से पलटकर संबोधक की ओर देखा। दोनों परस्पर एक दूसरे को देखते ही रह गए। मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला। रामचन ने परिस्थिति समझकर दोनों के मौन को भंग करते हुए कहा, "अरे तुम तारा हो न? इधर कैसे आ पहुँची?" परन्तु यह प्रश्न करके उसने गलती ही नहीं की बल्कि एक अनुचित काम भी किया। भर चुके जख्म को उसने अचानक कुरेद दिया था, बरसों से राख के अन्दर दबी एक चिंगारी एक आँधी के झोंके से बाहर निकली और भड़क उठी। इस चूक का दोनों मित्रों को अचानक एहसास हुआ।

उस औरत के माथे पर, मुँह और नाक पर पसीने की दारा बहने लगी। वह खीझकर बोली, "पता नहीं कौन लोग हैं जो मुझे पूछ रहे हैं, कहाँ से आई हूँ, लाज -  शरम बी नहीं।" कुछ बोलना न पड़े इसले उसने घबराकर अपने पति को बुलाया, "साहिंला, ओ साहिंला।"

 मोटर से दोनों बंदुओं को निकालने में मदद करने वाले एक अधेड़ उम्र के मजदूर ने वहां आकर हँसते हुए कहा, "आप लोग किसम्त से बच गए, नहीं तो...।"

रामचन ने कहा, "देखो तुम्हारी पत्नी और हम एक ही गाँव के हैं।"

"सच साहिंली?" आश्चर्य और खुशी मिश्रित स्वर में उसने पूछा।

झुकी गर्दन हिलाकर उसने हामी भरी और बहते आँसू उसने कंधे पर रखे मजेत्रो (दुपट्टे) से पोंछे। साहिंला मुश्किल में पड़ गया, ससुराल के गाँव के इतने बड़े बाबूओं की आवभगत किस प्रकार करे?

जयचन ने 'तारा' कहकर पुकारा। बड़ी - बड़ी भीगी आँखों से उसने जयचन की ओर देखा। जयचन ने दीर्घ निश्वास खींचा और उसकी आँखों के पोर भी भीग गए।

इतने में मोटर तैयार हो गई। सूचनार्थ ड्राइवर ने हॉर्न बजाया। दोनों मोटर में जाकर बैठ गए। ससुराल के गाँव के दोनों बाबूओं को साहिंला ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। गाड़ी आगे बढ़ने लगी. साहिंला अपनी पत्नी के पास पहुँचा। तारा निर्निमेष आँखों से उससे दूर बहुत दूर जा रही मोटर को खड़ी - खड़ी देख रही थी। पंद्रह साल पहले संजोया सपना, उसके बाद की उपेक्षा और परित्याग क्रमश: उसकी आँखों के आगे से गुजर गए। वह दुखी हो गई।

जयचन ने कोट की ऊपरी जेब से तिकोना रूमाल निकालकर अपनी आँखें पोंछीं। रामचन ने अपने प्रिय बन्धु की मानसिक अवस्था को अंग्रेजी मिश्रित नेपाली में कहा - "जेसी, भावुक क्यों होते हो? यह कोई नई बात नहीं है। जिन्दगी में ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है। इन्सान को सहन करना ही पड़ता है, हौसला रखना पड़ता है।"

"जबतक नहीं मिली थी, मन में तसल्ली थी पर आज उसे इस हालत में देखना पड़ा। तारा इस हालत में परदेस में पत्थर तोड़कर एक मजदूर की जिन्दगी बसर करेगी, मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। सोचा था, किसी अच्छे घर की बहू बन गई होगी, पर हाय री किस्मत! आज क्या देखना पड़ा? इसका कसूरवार मैं ही हूँ, अपराध मेरा ही है।"

"जेसी, होनी को कौन टाल सकता है? यह सब सोचकर मन क्यों दुखी करते हो? जो नहीं होना था, हो गया, अब कर ही क्या सकते हो?"

उस वक्त उनके छोटे से गाँव में तारा जैसी सुन्दर लड़की और कोई नहीं थी। वह प्राइमरी स्कूल तक पढ़ी थी। जयचन उसे बहुत पसन्द करता था। गाँव के लोगों की धारणा थी कि उसे जयचन ही भगा ले जाएगा। जयचन की माँ जब उसे मिलती, खुले आम उसे अपनी 'बहू' कहकर सम्बोधित करती थी। वह गुस्से से जल - भुन कर रह जाती पर अंदर ही अंदर एक असीम आनन्द का अनुभव भी करती। जयचन ने एक दिन रामचन और रिश्तेदारों से यहाँ तक कह डाला था कि शादी करूँगा तो तारा से नहीं तो कुँवारा ही रहूँगा। बल्कि पैसा कमाकर यूरोप, इंगलैंड और सारी दुनिया की सैर करूँगा और यात्रा - संस्मरण लिखूँगा।

मैट्रिक पास करके जयचन कलकत्ता पढ़ने चला गया। गर्मियों की छुट्टियों में जब वह गाँव आता अपनी पॉकेट खर्च से कुछ पैसे बचाकर कुछ न कुछ तारा की माँ के लिए और कुछ चुपके से तारा के लिए तोहफे के रूप में ले आता। बी.ए.(आनर्स) पास करने के बाद वह कूब मेहनत के साथ कानून पढ़ने लगा क्योंकि वह एडवोकेट बनना चाहता था।

लॉ कालेज में दैव संयोग से उसका एक छात्र से परिचय हुआ। पहले तो उस छात्र को उसने बिहारी राजपूत समझा था पर वह नेपाली था। उसके पिता पटना के एक प्रसिद्ध नेपाली व्यवसायी और माँ मुल्क से निर्वासित एक राणा परिवार की राजकुमारी थी। उद्यमी व्यवसायी होने पर उन्होंने कलकत्ता में भी अपना कारोबार शुरू कर दिया था और अपने परिवार को कलकत्ता में ही रखा था। उसी सहपाठी के जरिए जयचन का इस परिवार से परिचय हुआ। परिवार में सात कन्याएँ थीं और एक बेटा। सबसे बड़ी लड़की सुलोचना बी.ए. में पढ़ रही थी। व्यवसायी महाशय और उनकी पत्नी पहले ही दिन से जयचन को अपने बेटो की तरह चाहने लगे थे। इसी बीच जयचन का सहपाठी बैरिस्टरी पढ़ने के लिए विलायत चला गया। इसके बाद व्यवसायी दम्पति के आग्रह से जयचन हॉस्टल छोड़कर उनके विशाल घर में रहते हुए कॉलेज जाने लगा। गृहमालिक का दायाँ हाथ, गृहिणी का पुत्रतुल्य और सात कन्याओं का रक्षक, परामर्शदाता और सभी की घरेलू फरियाद सुनने वाला विचारक! सुलोचना के व्यवहार और आचरण से यह लगता कि जयचन पर उसका पूरा अधिकार है।

सुलोचना के रूप, यौवन, पहनावे और शिष्टाचार में जयचन तारा की तुलना करता। वह कल्पना करता, ग्रामीण कन्या तारा से विवाह करके वह उसे सुलोचना के साँचे में ढालकर धीरे - धीरे सभ्य समाज के उपयुक्त बनाएगा। एक विशाल अध्ययन - गृह में बैठकर पढ़ते उसका मन न जाने कहाँ - कहाँ भटकता रहता। उसे लगता उसके आगे बैठी जो लड़की पढ़ रही है. वह सुलोचना नहीं, तारा है। वह उसकी ओर अपलक देखता रहता। सुलोचना और बाद में उसकी माँ तक ने जयचन के इस व्यवहार और मनोभाव को नोट किया था। सुलोचना की माँ उसका दूसरा ही अर्थ लगाने लग गई, सुलोचना भी। एक दिन आखिर सुलोचना ने जयचन विचारक के सामने अपनी फरयाद पेश की। इस अवसर पर जयचन ने तारा की बातें सुलोचना को साफ - साफ बता दीं। बाद में इन्हीं बातों को लेकर सुलोचना जयचन को चिढ़ाने भी लगी। पर तारा की बात एक राज की बात ही रही. परिवार का कोई सदस्य इस राज को जान न पाया।

वकालत के अध्ययन के अन्तिम वर्ष में गर्मियों की छुट्टियों में घर आकर जयचन ने सुलोचना और उस धनाढ्य परिवार की बूरी - भूरी प्रशंसा की, बूढ़ी माँ ने इसका दूसरा ही अर्थ निकाला। बूढ़े बाप के साथ भी काफी बातें हुईं। कुछ दिनों के बाद माँ ने कहा, "हाथ डालना है तो बड़े घर में ही डालो। तेरे बाप की जिद थी तुझे बहुत पढ़ाना, पढ़ते - पढ़ते तू बूढ़ा हो चला, रुपये - पैसे भी पानी की तरह बह गए।"

कलकत्ते में तारा के लिए आकुल होने वाला मन गाँव आने के बाद सुलोचना की याद में बेचैन रहने लगा। तिस पर माँ की उपरोक्त टिप्पणी सुनकर तारा के प्रति उसका अनुराग ठंडा पड़ने लगा। उसने सोचा, तारा गाँव की कूप - मंडूक, उसके जैसे उदीयमान एडवोकेट की उपयुक्त गृहिणी होने के गुणों से वंचित है। कलकत्ते से हमेशा की तरह लाए हुए उपहार भी तारा को देने की इच्छा नहीं हुई। वार्तालाप में भी तारा और उसके माँ - बाप ने बड़ा फर्क महसूस किया। सरल हृदय तारा और उसके भोले - भाले माँ - बाप ने सोचा, जयचन को बहुत ऊँची तालीम हासिल करनी है इसलिए उसके पास पहले की तरह बातचीत करने की फुर्सत नहीं होगी। फिर भी तारा ने शिकायत करके अपनी नाराजगी प्रकट की थी, चुपके से।

छुट्टियाँ खत्म होने के बाद जयचन कलकत्ता वापस चला गया और अन्तिम परीक्षा देने के बाद समस्त परिवार के साथ पटना चला गया। वह तारा तो भूलता गया और सुलोचना को अब उसने अपने हृदय में जगह दी। चतुर व्यवसायी और उनकी पत्नी ने सुलोचना की शादी जयचन के साथ पटना में कर दी। जयचन को लगा कि विवाह मण्डप में जैसे वह अग्नि - देवता के समक्ष तारा के साथ बैठा है। पर यह तो अवचेतन में सुशुप्त भूतकाल के स्मृतिचक्र का क्षणिक आभास ही तो था। बेचारी तारा पटना से बहुत दूर एक पहाड़ी गाँव में थी। हकीकत में उसके पास बैठी थी सुलोचना - एक उदीयमान एडवोकेट की उपयुक्त लगने वाली गृहिणी, सर्वगुणसम्पन्न एक आधुनिक युवती। उसी दिन जयचन का वह संकल्प कि 'शादी करूँगा तो तारा से नहीं तो कुँवारा ही रहूँगा, बल्कि पैसे कमाकर सारी दुनिया की सैर करूँगा और यात्रा - संस्मरण लिखूँगा' पाटलीपुत्र में दफन हो गया था।

 

नीलकुटी विमानस्थल पर ठीक वक्त पर पहुँचने के लिए मोटर तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है। डयचन काफी देर तक चुप रहे, मोटर के आगे की स्क्रीन पर उनके अचल नेत्रद्वय टिके थे। उस स्क्रीन पर उन्होंने देखा तारा कुमारी के साथ के प्रेम - सम्बन्धों का दौर और एक सुखद भविष्य का सपना, उसके बाद एक धनाढ्य परिवार के साथ घनिष्ठता, सुलोचना के साथ परिचय, वक्त, मैहौल और नई संगति से उनकी सोच में आया वह महापरिवर्तन जिसका अन्त सुलोचना के एक प्रभावशाली ग्रह के रूप में अवतरित होना और तारा का क्रमश: लोप - समस्त घटनाएँ एक संक्षिप्त फिल्म की पटकथा की तरह। मित्र को सान्त्वना देने के लिए पामचन ने फिर कहा, "किस्मत में जो लिखा होता है, वही होता है, फिजूल में चिन्ता करने से क्या फायदा?"

कुछ देर के बाद जयचन ने कहा, "हाँ, एक उपाय तो है। गाँव की जमीन पर इन पति - पत्नी को अदियारी दे देते हैं।"

"जेसी, मैंने पहले ही कहा, संसार में अनेक प्रकार की घटनाएँ होती रहती हैं, होनी के बारे में कोई नहीं जानता। आदमी जैसा सोचता है वैसा कहाँ होता है? करम गति टाले न टले।"

"करम गति?" जयचन ने कड़वी हंसी के साछ कहा, "आदमी की इच्छा के बारे में जानना बड़ा मुश्किल है, बल्कि ऐसा बोलो न! करमों को क्यो दोष देते हो?"

बात को लम्बी न बढ़ाने की गर्ज से रामचन ने कहा,"जेसी, अब बीती बातों को बूल जाओ, अपनी - अपनी किस्मत है। जज्बाती होने से क्या लाभ? सभी ने कहा था कल चले जाना पर तुमने किसी की नहीं मानी और आज 'एक्सीडेन्ट' से बाल - बाल बचे हैं। फिर किसी ने सपने में बी नहीं सोचा कि तारा कहीं आसमान से ठीक इसी रास्ते पर आ टपकेगी! भूल जाओ इन बेकार की बातों को। बेकार में सेन्टिमेन्टल बनने से क्या लाभ! मन से उखाड़कर फेंकी हुई बातों को फिर याद करने से कोई लाभ नहीं होने वाला!"

"तुम्हारी बातें सिर्फ वहम हैं राम, मैं आसानी से जज्वाती होने वाला आदमी नहीं हूँ।" जयचन ने मित्र की बातों का खंडन करते हुए कहा, "इसमें हैरानी की क्या बात है राम, कालचक्र में पड़कर तारा और मेरा सम्बन्ध सड़ी - गली डोरी की तरह बेशक टूट गया पर माया - मोह के बीज को आसानी से उखाड़कर फेंका नहीं जा सकता चाहे दुनिया की नजर में पौदा मुरझाया हुआ क्यों न दिकाई दे। यकीन करो राम, सारी जिन्दगी में तारा को नहीं भूल पाया हूँ और न ही भविष्य में बूल पाऊँगा।" उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि मोटर नीलकुठी विमानस्थल के गेट पर पहुँच कर रुक गई।

जयचन का जहाज उड़ जाने के बाद रामधन वापस धुब्री की ओर चले।

उन्होंने दूर से उसी जगह पर तारा को पेड़ के नीचे पत्ऱों के ढेर पर किसी की प्रतीक्षा में बैठे देखा। वह गाड़ी रोककर नीचे उतरे। तारा हँसती हुई उनसे बोली, कुछ देर पहले का गुस्सा और आवेश अब उसके चेहरे से गायब थे। रामचन ने एक दो बातें करने के बाद प्रस्ताव रखा, "इस तरह यहाँ तकलीफ मत उटाओ, बल्कि दोनों पति - पत्नी मेरे साथ चलो, मेरे घर में रहो, अपनी इच्छा से कोई काम कर लेना।"

तारा ने सिर हिलाकर प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। कहा, "आप लोगों की मोटर नीचे गिरती देखकर मेरी तो जान ही निकल गई थी।"

"बच गए तारा, किस्मत से।"

"चोट तो नहीं लगी!"

"मुझे तो नहीं लगी!"

"उन्हें?" तारा ने उत्सुकता से पूछा।

(मन हुआ कि कहे जिस्म पर नहीं, मन में?)

रामचन ने कहा, "उन्हें भी नहीं लगी।"

उत्तर सुनकर तारा के चेहरे पर निश्चिन्तता की झलक दिखाई दी। इसी मौके पर रामचन ने पूछा, "तारा, बता तो उनकी याद अब भी आती है?"

तारा विह्वल हो गई, चुप रही और झुककर आँसू पोंछने लगी। ज्यादा कुछ कहना अनुचित ठानकर काम करते तारा के पति को रामचन ने अपने पास बुलाया और दोनों से धुब्री चलने का आग्रह किया। पति मान भी गया पर तारा बिल्कुल नहीं मानी। रामचन उलझन में पड़ गए, कुछ कह नहीं पाए और बुझे मन से मोटर में जाकर बैठ गए।

रास्ते में उनके मन में जयचन और तारा की बातें खेलती रहीं। और उस असम - बंगाल राजपथ में उनके मानसपट में एक गूढ़ तत्व का उदय हुआ। वास्तविक प्रेम जीवन में सिर्फ एक बार होता है। मनुष्य नियति या बहुरंगी परिस्थिति की भूल - भुलैया से उन्मुक्त न हो सकने वाला प्राणी होने पर भी अपने हृदय में नैसर्गिक प्रेम से अनन्तकाल तक जकड़ा रहता है। (नवम्बर 2010)

(नेपाली से सुवास दीपक द्वारा अनूदित)

 

अनश्वर की मणि

 

भीम ठटाल

रूप कथा का गौरव पात्र

संदर्भ संदर्भ तैरता साल दर साल बाद

चरण चरण के विकास के नजदीक

शहर में अकेले घर लेकर बसा है

उसका पूरा घर शहर ही शहर है।

अनश्वर होने के लिए उसका एक ही उपाय था

कहीं घनघोर वन में एक सर्प

सिर में जलती मणि लिए बसा करता है।

आदमी केवल आदमी है

क्योंकि आदमी आदमी मात्र है

आदमी आदमी ही कहाँ है और

क्योंकि आदमी आदमी आदमी मात्र कहाँ है।

 

इस क्षण एक उच्छवास की प्रतीक्षा है

 - राक्षस इच्छा

इस क्षण एक तृष्णा की प्रतीक्षा है

 - सागर की गहराई।

काँटा ही तो है, न चुभने पर भी

जंगल - जंगल

रास्ता ही तो है, न पहुँचने पर भी

यात्रा सुमंगलमय।

चलते रहने के अर्थ पर सवार होकर

बूटी ढूँढने की आकांक्षा लिए।

आदमी को अमर बनने के लिए

उस सर्प की मणि निकालनी होगी

(कभी सोचा है कि वह जंगल कहीं हमारे अंदर तो नहीं)

(अनुवाद - सुवास दीपक) - अक्तूबर 2010

भारतीय नेपाली कविता

विन्ध्या सुब्बा

तुम उदास रहते थे

मैं रेत का घर बनाती थी

मन के पूलों से

फूलबाड़ी सजाती थी

जीवन का हाथ पकड़कर

जैसे भी हो कष्ट उठाती थी।

 

आजकल तुम बहुत दुखी हो

अति व्यस्त रहते हो

ईंट और सीमेन्ट से बने

हमारे इस घर में

छोटी फूलबाड़ी के पास के एक रास्ते पर आंगन में

बरसों से किसी के इन्तजार में उदास हूँ मैं। (अनुवाद: सुवास दीपक)

 

भारतीय नेपाली कहानी

 

छिरिंग डोमा के नाम चिट्ठी

 

पूर्ण राई

पोस्टमास्टर साहब, यह चिट्ठी मैं छिरिंग डोमा के नाम लिख रहा हूं। उसके हाथ पहुंचे। दरअसल, बहुत साल पहले से छिरिंग डोमा को यह चिट्ठी लिखने की इच्छा अपने जोहन में पाल रखी थी। लेकिन देर हो गई। दूसरी वजह यह है कि मेरे पास उस का ठौर ठिकाना नहीं है लेकिन जैसे भी हो, मेरी गुजारिश है, यह चिट्ठी छिरिंग डोमा के पास किसी बी हलत में पहुंचने की व्यवस्था कर दीजिएगा। छिरिंग डोमा जहां बी हो, दुनिया के किसी कोने में क्यों न हो, उस के पास यह चिट्ठी ज़रूर पहुंचा दीजिएगा।

छिरिंग डोमा के नाम चिट्ठी:

 

"...छिरिंग डोमा, तुम्हें मेरा स्नेह भरा आशीष। यह चिट्ठी तुम्हें आज से सात-आठ साल पहले लिखने की इच्छा थी लेकिन लिखने का वक़्त आज ही निकाल पाया हूं। आज से सात-आठ साल पहले तुम मेरे अनुमान से कोई सात साल की छोटी-सी बच्ची थी, आज सोलह-सत्रह साल की युवती हो चुकी होगी।

छिरिंग डोमा, तुम आजकल कहां हो? मुझे नहीं मालूम, तुम कहां हो। तुम्हें तो अब मेरी किंचित याद भी नहीं होगी क्योंकि उस वक़्त तुम छोटी-सी बच्ची ही तो थी। और तिस पर हमारी दो बार की मुलाकातें भी तो क्षणिक ही थीं। इसी वजह से मुझे पक्का यकीन है वे मुलाकातें तुम्हारी स्मृति से बिल्कुल गायब हो चुकी होंगी। फिर भी आज तुम्हें यह चिट्ठी उसी उत्सुकता और जिज्ञासा से लिख रहा हूं जैसे मैं आज से सात-आठ साल पहले लिखना चाहता था।

छिरिंग डोमा, मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। मेरे हृदय में तुम्हारे प्रति स्नेह उमड़ पड़ता है। यहाँ के पहाड़-पर्वत, नदी-नाले, पनघट, खेत-खलिहान, चरागाहें, मैदान सभी तुम्हारी स्मृति को ताजा कर देते हैं। आज से सात-आठ साल पहले तुम नन्हीं बालिका की कही हुई साधारण और असाधारण बातें मैं आज तक भूल नहीं पाया हूं। यह स्वाभाविक ही है कि हमारे साथ रोज़ाना कई घटनाएं घटती हैं जिन्हें हम समय गुज़रने के साथ भूल जाते हैं, लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हां जिन्हें चाह कर भी हम भूल नहीं पाते। तुम्हारी बातें भी ऐसी ही तीं जिन्हें भूल पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है। जब-जब मैं तुम्हें अपनी स्मृति के चबूतरे पर खड़े पाता हूं जब-जब तुम्हारे साथ हुई पहली मुलाकात की बातें मुझे हंसाती भी हैं और रुलाती भी हैं, मेरे हृदय को बुरी तरह आंदोलित कर देती हैं और अचानक मन कसैले विषाद से भर उठता है। तुम्हारी उन नन्हीं आंखों के सारे सपने साकार हो जाएं, मेरी यही कामना है।

तुम्हें पता नहीं छिरिंग डोमा कि मैं यहां अर्थात जहां तुम उस वक़्त रहती थीं, कुछ महीनों के लिए सरकारी काम के सिलसिले में गया था। घर से काफी दूर होने के कारण दिन भर के काम के बाद घर की याद दिल में संजोए मैं शाम को अक्सर मन बहलाने के लिए इधर-उधर घूमने निकल पड़ता था। ऐसी ही एक शाम होगी जब तुम से मेरी मुलाकात हुई थी।

उस शाम मैं अपने होटल के कमरे से ऐसे ही निरुद्देश्य निकल पड़ा था। अचानक रास्ते में  मैं ने तुम्हारी जैसी तिब्बती बच्चियों को छोटी-छोटी लेकिन मैली और काली केतलियों और जर्किनों में नीचे झरने से पानी भर कर ऊपर टीले पर स्थित तुम्हारे होस्टल की ओर हंसते, शोर मचाते घिसटते हुए ले जाते देखा था। ऐसे दृश्य कोई असाधारण नहीं होते। इन्हें सामान्य तौर पर हम भूल जाते हैं। लेकिन उस शाम का वह दृश्य जैसे मेरे स्मृति-पट पर हमेशा के लिए अंकित हो गया है। इसलिए कि बच्चों के उस समूह में तुम अंतिम थी जो टूटे हैंडल की एक बड़ी-सी केतली को, जिसका हैंडल मोटे तार से बनाया हुआ था, अपनी पूरी ताकत से दोनों हाथों से उठा कर घिसटती आ रही थी। पानी के छलकने से पीछे रास्ते में एक लकीर- सी बन गई थी। हां, तुम अपने मासूम नन्हे चेहरे पर ज़ोर लगा कर दोनों हाथों से उस पानी की केतली को उठाए हुए थी और ज़ोर-ज़ोर से हांफ रही थी। शायद तुम से मुलाकात होनी थी और तुम्हारी बाल-सुलभ स्मृति को संभाल कर रखना था। उस वक़्त अपनी मां की गोद में इठलाती एक नन्हीं बालिका को इतनी मशक़्क़त से पानी उठा कर लाते हुए देख कर मेरी हंसी फूट पड़ी थी, लेकिन इस के साथ-साथ मुझे तनिक दुख भी हुआ था। उसी वक़्त अचानक मुझे सामने खड़ा देख कर तुम ने अपने छोटे-छोटे हाथों से उस केतली को नीचे रख दिया था और ज़ोर-ज़ोर से हांफते मेरी ओर इस कदर मासूमियत से मुस्कराते देखा था जैसे तुम मुझ से पूर्व परिचित हो। तुम्हारी उस नन्हीं मुस्कान के आगे मुझे पता ही नहीं चला कि मैं लगभग पराजित-सा तुम्हारी ओर देखता रहा। तुम ने तब बिना वक़्त गंवाए नन्हीं-सी लेकिन आधिकारिक आवाज़ में टूटी-पूटी अंग्रेजी में कहा था - हेलो सर, यह पानी ऊपर होस्टल तक पहुंचा दो न!"

तुम इस घटना को भूल चुकी होगी लेकिन मुझे आज तक पूरी तरह याद है। तुम्हारी उस बाल वाणी में न जाने कौन-सा जादू था छिरिंग डोमा कि मैं ने तुम्हारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार कर लिया था। तुम्हें पानी से भरी हुई उस केतली को नीचे से उठा कर लाने में कितनी मशक्कत करनी पड़ी थी। मैं एक हाथ से भरी हुई उस केटली को और दूसरे से तुम्हारी बांह पकड़ कर तुम्हारे होस्टल जाने वाली पगडंडी चढ़ रहा था। उस वक़्त तुम्हारा चेहरा खुशी से खिल उठा था, मुझे भी बेहद खुशी हो रही थी। ऊपर टीले पर पहुंच कर एक चबूतरे पर बैठ कर मैं ने तुम से तुम्हारा नाम पूछा था और जबाब में तुम ने जो बातें कही थीं वे मुझे आज तक याद हैं। तुम ने कहा था," मेरा नाम छिरिंग डोमा है। मैं तीसरी कक्षा में पढ़ती हूं। मेरा घर यही होस्टल है। मेरे देश का नाम तिब्बत है। मैं अपने देश से बहुत प्यार करती हूं।"

तुम्हारे अबोध चेहरे पर टिकी नन्हीं आंखों में झलकते आत्मविश्वास को देखकर मैं मंत्र-मुग्ध सा तुम्हें देखता रहा। फिर मैंने तुम्हारे मां-बाप, भाई-बहिन और सगे-संबंधियों के बारे में पूछा था।

"मोमोला (दादी मां) हैं और किसी के बारे में पता नहीं। मोमोला कहती हैं तू बड़ी होकर अपनों के बारे में खोज-खबर करना। मां-बाप, देश सभी को ढूंढने को कहा है मोमोला ने।"

"तुम्हारी मोमोला कहां है?"

"यहीं रहती हैं, उधर माल रोड पर एक दुकान चलाती हैं।"

"तो क्या तुम  बड़ी होकर अपने मां-बाप, भाइ-बहन और अपनो देश को ढूंढ़ोगी?"

"हां, ज़रूर ढूंढूंगी।"

आज तक मुझे पूरी तरह याद है, तुम्हारी उन बातों से मैं क्यों अवाक् रह गया था और सुदूर स्थित तुम्हारे देश तिब्बत की कल्पना में कुछ क्षणों के लिए खो गया था। खुद अपना मुल्क होते हुए भी कहीं कुछ खो देने का अनुभव, कहीं कुछ न होने का खालीपन अनुभव हुआ था मुझे उस वक़्त। उसके बाद छिरिंग डोमा, तुम अपने होस्टल चली गई थी। तुम चली गई थी लेकिन तुम्हारा नन्हा, अबोध सुकोमल चेहरा, छोटी-छोटी प्यारी और आत्मविश्वास से भरी बातें और तुम्हारी अमिट स्मृति अपने हृदय के एक कोने में मैंने संभाल कर रख ली थीं और अपने डेरे की ओर चुपचाप चल दिया था। फिर शाम ढलने के बाद रात गहराने लगी थी। तुम शायद अपने होस्टल के आल्मारीनुमा पलंग पर अपने संगी-साथियों के साथ हंसते-खेलते सो गई होगी और सपने में अपने मुल्क के पहाड़ों-टीलों पर पहुंच गई होगी। मैं भी उस रात हैप्पी वैली के बौद्ध विहार से आ रही 'लाभा' और 'ग्यालिंगो' की सुदूर घाटियों में प्रतिध्वनित होती आवाजों को सुनते काफी देर तक छटपटाता रहा था। तुम्हारे देश को याद करते एक विषाद से मेरा दम घुटने-सा लगा था और फिर अपने ही देश की धूल-मिट्टी में लहूलुहान-सा घूमता रहा था।

तुम्हें याद नहीं होगा छिरिंग डोमा कि हमारी उस पहली मुलाकात के बाद दूसरे, तीसरे और चौथे दिन तुम्हारे साथ मुलाकात करने की इच्छा लिए मैं उस रास्ते पर काफी देर तक खड़ा रहा तुम्हारा इंतज़ार करता रहा था, लेकिन पता नहीं क्यों तुम कहीं बी दिखाई नहीं दी थी। ऐसा नहीं है कि उस अवधि में तुम अपने संगी-साथियों के साथ पानी भरने के लिए उस रास्ते न आई-गई हो, लेकिन मेरी तरह पानी ऊपर पहुंचाने के लिए तुमने अवश्य ही किसी से नहीं कहा होगा, क्योंकि यह सौभाग्य सिर्फ मुझे ही मिला होगा। उस वक़्त मुझे वैसा ही अनुभव हुआ था। आज भी वैसा ही लगता है, हां वैसा ही।

इसी तरह दिन बीतते गए। और काफी दिनों के बाद केवल एक बार ही एक शाम को तुम से फिर मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात को भी तुम भूल चुकी होगी।

उस शाम मैं एक मराठी शिक्षक के साथ हैप्पी वैली के मनोरम जंगल में घूम कर वापस आ रहा था। जंगल में बंदरों की उछल-कूद देखकर उन हंसमुख बूड़े शिक्षक ने मुझसे हंसते कहा था, 'ये बंदर इंडियन फारेस्ट सर्विस में हैं।' इसी तरह हम दोनों हंसी-मजाक करते माल रोड पर पहुंचे थे तो फुटपाथ पर सिले-सिलाए कपड़ों की दुकान पर अचानक तुम एक तिब्बती बृद्धा के साथ मिल गई थी। एक अरसे के बाद तुम से अचानक मुलाकात होने पर मुझे हर्ष-मिश्रित आश्चर्य हुआ था। हमारे परिचय के बारे में जान कर बूढ़ी मोमोला भी बहुत खुश हुई थीं। वह बूढ़ी मोमोला तुम्हारी दादी मां हैं, यह जानकर मैं काफी आश्वस्त हुआ था, आज भी हूं।

तुम्हें याद नहीं होगा, उसके बाद तुम्हारी मोमोला के साथ एक दो बार मुलाकात हुई थी। एक दिन मैंने तुम्हारी मोमोला से एक खूब मुलायम रशियन बालों वाली लाल टोपी खरीदी थी। खरीदी क्या मुफ्त में मिल गई थी। मोमोला पैसे लेने को कतई तैयार नहीं हुईं। जबरदस्ती तीस रुपये दिए थे, जिनमें से बीस तो वापस कर दिए थे। छिरिंग डोमा, उस टोपी को पहन कर ट्रैकिंग करते हुए बड़ा आनन्द आया था। सर्दी से बचाव हुआ था, मानो तुम्हारी मोमोला के वृद्ध स्नेहयुक्त स्पर्श की उष्णता हो। ट्रैकिंग से वापस आते सोलह हजार फीट की ऊंचाई पर वर्षा, प्रचंड सर्दी और हवाओं से संघर्ष करते हुए भी एक दो गुच्छे फूल देने में समर्थ तुम्हारे नाम का एक गुरांस का पौधा रोपा था, लेकिन हमारी मुलाकात फिर नहीं हो पाई।

इस तरह आज काफी साल गुजर चुके है लेकिन तुम्हारे साथ उस जगह पर हुई पहली मुलाकात, तुम्हारा मुझे पानी की केतली उठा कर ऊपर टीले पर पहुंचा देने को कहना, हमारी बातें, तुम्हारी मोमोला के साथ हुई तमाम बातें आज भी ताजा लगती हैं। लेकिन काफी साल बीत चुके हैं। मुझे तो लगता है, तुम अभी भी वही नन्हीं-सी बच्ची ही हो, लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? इस दौरान तुमने कितना पढञा-लिखा, क्या-क्या करती रही, कहां-कहां रही हो, मुझे कुछ भी पता नहीं है। काफी पढ़-लिख कर, ज्ञानी बन कर इस योग्य बन चुकी होगी कि तुम्हें क्या-क्या खोज निकालना है:

'मिले तुम्हें तुम्हारा देश,

मिलें तुम्हें तुम्हारे मा-बाप

क्षितिज मिले तुम्हें अपना

मिले तुम्हें तुम्हारा अपना आकाश और अपनी हवाएं

पनघट मिले तुम्हें अपना

मिले तुम्हें अपनी खुशियां और सफलताएं

जहां रहो, खड़ा होना मिले

यही आशीष है तुम्हें - तुम्हें सब कुछ मिले।

इति।'

पोस्टमास्टर साहब, यह चिट्ठी मैं छिरिंग डोमा को लिख रहा हूं। उसी के हाथ में देने की व्यवस्था करें। वास्तव में काफी साल पहले ही छिरिंग डोमा को यह चिट्ठी लिखने की इच्छी थी लेकिन देरी हो गई। दूसरी वजह यह थी कि मेरे पास उसका ठौर-ठिकाना नहीं था। लेकिन जैसे भी हो यह चिट्ठी छिरिंग डोमा के पास जरूर पहुंचा दीजिएगा। (नेपाली से अनुवाद: सुवास दीपक)

 

तेरी आवाज पे गर कोई न आए

 

मूल रचना - रवीन्द्रनाथ ठाकुर

 

हिन्दी अनुवाद - दाऊलाल कोठारी, कोलकाता

 

तेरी आवाद पो गर कोई न आए, तो फिर चल अकेला रे।

तो फिर चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला रे।

 

यदि कोई न बोले, ओरे ओर ओ अभागे,

यदि सभी मुख मोड़े रहें, सब डरा करें

तब डरे बिना

तेरे मन की बात, मुक्त कंठ कह अकेला रे।।

 

यदि लौट जाएं सभी, ओरे ओरे ओ अभागे,

यदि गहन डगर चले, देखे मुड़ के न कोई,

तब राहों के कांटे,

ओ तू रक्त-रंगे, चरण - तले, दल अकेला रे।।

 

यदि दीप न धरें, ओरे ओरे ओ अभागे,

झड़ी - आंधी - भरी रात में, घर बन्द यदि करें

तब वज्र- शिखा से

तू अपनी अस्थियां जला और चल अकेला रे।।

 

 

मेरी माटी की तीन कविताएं

 

भविलाल लामिछाने

(एक)

 

मुझे माटी नहीं

माटी की सुगंध दो:

कुछ बांट सकूं

कुछ रख सकूं।

 

(दो)

मैंने खड़ा होने को माटी मांगी

मुझे लोहे के पिंजड़े में कैद कर दिया गया

मैं चिल्लाया

मुझे सूली पर लटका दिया गया

मेरो मरने के बाद

जिस जगह मुझे दफनाया गया

पता है, वह भी मेरी ही माटी थी?

 

(तीन)

मेरे देश का गुलाब का पौधा है

तुम इसमें हिंसा की खाद डालो,

घृणा से सींचो,

तलवार से काटो,

बंदूक से दागो,

इस पर थूको, धर्म के नाम पर गालियां दो -

पर, प्रतीक्षा करो -

ऋतु आने पर

इसमें से गुलाब ही निकलेगा

क्योंकि -

वह मेरे देश का ही गुलाब का पौधा है।

(नेपाली से अनुवाद - खडगराज गिरी)

 

नए मानव का निर्माण

 

एम.बी. राई

 

(1)

 पनी नाक ढकने और बचाने का तो

प्रश्न ही नहीं है क्योंकि

उस नाक का मस्तक ही गायब है

अब सोचें भी तो कैसे

पैर भी तो नहीं रहे

जिसके सहारे चल सकें

कलेजे के भीतर है एक भाव-शून्य हृदय

जहां केवल विद्रोह की आग धधक रही है।

 

(2)

मानव शोषण की आग में पक रहा है

उसकी धुनाई होती है

मजदूरों की हड़ तोड़ मेहनत में

ऐसे ही मानव के पौधे हमारे खेतों में रोपे जा रहे हैं

नये मानव का निर्माण

देख रहे हैं न आप?

(3)

 विशाल खाड़ी बना हमारा पेट

लोहे को भी पचा जाता है

यही है ऐसी ही हमारी खेती

हम नए मानव के पौधे

रोप रहे हैं

धूप, तारे या चांदनी हो

सिंके हुए मक्के का जलपान कर

नये मानव हम रोप रहे हैं

नये मानव उगा रहे हैं

और नये मानव की फसल

काट रहे हैं।

भावानुवाद - मनोरंजन भारद्वाज

 

वक्त और ख्वाब का अदृश्य रिसता घाव

 

पवन चामलिङ किरण

मुमकिन है तुम भूल चुके

फिर भी याद होगा

एक जलसे में हमारी मुलाकात हुई थी

तुमसे मुलाकात कर मुझे आनंद का अनुभव हुआ था।

आदमी के आदमी से मिलने पर

आनंद का एहसास होना

अपनेपन का एहसास होना

आजकल एक हैरानी की बात है

आदमी का आदमी को आदमी के रिश्ते में अपनाना

या तो सम्मान करना, सदभावना रखना

आजकल यकीन की बात नहीं लगती

मुझे खुद पर होती है शंका

मानव अरण्य में

खुद को अकेला पाकर

मुझे रोने को जी करता है

हमारी वह मुलाकात पहली नहीं थी

लेकिन लगता था कि

वह जैसे हमारी पहली ही मुलाकात हो,

लेकिन मैंने तो हमेशा

कल्पनाओं और ख्वाबों की अदृश्य सड़कों पर

तुमसे मुलाकात की थी

मैंने तो हमेशा तुम्हें अपने

मन की आंखों से देखा था।

 

हो सकता है मेरे मन की खिड़की

तुम्हारे घर की ओर खुली हो

न जाने कब से

ये आंखें तुम्हें निहार रही थीं

मन की इस आधारशिला पर

तुम्हारा घर बन चुका था।

 

याद है, ऐसी असामान्य बातें भी

सामान्य लग सकती हैं

तब लगता है वह मन का भ्रम हो

लेकिन उस भ्रम होने की स्थिति से उबर कर

उस असामान्य भीड़ के शोर को चीर कर

तुम्हारे कानों तक शब्दों के सहारे पहुंचा था

सपने की वैशाखी के सहारे

तुम्हारे पास कुछ क्षण खड़े होने की

 हिम्मत की थी

अचानक मन का दरवाजा खोल कर

तुम्हारे मन के घर पहुंचा था।

 

मेरे प्रिय ख्वाबों के बालक उस वक्त

किस तरह पुलकित बन दिवास्वप्न में

नृत्य कर रहे थे

किस तरह मेरे दिवास्वप्न खुशी में अकेले

संसार को हिला कर हंसे थे।

 

सपनों के बालक

विश्वास की सीढियां चढ़ कर

किस तरह खुद से ऊपर उठ सके थे

कल्पना के पथ पर निरंतर चलते

कितने युगों के बाद

हो सकता है

तुम्हारे दिवास्वप्न के पास आकर

तुम्हारे मन का शीतल स्पर्श ले सके थे

एक सुखद अनुभव हुआ था

युगों से छटपटा रहा सपना

खुद व्यक्त हुआ था

तुम्हारी जिंदगी का स्पर्श पाकर

सपने को थकान मिटाने के लिए

एक चबूतरा मिला था।

 

तुम्हारे दिल के हाथों से बनाई

प्रेम की गर्म चाय पीकर

पर भर के लिए ही क्यों न हो जिंदगी को हंसाना चाहता था।

 

हालात के गोते खाकर

दिल से हैरान-परेशान

जब तुम्हारी याद आती है

देवदार के हरे पेड़ों की तरह

इच्छा लहलहा उठती है

तुम्हारे साथ-साथ

जिंदगी की सुंदर सड़कों पर

मीठे सपनों की बातें करते

सुंदर कल्पनाओं को आकार देते

वक्त को रफ्तार और दिशा देना चाहता था

कल के संसार का

तुम्हारे साथ मिलकर निर्माण करना चाहता था

देवदार के हरे पेड़ों की तरह

इच्छाओं को संजो कर

जिंदगी की थकानों को मिटाना चाहता था

तुम्हारे साथ मुलाकात करना चाहता था

बीती बातों को भुला कर

जीना चाहता था

जीवन के सत्य को

तुम्हारे मन की सुंदरता में ढूंढना चाहता था।

 

मैंने जाना तुम्हारे विचारों की सुंदरता से

मैंने जाना तुम्हारे जीवन की उमंगों और तरंगों से

तुम्हारे मन के भावों और गहराइयों से

कि मन की माटी में

सत्य किस तरह फूल बन खिलता है।

 

सत्य के फूल खिलने पर

मन कितना पुलकित है, प्रफुल्लित है

मैं व्यक्त हुआ हूं इस तरह स्वयं ही में

मैं आवाजहीन, शब्दविहीन हुआ हूं खुद ही में।

 

मेरे मन ने किस तरह

एक दिन चुपचाप कहा था तुम्हारे मन को

मैं तुम्हें मिलने आऊंगा

मिल कर भूत, वर्तमान और भविष्य की बातें करूंगा

जीवन की कथा, व्यथा और सपनों की बातें करूंगा

मन को अनावृत्त कर तुम्हारे सामने रख दूंगा

यही थी मेरी ख्वाहिश

और तुम्हारे साथ खाय़ी कसमें भी थीं

पर आजतक ये सपने सपने ही रहे

मैं चाह कर भी तुम्हें मिल नहीं सका।

 

तुम्हारे मन में

एक शक्तिशाली आदमी का रूप

स्थापित होना चाहिए

निश्चय ही कुछ भी कर सकने वाला

जैसा भी कर सकने वाला

वह रूप शक्तिशाली होना चाहिए।

 

तुम भी जानते हो मैं टीले पर रहता हूं

ऊंचे टीले के घर का वासी हूं

यह घर सभी की नजरों के सामने है

लेकिन इस घर में मैं

कमजोर कैदी की तरह वास करता हूं

फर्क सिर्फ इतना-सा है,

कैदी या तो जेल में रहता है या बेल में होता है

मैं अकेला जिंदगी की जेल में कैद हूं।

 

खुद होकर भी खुद न होने की

पीड़ा और व्यथा में अकेला छटपटा रहा हूं।

 

प्रसव वेदना की तरह

वक्त के एक कालखंड नें मुझे कहा है

हमारे भविष्य को आकार दो...

अगर मैं विगत से प्रेम करता होता तो

खुद से पलायन हो चुका होता

मैं वर्तमान से प्रेम करता होता तो

स्व-केंद्रित बन

दुनिया को भूल चुका होता

मैं अनागत से प्रेम करता हूं

इसीलिए तो मैं कैदी हूं...

वक्त के चाबुक खाते हुए

अपने विगत का अदृश्य रिसता घाव

इतिहास भर पीड़ा देता रहता है

मन ही मन में रोता रहता है

वर्तमान रोगी न भी हो

लेकिन हम स्वस्थ भी नहीं हैं

कल लगी चोट और जख्मों के दाग

न मिटने वाले जख्मों के निशान और आहें

मेरी जिंदगी से मिटी नहीं हैं

हमारे दिलों से मिटी नहीं हैं

यह पीड़ा हमारे वर्तमान को सताती रहती है

हमारे जीवन को पल पल

तोड़ती मरोड़ती रहती है

खुद को इतिहास में विलुप्त कर

वर्तमान में खुद को ढूंढ रहा हूं

मेरे जीवन के इस सत्य से

तुम भी अनभिज्ञ हो

दूसरे भी अनजान हैं

आजकल आदमी के मन में

एक सड़ी लाश बन चुकी है संवेदना

क्या हो गया है आजकल

आदमी केवल भीड़ में ही नहीं

खुद में भी गुम जाता है

शायद इसीलिए

टीले के इस घर को

कुछ लोग ईर्ष्या से देखते हैं

बहुत से लोग नजरों से प्रहार करते हैं

तुम्हारी नजरों में

तुम्हारे मन माफिक न दिखना

तुम्हारे मन में

तुम्हारी कल्पना के अनुरूप मेरा स्वरूप भर न पाना

वह मेरा कारण नहीं

मुझे हर रोज हजारों दिलों से

वहिष्कृत किया जाना

यह मेरा अपराध नहीं है

वह विडंबना है विचार की

इसी विडंबना को भागता मैं पीड़ित हूं

विचारों और दिलों की चट्टानों से टकराता

मूर्छित जी रहा हूं

मैं छटपटाता रहता हूं

मुझे असहय पीड़ा होती है

छटपटाहट होती है।

 

मैं जमे स्वीमिंग पूल के पानी की तरह हूं।

 

लोग तैर कर पानी को मटमैला कर देते हैं

और कहते हैं पोखर का पानी साफ नहीं था

मैं तो स्वतंत्र बहते झरने

और नदी के जल की तरह

जिंदगी बहना चाहता हूं।

 

हजारों ठोकरें खाकर भी हंसते बहना चाहता हूं।

 

यह मेरी चाह है

जबकि मैं वैसा भी कर न सकने में असमर्थ बन चुका हूं।

 

मैं अपने घर की

मर्यादा और पवित्रता का रखवाला बन चुका हूं

और मैं उसी में कैद बन चुका हूं।

 

 अन्यथा यह घर फिर एक बार बंधक हो सकता है

विश्वास और आस्था के इस घर से

आदमी के सपने मर सकते हैं।

 

टीले के इस घर ने हमेशा

आंधियों और तूफानों का सामना किया है

सर्द हवाएं और वर्फ भी

इस घर को ज्यादा प्रभावित करती हैं

इस घर के भीतर मेरा

सिर्फ शरीर ही नहीं, मन भी ठिठुरता है

जिंदगी के सुंदर सपनों के आग्रह भी

वर्फ की तरह जम जाते हैं।

दरवाजे से बाहर की अदृश्य लक्ष्मण-रेखा को

लांघ भी नहीं सकता

चाह कर भी तुम्हें मिलने आ नहीं सकता

मैं इसी चार दीवारी के भीतर रह कर

भविष्य की प्रतीक्षा कर रहा हूं

तुम्हारे लिए नए संसार का निर्माण कर रहा हूं

स्वस्थ भविष्य के सपने बो रहा हूं।

 

मुझे माफ कर मेरी जिंदगी!

मैं तुम्हारे साथ जी न पाया

तुम्हारे लिए वक्त न दे पाया

आजकल मेरे अंदर तुम्हारे लिए

असीम प्यार उमड़ता है

खुद को कस कर आलिंगनबद्ध कर

भरपूर प्यार करने का जी करता है

अकेले चीख-चीख कर

कहना चाहता हूं कि

मैं खुद को प्रेम करता हूं

अपने सीने को सहला कर

खुद के लिए ही

भरपूर जिंदगी जीने का मन करता है

क्योंकि मैं अपनी जिंदगी से कट कर

खुद से निर्वासित हो चुका हूं

मैं तो खुद से ही सत्ताच्यूत हो चुका हूं।

                                                                                                                (अनुवाद - सुवास दीपक)

(पवन चामलिङ किरण नेपाली कविता के एक विशिष्ट हस्ताक्षर हैं। समग्र मानवता के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले अति संवेदनशील और राजनीति में आकंठ डूबे होने पर भी कवि पवन चामलिङ किरण को बचाने की आकांक्षा रखने वाले पवन चामलिङ राजनीति और साहित्य की सरहद पर खड़े मानव की शांति के लिए तपस्यारत हैं। समग्र मानवीय उत्थान के लिए कविता उनके लिए एक उपासना है।

अभी तक उनकी कविताओं के कई संग्रह छप  चुके हैं। 1996 में उनकी चुनिंदा कविताओं के हिंदी अनुवादों की पहली पुस्तक 'क्रूसीफाइड प्रश्न और अन्य कविताएं' (हिंदी अनुवाद सुवास दीपक) के अलावा 'पेरेनियल ड्रीम' ( अंगरेजी अनुवाद पी.बी. चक्रवर्ती)   चर्चित हो चुके हैं। संप्रति -चौथी बार सिक्किम के मुख्यमंत्री। अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित।)

 

परितृप्त

 

सुधा राई

हुत दिनों से

एक खुशी की तलाश में हूं

मन के ताप को बुझाने के लिए।

ईश्वर के घरों में

खुशियां -

बुद्ध,

कृष्ण,

ईसा मसीह

अल्लाह के

चेहरों पर बिखरी ही देखने की इच्छा हुई।

एक जैसे विषाद की छवि लिए

आदमी के घर-घर के चक्कर लगाए

विसंगति, विकृति और बेरौनक पाकर

उदास उदास होकर

दिन ढलते अपने आंगन के

एक कोने में

अहो!

देखा खुशी मुस्करा रही थी। (अनुवाद - सुवास दीपक)

 

डायरी

 

वीरभद्र कार्कीढोली

पने सुकोमल हाथों से

सुंदर फूल के बुके

पकड़ कर।

सुंदर ग्रीटिंग कार्ड

भेजती थी, हर नए साल तुम मुझे।

 

इस साल, शुभकामना सहित

एक बड़ी डायरी भेजी हो;

विश्वास न होगा तुम्हें

हर साल की डायरी है। मेरे पास

पर लिखने के लिए

विशेष शब्द न होने से

हर साल डायरी

यथावत है। मेरे पास

(तुमने जीवन तो दिया लेकिन...अनुवादक: खड़कराज गिरी, 1999 से साभार)