Gangtok, Sikkim,
Editor: Subhash Deepak
 

 

 

सृजन और अनुवाद का सफर

 

(अमृता प्रीतम से एक अनुवाद संवाद)

 

डॉ. आरसु

 

(ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेत्री (1981) पंजाबी कवयित्री अमृता प्रीतम एक ख्याति प्राप्त अनुवादिका भी हैं। उनसे मेरी मुलाकात हुई थी 12 जून, 1984 को। अनुवाद के विभिन्न पहलुऔं पर मेरे प्रश्नों के उन्होंने उत्तर दिए। हिन्दी और अंग्रेजी की विभिन्न शैली में बातचीत हुई थी। खैर, उनके अनुवाद सम्बन्धी विचार यहाँ पेश हैं)

 

प्रश्न :  भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है। इधर पारस्परिक अनुवाद के लिए अनन्त सम्भावनाएँ हैं। क्या हम वांछित ढंग से इस विधा में तरक्की कर पाते हैं?

 

अमृता :  जी हाँ, इधर अनुवाद के लिए काफी सम्भावनाएँ हैं। किन्तु काम बहुत कम ही हुए हैं। जुबानें ज्यादा हैं किन्तु अच्छे अनुवाद कम हैं। अनुवाद के महत्व के प्रति हम सतर्क नहीं बने हैं। जो लोग अनुवाद कर रहे हैं वे भी अपना काम पूरी निष्ठा के नहीं करते हैं। सरकारी संस्थाएँ अपनी मनमर्जी से अनुवाद के लिए पुस्तकों की सिफारिश करती है। कम पारिश्रमिक देकर ज्यादा अनुवाद करवाने के लिए कहती है। ठीक चीजें ठीक तरह से पाठकों को नहीं मिलती हैं। यह तरीका बदल जावे।

 

प्रश्न : आप विदेश के कई राष्ट्रों में भ्रमण कर चुकी हैं। अनुवाद की दिशा में उनकी कामयाबी का विशेष जिक्र  कर सकती हैं?

 

अमृता : जी हाँ, कई राष्ट्रों में मैं घूम चुकी हूँ। अनुवाद के प्रति उनका रवैया अच्छा है। पहले मैं हंगरी के बारे में कहूँगी। उनकी जुबान किसी दूसरी जुबान से नहीं मिलती - जुलती है। दूसरी भाषाएँ सीखने के लिए उन्होंने पहले ही कई लोगों को तैयार कर लिया। इस प्रकार हंगेरियन को सम्पन्न बनाने का मार्ग ढूंढा। अनुवाद के क्षेत्र में रूस काफी आगे बढ़ा है। वे अन्य जुबानों के साहित्य को सीधे रूसी में अनुवाद करते हैं। अनुवाद के बीच और कोई जुबान नहीं होती। उधर संस्कृत, हिन्दी, पंजाबी, तमिल आदि जुबानें सिखायी जाती हैं।

 

मैं चेकोस्लोवाकिया में भी गई थी। भारतीय भाषाओं की दो सौ से ज्यादा कृतियाँ चेक में अनूदित हो गई हैं। फ्राँस में भी पंजाबी, उर्दू, हिन्दी आदि भाषाएँ सिखाने की योजनाएँ हैं। पंजाबी के कवि वारिस शाह की कविताएँ फ्रांसिसी भाषा में अनूदित हो गई हैं। अब मेरे उपन्यास पिंजर का अनुवाद भी फ्राँसिसी भाषा में किया जा रहा है।

 

जापान के एक विश्वविद्यालय में पंजाबी सिखायी जा रही है। मुझे  उनकी प्रीमियर भी देखने का मौका मिला। पंजाब में वह कम्पोज की गई। पंजाबी के सही उच्चारण सिखाने के लिए उधर के विद्वान् इधर आये और उन्होंने मेरा इन्टरव्यू भी लिया। बलगेरिया, युगोस्लाविया आदि देशों में भी काफी काम हुए हैं।

 

प्रश्न : अनुवाद करते समय अनुवादक को किन - किन बातों पर सतर्क रहना आवश्यक है?

 

अमृता : अनुवादक अच्छी कृति का ही चयन करें। उस कृति को उसे पहले अपने भीतर उतार लेना होगा। अनुवादक किसी चीज को समझ न सका तो पाठक कैसे समझेगा? लोगों की पकड़ में आनेवाली भाषा में ही अनुवाद करना है। बाहरी हालत भले ही अलग - अलग हों, आम तौर पर हमारे गाँवों की आत्मा समान है। उनकी गरीबी और जीवन - संघर्ष एक - सा है। अनुवाद की भाषा उस लायक हो।

 

प्रश्न : आप मौलिक कविताएँ लिखती हैं और अनुवाद भी करती हैं। क्या दोनों प्रक्रियाएँ समान हैं या भिन्न?

 

अमृता : हम चुन - चुनकर ही अनुवाद करते हैं। जो रचना हमें पसन्द आती है उसी का अनुवाद करते हैं। अनुवाद करते समय पाठकों का ख्याल करना है। उधर मेहनत ज्यादा है। किन्तु मौलिक सृष्टि की बात ऐसी नहीं है। मौलिक लेखन कवि की आत्माभिव्यक्ति होती है। उससे आत्मसन्तोष मिलता है। अनुवाद कर्म में भी सन्तोष मिलेगा किन्तु दोनों में बहुत फर्क है।

 

प्रश्न : एक आम शिकायत सुनाई पड़ती है कि हमारे देश में अनुवाद का स्तर गिर रहा है। क्या यह बेबुनियाद है?

 

अमृता : इधर अनुवाद के लिए जमीन है। किन्तु मौके नहीं हैं। गैर - सरकारी प्रकाशक अनुवाद छापते कहाँ हैं? सरकारी योजनाओं की अपनी सीमाएँ हैं। अनुवाद के चयन में सरकार का अपना दृष्टिकोण है। अच्छे अनुवादक की सेवा नहीं मिलती है। एक बार एक अच्छे अनुवादक को चुन लिया तो फिर हर काम उससे ही कराने का विचार है। अनुवादक की खोज - तलाश उधर समाप्त हो जाती है। अनुवाद भी इधर 'कंट्राक्ट' के तौर पर दिया जाता है। अनुवाद पर उसका बुरा असर पड़ेगा। पैसे के चक्कर में पड़नेवाला आदमी समर्पित मन से अनुवाद नहीं करेगा। कुछ लोग छात्रों से अनुवाद कराकर अपना नाम छापते हैं। गरीब लेखकों से अनुवाद कराकर अपने नाम रखनेवाले अनुवादक भी हमारे बीच हैं। निष्ठा के साथ न करें तो अनुवाद का स्तर गिर जायेगा। आप माने या न मानें यही तो असली बात है। काम किसी का है और नाम किसी का।

 

प्रश्न : अनुवाद को आस्वाद्य बनाने में अनुवादक की भूमिका कैसी होगी?

 

अमृता : अनुवाद को बढ़िया बनाने के लिए पहले अनुवादक का भाषा पर अधिकार होना चाहिए। वह कृति की आत्मा को छू सकें। यान्त्रिक अनुवाद आस्वाद्य नहीं होगा। मूल कवि कई शब्दों से एक शब्द को चुनता है। और अनुवादक फटाफट एक शब्द से काम चलाएगा तो अनुवाद स्तरीय नहीं बनेगा। सृजनात्मक साहित्य के अनुवादक को भी सृजनात्मक प्रतिभा आवश्यक है।

 

प्रश्न : आपने कई कविताओं का अनुवाद किया है। किस मापदण्ड से आपने कविताएँ चुन ली थीं?

 

अमृता : मैंने मजबूरी से नहीं मन से अनुवाद किया था। कविताएँ मैंने अपनी रुचि के अनुसार चुन लीं। यह पैसे के लिए नहीं किया गया है। शौक ही मेरी प्रेरणा रही है। विदेशी भाषाओं की कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी के जरिए किया था। वह एक आनन्दपूर्ण अनुभव था।

 

प्रश्न : डॉ. जानसन जैसे पंडितों ने कहा है कि कविता का अनुवाद असम्भव है। काव्यानुवाद के बारे में आपको प्रथम कोटि की जानकारी है। इस मुद्दे पर आपका विचार क्या है?

 

अमृता : गद्य की अपेक्षा कविता का अनुवाद मुश्किल है। फिर भी काव्यानुवाद करनेवाले कई लोग हैं। उसकी सफलता अनुवादक की निपुणता पर निर्भर है। टैगोर एक अच्छे काव्यानुवादक थे।

 

प्रश्न : मान लीजिए - एक कवि अपनी ही कविता का अनुवाद करता है। उस अनुवाद प्रक्रिया में कविता थोड़ी बहुत बदल जाएगी। यदि दूसरा अनुवादक यह काम करता है तब ऐसा नहीं होता है। अपनी ही कविता के अनुवाद के दौरान क्या कवि - अनुवादक को अतिरिक्त आजादी मिलेगी?

 

अमृता : एक ही आदमी कवि और अनुवादक दोनों है तो उसे अपेक्षयता अधिक आजादी मिलेगी। अगर वह उससे लाभ उठाना चाहता है तो कोई हर्ज नहीं है। किन्तु दूसरों की कविता के अनुवाद करते समय यह आजादी नहीं मिलेगी। अगर अनुवादक यह आजादी लेगा तो मूल कविता के साथ वह न्याय नहीं कर पाएगा। अनुवाद भी गड़बड़ हो जाएगा। उसे पाबन्दियों का पालन करना पड़ेगा।

 

'कादम्बरी' नामक फिल्म के लिए मेरी एक पंजाबी कविता का हिन्दी अनुवाद करना था। मैंने ही अनुवाद कर दिया। इस समय मैंने कविता को एक नया अंदाज दे दिया।

 

मैंने रूसी, जर्मन ग्रीक साब्रो क्रोश आदि भाषाओं की कविताओं का भी अनुवाद किया। जब मैंने यह आजादी नहीं ली थी। अनुवादक के अनुशासन का पालन किया। अंग्रेजी के जरिए यह अनुवाद किया था। जो बात मुझे अंग्रेजी में स्पष्ट लगी है, उसी के आधार पर अनुवाद किया था।

 

प्रश्न : क्या आप सोचती हैं कि हमारे यहाँ अच्छे अनुवादकों को तैयार करना है? उनको प्रशिक्षण देना है?

 

अमृता : लेखक स्वयं कई भाषाओं में लिख नहीं सकता। उसकी श्रेष्ठ कृतियाँ अनुवाद के जरिए सारी भाषाओं में आनी हैं। इसलिए अच्छे अनुवादकों को तैयार करना है। अनुवाद एक रोजगार का काम है। जिन्हें इस दिशा में शौक है उन्हें बुनियादी चीजें सिखानी हैं।

 

प्रश्न : अनुवादक को प्रवंचक कहना कहाँ तक आपको सही लगता है?

 

अमृता : अनुवादक की मेहनत के परिणामस्वरूप आज विश्व की क्लासिक कृतियाँ अपनी भाषाओं मे हम पढ़ सकते हैं। ग्रीक लेखक कसन्त जास्कि से आज हम परिचित हैं तो उसका कारण अनुवाद है। हमें अनुवादकों के प्रति आभार प्रकट करना है। उनको प्रवंचक कहना कभी भी ठीक नहीं है।

 

प्रश्न : भारतीय कृतियों के पारस्परिक अनुवाद की प्रारम्भिक कड़ी के रूप में किस भाषा हिन्दी या अंग्रेजी को अपनाना उचित है? और क्यों?

 

अमृता : मेरे ख्याल से हिन्दी हमारी संस्कृति और चिन्तन के नजदीक है।

अंग्रेजी एक उन्नत जुबान होते हुए भी हमारी संस्कृति से दूर है। हमारे आदान - प्रदान की पहली कड़ी हिन्दी ही बन सकती है। तभी तो अनुवाद सुलभ होगा। घरों, खेतों और गलियों में प्रयुक्त भाषा का प्रयोग अनुवाद में भी आये। अगर आम लोगों की पहुँच के बाहर की भाषा का प्रयोग करते हैं तो अनुवाद को कोई नहीं पढ़ेगा।

 

प्रश्न : आपकी कई कृतियाँ हिन्दी में अनूदित हो गई हैं। उनका अनुवादक कौन है? क्या आप उन अनुवादों से सन्तुष्ट हैं?

 

अमृता : जी हाँ, मेरी कई कृतियाँ हिन्दी में अनूदित होकर आयी हैं। उत्तरप्रदेश के श्री भटनागर मेरी कृतियों के अनुवादक हैं। उन अनुवादों पर मुझे खुद तसल्ली है। मेरी उपस्थिति में ही वह अनुवाद करते हैं। उसका एक - एक वाक्य मैं सुनती हूँ। आमने - सामने अनुवाद करने पर तुरन्त सुधार निखार कर पाती हूँ।

 

प्रश्न : मेरी मातृभाषा मलयालम है। इस भाषा की कौन - सी विशिष्ट कृति आपने अनुवाद के जरिए पढ़ी है, और आपको पसन्द आयी है?

 

अमृता : मछुआरों के बारे में शिवशंकर पिल्लै ने एक उपन्यास लिखा है। (संकेत : 'चेम्मीन' के अनुवाद मछुवारों से है) वह उपन्यास मुझे बहुत पसन्द आया। आपके लेखक पोट्टेक्काट्ट ने अपने प्रान्त और जीवन पर आधारित एक उपन्यास लिखा है। वह भी मेरी पसन्द की कृति है।

(साहित्यानुवाद: संवाद और संवेदना से साभार, रचनाकाल  1984 )            अक्तूबर 2011

 

 

मैं आज भी अपने को 'बिगनर' महसूस करता हूँ

 

लीलाधर जगूड़ी से मोहन थपलियाल की बातचीत

 

आज लोकतन्त्र अथवा समाजवाद पर नहीं, बल्कि कुछ लोग आधुनिकता पर जोर देते हैं। क्या सब कुछ पहली बार आधुनिक हो रहा है? पहले की आधुनिकता और आज की उत्र - आधुनिकता में अंतर क्या है और उसका संघर्ष क्या है? क्या लोकतांत्रिक आधुनिकता जैसी भी कोई अवधारमा बनती है?

 

आधुनिकता की परंपरा बहुत लंबी है। जरूरी नहीं कि हर नई चीज आधुनिक कही जाने वाली हर जीच नई भी हो। आधुनिकता के कई पहलू हैं। भाषा पर आधारित कलाओं में आधुनिकता उस तरह नहीं जाँची - परखी जा सकती, जिस तरह गैरभाषिक कलाओं में। पेंटिंग वगैरह में सामग्री और उपकरणों के प्योग मात्र से भी आधुनिकता दिखाई देने लगती है। सामग्री - परिवर्तन ही कलाकार की आधुनिकता और वैचारिकता की पहचान बन जाती है। भाषिक कलाओं में भौतिक उपकरण के रूप में हमेशा सिर्फ स्याही, कलम और कागज का ही इस्तेमाल होता है। कागज की गुणवत्ता, नई शक्ल में ढली हुई कलम और जल्दी सूखकर अक्षरों को टिकाऊ तमक देने वाली स्याही भी आधुनिक उपकरण कहे जो सकते हैं, लेकिन लेखन में आधुनिकता उपकरणों तक ही सीमित नहीं रहती। आधुनिकता उत्पाजन को भी बदलती है। उत्पादन अर्थात् यथार्थ में हस्तक्षेप। नाट्य के क्षेत्र में देखें तो तकनीकी नवीनताओं के कारण मंच - सज्जा, ध्वनि और प्रकाश व्यवस्था में कितना अंतर आ गया है। आधुनिकता, उपकरणों के रूप में नाटक की प्रस्तुति में उसकी थीम का हिस्सा बन जाती है, जबकि साहित्य में आधुनिक उपकरण सीधे - सीधे काम नहीं आते। अतीत की आदुनिकता को वर्तमान की आधुनिकता में बदलने का मतलब है हमारे जीवन - बोध में पैदा हुआ परिवर्तन; जीवन - मूल्यों और जीवन - पद्धति में परिवर्तन। यथार्थ को पहचानना और उसे उजागर करना आदुनिक दृष्टि का बुनियादी संघर्ष है।

आधुनिक दृष्टि के कारण यथार्थ भी बदल जाता है। यथार्थ कभी भी प्रथम द्रष्ट्या दिखाई नहीं दोता। उसे पहचानने के लिए समझदारी - भरी द्वितीय दृष्टि की जरूरत है जो कि अंतत: अद्वितीय का सामान्य अर्थ है कि जिस जैसा कोई दूसरा न हो। लेकिन अद्वितीय का एक विलक्षण अर्थ भी है और वह कि जो द्वितीय नहीं है अर्थात् जो दूसरा नहीं है वही अद्वितीय है। प्रथम दृष्टि में भावुकता और अप्रामाणिकता हो सकती है. असंगति हो सकती है। तथ्यहीनता हो सकती है। क्षणिक प्रभाव का संवेग हो सकता है। प्रथम दृष्टि में निष्कलुष न होने से बहुत - से दोष हो सकते हैं। लेकिन तृतीय दृष्टि पुन: - पुन: के बाद पैदा होती है। बहुत कम ऐसा हुआ है कि पहला ही अद्वितीय ठहरा दिया दाए। अधिकांश अद्वितीय दो को बाद वाले ही हुए है। यह जो 'द्वित्व - बोध' है यह प्रयोगधर्मी है, क्योंकि जो भी है वह दूसरा है, पहला कोई नहीं है। अनादि जो था वही पहला था यानी अनादि के बाद दूसरा ही पहला बना। अनादि के बाद जो भी पहला है असल में वह दूसरा है। 'द्वैत', 'दुविधा' नहीं बल्कि 'संदेह' है। ' अद्वैत' या तो अनादि है या फिर 'तीसरा' है। कहने का मतलब कि 'अद्वितीयता' फिर - फिर के बाद ही आती है। आधुनिकता कभी भी मूल्यहीनता की पक्षधर नहीं होती बल्कि वह नए जीवन - मूल्यों की पहचान कराती है। भले ही वे कैसे भी हों। आधुनिकता एक तीसरी दृष्टि है यानी कि 'अद्वितीय दृष्टि'

आधुनिकता वह है जिसे प्रकृति नहीं बना सकती। आधुनिकता केवल मनुष्य की दृष्टि और मनुष्य का उपार्जन हैं। जो कुछ प्रकृति का था वह जब चाहे तब पैदा नहीं किया जा सकता था। प्रकृति के नियमों को समझकर मनुष्य ने प्रकृति के मनमानेपन के गणित को अपने मनमानेपन में बदल दिया। फसलों का और फलों तथा फूलों का ऋतुचक्र आदमी ने बदल डाला। जो फसलें जाड़ों में होती थी, वे कभी भी पैदा की जाने लगीं। बीज में तब्दीली पैदा की गई। आज आधुनिकता सही मायने में वह है जिसे प्रकृति न पैदा कर सके। पहली चुनौती मनुष्य के सामने प्रकृति ही थी और आज मनुष्य ने प्रकृति के सामने अनेक चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। प्रकृति की समझ और प्रकृति पर काबू पाना, यह मनुष्य - समाज की पहली आधुनिक प्रवृत्ति तब पैदा हुई जब, जो है उसे हटकर जैसा होना चाहिए उस ओर समाज बढ़ा। तीसरी आधुनिक प्रवृत्ति का जन्म तब हुआ जब मनुष्य ने ईश्वर की अपेक्षा बहुत सारी चीजों में स्वयं परिवर्तन पैदा करने की विधि प्राप्त कर ली। ईश्वर और प्रकृति, दोनों जो नहीं बना सकते, वह मनुष्य ने बनाना शुरू किया तब पूरी तरह आधुनिकता का साम्राज्य शुरू हो जाता है। आधुनिक दृष्टि हमेशा यथास्थितिवाद के विरुद्ध गई है। अब ऐसा समय आ गया है कि मनुष्य को कुछ नहीं बनाना है, सिर्फ इरादा बनाना है जो उसके सामने साकार होकर आ जाएगा। सारा निर्गुण अब सगुण हो गया है। यानी मनुष्य मन से तो सक्रिय रहेगा बाकी सारे काम मशीनें कर देंगी। यह मैं समझता हूँ कि उत्तर - आधुनिकता है, यानी आधुनिकता के बाद की स्थिति, जिसमें मनुष्य को केवल विचार देने हैं, विज्ञान को या विज्ञान की क्षमता को दृष्टिगत रखते हुए। सारी चीजें आपके समक्ष एक कैटलाग के रूप में आ जाएँगी। अब चुनना आपको है, परिणाम चाहे जो हों। उत्तर - आधुनिकता परिणाम पर कम और निर्णय यानी कि 'आर्डर' पर ज्यादा विश्वास करती है। यह आप पर निर्भर करता है कि आप उत्तर - आधुनिकता में भी एक प्रयोगशील, परिणामपरक आधुनिक मनुष्य के रूप में प्रवेश करना चाहते हैं या सिर्फ एक निरर्थक गोता लगाना चाहते हैं। संक्षेप में निष्कर्ष यह है कि प्रकृति की पराधीनता से मुक्ति के लिए मनुष्य ने आधुनिक होना पसंद किया और उत्पादन व रचना के सारे तंत्र - मंत्र से मशीनों की एक समानांतर सत्ता स्थापित कर दी। अब उत्तर - आधुनिक काल में मनुष्य सारे काम और परिणाम अपनी पैदा की हुई यांत्रिकी से लेना चाहता है। मैनपावर की जगह मशीनों की शक्ति ने ले ली है। अब मनुष्य अपने आप कुछ न करके अपने किए - धरे से काम करवाना चाहता है। यह अलग बात है कि इससे आगे जाकर अज्ञान और निष्क्रियता का दौर एक बार फिर आ सकता है। ईश्वर के बारे में जिस तरह बहुत - से अंधविश्वास काम करते हैं, उसी तरह मशीनों के बारे में भी नए - नए अंधविश्वास पैदा हो जाएँगे। आश्चर्य नहीं कि इस उत्तर - आधुनिकता के बाद आधुनिकता - पूर्व का जमाना कहीं फिर न आ जाए।

विज्ञान अभी पीने लायक नकली पानी, सुपर कंडक्टिविटी और पेट्रोल का कोई विकल्प नहीं प्राप्त कर सका है। दौड़ जारी है,  बस, अंत में यही प्रार्थना है कि दम न टूट जाए। पर मेरी यह प्रार्थना भी वैसी ही है जैसी 'घबराए हुए शब्द' में एक नास्तिक की प्रार्थना:

 

फलो

जब तुम्हें कोई कमजोर, बूढ़ा और बीमार

बच्चा देखे

तो पककर गिर जाया करो

फलो

जब तुम महँगे बेचे जाओ

तो सड़ जाया करो

छूते ही

या छूने न दिया जाए तो देखते ही।

 

और अंत में यह बात जो आपने अंत में पूछी है - लोकतांत्रिक आधुनिकता वाली! आधुनिकता भी मनुष्य के जीवन में अपनी परिस्थिति से ही पैदा होती है। सामंती सामाजिक ढाँचे, या और पीछे चलें तो अराजक प्राकृतिक न्याय के ढाँचे में, या इन दोनों से थोड़ा आगे जाएँ तो साम्राज्यवादी ढाँचे में 'ईश्वर' सबसे बड़ा आधुनिक 'कंसेप्ट' है। ईष्वर की परिकल्पना, मनुष्य की सृजनशक्ति और उसकी असीम कल्पना - शक्ति की उपज है। ईश्वर केवल कारण नहीं रह जाता, बल्कि वह परिणाम भी बन जाता है। ऐसा आविष्कार दुर्लभ है। प्रकृति और ईश्वर के अंतर्संबंधों को समझने की शुरूआत से ही आधुनिकता, विचार और तर्क तथा प्रत्यक्ष उदाहरणों की ओर बढ़ने लगी। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष के द्वन्द्व का आज भी निराकरण नहीं हो सकता है। प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष कहीं ज्यादा बड़ा होता है। आधुनिकता हर तरह की गुलामी के विरुद्ध रही है। आधुनिक दृष्टि जीवन को अधिक सुरक्षित, सुंदर और मूल्यवान बनाने की रही है। आधुनिक का अर्थ 'तब' कभी नहीं रहा, हमेशा 'अब' रहा है। संस्कृत में 'लेटेस्ट' को 'अधुना' या 'अधुनातन' या 'अद्यतन' कहा जाता रहा है। आधुनिकता अपने समय और सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप करती है और उसी से निर्मित होती है। अद्यतन लोकतांत्रिक व्यवस्था भी आधुनिक विचार - पद्धति के विकास का ही परिणाम है। आधुनिक दृष्टि हमेशा आचरण और विचार का विश्लेषण करती आई है। आधुनिकता बहुत - सी चीजों को 'तब' में बदल देती है। आधुनिकता के 'अब - तब' गौर से देखें तो जब -जब अपने को पुनरुत्पादित करते हुए समृद्ध करते रहते हैं। आधुनिक दृष्टि लोकतांत्रिक स्वरूप की भी एक मानवीय और वौज्ञानिक व्याख्या चाहती है।

(लीलाधर जगूड़ी हिन्दी के प्रख्यात कवि हैं। मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन से साभार)

(सितम्बर 2011)

 

 

मानवीय पीड़ा की अनुभूति से साहित्य यात्रा की शुरूआत:

 

 राजेन्द्र परदेशी

 

वैद्यनाथ उपाध्याय से बातचीत

 

पेशे से अभियन्ता के रूप में सेवानिवृत्त हुए वरिष्ठ लेखक राजेन्द्र परदेशी ने अपनी लेखन यात्रा का प्रारम्भ एक दर्दनाक मानवीय पीड़ा की अनुभूति से किया था। एक दिन किसी काम से वे बराईच में घूम रहे थे। वहाँ एक माँ दो बच्चों को लिए हुए थी। एक को वह दूध पिला रही था और दूसरा पास में था। दूसरा बच्चा माँ से कहता है - माँ, भूख लगी। वह बच्चा यूँ ही तीन - चार साल का होगा। वह कुछ सोचे बगैर उसे ताँचा लगाती है। मैंने देखा उसके भीतर की पीड़ा को वहीं से मैंने लेखन की शुरूआत की - परदेशी जी ने बताया।

 

नए लेखकों के लिए वे काफी अनुप्रेरक और मार्गदर्शक के रूप में खड़े हैं। इसी वजह से वे आज भारत के सभी भाषाओं के लेखकों से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। परदेशी दी ने जब मेरी एक दो रचनाएँ कादम्बिनी, भाषा आदि पत्रिकाओं में पढ़ीं तो एक पुस्तक उन्होंने मुझे भेजी। और मैंने भी अपना काव्य संग्रह 'गगन के उस पार' उन्हें भेजा। उन्होंने मुझे फोन पर बधाई दी और समीक्षा की प्रति भेजी। इतना ही नहीं, वे असम आए और तेजपुर में हमें बुलाकर उनके व्यक्तित्व से रू - ब - रू होने का मौका प्रदान किया। वहीं रीता सिंह सर्जना से भी हमें मिलाया और लेखन के बारे में खुलकर बातें कीं। तेजपुर में उनके बेटे के सरकारी आवास पर हमें पता चला कि वे लेखक ही नहीं, चित्रकार भी हैं। दिल्ली के लेखकों के बारे में उनकी टिप्पणी कि जब वे गुवाहाटी से कहीं भी बस से यात्रा करते हैं तब वे कितने राष्ट्रीय हैं, उनको पता चल जाता है। यहाँ न उनकी पत्रिका चलती है, न पुस्तक पढ़ी जाती है। राष्ट्रीय होने का भ्रम हमें नहीं पालना चाहिए। धर्मवीर भारती से लेकर कई वरिष्ठ एवं समकालीन लेखकों के विषय में उन्होंने हमें विस्तार से बताया। मेरे साथ मित्रवर गायत्री भट्टराई भी थे। प्रकाशक एवं प्रखण्ड अधिकारी ज्ञानेन्द्र सरकार से भी हमने उन्हें मिलाया। फिर वही लेखकीय ज्ञान की परम्परा की बात छिड़ी। उनके व्यक्तित्व से हम लोग काफी प्रभावित हुए। हम चाहते थे कि उनको उदालगुड़ी ले जाकर कुछ साहित्यिक आयोजन भी करें। लेकिन मित्रों ने उग्रवादी गतिविधियों के कारण खतरा न उठाने की सलाह दी। हमने उनको बोडो आरनाइ पहनाकर और भट्टराईजी ने नेपाली टोपी से उनका सम्मान किया। तेजपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भी उनके सम्मान में समारोह का आयोजन किया। ऐसे व्यक्तित्वसम्पन्न लेखक का हम हार्दिक अभिनन्दन करते हैं।

09435590014                                               सितम्बर 2011

 

मुल्कराज आनंद से डॉ. हरिशरण लाल की

 

 बातचीत

 

(जन्म 1905 निधन 2004)

 

लंदन प्रवास के दौरान आपकी रचनाधर्मिता को विकसित करने में अधिक प्रभावशाली तथ्य कौन से हैं?

मैंने 1925 में लंदन की यात्रा की। एक शहर के रूप में लंदन अद्भुत लगा। उसका शांत, भीगा - भीगा, ठहरा हुआ रूप अधिक शीतल एवं मनमोहक था। उसका स्पर्श वायवीय था। उसकी आत्मा जीवंत थी। तत्कालीन श्रेष्ठ रचनाकारों की वह बस्ती थी। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान और बाद में भी यूरोप का संपूर्ण ज्ञान उसके द्वारा होता था। बहुत दिनों तक मैं लंदन में भूखा - प्यासा रहा। अंतत: मुझे प्रति सप्ताह चार पौंड की एक नौकरी प्राप्त हुई। वहां कुछ दिन रहने के बाद मेरी मुलाकात प्रोफेसर हिक्स से हुई। मैंने नार्थ वेल्स की भी यात्रा की। मेरी मुलाकात प्रसिद्ध कवि यीट्स से भी हुई। प्रसिद्ध उपन्यास लेखिका वर्जीनिया उल्फ से कई मुलाकातें हुईं। ब्लूमस्बरी के प्रसिद्ध साहित्यकारों से मेरी दोस्ती थी। टी. एस. इलियट, जी.एच. लारेंस, ई.एम.फॉस्टर से अक्सर काफी हाउसों, पबों और किताबों की दुकानों पर बहस होती थी। इन रचनाकारों के सानिध्य में मैं 'ब्लूम्सबरी ग्रुप' का बुद्धिजीवी लेखक बन गया था। एक आयरिश कुमारी आयरिन ने मेरी जीवन - दिशा बदल दी। उस सुकोमल, सुन्दर आइरिश महिला ने मेरे अंदर की हठवादिता, जिद्दीपन और पंजाबी अक्खड़पन को हटाकर, एक शिष्ट व्यक्तित्व प्रदान किया। लंदन प्रवास के दौरान आयरिन से मेरी मुलाकात ने मेरे प्रसिद्ध उपन्यास 'द बबल' की रचना को प्रभावित किया है। मेरे प्रेमपत्रों और डायरी में लिखी गयी स्वीकारोक्ति का वर्णन इस उपन्यास में है।

गांधी जी के व्यक्तित्व का आप पर विशेष प्रभाव क्या रहा है?

जब मेरी गांधी जी से मुलाकात हुई तो मेरा प्रथम उपन्यास अनटचेबल लगभग तैयार था। गांधी जी ने मुझे प्रोत्साहित किया। गांधी जी के व्यक्तित्व का प्रभाव यह था कि उनसे मिलने के बाद आजतक मैंने टाई नहीं बांधी और स्त्रियों के प्रति जो उदासीनता का भाव था, वह समाप्त हो गया। कई वर्षों तक मैं गांधी जी को पत्र लिखता रहा। चौराचौरी कांड की याद मेरे जेहन में आज भी ताजी है। मौलाना आजाद, सुभाषचन्द्र बोस, राजेन्द्र बाबू और जवाहरलाल नेहरू मेरे मानसिक कैनवास पर आज भी उसी ताजगी के साथ मूर्तिमान हैं। गांधी जी से मेरी वार्ता के कुछ अंश आजतक मुझे याद हैं -

 

गांधीजी: तुम उपन्यास क्यों लिखते हो? अपृश्यता के बारे में एक लेख क्यों नहीं?

मु.रा. आ.:  एक उपन्यास मानवीय भावनाओं को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है और लेख में पूर्वाग्रहों के व्यक्त होने की संभावनाओं अधिक होती हैं।

गांधी जी: यहां तक मैं जानता हूं उपन्यासों में प्रेम के आख्यान का ही वर्णन होता है और सुन्दर शब्दों के माध्यम से असत्य का वर्णन अधिक होता है, क्यों ठीक कह रहा हूं?

मु.रा.आ. उपन्यास की विषय - वस्तु जीवन का हर पहलू हो सकता है, जो गंभीर हो, एक गहराई से जिसका विश्लेषण किया जाए।

गांधी जी के सेवाग्राम आश्रम के परिवेश ने इंगलैंड के मुझ जैसे ब्लूम्सबरी बुद्धिजीवी को एक जागृत भारतीय के रूप में परिवर्तित कर दिया। आश्रम में रहकर मैंने अपने उपन्यास अनटचेबल को कई बार संशोधित किया।

आप अपने औपन्यासिक विधा के बारे में क्या सोचते हैं?

मेरे उपन्यास स्वीकारोक्ति (कन्फेशन) की शैली में लिखे गये हैं। मेरे सभी उपन्यासों में अपराध, हिंसा, शोषण, मानवीय त्रासदी, सांप्रदायिकता एवं संकीर्णता के विरोध का साहित्य है। अधिकांश विश्व के महान लेखकों की रचनाएं स्वीकारोक्ति - साहित्य का अंग हैं। मेरी रचनाएं भी उसी प्रकार की हैं। माई नॉबेल्स आर माई कन्फोशन्स।

भारत का बंटवारा हमारे राजनीतिक इतिहास का एक दागनुमा अद्याय है। बंटवारे से संबंधित आपने किसी उपन्यास की रचना नहीं की, क्यों?

भारत के बंटवारे के प्रति जिन्ना, अतिवादी नेता, आर.एस.एस. और हिन्दू सांप्रदायिकता उत्तरदायी है। अल्लामा इकबाल जिनसे मैं प्रारंभिक काल में बहुत प्रभावित था, बाद में मैं उनसे हतप्रभ हो गया। मुझे लगा कि इस व्यक्ति को समझने में मुझसे गलती हो गई थी। बंटवारे की त्रासदी, भयावहता, जान - माल की हानि और अवर्णनीय नरसंहार एक फिल्म के लिए कथानक का विषय - वस्तु तो हो सकती है, किन्तु उपन्यास की विधा में इतने बड़े पैमाने पर मानवीय त्रासदी को समेटा जाना, कलात्मक रूप से समीचीन नहीं है।

भारतीय इतिहासबोध के संबंध में आप क्या सोचते हैं?

अजंता, एलोरा की जब मैंने यात्राएं कीं, मुझे ऐसा लगा कि इन स्थानों पर जाना, भारत के प्राचीन कलात्मक पक्ष को जानना है। एलोरा की गुफाओं में दीवारों पर आरेखित नारी - चित्रण, ऋंगार - पक्ष के अद्बुत चित्रण हैं। कई माइकल एंजलो एक साथ मिलकर ऐसा चित्रण नहीं कर सकते।

भारतीय आलोचकों ने एक रचनाकार के रूप में आपका समीचीन मूल्यांकन नहीं किया है, क्यों?

भारतीय आलोचना साहित्य, विशेषत: भारतीय साहित्य, जो अंग्रेजी में लिखा जा रहा है, उसका आलोचना साहित्य मीडियाकर है, जो प्रांतीयता, क्षेत्रीयता और भाषा की संकुचित सीमाओं से जकड़ा हुआ है। यूरोप की व्यापक एवं उदार दृष्टि का भारतीय आलोजना साहित्य में सर्वथा अभाव है। भारतीय बुद्धिजीवी ईर्ष्या, द्वेष, पूर्वाग्रहों से अधिक ग्रसित हैं।

भारतीय साहित्यकारों में आप किसको पसंद करते हैं?

भारतीय साहित्य में मुझे आज की महिला रचनाकार अधिक पसंद हैं, क्योंकि इनके साहित्य में एक निर्भीकता है। इन्हें अपनी पहचान की एक तलाश भी है। वैसे इस्मत चुगताई, टैगोर, कमला दास आदि मुझे बहुत पसंद हैं।

भारत में वर्तमान राजनीतिक परिवेश के संदर्भ में सामाजिक और नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है। ऐसी हालत में एक लेखक को किन क्षेत्रों की तलाश करनी चाहिए?

आज के लेखक के लिए कथानक की कमी नहीं है। उसे महानगरी का मोह छोड़ना होगा। गांव की ओर जाना होगा। ग्रामीण परिवेश में हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा सिसक रहा है। प्रकृति -त्रासदी, शोषण, अशिक्षा के कारण, आज भी जीवन का चित्र धुंधला है। गांव में दर्द का एक सैलाब आज भी निरंतर बह रहा है। गांवों से हटकर, छोटे - छोटे कस्बे भी हमें बुला रहे हैं। एक अजीबोगरीब कस्बाई संस्कृति विसकित होती जा रही है। साधारण किंतु महत्वाकांक्षी, शौकीन, लालसायुक्त मध्यवर्गीय जीवन कराह रहा है। झांककर देखने से लगता है कि जीवन का एक बहुत बड़ा कैनवास चित्रित होने के लिए मुंतजिर है।

सेक्स,प्रेम, धर्म और आज की राजनीति के बारे में आपकी क्या प्रतिक्रियाएं हैं?

धर्म का अर्थ रथयात्रा नहीं होता। सांप्रदायिक उन्माद में पूरा मध्ययुगीन भारत बन रहा है। जीवन के अधिकांश पहलू अर्थहीन हो रहे हैं। दे हू नॉट लीड फ्रॉम डार्कनेस टु लाइट। मृतप्राय: होने में समय नहीं लगता। भारत को बनाने में हजारों साल लगे हैं। इस देश को खंडित करनेवालों को यह सोचना होगा कि निर्माण की प्रक्रिया शताब्दियों तक चलती रहती है।

 

 मुल्कराज आनंद का निधन 2004 को 99 वर्ष की उम्र में हुआ।

(धर्मयुग 1 जनवरी 1994 से साभार)          अगस्त 2011

 

 

 

सन्तोष निराश: सिक्किम की प्रथम हिन्दी पत्रकार/ सम्पादक

 

वार्ताकार - सुवास दीपक

 

आपका जन्म कब और कहाँ हुआ?

मेरा जन्म अविभाजित भारत के दादन खान गाँव (जिला झेलम - अब पाकिस्तान में) 3 अक्तूबर, 1928 को हुआ। मेरे पिताजी का नाम हरिशचन्द्र बाली और माताजी का नाम सुशीलावती था।

 

सिक्किम कब और क्यों आना हुआ?

सन् 1959 को मैं सिक्किम आई। इसका कारण था कि मुझे सिक्किम के एक स्कूल 'वेस्ट पाइन्ट' में सिक्किम सरकार (तत्कालीन दरबार) से बतौर अध्यापिका चुन लिया था और तार द्वारा कार्यभार सम्भालने की सूचना मिली थी। इस स्कूल में कुछ वर्षों तक काम करने के बाद मैं राजा को निजी स्कूल ताथांगचेन में पढ़ाने लगी। यह स्कूल आज एक राजकीय स्कूल बन चुका है।

 

आप एक नर्सरी स्कूल भी चलाती थीं?

हाँ, मैं बाल शिक्षा में रुचि रखती हूँ। कुछ वर्षों तक सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों में अध्यापन करने के बाद मैंने निजी तौर पर स्कूल खोलने का निर्णय लिया जिससे कि नन्हें बच्चों को अक्षर - ज्ञान के अलावा उनका सर्वांगीण विकास किया जा सके। उस जमाने में समूचे सिक्किम में केवल सरकारी स्कूल ही संचालित होते थे। मेरा निजी स्कूल सिक्किम में अपनी किस्म का  पहला   नर्सरी स्कूल था।

 

लिखने के प्रति रुचि कब से जागृत हुई?

लिखने के प्रति रुचि विद्यार्थी जीवन से ही जागृत हुई। स्कूल में हम कहानियाँ पढ़ते, गढ़ते और लिखते थे और एक - दूसरे को सुनाते थे। इसी से लिखने की ओर झुकाव हुआ। कॉलेज में VAN GUARD नामक पत्रिका निकलती थी जिसमें मेरी कहानियां और लेख छपते थे।

 

सिक्किम में शिक्षा के प्रचार कार्य में आप 1959 से जुड़ीं और उसके बाद आप पत्रकारिता से भी। सिक्किम में पत्रकारिता से कैसे जुड़ीं?

देखिए, मैं शिक्षण के साथ - साथ समाज सेवा से भी जुड़ी रही हूँ। मेरे पतिदेव श्री प्रेमसागर निराश सिक्किम से Daily Telegraph (London), Times of India, Malayalam Manorama आदि पत्र - पत्रिकाओं और समाचार एजेन्सियों से जुड़े थे। घर में पत्रकारिता का माहौल था। मैंने 1975 में सिक्किम के भारत में विलय होने के पश्चात राज्य के विकास कार्यक्रमों के विषय में 1970 के दशक के अन्तिम वर्षों से The Asian Features के लिए काम किया। मेरे पतिदेव पत्रकारिता में मेरे गुरु रहे हैं।

 

आपने अंग्रेजी में एक मासिक पत्रिका Broader News & Views भी निकाली थी?

हाँ, आपने ठीक बताया। Broader News & Views सिक्किम की पहली समाचार पत्रिका थी। मेरे पतिदेव इसमें मेरा पूरा सहयोग देते थे। इससे पहले की बात बता दूँ, 1975 में जब समूचे देश में आपातकाल लगा दिया गया था तो मैंने अन्य समाचार पत्रों को छोड़कर UNI में काम किया था। Broader News & Views  हमने 1987 तक निकाला। उसके बाद मैंने अपने नर्सरी स्कूल का कार्यभार एक स्थानीय योग्य महिला को सौंप दिया और खुद पूर्णकालिक पत्रकारिता में संलग्न हो गई। हमने अपना एक छोटा - सा Letter Press भी स्थापित किया जिसके कारण हमें अपने प्रकाशनों के लिए अन्यत्र नहीं जाना पड़ता था।

 

जमाना (अब जमाना सदाबहार) निकालने के पीछे आपका क्या उद्देश्य था?

सिक्किम में शुरू से ही हिन्दी भाषा के प्रति किसी प्रकार का द्वेष नहीं रहा। लोग हिन्दी समझते हैं, फर्राटे से बोलते हैं - कोई समस्या नहीं है। बचपन से ही मैं अंग्रेजी और हिन्दी में लिखती आ रही हूँ। मेरे पतिदेव पूर्णकालिक पत्रकार, संवाददाता एव लेखक - शायर थे। पारिवारिक माहौल पत्रकारिता के अलावा शेरो - शायरी का भी रहा, यद्यपि सिक्किम आने के बाद शेरो - शायरी का माहौल नहीं रहा, केवल पत्रकारिता ही हाबी रही। आपने पूछा, हिन्दी में साप्ताहिक निकालने का क्या उद्देश्य था? उद्देश्य स्पष्ट था - हिन्दी भारत की केवल राष्ट्रभाषा ही नहीं है, यह एक विश्वभाषा है। आज से चौबीस साल पहले 1987 में जब मैंने हिन्दी साप्ताहिक जमाना शुरू किया तो इसके पीछे सिर्फ राष्ट्रभाषा के प्रति अटूट आस्था और प्रेम था। इने - गिने लोग हिन्दी भाषा के प्रति दुराग्रह रखते भी हों, मुझ पर या हिन्दी भाषा पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं किसी प्राप्ति की चाह में, लालच में या लोभ में पड़कर यह काम नहीं कर रही हूँ - यह मेरा जनून है, आप सभी जानते हैं पिछले 24 सालों से सिक्किम से यह इकलौता हिन्दी साप्ताहिक नियमित रूप से छपता आ रहा है। मैंने इसे किसी विशेष विचारधारा के घेरे में रखने की कोशिश नहीं की - अपने बलबूते निष्पक्ष रूप से सभी के विचारों को स्थान दिया - अपनी टिप्पणियाँ बिना किसी भय या दबाव में नहीं लिखीं। अब चूँकि मेरी बड़ी बेटी नीता निराश ने साप्ताहिक का पूरा कार्यभार संभाल लिया है, मैं तो नाम मात्र की सम्पादक हूँ। मेरे इस प्रयास में यानि जमाना सदाबहार के नियमित प्रकाशन में हिमाद्रि प्रिंटर्स की स्वतत्वाधिकारी श्रीमती शीला थामी दाहाल का निरन्तर सहयोग रहा है।

एक और बात बता दूँ। हिन्दी साप्ताहिक का समूचा अंक तैयार करने में मेरे पतिदेव (जब तक लेटर प्रेस था) पूरी सहायता करते थे - जैसे समाचारों का संकलन, अग्रलेख, सम्पादकीय, प्रूफ संशोधन आदि सभी में उनका सहयोग रहा है। निराश साहब एक कवि - हृदय थे - साहित्य, संगीत, कला के वे गम्भीर अध्येता और पारखी थे। वे भाषाप्रेमी थे - कई भाषाओं के जानकार थे - यहाँ तक कि उन्होंने कुछ हद तक तिब्बती भाषा भी सीखी ती। अदभुत ऊर्जा के धनी थे वे। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। यही कारण है कि पिछले 51 सालों से हम सिक्किम के विकास में, चाहे समाज सेवा हो, पत्रकारिता हो, अपनी ओर से थोड़ा - बहुत योगदान दे सके। निराश साहब का निधन 29 अप्रैल 2008 को हुआ। भौतिक रूप से वे न भी हों लेकिन उनके दिखाए हुए उसूलों पर चलते हुए हम अपनी अन्तिम सांस तक मानव सेवा के कार्यों में लगे रहेंगे।

 

आप Women's Council, Sikkim की सदस्या भी रही हैं। इसके बारे में कुछ बताइए?

1980 के प्रारम्भिक वर्षों में, जब होमी तल्यार खान सिक्किम के राज्यपाल थे, तो उनकी धर्मपत्नी श्रीमती त्रिथी तल्यार खान की अध्यक्षता में वीमेन्स कौंसिल, सिक्किम शाखा की सदस्य के रूप में सिक्किम में महिलाओं की समस्यायों, उनके अधिकारों एवं उनकी सर्वांगीण प्रगति के क्षेत्र में मैंने अपनी सेवाएँ प्रदान करने का अवसर प्राप्त किया। 'आशी' (Association for Social Health in India) की सिक्किम शाखा की उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए बेसहारा एवं विभिन् कारणों से पारिवारिक हिंसा एवं शोषण आदि से प्रभावित महिलाओं को उचित परामर्श देने का अवसर मिला। सिक्किम में Family Court की स्थापना से लेकर सन् 2006 तक फैमिली कौंसिलर के रूप में दम्पत्तियों के बीच कलह, तलाक आदि के कारणों से उत्पन्न विवादों को सुलझाने और उन्हें पुनर्स्थापित करने के कार्यों में मैं अपनी सेवाएँ देती आई हूँ।

 

पिछली अर्धशताब्दी से आपने नि:स्वार्थ भावना से सिक्किम में शिक्षा, महिला कल्याण, स्वास्थ्य आदि सामाजिक क्षेत्रों में जो योगदान दिया है, उसका मूल्यांकन होना अभी बाकी है। राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार - प्रसार में आपका योगदान पथ - प्रदर्शक माना जाएगा। युवा पीढी को आप क्या सन्देश देना चाहेंगी?

मैंने तो अपने जीवन में कर्म को ही अपना धर्म समझा है। युवा पीढ़ी को भी मेरा यही सन्देश है कि वे कर्म के सिद्धान्त का अनुसरण करें, निजी हित या स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और देश के लिए काम करें क्योंकि आज देश को उनकी नितान्त आवश्यकता है। समाज के सभी वर्ग, विशेष तौर पर महिलाएँ आगे आएँ, उन्हें जो अधिकार प्राप्त हैं, उनका सदुपयोग करें, अपनी प्रतिभा, अपनी ऊर्जा तथा अपना समय समाज और देश निर्माण मे व्यय करें। धन्यवाद।

 

(श्रीमती सन्तोष निराश वर्तमान में सिक्किम केन्द्रीय विश्वविद्यालय की Gender Sensitization Unit की सदस्य मनोनीत की गई हैं। वे मार्च 10, 2010 से राज्य की प्रथम आधिकारिक Aids Ambassador बनाई गई हैं। सिक्किम की शीर्ष प्रकाशन संस्था निर्माण प्रकाशन ने पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें 2002 को अभिनन्दित किया था। उन्हें 2009 को पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रेस क्लब आफ सिक्किम ने कंचनजंघा कलम पुरस्कार से पुरस्कृत किया था।)                    जुलाई 2011

 

 

 

प्रख्यात कवि पवन चामलिङ 'किरण' से बातचीत

 

 

(सुवास दीपक द्वारा यह अन्तरवार्ता 1987 में ली गई थी जो विचार (नेपाली) के 24 जुलाई, 1987 के अंक में प्रकाशित हुई थी। उसी का यह हिन्दी रूपान्तरण है।)

 

आप क्यों लिखते हैं?

 

रूढ़िग्रस्त समाज में अव्यवस्थित मानव से निर्मित इस संसार में जब मैं अकेला रोता हूँ, छटपटाता हूँ, तड़पता हूँ - अपनी व्यथा और कथा से, तब मैं इस मन को हल्का करने के लिए लिखता हूँ। बस! स्कूली जीवन से ही लिखना शुरू कर दिया था। मेरे श्रद्धेय गुरु श्री तुलसी 'कश्यप' की प्रेरणा से ही 'कवि' बनने का संकल्प लिया, इन्हें मैं अपना साहित्यिक गुरु मानता हूँ।

 

आपकी पहली रचना कौन है और वह किस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी?

 

मेरी पहली रचना 'स्वार्थी मानव' 'क़ञ्चनजङ्घा' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। मेरी पहली कविता 'वीरको परिचय' है।

 

आपके मन पसन्द लेखक?

 

मेरे मन पसन्द लेखक अनगिनत हैं जिनमें से एक दो के नाम लेकर अन्याय करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। दरअसल लेखक और कवि स्रष्टा होते हैं इसलिए सभी अच्छे होते हैं। मुझे सभी अच्छे लगते हैं। केवल स्तर ऊपर - नीचे हो सकता है - बस इताना ही अन्तर होता है।

 

सिक्किम के वर्तमान साहित्य सृजन को लेकर आपकी टिप्पणी?

 

सिक्किम का वर्तमान साहित्य उम्मीदों से भरा है। लेखक - लेखिकाएँ आगे बढ़ रहे हैं। इनकी रचनाओं को प्रकाशित करने की दिशा में हमें सोचना चाहिए। इस महान कार्य के लिए बुद्धिजीवियों और पूँजीपतियों को आर्थिक और नैतिक सहयोग करना चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है - यही दु:ख की बात है।

 

एक रचनाकार की प्रतिबद्धता किसके प्रति होनी चाहिए?

 

रचनाकार की प्रतिबद्धता आम आदमी के प्रति होनी चाहिए। इस बात पर मैं 'मैनाम' और 'टेन्डोंग' (सिक्किम के पहाड़ों के शिखर) की तरह अटल हूँ। मानव की शाश्वत मर्यादा एवं अस्तित्व की रक्षा के लिए रचनाकार को कलम का हथियार पकड़कर युद्धरत होना चाहिए। मानव को सही दिशा देना और मूल्यबोध कराना ही रचनाकार का दायित्व है।

 

एक रचनाकार कोपरम्परा का अनुकरण करना जरूरी है?

 

रचनाकार परम्परा को पकड़कर आगे बढ़ सकता है - ऐसी बात को मैं नहीं मान सकता। परम्परा से चिपककर लिखना केवल अनुकरण करना है। मौलिकता नहीं। मौलिकताहीन रचना जीवनहीन मनुष्य की तरह होती है। लेखक - कवि को अपने संसार और अपनी पम्परा की स्थापना करके ही जिन्दा रहने में सक्षम होना चाहिए। रचनाकार सीमाबद्ध होकर जिन्दा नहीं रह सकता।

 

लेखकीय स्वतन्त्रता की आपके विचार में क्या परिभाषा है?

 

मैं स्वतन्त्र हूँ अपने लेखन संसार में। मैं एक मात्र सम्राट हूँ - इस धारणा के सिंहासन पर बैठकर मैं अपने लेखन संसार में राज कर रहा हूँ - इस बात पर मैं विश्वस्त हूँ। कोई वाद, सीमा मेरे विचार में नहीं है। मैं आदमी के साथ हूँ और रहूँगा। लेखकीय स्वतन्त्रता के बिना कोई भी लेखक विकलांग बन जाता है। लेखकीय स्वतन्त्रता से ही जनमानस को न्याय दिया जा सकता है। लेखकीय स्वतन्त्रता के बिना लिखी रचना भ्रामक हो सकती है।

 

वर्तमान भारतीय नेपाली कविता को आप किस स्तर पर रखते हैं?

 

वर्तमान भारतीय नेपाली कविता अन्य भाषाओं में लिखी कविता की तुलना में किसी भी स्तर पर उन्नीस नहीं है लेकिन विश्व के साथ तुलना करने की स्थिति में नहीं है। इसके लिए हमें और ज्यादा प्रयास करने होंगे।

 

कल का सिक्किम आपकी कल्पना में कैसा होगा?

 

कल का सिक्किम! 'सिक्किम' बनेगा एक मुकम्मल और चोखा सिक्किम। इसके लिए हमें मानसिक, शारीरिक रूप से परिश्रम करना होगा। इसके लिए वैचारिक एकता होना जरूरी है।

 

राजनीति में आकण्ठ डूबे पवन चामलिङ और कवि पवन चामलिङ 'किरण' में आप क्या अन्तर पाते हैं?

 

राजनीति में भी कवि पवन चामलिङ को बचाने के पक्ष में हूँ। आपके सोचने की तरह राजनीति रूखी नहीं है लेकिन राजनीति करने वाले लोग (एकाध को छोड़कर) अवश्य रूखे और भूखे हैं। रूखे लोगों की वजह से ही राजनीतिक परिवेश मैला और रूखा हुआ है। राजनीति करने वाले लोगों में वैचारिक परिवर्तन होना अति आवश्यक है, केवल तब ही राजनीतिक स्तर ऊपर उठ सकेगा।

पवन चामलिङ का हृदय जिस तरह कोमल है, ठीक उसी तरह राजनीतिक हृदय भी कोमल है। इस कारण आज के राजनैतिक माहौल में भी पवन चामलिङ राजनीति नहीं कर रहा है, बल्कि समाज सेवा करने के अभियान में आगे बढ़ रहा है। गरीबों, बेसहारा लोगों, नंगे पाँव चलती बहुसंख्यक जनता के अधिकारों के पक्ष में वकालत करना ही मेरा राजनैतिक सिद्धान्त है। गंदे पोखर में फूल खिला होता है - शूल नहीं, उसी तरह मैं भी राजनीतिक दलदल में फँसा होने के बावजूद यह मन पत्थर नहीं बना है। राजनीति और साहित्य के संगम में बैठकर आदमी के सुख और शान्ति के लिए तपस्यारत हूँ।

 

आपके जीवन का दर्शन?

 

मानव सेवा। सेवा और समर्पण ही मेरा जीवन दर्शन है।

 

निर्माण प्रकाशन से अभी तक कितनी पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है?

 

निर्माण प्रकाशन से अभी तक (1987) प्रकाशित पुस्तकों की सूची इस प्रकार है - 1.निर्माण (अपने सम्पादन में साहित्यिक पत्रिका), 2.अन्तहीन सपना: मेरो विपना (कविता संकलन - मेरा अपना), 4. सल्बलाएको मन (कहानी संग्रह -सरला राई), 5. रविका निबन्धहरू (निबन्ध - रविदास राई) और 6. साक्षात्कार (अन्तरवार्ताएँ - सुवास दीपक)।

 

नेपाली भाषा की संवैधानिक मान्यता के बारे में आपकी प्रतिक्रिया?

 

नेपाली भाषा को भारत के संविधान  की आठवीं अनुसूची में मान्यता दिलाने से पहले हमें इस भाषा (मातृभाषा) को मान्यता देनी होगी। क्या हमने स्वयं इसे मान्यता दी है? इस विषय पर एक बार हमें सोचना चाहिए।

(जून 2011)

 

साहित्यकार उर्मि कृष्ण: एक परिचय

 

जीवन में अदम्य साहस एवं संघर्ष की धनी विदुषी साहित्यकार श्रीमती उर्मि कृष्ण का जन्म मध्य प्रदेश के एक छोटे शहर हरदा के दुबे परिवार में 14 अप्रैल को हुआ था। आपके पिताजी का नाम श्री गुरु प्रसाद दुबे तथा माताजी का नाम श्रीमती रामलली दुबे था। आपके पिता संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी और मराठी के ज्ञाता थे। हिन्दी साहित्य के अच्छे कवि थे। वे हिन्दी साहित्य समिति इन्दौर में 45 वर्ष तक सेवारत रहे। उर्मिजी के दादाजी दीवान श्री दौलतराम दुबे पूरे इलाके में रौब दाब वाले और संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी के विद्वान् थे।

 

श्रीमती उर्मि कृष्ण की प्राथमिक शिक्षा दादाजी के सानिध्य एवं इन्दौर की कन्या पाठशाला में हुई। तत्पश्चात आप माता - पिता के साथ इन्दौर आ गईं। फिर एम.ए. (राजनीति शास्त्र), साहित्य रत्न, मांटेसरी ट्रेड (बाल शिक्षा डिप्लोमा) की उपाधियाँ इन्दौर में प्राप्त कीं। य़ह एक सुखद संयोग रहा कि जिस संस्थान से इन्होंने डिप्लोमा लिया, वहीं सेवारत रहीं। बाद में बाल शिक्षण में ही मध्य प्रदेश शासकीय सेवा में रहीं। बच्चों के साथ आनन्द से काम करते हुए उनके लिए कविता, कहानी, नाटक लिखने लगीं।

 

लेखन में रुचि होने के कारण अम्बाला के डॉ. महाराज कृष्ण जैन के संस्थान 'कहानी लेखन महाविद्यालय' से सम्पर्क हुआ। पत्राचार के द्वारा आत्मीयता बढ़ी। धीरे - धीरे यह लगाव डॉ. जैन के साथ परिणय में बदल गया। फलत: 15 अगस्त 1971 में उर्मिजी ने एक ऐसे व्यक्ति को जीवन साथी चुना, जो पाँच वर्ष की आयु में पोलियोग्रस्त हो चुका था। इस चुनौतीपूर्ण निर्णय को अमल में लाने के लिए कुछ वर्ष कठिन संघर्ष में बीते। पिता का सुरक्षित आश्रय, माँ की ममता, सखी - सहेलियों का साथ, सरकारी शिक्षा - सेवा सब कुछ छोड़ एक अनिश्चित भविष्य में छलांग लगा दी और उर्मि - दुबे - उर्मि कृष्ण बन गईं।

 

अब जीवन नए मोड़ पर था। वृद्ध सास - ससुर, दो किशोर वय भतीजियाँ और एक ही स्थान पर बैठे रहने वाले डॉ. कृष्ण, जिनके पाँच भाई और दो बहनें थीं। भाई नौकरी के कारण दूसरे शहर और विदेशों में थे जो समय समय पर आते और यथासम्भव आर्थिक सहायता करते। डॉ. कृष्ण की देखभाल, घर का काम, कहानी लेखन महाविद्यालय और शुभ तारिका (पत्रिका) में सहयोग आदि कार्यभार के कारण आपका लेखन कम हुआ, पर प्रकाशन अच्छा होने लगा था। सारिका, नवभारत टाइम्स, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवनीत, धर्मयुग आदि सभी प्रतिष्ठित पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ छपने लगीं। इसी दौरान पत्राचार के माध्यम से प्रकाशन जगत् के पितृतुल्य श्री कृष्णच्रन्द्र बेरी से सम्पर्क बना। 1974 में बेरीजी ने 'वन और पगडंडियाँ' उपन्यास प्रकाशित किया। उसी वर्ष 'हरियाणा साहित्य अकादमी' का प्रथम पुरस्कार इस कृति को प्राप्त हुआ। इस लेखन से ही श्री बेरी से आत्मीयता बढ़ी। बाद में पितृवत् स्नेह भी मिला। श्री विजय प्रकाश बेरी से भ्रातृवत् सम्बन्ध बना। धीरे - धीरे उर्मिजी पूरे प्रचारक परिवार से सम्बद्ध हो गईं। बाद में हिन्दी प्रचारक प्रकाशन से दो कहानी संग्रह 'नए सफेद फूल' और 'धुएँ के ऊपर' भी प्रकाशित हुए। इन पुस्तकों के कारण साहित्य एवं प्रकाशन जगत् में अच्छा प्रभाव पड़ा। अन्य प्रकाशकों ने भी उर्मिजी की यात्रा, व्यंग्य, कहानी, बाल साहित्य आदि की पुस्तकें प्रकाशित कीं। भारत: एक भाव यात्रा (यात्रावृत्त), महल दुमहले, अग्निरथ,ऊँगलियाँ (कहानी संग्रह), दृष्टि (लघु कथा संग्रह), बीमार पड़ने का सुख (हास्य - व्यंग्य), दीदी इन्दिरा, खेल - खेल में विज्ञान, मैं परी बनूँगी, सबका प्यारा, चाँद का गुस्सा बादल पर उतरा, इन्द्रधनुष, झुकेंगे नहीं, मनोरंजन बाल कथाएँ (बाल पुस्तकें) आपकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं। उर्मिजी ने ब्रेल, पंजाबी, मराठी, गुजराती, उड़िया आदि भाषाओं की कहानियों का अनुवाद एवं सम्पादन कार्य बी किया है। मन यायावर (यात्रा वृतान्त) और नए सफेद फूल (कहानी संग्रह) को हरियाणा साहित्य अकादमी ने  प्रथम पुरस्कार प्रदान कर उर्मिजी को सम्मानित किया। इसी अकादमी का 'लाला देशबन्धु गुप्त सम्मान' एक लाख का पुरस्कार भी आपको मिल चुका है। इसके अतिरिक्त 2008 में मद्य प्रदेश लेखक संघ के सर्वोच्च सम्मान 'अक्षरादित्य' से भी आपको सम्मानित किया गया।

आज डॉ. कृष्ण के संस्थान कहानी लेखन महाविद्यालय (स्थापित 1964) से पाँच पत्राचार कोर्स उर्मिजी देख रही हैं। इसके अतिरिक्त वे हिन्दी साहित्य समिति इन्दौर, मध्य प्रदेश लेखक संघ, भोपाल, लेखिका संघ दिल्ली, पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग (मेगालय) की आजीवन एवं सम्मानित सदस्य हैं। आपकी अनेक कृतियों पर शोध कार्य कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में हुआ है और एक कहानी इसी विश्वविद्यालय के हिन्दी एम.ए. पाठ्यक्रम में भी पढ़ाई जा रही है।

वस्तुत:  अत्यन्त सरत, मृदुभाषी एवं मिलनसार उर्मिजी धर्म, जाति, सम्प्रदाय से अछूती हैं। 5 जून 2001 को अचानक हृदयगति रुकने से पति डॉ. जैन के स्वर्गवासी होने के बाद से वे संस्थान और पत्रिका शुभ तारिका नियमित चला रही हैं। यह पत्रिका हिन्दी अहिन्दी क्षेत्रों के अलावा विदेशों में भी लोकप्रिय है।

उर्मिजी को 25 फरवरी 2011 को प्रभुश्री श्रीनाथजी के पाटोत्सव (फाल्गुन कृष्ण सप्तमी) के शुभ अवसर पर हिन्दी प्रचारक शताब्दी सम्मान; 2011 प्रदान किया जा रहा है। सम्मानस्वरूप अभिनन्दन एवं सम्मान पत्र सहित ग्यारह हजार की राशि भेंट की जाएगी।

(हिन्दी प्रचारक पत्रिका, जनवरी 2011 से साभार)

(फरवरी 2011)

 

अन्तरवार्ता सुवास दीपक के साथ

 

                                                                       राजेन्द्र भण्डारी

 

लेखन के क्षेत्र में प्रवेश कैसे हुआ?

लेखन के क्षेत्र में मेरा प्रवेश कैसे हुआ, कब हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, उसके पीछे कौन-कौन से कारण थे - यह एक बेहद जटिल सवाल है जिसका उत्तर देना मेरे लिए असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। हर रचनाकार के व्यक्तित्व में आधारभूत प्रवृत्ति, संस्कार एवं आद्य बिम्बों के साथ साथ विभिन्न परिस्थितियों में उत्पन्न सन्ताप और संघर्ष, द्वन्द्व, तनाव और फन्तासियों की एक शक्तिशाली भूमिका होती है। मेरे संस्कारों ने मुझे लिखित शब्द के प्रति अतिशय अनुराग, अतिशय संवेदनशीलता दी, गीत और संगीत तथा ललित कलाओं व अध्यात्म के संस्कार परिवार से मिले। इसका मेरे समग्र व्यक्तित्व पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा। 1966 में कॉलेज के अध्ययन को बीच में ही छोड़ने का अवसाद, पारिवारिक परिवेश से अलगाव भोगने की बाध्यता और अचानक विसंगतियों के भंवर में पड़ जाने पर मैं सचमुच एक जटिल मानसिक अवस्था में था। भविष्य की कोई स्पष्ट रूपरेखा मेरे साथ नहीं थी, अज्ञात भविष्य की यात्रा में मैं अकेला यात्री था जहां मेरे साथ कोई 'रोल मॉडल' नहीं था। 18 साल की उम्र में दिसम्बर 1966 का अन्तिम सप्ताह होगा, रोजगार की तलाश में गान्तोक पहुँचा और आदे घंटे में शिक्षक की नियुक्ति पाकर एक ठिकाना पाने में सफल हुआ। जनवरी 1967 से सिंगताम स्कूल में शिक्षक की नियुक्ति पाने तक मैं नेपाली भाषा से अनभिज्ञ था। आज मुझे यह याद करते हुए हैरानी होती है कि कि मैंने इतनी जल्दी कैसे नेपाली भाषा सीख ली। सिर्फ सीखी ही नहीं बल्कि एक साल के अंदर ही कविताएँ भी लिखने लग गया था। 10.12.1067 को लिखी मेरी पहली कविता ' अस्तित्वहीन जीवन यात्रामा' (अस्तित्वहीन जीवन यात्रा में) व्यक्त नैराश्यबोध का आधार मेरे अंदर का असुरक्षाबोध हो सकता है। मेरा पारिवारिक परिवेश अति साधारण लेकिन आध्यात्मिक था। मानवीय श्रेष्ठ मूल्यों के प्रति आस्था का संस्कार मैंने अपने पिता से पाया जो अव्वल दर्जे के गायक थे । लाहौर में उनके कुंदनलाल सहगल की संगीत सभाओं मे जाने के बारे में मैंने बचपन में उन्हें अपने मित्रों से कहते हुए सुना था। बचपन में मैंने उनसे कला, संगीत, नाटक और अभिनय का संस्कार प्राप्त किया। लेकिन  जिस परिवेश में मेरा लालन-पालन हुआ वह साहित्य और कला के लिए अनुकूल नहीं था। मैं नाटकों में भाग लेता, मेरा स्वर अति सुरीला था, स्कूल और कॉलेज के कार्यकर्मों में मैं गीत गाता। पचास और साठ के दशक के फिल्मी गीत मुझे कंठस्थ थे जिनमें 'सारंगा तेरी याद में...', 'चल उड़ जा रे पंछी...', आदि मैं गाता और प्रशंसा पाता। यदि मुझे उचित परिवेश मिलता तो आज मैं लेखक न होकर गायक होता, ऐसा मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ। लेकिन नियति ने तो मेरी एक दूसरी ही सक्रिप्ट लिख छोड़ी थी।

खैर, किसी पूर्व-निर्धारित योजना के बिना अकस्मात मेरी प्रारब्ध ने मुझे एक भिन्न सांस्कृतिक परिवेश में जब ला पटका तो ऐसा लगा कि मेरी अव्यक्त कलाओं को एक उर्वरक भूमि मिल गई है। और संभवत: इसका प्रस्फुटन कविता के माध्यम से हुआ। सिक्किम का सब कुछ मेरे लिए अलौकिक था, अदभुत था। यहाँ के परिवेश में मुझे वह सब कुछ मिला जो सुन्दर था, सहृदय था और इसी कारण मैं सिक्किम से प्रेम करने लगा। ऐसा लगा कि एक जन्म की प्रतीक्षा के बाद हम मिले हैं। मैंने जैसे पुनर्जन्म पा लिया हो। नियति और पुनर्जन्म में मेरी दृढ़ आस्था है। आभारी हूँ, उसके प्रति, जिसे मैंने प्रेम किया। वह प्रेम मेरे लिए एक अति मूल्यवान वस्तु है। उस प्रेम की तपश मैं आजतक प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूँ।

 

आप कवि, कथाकार, समीक्षक, उपन्यासकार, पत्रकार, अनुवादक, शोधकर्ता हैं। इन विधाओं में किस विधा में आप रचनात्मक सन्तुष्टि पाते हैं?

मुझे प्राय: सभी विधाओं में समान रूप में रचनात्मक संतुष्टि मिली है। इन सभी विधाओं में कविता अब मैं काफी कम लिखता हूँ। आजकल पत्रकारिता तथा अनुवाद में ज्यादातर व्यस्त रहता हूँ और इन दोनों विधाओं में समान रूप से मेरा गहरा लगाव है। पत्रकारिता भी एक रचनात्मक विधा है। रचनात्मक  न होने से पत्रकारिता नहीं की जा सकता। इसमें हमें हर समय तैयार रहना पड़ता है। नेपाली में पत्रकारिता करते हुए तीन दशक होने को हैं। पत्रकारिता मैंने नेपाली भाषा में ही शुरू की थी। मेरा लेखन कार्य भी नेपाली से शुरू हुआ। 1978 में नेपाली मासिक सुधा से मैंने पत्रकारिता शुरू की और उसके तुरन्त बाद हिमाली बेला में और 1981 में अपने समाचार पत्र (पहले पाक्षिक, फिर अर्ध साप्ताहिक और अब साप्ताहिक) विचार का सम्पादन और प्रकाशन शुरू किया। प्रबुद्ध पाठक बीते वर्षों के विचार में प्रकाशित सामग्री का अवलोकन कर निष्कर्ष निकाल सकते हैं। मैंने विचार में हजारों की संख्या में सम्पादकीय लिखे हैं। कोई विषय अछूता नहीं रहा। अनुवाद में भी मुझे उतने ही आनन्द का अनुभव होता है जितना मौलिक लेखन में।

उपन्यास लेखन मेरी प्रिय विधा है. अरण्य रोदन (हिन्दी उपन्यास, संभावना प्रकाशन, हापुड़ से 1985 में प्रकाशित, सिक्किम से हिन्दी का पहला उपन्यास) मैंने 28 साल की उम्र में लिखा था। इस उपन्यास से मुझे जो रचनात्मक संतुष्टि मिली, वह अभूतपूर्व है। एक आत्मकथात्मक उपन्यास लिखना शुरू किए हुए काफी साल गुजर गए हैं, जिसे अन्तिम रूप देने में, लगता है, अभी और कुछ साल लगेंगे।

 

हिन्दी, अंग्रेजी, नेपाली, डोगरी में आप निरन्तर लिखते आ रहे हैं। रचनात्मक माध्यम के रूप में इनमें किस भाषा को सर्वाधिक सहज और निकट पाते हैं?

मेरी तरह और भी बड़ी संख्या में लेखक होंगे जो बहुभाषीय पृष्ठभूमि से आते हैं। जहाँ तक रचनात्मक माध्यम के रूप में सर्वाधिक सहज और अपने निकट की भाषा का सवाल है, हिन्दी और नेपाली दोनों भाषाओं मैं सहज रूप से लिखता आ रहा हूँ। अधिकांश लेखन नेपाली में ही होता है क्योंकि मेरी जीविका की भाषा नेपाली है। हिन्दी में कविताएँ, उपन्यास और अनुवाद करता हूँ। विस्थापन के कारण मेरा सम्पर्क मेरी मातृभाषा से टूट चुका है। गाँव के भौतिक ब्योम से दूर होने के बाद उसे भाषिक ब्योम में पाने की चेष्टा, भाषा में पुनर्स्थापित करने की चेष्टा अर्थात भाषा के माध्यम से जीवित रहने की जो मूलभूत शर्त होती है, वह मेरे ऊपर लागू नहीं होती। अपनी मातृभाषा में मैं केवल वार्तालाप ही कर सकता हूँ, मौलिक लेखन करने में असमर्थ हूँ। दुर्भाग्य से अपनी मातृभाषा में शिक्षा नहीं पा सका किन्तु मेरे अंदर मेरा गाँव और घर तथा भाषा का बिम्ब हमेशा उपस्थित रहता है जबकि भौतिक रूप से मैं उनसे सालों पहले अलग हो चुका हूँ।

 

आप चार भाषाओं के जानकार हैं, कैसा लगता है?

मैं पहले भी कह चुका हूँ कि हम बहुजातीय, बहुभाषीय और बहुसांस्कृतिक समाज में रह रहे हैं, जो आज के विश्व की हकीकत है। खुद को ऐसी सामाजिक, सांस्कृतिक भावभूमियों से जुड़ा हुआ पाकर मुझे लगता है कि मैं विश्व समाज का एक अंग हूँ। यह सकारात्मक पक्ष मनुष्य को सहिष्णु बनाता है, उसकी संवेदनाओं का परिष्कार करता है और जीवन के दृष्टिकोण को विस्तृत आयाम प्रदान करता है।

 

आपने मूलत: अनुवादक के रूप में प्रसिद्धि पायी है। आपने नेपाली भाषा से हिन्दी और हिन्दी भाषा से नेपाली में अनुवाद करते हुए किसी प्रकार की कठिनाई का सामना किया है?

नेपाली से हिन्दी और हिन्दी से अनुवाद करते हुए मुझे किसी आधारभूत कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। कुछ प्रतीकों के एक भाषा से दूसरी भाषा मे समानार्थी प्रतीक न मिलने की वजह से कभी-कभार कठिनाई अवश्य होती ही है। हर भाषा की एक विशिष्ट लय होती है। एक विशिष्ट संस्कार का छन्द होता है। हिन्दी-उर्दु में मोमबत्ती के प्रतीक को लेकर काव्य रचना हुई है। विरह, दर्द, बिछोड़ की पीड़ा आदि को प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यकत् करते हुए हिन्दी-उर्दु में 'शमा' और 'परवाना' का प्रयोग किया जाता रहा है। किसी विरहणी की विरह को व्यक्त करते हुए हिन्दी-उर्दु में 'पिघलते मोम का दर्द' शब्दावली का किया जाता है। लेकिन यह प्रतीक नेपाली में नहीं है। इसका शाब्दिक अनुवाद सही अर्थबोध नहीं देगा।

 

क्या कविता का अनुवाद संभव है?

क्यों संभव नहीं है? कौन कहता है कि संभव नहीं है? ऐसी बातें करने वाले वे आलोचक या समीक्षक हैं जो दोनों भाषाओं की मूल प्रकृति से अनभिज्ञ हैं। आज विश्व साहित्य को हम अनुवाद के माध्यम से जानते हैं। ओक्टावियो पाज, पाब्लो नेरूदा, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नजरूल इस्लाम, हरभजन सिंह, कामू, सार्त्र, लेनिन आदि ने अनुवाद के माध्यम से ही हमारी संवेदनाओं को झझकोरा है। लेकिन अनुवाद अति कठिन श्रम और धैर्य की अपेक्षा रखता है। जल्दबाजी में किया गया अनुवाद और केवल शब्दकोशीय ज्ञान से कविता हो या अन्य किसी अन्य विधा के अनुवाद के त्रुटिपूर्ण होने की पूरी संभावनाएं होती हैं। मैं व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि आजतक मैंने अन्य विधाओं की तरह कविता विधा में भी प्रशस्त अनुवाद किया है, आजतक मैंने किसी से मूल कविता की भावना के प्रति अन्याय होने की टिप्पणी नहीं सुनी है। आप की बहुत सी कविताओं के हिन्दी अनुवाद मैंने किए हैं जो हिन्दी की शीर्ष पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। आप कहिए, आपकी किस कविता के प्रति अन्याय हुआ है?

 

लेखन के अनेक रास्तों पर आप यात्रा कर रहे हैं। क्या आप इनमें सन्तुलन बना सके हैं?

मैं सन्तुलित हूँ, अन्तुलन की स्थिति में निरन्तर का रचनात्मक कार्य बाधित होता है। मैं चौबीस घंटे में 17-18 घंटे निरन्तर लेखन, अनुवाद के काम के अतिरिक्त अध्ययन और चिन्तन में बिताता हूँ। यह मेरी एक रूटीन ही बन चुका है, इससे मुझे मुक्ति नहीं है। विश्व के अद्यतन राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में भी खुद को सुसूचित रखना पड़ता है।

 

भारतीय नेपाली साहित्य की किस किस विधा को आप अविकसित मानते हैं? इसके क्या कारण होंगे?

संस्मरण लेखन, यात्रा लेखन में हम काफी पिछड़े हैं लेकिन सिक्किम के संदर्भ में कहते हुए मुझे गर्व का अनुभव होता है कि हमारे यहाँ सानु लामा जैसे अद्वितीय प्रतिभा के संसमरण-यात्रा लेखक हैं। डॉ. शान्ति छेत्री और प्रद्युम्न श्रेष्ठ ने भी इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। दूसरा क्षेत्र है समीक्षा का। मेरे विचार में निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ समीक्षा के क्षेत्र में गंभीरतापूर्वक काम नहीं हो रहा है। इस क्षेत्र में इने गिने नाम हैं। इन समीक्षकों की समीक्षाओं के अलावा अन्य समीक्षा समीक्षा के नाम में कृतिकार के स्तुति-गान ही ज्यादा हुए है। इस स्थिति का मुख्य कारण यह हो सकता है कि हमारे बीच अभी तक निष्पक्ष और रचनात्मक आलोचना को बरदाश्त करने की शक्ति विकसित नहीं हुई है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में 1947 में स्वतन्त्रता प्राप्त होने के बाद भी दार्जिलिङ, असम क्षेत्र के नेपाली साहित्यकारों से इस स्वतन्त्रता (अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता,लेखन का संदर्भ) का उपभोग कर जातीय अस्मिता के संकट के संदर्भ में लेखन में प्रवृत्त होने की अपेक्षा की गई थी लेकिन वैसा नहीं हो सका। सिक्किम ने 1975 से राजतन्त्र से मुक्ति पाई लेकिन सिक्किम का समाज आज भी दो वर्गों में विभाजित है - एक सामंती सोच का शोषक समाज और दूसरा भयाक्रान्त शोषित समाज। गत 10-15 सालों से पवन चामलिङ ने इस स्थिति में परिवर्तन लाने का भगीरथ प्रयास किया है, फिर भी समाज के संस्कारों में सदियों से जो दासत्व की भावना जड़े गाड़कर बैठी है, वह आज भी जिन्दा है। उपयुक्त समाज का निर्माण किसी एक व्यक्ति से नहीं हो सकता - यह एक बृहद् सामूहिक काम है।भारतीय परिप्रेक्ष्य में आज समाज को उपयुक्त बनाने के लिए साहित्यकारों द्वारा सक्रिय भूमिका न निभाने का कारण अवचेतना में बसा दासत्वबोध है जिसके चलते समग्र जातीय संदर्भों को परिभाषित करने वाली कृतियों की रचना संभव नहीं हो सकी है। इस संदर्भ में राजतन्त्र होने के बावजूद नेपाल का जनमानस  दासत्वबोध और भयबोध से मुक्त होकर जन सक्रियता दिखाते हुए आगे बढ़ रहा है, राजनैतिक, सामाजिक और अन्य विसंगतियों पर विभिन्न माध्यमों से जैसा तीव्र प्रहार करने का नैतिक बल लेखको और कलाकारों ने वहाँ अर्जित किया है, वह अभूतपूर्व है। इस संदर्भ में हम रचनाकारों को नेपाल के रचनाधर्मियों से प्रेरिय होना चाहिए।

 

व्यवसाय के रूप में पत्रकारिता को अपनाने से आप की सृजनात्मकता पर नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ा?

पत्रकारिता बेशक बहुत समय लेती है, जिसके चलते मौलिक लेखन के लिए समय कम पाता हूँ। लेकिन मैंने पहले ही बता दिया है कि मुझे पत्रकारिता ने भी उतनी ही संतुष्टि दी है जितनी कि एक कविता लिखते या उपन्यास लिखते पाता हूँ। नकारात्मक प्रभाव न कहें इसे। मैंने जितना मौलिक लेखन या अनुवाद का काम किया है, वह पत्रकारिता की ही समानान्तर उपज है। पत्रकारिता ने मुझे रचनात्मक को ऊर्जा प्रदान की है और भविष्य में भी करती ही रहेगी, इस पर मैं विश्वस्त हूँ। मेरी पत्रकारिता मूलत: साहित्य, संस्कृति, पर्यावरण, श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों और कलाओं के प्रति समर्पित है और यही कारण है कि इससे मेरी सृजनात्मकता को विस्तृत आयाम प्रदान किया है, मेरी संवेदनाओं की जीवन्तता प्रदान की है।

 

सिक्किम के नेपाली साहित्य को समग्र रूप से आप किस नजर से देखते हैं?

समग्र रूप से सिक्किम का नेपाली साहित्य उत्तरोत्तर विकास की सीढ़ियाँ चढ़ रहा है। अमूमन सभी विधाओं में निरन्तर श्रेष्ठ साहित्य की सृजना हो रही है। प्रकाशन सुविधाएँ भी आज ज्यादा मात्रा में उपलब्ध हैं। दो दशक पहले तक यह स्थिति नहीं थी। आज ऐसे कवियों के कविता संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं जिनकी एक भी कविता प्रकाशित नहीं है। निर्माण प्रकाशन ने इस दिशा में एक क्रान्ति ही ला दी है। स्थापित साहित्यकारों से लेकर नवोदितों की कृतियों का लगातार प्रकाशन कर निर्माण प्रकाशन ने नेपाली साहित्य के प्रकाशन जगत में एक शीर्ष प्रकाशन संस्थान का जो गौरव प्राप्त किया है, उसका मुकाबला कोई नेपाली प्रकाशन समूह नहीं कर सकता। सिर्फ सिक्किम और भारत के अन्य राज्यों के लेखक ही नहीं, नेपाल के वरिष्ठ साहित्यकारों की सम्पूर्ण कृतियों का प्रकाशन निर्माण प्रकाशन ने कर दिखाया है जो प्रकाशन जगत की एक अभूतपूर्व घटना मानी जा सकती है। इससे नेपाली में लिखने वाले लेखकों को अतिरिक्त उत्साह और ऊर्जा मिली है। कविता, कथा, उपन्यास, यात्रा लेखन, समीक्षा आदि में सिक्किम के लेखकों ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। बड़ी संख्या में नवोदित हस्ताक्षरों ने अतीव संभावनाओं के साथ साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवायी है। समग्र रूप से देखा जाए तो सिक्किम में नेपाली साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है।

 

सिक्किम की पत्रकारिता कितनी स्वस्थ है?

सिक्किम की पत्रकारिता के स्वास्थ्य की जाँच करना मेरा काम नहीं है, न ही मेरी क्षमता है ऐसा काम करने की। यह काम मेरा नहीं है। यह काम इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को दिया जाए तो बेहतर होगा। मेरा इतना भर कहना है कि, 1957 में सिक्किम से 'कंचनजंघा' का प्रकाशन नेपाली प्रकाशन जगत की एक महत्वपूर्ण घटना है, उपलब्धि है। करीब 12 सालों की अवधि में प्रकाशित इस समाचार-प्रधान मासिक पत्र में राजनीतिक समाचारों के साथ साथ साहित्य व संस्कृति को भी मजबूत आधार मिला है। आज सिक्किम और दार्जिलिङ की दूसरी पीढ़ी के अधिकांश लेखक इसी पत्रिका की उपज हैं। राजनीति और प्रशासन के एक सक्रिय और निर्णायक अंग होते हुए भी, और वह भी राजतन्त्र में, इस पत्रिका के सम्पादक व प्रकाशक स्वर्गीय काशीराज प्रधान ने विभिन्न सामाजिक विषयों में निर्भीक सम्पादकीय टिप्पणियाँ की हैं। आज के नवोदित पत्रकारों के लिए 'कंचनजंघा' एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है। आज के काल और 'कंचनजंघा' के काल के संदर्भ में आमूल परिवर्तन आ चुका है, फिर भी शोधकर्ताओं के लिए यह पत्रिका तत्कालीन सिक्किम की राजनीति, समाज, साहित्य और लोक-व्यवहार के बारे में एक ठोस आधार-सामग्री बन सकती है।

वर्तमान सिक्किम की पत्रकारिता अभी अपनी शैशवावस्था में ही है लेकिन जितने लोग इस क्षेत्र में गंभीर हैं, वे अच्छा काम कर रहे हैं। विसंगतियाँ तो हर जगह होती हैं, हर समय और हर क्षेत्र में। लेकिन उन्हें नजरअन्दाज कर बृहत् परिप्रेक्ष्य में समाज को साकार सोच और दिशा देने वाले प्रयासों का सही मूल्यांकन होना चाहिए। सिक्किम की नेपाली पत्रकारिता ने 1975 में सिक्किम के भारत में विलय के बाद काफी प्रगति की है। शिक्षित युवक व युवतियों का अतीव संभावनाओं के साथ इस क्षेत्र में पदार्पण हो चुका है जो अपनी अपनी विधाओं में अच्छा काम कर रहे हैं। सिक्किम से राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों में भी युवा पत्रकार प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यह एक शुभ संकेत है।

 

आपको जीवन के सर्वाधिक विषादमय क्षण  या अवधि (व्यक्तिगत रूप में) का कब अनुभव हुआ?

मैं संस्कारों से अति संवेदनशील और अति भावुक होने के बावजूद विकट परिस्थितियों में मानसिक संतुलन बना रखने में मेरे अंदर एक अदभुत क्षमता है। प्रख्यात नाटककार सैमुअल बैकेट ने कहा है - मानसिक संतुलन बनाए रखने का यह 'A game of staying sane' है। परिस्थितियां मेरे लिए कभी भी अनुकूल नहीं रहीं। छोटी उम्र से ही अपने जन्म के परिवेश से निर्वासन भोग रहा हूँ - कहीं भी कोई ऐसा सूत्र नहीं है जो मुझे मेरे जन्मस्थान से जोड़ सके। मैं कभी-कभार दिशाहीनता का बोध करता भी करता हूँ लेकिन समानान्तर सांस्कृतिक भावभूमियों के बीच खुद को उपस्थित पाने पर भी मैं विषाद का अनुभव नहीं करता। गंभीरतम संकट में भी मेरे अंदर आस्था और आशा का दीया जलता रहता है। परिजनों और प्रियजनों की मृत्यु से लेकर अन्यान्य बहुत से प्रत्यक्ष व परोक्ष दबावों और परिस्थितियों में भी मैंने खुद को अस्वस्थचित्त नहीं होने दिया है।

शास्त्र कहता है -

 

उदरेदात्मनात्मानं नात्मामबव सादयेत।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव शत्रुरीत्मत:।।

 

अर्थात - 'अपना उद्धार अपने द्वारा ही किया जाना चाहिए। स्वयं को अवसाद में, हताशा में मत डालो। खुद अपने बन्धु बनो, खुद अपने शत्रु।'

हाल ही में मैं एक कोटेशन पढ़ रहा था। मेरी बेटी ने कम्प्यूटर से निकाला था। मुझे यह कोटेशन अच्छा लगा और ऐसा लगा कि जैसे यह मेरे लिए ही लिखा गया है - "I have learned that no one was put here to be in charge of making me happy. THAT'S MY JOB."

 

भारतीय नेपाली साहित्य को अन्य भाषा-भाषियों में और विशेष तौर पर भारतीय नेपाली कथा के अस्तित्व को अलग रूप से परिचित कराने के महत कार्य में आपकी भूमिका ऐतिहासिक रही है। अब आकर भारतीय नेपाली कथा की प्राप्तियो और अप्राप्तियों का कैसे मूल्यांकन करेंगे?

 

 सन् 1970 में 'सारिका' पत्रिका के सम्पादक कमलेश्वर ने मुझे नेपाली कथाओं के अनुवाद की ओर प्रेरित किया। मैंने एक साल तक परिश्रम कर 'भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक' निकालने का प्रस्ताव रखते हुए कहानियाँ अनुवाद करके भेजीं लेकिन 'भारतीय नेपाली साहित्य' की अवधारणा उस समय तक भारत के लेखकों, बुद्धिजीवियों और नेताओं में स्पष्ट नहीं होने के कारण तथा भारत में नेपाली साहित्य के अस्तित्व की बात उन लोगों के लिए एक असंभव-सी बात थी। इसलिए कमलेश्वर ने 'भारतीय नेपाली कहानिओं' के अस्तित्व को सिरे से खारिज कर दिया। मेरा परिश्रम बेकार गया। लेकिन मैंने हार स्वीकार नहीं की। यह वह समय था जब भारतीय नेपाली साहित्य की अवधारणा के प्रति भारत के नेपाली साहित्यकार भी एक दुविधा की स्थिति में थे और खुद 'प्रवासी' के पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे। मैं यहाँ इस विषय में डॉ. घनश्याम नेपाल की एक टिप्पणी का उल्लेख करना चाहूँगा। वह लिखते हैं - "जिस समय नेपाली साहित्य में ख्याति प्राप्त कर चुके कुछ भारतीय लेखक - कवि खुद को 'प्रवासी नेपाली' और अपने साहित्य को 'प्रवासी नेपाली साहित्य' ही बताने का दोषपूर्ण दृष्टिकोण लिए कलम चला रहे थे, उसी समय अनेपाली पृष्ठभूमि से आकर नेपाली भाषा को अपनी आजीवन साधना के क्षेत्र के रूप में वरण कर चुके सुवास दीपक ने 'साहित्य निर्झर' के 'भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक' के सम्पादकीय में इस प्रकार लिखा - "...आम तौर पर यह भूल धारणा कहें या भ्रान्ति जो नेपाली साहित्य के बारे में चली आ रही है वह यह है कि नेपाली साहित्य केवल नेपाल की ही बपौती है। परन्तु प्रस्तुत अंक की कहानियाँ अपनी पहचान स्वयं करवाने लायक हैं जबकि वास्तविकता यह है कि भारतीय नेपाली कहानी समग्र रूप से हिन्दी, बंगला और अंग्रेजी भाषाओं से प्रभावित होकर विकास की सीढ़ियाँ चढ़ती हुई एस साँझे अन्तरराष्ट्रीय मंच पर पहुँच चुकी है।" (1974)

वह लिखते हैं - "अंग्रेजों के शासनकाल में केवल नेपाल में ही नहीं, भारत के नेपाली भाषी नागरिक समाज में भी किसी बात की मान्यता या अमान्यता नेपालीय राणा प्रधानमन्त्री जंगबहदुर रामा की लाल मोहर से निर्धारित होती थी। आजतक भी कईं नेपाली भाषी भारतीय नागरिक उस मनोग्रंथि के शिकार हैं और भा,-साहित्य के क्षेत्र में आज भी नेपाल के कतिपय साहित्यिक तथा सामाजिक नेता इधर के हम लोगों को 'प्रवासी नेपाली' कहकर समेबोधन कर रहे हैं। इस अर्थ में जंगबहादुर आज भी जीवित है और हमारे कई सह-नागरिक उसी की लाल मोहर पाने के लिए लालायित हैं। लेकिन सुवास दीपक  इस भ्रान्तिपूर्ण दृष्टिकोण के विरुद्ध भारतीय नेपाली साहित्य की वधारणा के फैलाने का प्रयत्न गत तीन दशकों से करते आ रहे हैं। इस अवदारणा के पहले प्रवर्तक वह भले ही न हों लेकिन इसके सध्येय विस्तार और प्रसार में उनका विशेष योगदान है।" ('भाषा मान्यता' (सुवास दीपक) की भूमिका से - 1995)

बाद में चंडीगढ़ से प्रकाशित 'साहित्य निर्झर' (हिन्दी) पत्रिका के अक्तूबर 1974 का क 'भारतीय नेपाली कहानी विसेषांक' के रूप में प्रकाशित हुआ और मैं इस कार्य को सम्पन्न कर सका, इस पर मुझे गर्व है। इसके कुछ वर्षों के बाद साहित्य अकादेमी ने नेपाली भाषा को मान्यता देने के बाद 'समकालीन भारतीय साहित्य' पत्रिका के माध्यम भारतीय नेपाली साहित्य का अनुवाद प्रकाशित होना शुरू हुआ। 1981 में मैंने पटना से प्रकाशित 'प्रस्ताव' पत्रिका का 'भारतीय नेपाली कथा खण्ड' प्रकाशित हुआ जिसमें मैंने छह बारतीय नेपाली कहानियों के अनुवाद प्रकाशित करवाए और इसके साथ-साथ 'भारतीय नेपालीलियों की राजनीतिक, आर्थिक पृष्ठभूमि और भारतीय नेपाली कहानी में प्रगतिशील तत्व' शीर्षक में एक लम्बा आलेख भी हिन्दी में छपवाया था। आजतक मैंने कम से कम 200 कहानियों और कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया है, जिनमें अधिकांश हिन्दी की बड़ी पत्रिकाओं में छप चुकी हैं और कुछ महत्वपूर्ण संग्रहों में संग्रहीत की गई हैं। भारतीय नेपाली कहानी आज अपने विकास की सीढ़ियाँ चढ़ती हुई अन्तरराष्ट्रीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुकी है। इस दिशा में मैं अपनी ओर से कुछ योगदान कर सका, उस पर मुझे रचनात्मक संतुष्टि मिलती है, मैं गर्व का अनुभव करता हूँ।

 

(1 अप्रैल 1948 को जन्मे सुवास दीपक सिक्किम के नेपाली सीहित्य-क्षेत्र में सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। सन् 1967 से लेखन की ओर प्रवृत्त हुए सुवास दीपक अनवरत रूप से गत 44 सालों से साहित्य साधना में लगे हैं। सन् '60 के उत्तरार्ध दशक और सन् 70 के पूर्वार्ध दशक में सिक्किम सरकार के शिक्षा विभाग के अन्तर्गत विभिन्न स्कूलों में शिक्षणकार्य करते हुए वह साहित्य की ओर प्रविष्ट हुए। शुरूआती सालों में कविता विधा में डूबे सुवास दीपक ने परवर्ती काल में उपन्यास, कथा, अनुवाद, शोध जैसे क्षेत्रों में प्रश्स्त कलम चलाई है। उनकी कृतियाँ नेपाली, हिन्दी, अंग्रेजी में प्रकाशित हैं। वह डोगरी और पंजाबी भाषाओं के भी ज्ञाता हैं। इसके अलावा उनके द्वारा सम्पादित विचार नामक साप्ताहिक (नेपाली) अपने प्रकाशन के 30 वर्ष पूरा कर चुका है।

नेपाली कहानी को हिन्दी अनुवाद के माध्यम से परिचित कराने का श्रेय उन्ही को ही जाता है और उनकी इस भूमिका को महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक बताया जाता है।

सुवास दीपक हिन्दी के पहले उपन्यासकार हैं। संभावना प्रकाशन, हापुड़ से 1987 में प्रकाशित अरण्य रोदन उपन्यास काफी चर्चित रहा है। वह सिक्किम के पहले नेपाली बाल उपन्यासकार हैं। उनका बाल उपन्यास अभिषेक 1980 में प्रकाशित हुआ था। वह सिक्किम के पहले हिन्दी कथाकार (चक्रब्यूह तथा अन्य कहानियाँ - 2003 में प्रकाशित), सिक्किम के पहले हिन्दी कवि (खुला दरवाजा और पेड़ -कविता संग्रह - 1994 में प्रकाशित) के अलावा सुवास दीपक द्वारा लिखी मौलिक व अनुवादित पुस्तकों की संख्या दो दर्जन तक है।

उन्हें साहित्य अकादेमी का अनुवाद पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका हैं। 2003 को ओम गोस्वामी के डोगरी उपन्यास पल-खिन के नेपाली अनुवाद (नेपाली में पल-विपल) के लिए उन्हें अकादेमी अनुवाद पुरस्कार मिला था। यह मूल डोगरी भाषा से नेपाली में अनूदित पहली कृति है। ओम गोस्वामी के एक बाल उपन्यास कमालपुर दी करामात भी सुवास दीपक द्वारा अनूदित होकर प्रकाशित हो चुका है।

सुवास दीपक नें डॉ. गोपीचन्द नारंग के संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद एवं प्राच्य काव्य शास्त्र का नेपाली में अनुवाद किया है जो साहित्य अकादेमी ने प्रकाशित किया है। क्रूसीफाइड प्रश्न और अन्य कविताएँ (पवन चामलिङ किरण की चुनी हुई नेपाली कविताओं का हिन्दी अनुवाद - 1996), भारतीय नेपाली कहानियाँ (भारत के नेपाली कथाकारों की कहानियों का हिन्दी अनुवाद - 1996 - भारतीय नेपाली कहानी की पहली प्रकाशित अनुवाद पुस्तक), पवन चामलिङ की योगेन्द्र बाली द्वारा अंग्रेजी में लिखी Daring to be Different जीवनी  का नेपाली में विजय कुमार राई के साथ पवन चामलिङ एक अटल योद्धा शीर्षक में तथा हिन्दी अनुवाद पदम क्षत्री के साथ पवन चामलिङ - जमीन से जुड़े एक राजनीतिज्ञ का सफरनामा शीर्षक में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है।

सुवास दीपक नें सिक्किम सरकार के सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग के प्रायोजन में सिक्किम की 12 भाषाओं  और इन भाषाओं में लिखे साहित्य और पत्रकारिता पर शोध कार्य किया है जो अंग्रेजी में Sikkim Study Series  के अन्तर्गत Language And Literature शीर्षक में प्रकाशित हुआ है।

पिछले 33 सालों से नेपाली पत्रकारिता से जुड़े सुवास दीपक ने गत 30 सालें से विचार के सम्पादन/प्रकाशन के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं का सम्पादन किया है, जिनमें प्रमुख हैं - सुधा (नेपाली 1978-79), हिमाली बेला (नेपाली 1979 - 81), प्रतीक (नेपाली साहित्यिक संकलन - 1981), विचार का अंग्रेजी संस्करण (Wichar -1996 - 2004), सिक्किम अकादेमी के प्रकाशन सृजन समय एवं अकादेमी जर्नल का सम्पादन (2008 - 2010) आदि प्रमुख हैं।

विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं से सम्मानित एवं अभिनन्दित सुवास दीपक को 1998 में भानु-रत्न साहित्य पुरस्कार, 1997 में द ग्रीन सर्किल पुरस्कार, 2002 में शिवकुमार राई स्मृति पुरस्कार, 2003 में नेपाली भाषा एवं साहित्य की श्रीवृद्धि में उल्लेखनीय योगदान के लिए नेपाली साहित्य परिषद् द्वारा प्रदान किए जाने वाला भानु पुरस्कार, 2010 में महाकवि लक्ष्मी प्रसाद देवकोटा शताब्दी सम्मान, नेपाल आदि प्रमुख हैं।

सुवास दीपक  नेपाली और हिन्दी की वेबसाइट www.rachanakaar.com  का संचालन पिछले दो सालों से कर रहे हैं जो नेपाली और हिन्दी साहित्य पर केन्द्रित है।

सम्पर्क - पोस्ट बॉक्स न. 36, गंगटोक - 737101, सिक्किम (भारत)

इमेल -wicharprakashan@gmail.com

मोबाइल - 098320-36893)

(राजेन्द्र भण्डारी - नेपाली कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर, तीन कविता संग्रह प्रकाशित, सार्क देशों के लेखक सम्मेलनों में सहभागिता, सम्प्रति - रीडर, नेपाली विबाग, सिक्किम सरकारी महाविद्यालय, तादोंग, सिक्किम)

 

आधुनिक नेपाली संगीत को नया मोड़ देने का श्रेय दार्जिलिंग को जाता है:

 

                        शांति ठटाल

 

(सुप्रसिद्ध संगीत निर्देशिका एवं गायिका सुश्री शांति ठटाल से यह अंतरवार्ता अगस्त 1978 में एक नेपाली मासिक पत्रिका सुधा के लिए ली गई थी -   सुवास दीपक)

 

 

शिक्षा-दीक्षा के बारे में - 'मैंने रवींद्र भारती विश्वविद्यालय, कलकत्ता से 1962 को संगीत में डिप्लोमा और शास्त्रीय संगीत की परीक्षा पास की है।'

 

संगीत की ओर झुकाव के बारे में - ' पारिवारिक परिवेश अति कठोर और अनुशासित था। गीत गाना, बजाना पूरी तरह से वर्जित था लेकिन मैं थी कि सिर्फ गाती ही रहती थी। गीत हमेशा मेरे होठों पर गूंजता रहता था। इस तरह होठों पर गीत लिए मैंने उस कठोर परिवेश और अनुशासन पर गाकर ही विजय प्राप्त की। बाद में मेरी इस रुचि को ध्यान में रखते हुए मेरे अभिभावकों ने मुझे कलकत्ता में संगीत शिक्षा प्राप्त करने की अमुमति दे दी। गाना तो मेरे लिए ईश्वर का वरदान है।'

 

सर्वप्रथम रिकार्ड किए गए गीतों के बारे में -'श्री शिवप्रसाद सिंह की गीत रचना में मेरे चार गीत रिकार्ड हुए थे। इनमें तीन गीत सोलो थे - 'बितिगयो दिन सारा', 'रात मधुरो, चम्कन्छन् तारा', 'चाँदनी तिमी छ्यौ शीतल पथमा'  और एक युगल गीत श्री मानवीर सिंह के साथ था जिसके बोल थे - 'वारीपारी बादलबिचमा''

सुक्षी शांति ठटाल की संगीत सृजना यात्रा 1962-65 से शुरू होती है। उन्होंने 'म अचानक नै अड़ें' (शब्द - अंबर गुरुंग) तथा 1963 की भानु जयंती में शशि ठटाल की गीत रचना 'साहित्याकाशमा भानु उदाए'  को संगीतबद्ध करके मंच पर प्रस्तुत किया था। उनकी संगीत रचनाओं में दावा ग्याल्मो, कुमार सुब्बा, वाङ्ग्येल, पेमा, शंकर गुरुंग, नारायण गोपाल, पुष्प नेपाली, पी. राज आदि ने स्वर दिए हैं। उन्होंने ईश्वरवल्लभ, अंबर गुरुंग, अगमसिंह गिरी, मनबहादुर मुखिया, लक्खीदेवी सुन्दास, कुमार प्रधान, नंद हांगखिम, शशि ठटाल, जस योञ्जन प्यासी, पवन गुरुंग, इंद्र थपलिया आदि के गीतों को स्वरबद्ध किया है।

उन्होंने बताया कि उन्होंने 'हिमालकी रानी'  (अपूर्ण), 'शराबी की बेटी' (हिंदी), 'पोनी ब्वाय' (वृत्त चित्र) में पार्श्व संगीत और 'परालको आगो'  में पूर्ण संगीत दिया है।

'परालको आगो' फिल्म के बारे में वह कहती हैं - 'फिल्मों में दार्जिलिंग के लोगों में रुचि तो है लेकिन कोई आर्थिक रिस्क नहीं लेना चाहता। लेकिन श्री प्रताप सुब्बा की लगनशीलता से इस फिल्म का निर्माण संभव हो सका। प्रताप जी को इसके निर्माण में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। फिल्म निर्माण के दौरान गीतकार की खोज शुरू हुई तो प्रख्यात नाटककार और निर्देशक मनबहादुर मुखिया को गीत लिखने के लिए चुना गया। फिल्म की कहानी के अनुसार और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को लेकर गीतों की रचना वही कर सकता है जो जनजीवन से संवेदनात्मक रूप से जुड़ा हो। हमारे प्रतिभाशाली कलाकार मुखिया जी के गीत वैसे ही थे आवश्यकता थी। यह आवश्यक भी है क्योंकि शब्द और संगीत का सामंजस्य ही संगीत की सफलता मानी जाती है। और इस फिल्म में मैंने उपरोक्त तथ्य को चरितार्थ करने का यथासंभव प्रयत्न किया है। मुझे रचनात्मक संतुष्टि भी मिली है। दर्शकों ने इसे पसंद किया यही इस फिल्म की सफलता का द्योतक है।'

 

दार्जिलिंग और काठमाडौ के संगीत में भिन्नता - 'आधुनिक नेपाली संगीत को नया मोड़ देने का श्रेय दार्जिलिंग को जाता है। दार्जिलिंग का जितना हो सके मौलिकता के प्रति आग्रह होता है, हमेशा कुछ नया देने का प्रयास होता है। काठमाडौ और दार्जिलिंग की गायन शैलियां भिन्न भिन्न हैं। दार्जिलिंग के संगीत में भारतीय छटा और काठमाडौ के संगीत में नेपाल की झलक पायी जाती है। दार्जिलिंग में मौलिक सृजना को संदर्भ में वातावरण अनुकूल है लेकिन अपेक्षित स्कोप नहीं है। प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन प्रोत्साहन की कमी है। नेपाल में आर्थिक सहायता दी जाती है लेकिन कुछ मौलिक करने की स्वतंत्रता नहीं है।'

 

संगीत के प्रेरणास्रोत के बारे में- 'सचिनदेव बर्मन, मदन मोहन, सलिल चौधरी (संगीत निर्देशक) और पार्श्व गायन में स्वर कोकिला लता मंगेशकर तथा शास्त्रीय संगीत में बड़े गुलाम अली, अमीर खान तथा डी.बी. पुलस्कर को प्रेरणास्रोत और आदर्श मानती हूं।'

उनके विचार में नेपाली संगीत में शास्त्रीय संगीत की स्थिति उत्साहजनक नहीं है। संगीतकारों और गायकों का झुकाव शासित्रीय संगीत की ओर कम ही है।

 

सिक्किम में नेपाली संगीत के बारे में - 'सांस्कृतिक विकास की ओर ध्यान नहीं दिया गया है। सरकारी तौर पर भी उचित मार्गदर्शन की कमी है लेकिन धीरे-धीरे इस दिशा में भी उचित वातावरण बन सकने की आशा की जा सकती है।'

 

संगीत में आधुनिकता के बारे में - 'संगीत युगानुकूल होना ही चाहिए। हम आजतक इस क्षेत्र में अविकसित ही हैं लेकिन हमें अपनी मौलिकता को बचाना होगा, अपनी संस्कृति की रक्षा करनी होगी। संगीत में लोक धुन और लोक गीत का बड़ा महत्व है। विश्व के अनेक देश प्रगति की पराकाष्ठा पर पहुंच चुके हैं लेकिन स्व-संस्कृति की रक्षा ही मानव-जाति की सुरक्षा है, ऐसा मुझे लगता है।'

पाश्चात्य संगीत का कौन-सा पक्ष उन्हें पसंद है? मेरे इस प्रश्न के उत्तर में वह कहती हैं - 'माडर्न स्लो तथा मधुर धुनें।

'

नए संगीतकारों को संदेश - 'अंधाधुंध अनुकरण मत कीजिए, अध्ययन और साधना पर ध्यान दीजिए और संगीत को गंभीरता से लीजिए।'

 

बलु बराइली की नजर में सुश्री शांति ठटाल - 'शांति ठटाल के संगीत में परिपक्वता आयी है। 'परालको आगो'  के संगीत के लिए उनका चुनाव उत्तम है। प्रथम नेपाली महिला संगीत निर्देशिका शांति ठटाल के संगीत में सुर, लय और समन्वय का उत्तम मिश्रण पाया जाता है। नेपाली संगीत जगत को शांति ठटाल का योगदान स्मरणीय है। वह हमारी संपत्ति हैं, जिसे संभाल कर रखना हमारा कर्तव्य है। उनसे और ज्यादा उम्मीदें हैं।'