Gangtok, Sikkim,
Editor: Subhash Deepak
 

 

रूढ़ि, अन्धविश्वास और नारी

 

श्रीमती आशा भट्ट, अल्मोड़ा

 

'त्र नार्यस्तु पुज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' अर्थात् जहाँ नारियों की पूजा होती है वहीं देवताओं का वास होता है। यह है जनमानस में आदिशक्ति, अर्धांगिनी और गृहलक्ष्मी के रूप मे जानी जाने वाली भारतीय नारी के प्रति भारतीय दर्शन की कृतज्ञता। विडम्बना है कि वही नारी अबला और रमणी की उपाधियाँ प्राप्त करती हुई और अनादर और उपेक्षा का पाज्त्र बनी। मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ -

 

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी

आँचल में है दूध और आँखों मे पानी।

 

नारी की बेबसी और एक हद तक पुरुषों के अन्तस्थल में व्याप्त नारी की छवि को दर्शाने में कोई कमी नहीं रखती। नारी को पुरुष की पूर्णता कहा जाता है। एक रूप होते हुए भी समयानुसार अपने को अनेक रूपों में ढालती हुई हमारे सामने दृष्टिमान होती हुई नारी धन्यवाद की पात्र है और शायद यही श्रेष्ठता और सम्मान नर का अन्तर्मन सहन नहीं कर पाया और नारी के लिए आचार संहिता बना सभा अधिकार अपने हाथों में ले लिए।

 

नरकृत शास्त्रों के बन्धन, सब हैं नारी को ही लेकर

अपने लिए सभी सुविधाएँ, पहिले ही कर बैठे हैं नर।

 

नख से शिख तक, किसी न किसी रूप में बेड़ियों में जकड़ी हमारी भारतीय नारी का अन्तर्मन रूढ़ियों की आड़ लेकर इतना डरा और सहमा है कि शिक्षित और जानकार होते हुए भी मात्र दूसरों की नजरों से बचने के लिए उसे मजबूर होकर सब कुछ झेलना और सहन करना पड़ता है। पाँवों में पहनी जाने वाली पायजेब और बिछुए तथा हाथों में सुशोभित चूड़ियाँ एक तरह से बेड़ियाँ का ही तो सुधरा हुआ रूप है। जिसको नारी के सौभाग्य का सूचक करार दे आज भी नर का अन्तर्मन हमारे सामने अट्टहास करता हुआ दिखाई देता है। नारी के हाथों में पहनी जाने वाली चूड़ियों का हाथों में टूट जाना क्या वास्तव में किसी अदृश्य घटना का संकेत हो सकता है? यह एक विचारणीय प्रश्न है।

 

नारी की मांग में भरा जाने वाला सिंदूर सौभाग्य सूचक करार दे विवाहिता को अनिवार्य रूप से मांग भरने को जहाँ विवश करता है, वहीं दूसरी ओर मांग न भरने वाली विवाहित महिलाएँ क्या सौभाग्यशाली बनने की अधिकारी नहीं? या फिर सिर्फ मांग में भरा जाने वाला सिंदूर ही उनके पति को जीवन प्रदान कर पा रहा है। रात को महिलाओं को ऋँगार करना देवताओं को कुपित करना होता है। कुछ रूढ़वादी समाज रात्रि में नारी का ऋँगार अच्छा नहीं मानते। सीधे तौर पर यह कहना शायद नारी को कोमल मन स्वीकार न कर पाए तो उसको रूढ़ि में लाद यह कहना कि इस कृत्य से देवता कुपित होते हैं, कह रात्रि में नारी को ऋँगार से रोक लगा दी।

 

पुराने जमाने में बिजली तथा रोशना के अभाव में दीपक के आगे बैठे हुए बाल बनाने में आग लगने की आशंका रहती थी उससे बचाव का रास्ता रूढ़ियों में किस तरह पिरो दिया गया है अपने आप में कितना हास्यास्पद सा दृष्टिकोण है। और भी कि रात को झाड़ू नहीं लगाओ। इससे लक्ष्मी जी नाराज होती हैं। पर भला जो लक्ष्मी जी स्वयं साफ - सफाई पसंद हैं वह भला इस बेतुकी बात पर क्यों नाराज होंगी?

 

सदियों पहले शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस नारी को हम अबला कहने में आज अपना गौरव समझ रहे हैं, समय के बदलाव के साथ वही नारी पुरुषों से कंधा मिलाती हुई उससे हर क्षेत्र में आगे बढ़ गई है। अब पुरानी रूढ़ि को कुछ हद तक भी मानना उसके लिए बेइमानी ही है। क्योंकि पुराने जमाने में रोशनी के अभाव में अंधेरे में झाड़ू के साथ कोई कीमती सामान न चला जाए उसके लिए तो कुछ हद तक यह अन्धविश्वास कारगर हो सकता था लेकिन आज के समय बिजली की चकाचौंध में ऐसा अन्धविश्वास नारी पर थोपना किस हद तक ठीक हो सकता है? अन्त में यह कहना चाहूँगी कि रूढ़ि और अन्धविश्वास की बेड़ियों में जकड़ी, डरी, सहमा भारतीय नारी दिनों जिन अग्रसर होती हुई भी अन्दर घुटन का अनुभव करती हुई न चाहते हुए भी रूढ़ियों का निर्वाह करती चली आ रही है। आखिर कब तक?

 

जागरूक महिलाओं को इसके लिए आगे आना होगा और बालिका शिक्षा पर ध्यान देना पड़ेगा। महिलाओं के मन में वैज्ञानिक सोच जाग्रत करनी होगी , उनके मन में आत्मविश्वास की भावना विकसित करनी होगी।        जनवरी 2012

 

 

छायावादी युगीन राष्ट्रीय - सांस्कृतिक चेतना के कवि

 

सोहनलाल द्विवेदी (1901 - 1988)

 

सुवास दीपक

 

 

सोहनलाल द्विवेदी का जन्म 1901 ई. में बिन्दकी जिला फतेहपुर में हुआ था। उच्च शिक्षा के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में और वहीं से एम.ए. और एल.एल. बी की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। द्विवेदी की राष्ट्रीय चेतना को प्रखर बनाने में महात्मा गाँधी की विचारधारा का गहरा प्रभाव है। गाँधीजी की विचारधारा से प्रभावित होकर द्विवेदीजी ने जो गीत लिखे वे असहयोग आन्दोलन के समय अत्यन्त लोकप्रिय हुए। सहज, सरल भाषा में लिखी हुई उनकी कविताएँ भैरवी, प्रभाती, युगधारा, पूजागीत और चित्रा में देखी जा सकती हैं। वासवदत्त, कुणाल शीर्षक रचनाओं में मध्यकालीन कथा प्रसंगों की कल्पनाप्रसूत रचनाएँ हैं।

 

जब गाँधीजी एक लोकप्रिय नेता हो गए और साहित्यकार उनका गुमगान करने लगे तो साहित्य में द्विवेदी - युगीन कविता का अन्त और छायावाद का श्रीगणेश हो रहा था। सनातन भारतीय विचारों का समाहार होने के कारण गाँधीवादी विचारधारा साहित्य में आदिकाल से व्यक्त हो रही थी।

 

गाँधीवादी विचारधारा के व्यापक प्रभाव के कारण 'छायावादी कविता का व्यक्तिवाद असामाजिक पथों पर न भटक' सका। गाँधीजी की विचारधारा के फलस्वरूप छायावादी युग की राष्ट्रीय काव्यधारा से स्पष्ट अन्तर दिखाई देने लगा। द्विवेदी युग में राष्ट्रीयता के स्थूल रूप, भौगोलिक, ऐतिहासिक और संघर्षात्मक तत्वों की प्रमुखता तथा इतिवृत्तात्मकता थी। छायावादी युग में दार्शनिक, सांस्कृतिक, प्रकृति - सौन्दर्यमूलक और मानवतावादी राष्ट्रीयता की प्रधानता हो गई।

 

डॉ. अरविन्द जोशी के मतानुसार "इस युग के काव्य पर विचार करते समय यह स्मरण रखना आवश्यक है कि इस पर पाश्चात्य प्रभाव के साथ देश की अन्तर्धारा 'गाँधीवादी विचारधारा' का सर्वाधिक प्रभाव है। गाँधीजी के व्यक्तित्व और विचारों से प्रभावित युगीन कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी तथा भवानीप्रसाद मिश्र प्रमुख हैं। वस्तुत: गाँधीवादी विचारधारा के आदर्शों से प्रभावित पूर्व युग की कविता में बलिदान की राष्ट्रीय भावना के साथ अहिंसा युगनद्ध है। मैथिलीशरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, भवानीप्रसाद मिश्र आदि में राष्ट्रीय भावना का यह स्तर पाया जाता है। गाँधी युग की प्राय: समस्त मूल प्रवृत्तियाँ - राष्ट्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलन - उनके काव्य में प्रतिफलित हैं। सेवाग्राम सोहनलाल द्विवेदी की गाँधीपरक कविताओं का संग्रह है। इसमें गाँधीजी को ऐतिहासिक उपवास, व्रत समाप्ति, सत्याग्रह, खादी और स्वराज तथा समकालीन घटनाओं के सन्दर्भ में काव्याभिव्यक्ति की गई है।

 

द्विवेदी युग (1901 - 1922) के अन्तिम चरण में स्वच्छदतावाद की धारा वेगवती हो गई थी। छायावाद की कविता की पहली दौड़ तो बंगला भाषा की रहस्यात्मक कविताओं के सजीले और कोमल मार्ग पर हुई पर उन कविताओं की बहुत कुछ गतिविधि अंग्रेजी काव्य खण्डों के अनुवाद द्वारा संगठित देख, अंग्रेजी काव्यों से परिचित हिन्दी कवि सीधे अंग्रेजी से ही तरह - तरह के लाक्षणिक प्रयोग लेकर अपनी रचनाओं में जड़ने लगे। केवल भाषा के प्रयोग वैचित्र्य तक ही बात न रही, अनेक यूरोपीय वादों और प्रवादों का प्रभाव भी छायावाद कही जाने वाली कविताओं के स्वरूप पर कुछ न कुछ पड़ता रहा।

 

छायावाद युग के समकालीन कुछ ऐसे कवि हैं जिन्होंने विभिन्न विषयों की मुक्तक रचनाएँ प्रस्तुत कर अपनी पहचान छायावाद से पृथक बनाई। काल की दृष्टि से उनका समय अवश्य छायावाद की सीमा में आता है। भाव और अभिव्यञ्जना शिल्प की दृष्टि से उन्हें छायावादी कवि नहीं कहा जा सकता। इन कवियों की रचनाओं में राष्ट्रीय - सांस्कृतिक धारा को प्रमुख स्थान मिला है। उसका एक विशेष कारण है। सन् 1922 से सन् 1932 तक का समय अहिंसात्मक आन्दोलन की दृष्टि से राष्ट्रीय जागरण का काल था। ब्रिटिश शासन की दासता से मुक्ति पाने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस महात्मा गाँधी के नेतृत्व में एक देशव्यापी आन्दोलन चला रही थी और उसका प्रभाव देश की सभी भाषाओं के रचनाकारों पर पड़ रहा था। हिन्दी में भी उस समय ऐसे अनेक कवि उत्पन्न हुए जिन्होंने राजनीति तथा भारतीय संस्कृति को केन्द्र में रखकर अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। इन कविताओं में देशभक्ति के साथ सामाजिक न्याय, स्वाधीनता, पराधीनता की पीड़ा आदि विषयों का समावेश था। उन कवियों को राष्ट्रीय - सांस्कृतिक धारा के कवि के रूप में परिभाषित किया गया था।

 

महात्मा गाँधी इस शताब्दी के महानतम व्यक्ति थे। उनका चरित तथा चिन्तन तप:पूत: है। उनके व्यक्तित्व का स्पर्श पाकर 'कोई कवि बन जाए सम्भाव्य है' मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सुमित्रानन्दन पन्त, बालकृष्ण शर्मा नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी और भवानीप्रसाद मिश्र जैसी प्रतिभाएँ उनके सम्पर्क में आकर उदीप्त हुई हैं। गाँधीवादी काव्य की सबसे बड़ी शक्ति उज्ज्वल भारतीय परम्पराओं का स्वीकार है। उन कवियों ने जीवन और काव्य के माध्यम से स्वतन्त्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। गाँधीजी तपस्वी और त्यागी नेता माने जाते थे। वे सत्यवादी, स्नेहशील, अहिंसक, अपरिग्रही, राजनीतिक, पथप्रदर्शक, संरक्षक, करुणाकर, समाज सुधारक... लोकनायक कहलाते थे। सोहनलाल द्विवेदी की कविता में से एक उदाहरण प्रस्तुत है -

 

युग - प्रवर्तक! युग संस्थापक!

 युग - संचालक! हे युगाधार

युग निर्माता! युगमूर्ति!

तुम्हें युग - युग तक का नमस्कार

 

(दिसम्बर 2011)

 

 

आज की भारतीय नेपाली कहानी

 

सुवास दीपक

 

 

शायद कम लोगों को ज्ञात होगा कि भारत का नेपाली साहित्य अन्य प्रादेशिक भाषाओं टक्कर लेने में समर्थ है।'नेपाली' शब्द से केवल यह जान लेना कि वह नेपाल की भाषा और नेपालवासियों के लिए प्रयुक्त होता है, एक भ्रान्ति है। भारत में नेपालियों के सबसे बड़े गढ़ माने जाने वाले दार्जिलिंग में नेपाली भाषा के प्रचार और भाषागत ज्ञान देने का श्रेय व्याकरणवेत्ता और कोश लेखक पारसमणि प्रधान को जाता है।

 

दार्जिलिंग के वर्तमान स्वरूप के निर्माण के लिए पिछली दो शताब्दियों से नेपालियों का खून - पसीना बहा है। दार्जिलिंग जिले के अतिरिक्त असम, देहरादून, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों आदि में लगभग पचास लाख के करीब नेपाली रहते हैं जिन्हें भारत की नागरिकता प्राप्त है।

 

आदिकवि भानुभक्त रामायण के काव्यानुवाद से पहले नेपाली एक व्यापक भाषा के रूप में प्रचलित नहीं थी। नेपालियों की विभिन्न जातियों और समुदायों की अपनी - अपनी स्वतन्त्र भाषाएँ और बोलियाँ होने के कारण समस्त नेपालियों को (नेपाल और नेपाल से बाहर भारत में) एक भाषायी सूत्र में बाँधने का श्रेय आदिकवि भानुभक्त आचार्य को जाता है। परन्तु उससे भी ज्यादा मोतीराम भट्ट को जिन्होंने भानुभक्तीय रामायण को वाराणसी में छपवाकर जन साधारण की पहुँच तक ला दिया। यह रामायण घर - घर में पढ़ी जाने का मुख्य कारण यह था कि यह सरल नेपाली भाषा में थी और भारत तथा नेपाल के नेपालियों को सम्प्रेषण की एक व्यापक भाषा मिल गई और विभिन्न जातियों और समुदायों को एक सूत्र में बाँधने के मानवीय कर्तव्य का निर्वाह भी हो गया।

 

सन् 1950 की नेपाल क्रान्ति के पूर्व की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन थीं। नेपाल राजाओं के निरंकुश शासन के अधीन होने के कारण वहाँ अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं थी। फिर भी कुछ लेखक जैसे लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, बालकृष्ण सम, भवानी भिक्षु आदि सामाजिक अत्याचार के प्रति सजग होकर लिखने लग गए थे। विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला फ्रायडवादी यौन - विश्लेषण की ओर झुके। यह इस दिशा की शुरुआत थी।

 

करीब 1940 ई. के आस पास भारत के नेपालियों के सबसे बड़े गढ़ दार्जिलिंग में भी जागरूक कहानीकारों का प्रादुर्भाव होता है। खोजी नामक पत्रिका के प्रकाशनकाल (1940) से ही आधुनिक भारतीय नेपाली कथा साहित्य का सूत्रपात हो गया था। इसी समय कलकत्ता विश्वविद्यालय नेपाली भाषा को पश्चिम बंगाल में मैट्रिक, आई.ए. और बी.ए. की परीक्षाओं के लिए स्वीकार कर लिया था। दार्जिलिंग, कलकत्ता, देहरादून, काशी - बनारस से क्रमश: युगवाणी, प्रभात, उदय और भारती आदि पत्रिकाओं के प्रकाशन से भारत के नेपाली लेखकों को सम्प्रेषण और अभिव्यक्ति का साधन मिला।

 

दार्जिलिंग में पारसमणि प्रधान की कथा भारती और रूपनारायण सिन्हा की खोजी पत्रिकाओं ने नव कथा प्रयोगों को प्रश्रय दिया। इसी कल में एम.एम. गुरुंग, काशीमान कन्दवा, जी. छिरिंग, पासांग गोपर्मा, रूपनारायण सिन्हा, शिवकुमार राई और इन्द्र सुन्दास आदि मुख्य कहानीकार प्रकाश में आए।

 

एम.एम. गुरुंग नेपाली लोक कथाओं पर आधारित कहानियाँ लिखने लगे। गनु सिंह गुरुंग ने गोरखा फौजी जनजीवन पर आधारित कहानियाँ लिखीं। उनका एक कहानी संग्रह यात्रा में प्रकाशित है। सम्पादक रूपनारायण सिन्हा की लेखन कला नेपाली शैली अनुप्रास में परिष्कृत और सुन्दर है। संस्कृत शब्दों को नेपाली गद्य में उन्होंने बड़ी कुशलता से मिश्रित कर लिया है। दार्जिलिंग के जनजीवन को कहानियों में मनोवैज्ञानिकता देने में उनकी कहानियाँ नेपाली साहित्य की अमूल्य निधि हैं। प्रकाशित संग्रह कथा नवरत्न और भ्रमर उपन्यास हैं। आमा उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी कही जा सकती है। इस काल की कहानियों में हास्य - व्यंग्य, इतिवृत्तात्मकता और सुधारवादी दृष्टिकोण का स्वर प्रमुख है। शिवकुमार राई की कहानियों में दार्जिलिंग के निम्न वर्ग के जनजीवन का वर्णन बड़ी कुशलता से हुआ है। उनकी कहानियों का विषय वेदना है। अपनी जाति की समस्यायों को सामाजिकता देने में वे अग्रणी हैं। माछाको मोल (मछली का मूल्य) उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी है जो जनजीवन का आकांक्षाओं, निराशाओं और विषमताओं का दस्तावेज हैं। उन्होंने फौजी नेपाली सिपाही के जीवन पर आधारित कहानियाँ भी लिखी हैं। दो कहानी संग्रह और एक उपन्यास देकर आजकल वे साहित्य से सन्यास लेकर आकाशवाणी कर्सियांग (प. बंगाल) के नेपाली विभाग के निर्देशक हैं।

 

1945 के आसपास देवकुमारी सिंह सामाजिक कहानियों में मनोवैज्ञानिक पुट लेकर आती हैं। सामाजिक कथाओं में वह सिद्धहस्त हैं। बाल मनोविज्ञान और नारी मनोविज्ञान उनकी कहानियों का विषय हैं। इसी समय अच्छा राई रसिक का नेपाली साहित्याकाश में पदार्पण होता है। उन्होंने दार्जिलिंग के नेपाली जनजीवन की सामाजिक विषमताओं, राजनीतिक क्षेत्र में नेताओं की अकर्मण्यता और आडम्बर पर तीखे व्यंग्य प्रहार किए हैं। इस होनहार लेखक की केवल चौबीस वर्ष की आयु में ही मृत्यु होना दार्जिलिंग के नेपाली साहित्य के लिए कभी न पूरा होने वाली क्षति है।

 

राधिका राया की कहानियों में ब्रिटिश सेना में गए गोरखाओं के जीवन का वर्णन मलाया की पृष्ठभूमि पर मिलता है। मलाया में गए जीवन बलिदान कर देने वाले भारतीय नेपाली सैनिकों की नियति का वर्णन उन्होंने बड़ी मार्मिकता के साथ किया है।

 

1950 के बाद नेपाली साहित्य सम्मेलन की प्रमुख पत्रिका दियालो के प्रकाशन से कथा - साहित्य में नवीनता, मूल्यों के प्रति सजगता, गहन चिन्तनशीलता और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रादुर्भाव हुआ। दार्जिलिंग में इन्द्रबहादुर राई ने तीसरे आयाम की शुरूआत की कथा विधा में। यह कथा साहित्य के लिए एक नवीन प्रयोग था। विदेशी साहित्य के प्रभाव को उन्होंने नेपाली कहानी में ढालना शुरू कर दिया। परन्तु यह एक प्रयोग मात्र रह गया है। एक भेंटवार्ता के दौरान उन्होंने मुझे बताया था - मेरा लेखन मेरे लिए स्वत्व की साधना है। अभी हाल में उनका आयामिक कहानियों का संग्रह कथास्था प्रकाशित हुआ है।

 

आयामिक साहित्यकाल में ही जब इन्द्रबहादुर राई, ईश्वरवल्लभ और तिलविक्रम नेम्बांग - बैरागी काइँला आदि कहानी और कविता में नए प्रयोग कर रहे थे, गाब्रियल राणा, देवकुमारी सिंह और बल हेवान आदि प्रयोगवादी मनोवैज्ञानिक कहानियां लिख रहे थे। वे भारतीय नेपाली जनजीवन की मूल समस्याओं, आजीविका, युग और आधुनिकता के प्रति विरोध और अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रति सजग होकर लिखने लग गए।

 

हरीश बमजन की कहानियों में यथार्थवादी दृष्टिकोण के साथ साथ नेपालियों के यायावर जीवन का चित्रण प्रखर रूप में मिलता है। वह किसी पूर्वाग्रह के यथार्थ को कलात्मक रूप देने में अग्रणी हैं। उनका एक लघु उपन्यास शो केस के भीतर की जिन्दगी काफी चर्चित रहा है।

 

रामलाल अधिकारी ने साहित्य की सभी विधाओं पर कलम आजमाई है। उनके कहानी संग्रह स्वयं जन्मे में भारतीय नेपाली जनजीवन का करुण इतिहास है। आजीविका और सिलिगुड़ी तथा कलकत्ता के नेपाली शहरी जनजीवन पर उन्होंने अच्छी कहानियाँ लिखी हैं। थमिनी कान्छी दार्जिलिंग की सीजनल अर्थव्यवस्था तथा नेपाली भारवाहकों की जिन्दगी पर आधारित बेजोड़ कहानी है। इस कहानी को उन्होंने एक नेपाली महिला भारवाहक थमिनी कान्छी के माध्यम से लिखा है। वह कुली का काम करके अपने मृत पति को छोडी एक मात्र निशानी अपने बेटे को इस आकांक्षा से पढ़ा रही है कि वह बड़ा होकर बाबू बने। वह अपने बेटो को भी पब्लिक स्कूलों में पढ़ रहे लड़कों की तरह देखना चाहती है। उसकी आकांक्षाओं पर तुषारापत तब हो जाता है जब वह एक दिन कुछ न मिलने पर घर लौटती है। उसका बेटा अपनी पाठ्यपुस्तक से ईश्वरचन्द्र विद्यासागर पाठ पढ़ रहा होता है। वह कह रहा होता है कि अपना काम खुद करों। थमिनी कान्छी को लगता है सभी ईश्वरचन्द्र विद्यासागर बन गए तो उसका गुजारा कैसे होगा और वह अपने बेटे को पढ़ाकर कैसे बाबू बना सकती है? यथार्थ की इस कटु स्थिति पर उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठता है और वह अपने बेटे के हाथ से किताब छीनकर फाड़ देती है और कहती है - कल से तू भी मेरे साथ काम करने के लिए चलेगा।

 

नन्द हांगखिम का उन्मुक्ति कहानी संग्रह उल्लेखनीय है। नई पीढ़ी के कहानीकारों  वह अच्छा लिख रहे हैं। इसके अतिरिक्त पूर्ण राई, धनवीर पुरी, यस योञ्जन प्यासी, शंकर फागो, सुरेश राई, मनबहादुर मुखिया, उदय कुमार प्रधान, मटिल्डा राई, कुमार घिसिंग, मोहन ठकुरी आदि ने जनजीवन की आकांक्षाओं और अपने अस्त्तिव के प्रति सजग होकर लिखा है।  अधूरी मांगें (भाषा मान्यता), आशा के विपरीत जीवन व्यवस्था, अपने अस्तित्व की रक्षा आदि ही आज की कहानी की मूल आवाज है, जिसे सही दिशा देने में कुछेक युवा लेखक प्रयत्नशील हैं।

 

नेपाली साहित्य का सम्पूर्ण इतिहास लिखने में दार्जिलिंग को छोड़ दिया जाए तो वह अधूरा इतिहास होगा। एक समय था जब नेपाल के नाटकों के शेक्सपीयर बालकृष्ण सम को कहना पड़ा था - आज जो दार्जिलिंग सोचता है, उसे नेपाल कल सोचता है।

 

भारत के पचास लाख नेपालियों के अस्तित्व को, उनके समृद्ध साहित्य को हम आंज मूंद कर नेपाल के साहित्य में शामिल नहीं कर सरकते। समय आ गया है, हम उनके अभियान में शामिल होकर उनके अस्त्तित्व और साहित्य को वास्तविक परिप्रेक्ष्य में विश्व के सामने प्रस्तुत कर सकें।

(यह लेख चण्डीगढ़ से प्रकाशित और शामलाल मेहन्दीरत्ता प्रचण्ड के सम्पादन में प्रकाशित हिन्दी मासिक साहित्य निर्झर के 1974 के एक अंक में प्रकाशित हुआ था) - नवम्बर 2011

 

यात्रा संस्मरण

 

वाराणसी की ओर

 

सुवास दीपक

 

सएनटी की बस 29 जनवरी 2011 को 1.30 के करीब गंगटोक से रवाना हुई। बस की रफ्तार धीमी थी, मुझे भी जल्दी नहीं थी क्योंकि मुझे रात की 10.30 की ट्रेन पकड़नी थी।

 

पिछले दिनों पड़ोसी राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की लगातार हड़ताल से राष्ट्रीय राजमार्ग 31 ए प्रभावित हुआ। तीन दशकों से यह सिलसिला जारी है। एक हफ्ते से भी ज्यादा दार्जिलिंग जिले में पृथक राज्य की मांग पर समूचे जिले में बन्द रहा। राष्ट्रीय राजमार्ग 31 ए, जो सिक्किम की जीवन - रेखा है, दार्जिलिंग जिले से गुजरता है। इसी वजह से सिक्किम पिछले तीन दशकों से बन्द की मार झेलता आ रहा है, कोई विकल्प नहीं। हवाई मार्ग के रूप में एक हेलिकॉप्टर तो है लेकिन वह भी खराब मौसम में आराम फरमाता रहता है। इस बार चूंकि मोर्चा ने राष्ट्रीय राजमार्ग को बन्द से मुक्त रखा था, फिर भी इक्का - दुक्का तोड़फोड़ की घटनाओं की वजह से निजी परिवहन सेवाएँ जोखिम नहीं उठा रही थीं। एसएनटी (सिक्किम राष्ट्रीयकृत परिवहन) सेवा ने उचित सुरक्षा में अपनी सेवाएँ मुहैया करवाकर यात्रियों की कठिनाइयों को कम किया। एसएनटी की इस बार की व्यवस्था की काफी तारीफ की गई है।

29 जनवरी को बन्द नहीं था फिर भी मैंने, सामान्य दिनों की तरह बस में ही सफर करने का फैसला किया। ट्रेन 10.30 (रात) की थी इसलिए सुबह चलने का कोई तुक नहीं था, अत: 1 बजे की बस की टिकट ली थी।

 

राष्ट्रीय राजमार्ग सिंग लेन है। इसे डबल लेन बनाए जाने के लिए केन्द्र सरकार से सिक्किम सरकार  पिछले तीन दशकों से मांग करती आ रही है। केवल पिछले दो सालों से, सर्दियों में यह डबल लेन का काम चल रहा है लेकिन अति धीमी रफ्तार से। पुराने बूढ़े हो चुके पुलों की, जो ब्रिटिश सरकार के जमाने में बनाए गए थे, मरम्त की जा रही है। संकरे मोड़ों को पहाड़ काटकर चौड़ा किया जा रहा है। काफी दिनों से वारिश न होने से धूल भी काफी है।

 

आधे रास्ते पर पहुँचते ही, मल्ली से एक किलोमीटर पहले, ट्रैफिक जाम मिली। राष्ट्रीय राजमार्ग कई स्थानों पर काफी संकरा है, केवल एक ही वाहन गुजर सकने का रास्ता। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रतिदन हजारों की संख्या में निजी, सरकारी, सेना के वाहन, दोनों ओर से इसी संकरे सिंगल लेन रोड़ से गुजरते हों तो ऐसी स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। करीब दो ढाई घंटों के इन्तजार के बाद यह लम्बी ट्रैफिक क्लियर होती है लेकिन वाहनों की रफ्तार सामान्य से भी धीमी होने से तीन साढ़े तीन घंटों का सफर साढ़े सात घंटों में समाप्त हुआ।

 

एनजेपी पहुँचने के लिए टेम्पो किया। एसएनटी परिसर के बाहर सवारियों की प्रतीक्षा में वह एक मात्र टेम्पो था जैसे कि मेरे ही इन्तजार में - यह उस टेम्पो वाले ने चढ़ जाने को बाद कहा। वह कह रहा था कि इस वक्त उसके अन्य साथी चले गए थे लेकिन वह रुक गया था, एसएनटी की आखीरी बस के इन्तजार में। इतनी देर क्यों हुई? उसने मुझसे पूछा। मैंने ट्रैफिक जाम की बात कही। वह कह रहा था कि ममता बनर्जी आज सिलिगुड़ी आई थीं, आज पार्टी का कोई ओपनिंग था, वह बता रहा था। शहरों का जीवन, समतल के शहरों का जीवन शाम से शुरू होता है। मैंने जिस शहर या कसबे में, पहाड़ों के अपने जीवन का तीन चौथाई भाग गुजारा है, वहाँ शाम ढलते ही लोग अपने - अपने कमरों में आ जाते हैं। शाम की जिन्दगी केवल घरों में ही गुजरती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से कहें, दो दशकों से गंगटोक के आन्तरिक स्वरूप में काफी तब्दीली आई है। कैफे, कैशिनो, बार आदि खुल जाने से सम्भ्रान्त वर्ग अब अपनी शामें कमरों से बाहर गुजारने लगे हैं।

 

सिलिगुड़ी से एनजेपी की ओर जाते हुए घनी शहरी आबादी में  खेल मैदानों में विद्युत प्रकाश में लड़के कहीं बास्केट बॉल का तो कहीं क्रिकेट का अभ्यास करते दिखाई दिए। अच्छा लगा। एनजेपी पिछले 40 सालों से आता - जाता रहा हूँ। तंग गलियों से पहले रिक्शा या टेम्पो ट्रैफिक में फंस जाते थे लेकिन पिछले दो दशकों से इस मार्ग पर फ्लाई ओवर बन जाने से काफी सुविधा हो गई है।

 

एनजेपी प्लेटफार्म कुछ बदला हुआ लगा। अपेक्षाकृत साफ - सुथरा। माइक पर सूचना सुनाई देती है - न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पर आपका स्वागत है। इसे साफ - सुथरा रखने में रेलवे की सहायता करें। प्लेटफार्म पहुँचने से पहले रास्ते में पड़ने वाले छोटे - मोटे बाजार और गलियाँ भी साफ - सुथरी दिखाई दीं। बंगाल में चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इसलिए विभिन्न पार्टियों के बैनर लगी गलियाँ और बाजार साफ - सुथरे दिखे जो सिलिगुड़ी के अतीत के चेहरे से अपेक्षाकृत कुछ धुले हुए लग रहे थे। नेताओं के आने पर, जैसे कि अतीत में होता आ रहा है, रास्ते साफ - सुथरे कर दिए जाते हैं और उनके निकलते ही तुरन्त बाद फिर अपने मौलिक चेहरों में तब्दील हो जाते हैं - यदि इन रास्तों को नेताओं के दौरे के अवसर पर ही साफ किया किया गया हो तो यह कहना तर्कसंगत नहीं होगा कि यथास्थिति में कोई परिवर्तन हुआ है।

 

खैर, उच्च श्रेणी के प्रतीक्षालय में आकर बैठा तो सबसे पहले देखकर हैरानी हुई कि इस छोटे से कमरे की कुर्सियाँ कम हैं। एक कुर्सी दो महीने पहले जिस स्थिति में थी - हिली हुई, वैसी ही मिली। नितान्त अपरिचितों के बीच बैठते ही मैं असहज हो जाता हूँ। यह असहजता मेरे अन्दर जन्मजात है जिससे मैं आजतक छुटकारा नहीं पा सका हूँ।

 

बैठने की उचित व्यवस्था न होने पर भी यह असहजपन मुझे और असहज बना रहा था। कुर्सी स्टील की थी और आगे से नीचे झुकी हुई थी। मैं कुर्सी का हत्था पकड़कर सात घंटे के बस के सफर में आई थकान को मिटाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। लेकिन यह थकान बढ़ती ही जा रही थी। टॉयलट पास होने के कारण हर पाँच मिनट के बाद दरवाजा खुलता और बन्द होता तो दुर्गन्ध का भभका बाहर निकलता। टॉयलट की हालत जो दो महीने पहले थी, वैसी ही थी, कोई सुधार नहीं हुआ था।

 

एक सीट खाली होने पर मैं तुरन्त उस पर बैठ गया। यह सीट ठीक थी जिस पर आराम से बैठा जा सकता था। अच्छी तरह टिककर आँखें बन्द कर लेता हूँ। थकान के वजह से जोरों की नींद आ रही थी।

तभी 10.30 के बाद ध्वनि प्रसारण से मेरी रेल के प्लेटफॉर्म का नाम बताया जाता है। लगा, मैं एक टापू से निकल रहा हूँ - असहजता सहजता में बदल जाती है। नीचे पहुँचते - पहुँचते रेल आ जाती है और फिर दो फर्लांग की दौड़ के बाद कम्पार्टमेन्ट में प्रवेश कर पाता हूँ। इस बार मैंने कम से कम सामान लेकर चलने का उपक्रम किया था। फिर भी टाँगें दुखने लगी थीं। एक बार कम्पार्टमेन्ट के सामने से ही गुजरा था लेकिन नजर नहीं पड़ी और एक फर्लांग अतिरिक्त दौड़ना पड़ा जबकि दौड़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि गाड़ी पौने घन्टे के बाद चली थी। चलती है। हम लोग हर काम, उपक्रम जल्दबाजी में करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। यह सब हमें व्यवस्था ने सिखाया है। ट्रेनें ठीक समय पर चलें, ठीक समय पर प्लेटफॉर्म छोड़ें तो ऐसी आपाथापी नहीं होगी लेकिन क्या यह भारत जैसे देश में संभव है? हर बार आमजन ही इस अव्यवस्था का शिकार होता है।

 

दरवाजे के अन्दर एटेंडेंट से पूछा कि यह वही कम्पार्टमेन्ट है तो 20 - 22 साल के उस युवक ने नपा तुला जबाव दिया। जवाब क्या वह तो ऐसे बोल रहा था जैसे मैं कोई जनरल सीट का मुसाफिर होऊँ और एसी क्लास में घुस आया हूँ। उससे जब मैंने चादर, कंबल और तकिए के बारे में कहा तो वह एक चादर पटक कर चला गया।

 

नेट पर टिकट रिजर्व करते हुए 29 जनवरी को इस गाड़ी से प्रथम श्रेणी में सिर्फ एक ही सीट (सीट नं. 1) मिली लेकिन देख रहा हूँ कि 2, 3, 4, 5 और 6 सीटें खाली है। इस ब्लॉक में सिर्फ मैं ही एक मुसाफिर हूँ - निपट अकेला।

 

पटना तक पहुँचते - पहुँचते टीटी अधिकारियों के माध्यम से रेल व्यवस्था के बहुत  से अच्छे- बुरे पक्षों के बारे में जानकारी मिली। सफाई - व्यवस्था (अनुबन्ध पर), रेलवे पुलिस वाहिनी और चाय तथा अन्य विभिन्न प्रकार के सामान बेचने वालों का संजाल, एक अदृश्य रूप में बहुत बड़े तन्त्र (कुतन्त्र!) के तहत रेल विभाग संचालित होता आ रहा है जिसका थाह पाना उतना आसान नहीं है जितना समझा जाता है।

 

एक सीआईटी महोदय एक योग गुरु के बारे में बतिया रहे थे। बातों ही बातों में योग गुरु रामदेव का जिक्र उठा। उनका कहना था कि रामदेव तीन - चार हजार लोगों को इकट्ठा करके सभी को एक ही लाठी से हाँकते हैं। योग का मूल सिद्धान्त व्यक्तिगत है। सामूहिक नहीं, जब इससे बीमारियों के उपचार की बात होती है। प्रत्येक व्यक्ति अलग इकाई है, उसकी समस्यायों को व्यक्तिगत स्तर पर लेना होगा।

 

हर क्षण एक नया अनुभव है। अरबों सालों से धरती, आसमान, लोग, पेड़ - पौधे वही हैं लेकिन एक जाग्रत व्यक्ति की आँख उन्हें हर क्षण नए रूप में देखती है। मुक्य टिकट निरीक्षक ने जिस भिखमंगे लड़के को लात मारी थी - उस लड़के और निरीक्षक की स्थिति पर विचार किया जाए तो बहुत बड़ा शोषण दृष्टिगोचर होगा। दो अलग - अलग सामाजिक - आर्थिक यथार्थ।

 

रेल तो एक बहुत बड़ी पुस्तक है जिसक एक एक सफा - नहीं एक एक अक्षर कई महाभारतों का वर्णन कर सकता है।

 

मुगलसराय ब्रह्मपुत्र ट्रेन 'बिफोर' (पहले) पहुँच गई - यह सीआईटी बता रहा था। इसका अर्थ यह हुआ कि ट्रेन को जिस निर्धारित समय पर पहुँचना था उससे पहले ही पहुँच गई थी। ज्यादा नहीं केवल आधा घंटा। स्टोशन से बाहर आया तो एक टैक्सी वाले ने रोक लिया। चौखम्बा पहुँचने के लिए किराया तै हुआ। उसने सामान उठाया और बाहर टैक्सी की कतारों के बीच एक टैक्सी का पिछला दरवाजा खोलकर मेरा सामान रख रहा था कि टैक्सी (यह टैक्सी नहीं थी) कार थी प्राइवेट जिसपर PRESS लिखा कागज चिपका था। मैंने पूछा तो बोला कि इस कार में ब्यूरो चीफ चलते हैं। कार की दशा देखकर ऐसा नहीं लगता था कि इस पर कोई ब्यूरो चीफ बैठता हो। टैक्सी ऐसी थी कि जैसे गैराज से टेस्टिंग के लिए निकाली गई हो। वाराणसी के ठगों के बारे में जगतप्रसिद्ध किस्से मिलते हैं, यह भी एक उम्दा किस्सा हाथ लगा आज। मेरी जानकारी में इजाफा हुआ। किसी अखबार का होगा, स्टेशन में छोड़ने आया होगा और वापस जाते हुए सवारी ले जाना चाहता हो। यह कोई नई बात नहीं है। हो सकता है वह ठग न हो - कार किसी अखबार वाले की हो सकती है या किसी और की। मेरे पास विकल्प नहीं था - कार सुरक्षित थी जिसमें इस धूल - धूसरित क्षेत्र में सुरक्षित पहुँचा जा सकता था। मैं पिछले 18 - 19 घंटों से तकरीबन थक चुका था, किराया बचाने के लिए किसी टेम्पो या कहीं रिक्शे या बस से जाने की हिम्मत जुटा नहीं पा रहा था। सामान चूँकि कार में था और मैं भी, इसलिए उस गन्तव्य की लोकेशन बताकर चल पड़ता हूँ, कार चल पड़ती है। मैं पहले ही कार की हालत के बारे में बता चुका हूँ। खटारा थी, गैराज से में रिपेयर के लिए लाई गई या ट्राइल के लिए निकाली गई हो। और इस ट्रायल में सवारी करने का सौभाग्य या दुर्भाग्य मैं प्राप्त कर रहा था। आने वाली शुभ या अशुभ स्थिति के बारे में मैंने सोचना ही छोड़ दिया था।

 

धूल भरी बस्ती से प्रेस का स्टिकर लगी कार में बैठे मुझे इस तरह लग रहा था जैसे यह कार सिर्फ मुझे रिसीव करने आई हो। देखता हूँ कि कार के आगे एक लाल रंग की कार थी जिसके पीछे भी PRESS का स्टिकर लगा था। यह देखकर मेरे सूखे होठों पर एक कृत्रिम मुस्कान तैर गई इस मुगालते पर कि यह अगली कार मेरा एस्कॉर्ट कर रही है। वाराणसी मेरे स्वागत की अगवानी कर रही है।

 

1982 में जब मैं अपना लेटर प्रेस स्थापित करने जा रहा था तो टाइप खरीदने के लिए मैं काशी टाइप फाउण्डरी से कोटेशन मांगी थी। भारतीय स्टेट बैंक से 5000 रुपयों की टाइप की कम्पोजिंग युनिट स्थापित करने के लिए मुझे कैश क्रेडिट मिला था जिसकी मंजूरी के लिए सिक्किम के तत्कालीन राज्यपाल होमी जेएच तल्यार खान ने तत्कालीन बैंक मैनेजर को फोन किया था। दरअसल मैं काफी दिनों से बैंक का दरवाजा खटखटा रहा था लेकिन 5000 का लोन पास नहीं हो रहा था। तब मैंने राज्यपाल से गुहार लगाई थी। राज्यपाल ने मेरे सामने बैंक मैनेजर को फोन लगाया था और दूसरे ही दिन मुझे 5000 का चैक मिल गया था। मेरे जैसे एक निहायत अदने से व्यक्ति जिसके पास पाँच हजार रुपये तक नहीं थे, अपना कारोबार खोलने के लिए, उसकी सिफारिश राज्यपाल से आने से उस बैंक मैनेजर ने दूसरे दिन मुझे अपने चैम्बर में बुलाकर बड़े अदब से चाय पिलाकर चैक दिया था।

 

और उसी धनराशि से मैंने अपनी कम्पोजिंग युनिट खोली थी और टाइप खरीदने के लिए वाराणसी आया था।

 

गंगा के इस पार से स्टील के पुल से गुजरते हुए मैं तकरीबन तीस साल पहले की स्मृतियों को कुरेद रहा था।

 

उस समय गोपाल प्रसाद दाहाल सिक्किम विधान सभा में देवनागरी टाइपिस्ट के पद पर नियुक्त हुए थे। वह सिक्किम के देवनागरी शार्ट हैण्ड और टाइपिंग में प्रशिक्षण प्राप्त कर नियुक्ति पाने वालों में पहले कर्मचारी थे। विधान सभा में डिपुटी स्पीकर लाल बहादुर बस्नेत ने नेपाली कहानियों का एक संग्रह तैयार किया था जिसकी पाण्डुलिपि ' धर्मछाड़ा' गोपाल प्रसाद दाहाल ने ही तैयार की थी। और चूँकि वह वाराणसी में ही पढ़े थे इसलिए उन्हें इस शहर के इतिहास, भूगोल और मुद्रणालयों के बारे में अच्छी जानकारी थी। संयोग से उसी समय बस्नेत जी ने उन्हें वाराणसी भेजकर पुस्तक को छपाने की योजना बनाई। दाहाल जी चूंकि मुझसे तकरीबन रोजाना मिलते थे, इसलिए उन्होंने वाराणसी जाने का जिक्र किया तो मुझे सौभाग्यवश एक मार्गदर्शक मिल गया था।

 

तब तक एनजेपी स्टेशन का निर्माण नहीं हुआ था। सिलिगुड़ी रेलवे स्टेशन से मीटरगेज पर ट्रेनें चलती थीं। वाराणसी पहुँचने के लिए सिलिगुड़ी से डायरेक्ट ट्रेन थी। आजकल यह व्यवस्था नहीं है. एनजेपी से देश के सभी बड़े शहरों तक सीधी ट्रेन सेवा पिछले तीन दशकों से संचालित हो रही है लेकिन एनजेपी से सीधी ट्रेन नहीं है, मुगलसराय तक है। उसके बाद का यह 17 - 18 किलोमीटर का रास्ता टैक्सी से तय करना पड़ता है।

 

... पुल से मैं उस पार विस्व के प्राचीनतम धार्मिक महत्व के शहर काशी या वाराणसी को देख रहा था। बायीं दिशा में क्षितिज पर सूर्य एक लाल गोले की तरह टंगा - सा दिख रहा है। गंगा किस दिसा बह रही है -  मैं अनुमान लगाने में असमर्थ हूँ। नाचे मटमैली गंगा में नौकाएँ जैसे किसी विशाल पेंटिंग कर उकेरी गई दिखती हैं। किसी मन्दिर के गुम्बद दिख रहे हैं। कुछ देर के बाद मैं गंगा नदी के इस विशाल स्टील ब्रिज (लाल रंग के) को पार कर विश्व के प्राचीनतम शहरों में एक शहर वाराणसी में प्रवेश कर रहा हूँ। मन में किसी प्रकार की श्रद्धा का संचार नहीं है. बेतरतीब है सब कुछ, कहीं भी कोई वस्तु संगत नहीं दिखती - टेम्पो, रिक्शों, टैक्सियों, साइकिलों, गाय - भैंसों, पैदल लोगों की भीड़ में जिन्दगी पनप रही है। कहीं कोई विरोध नहीं - कोई भी इस भीड़, इस बेतरतीब जिन्दगी को असामान्य नहीं मानता - उनके लिए यह एक सामान्य, एक हकीकत है - हर रोज का एक सिलसिला। मैं ही हूँ जो समझ रहा हूँ कि वाराणसी बेतरतीब है, असंगत है, भद्दा, कुरूप, बूढ़ा और जर्जर शहर है।

 

ओशो इस संदर्भ में कहते हैं - " जीवन सुन्दर है क्योंकि बह बहुरंगी है। इसकी विविधता ही इसकी समृद्धि है। यह एकांगी नहीं है, एकांगी हो तो यह उबाऊ हो जाएगा, कंजूसी भरा होगा, सिकुड़ा - सिकुड़ा होगा। शायद किसी एक विशेष प्रकार की मानसिकता वाले लोगों को अपील करेगा, उनके मन को भाएगा। लेकिन यह जगत भरा है हजारों प्रकार के लोगों से, हजारों प्रकार के प्राणियों से - जो एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं; भिन् ही नहीं, विपरीत भी हैं। जीवन इल सभी को उतना ही उपलब्ध है, जितना किसी प्रकार के लोगों को। जीवन भेद करता ही नहीं; सबमें एक बिना किसी शर्त के प्रभावित होता है। शर्त तो तुच्छ मन, क्षुद्र चित्त की मांग है। लेकिन जीवन अपिसीम है और अवाध गति से बहता है।"

 

मेरा गाइड - टैक्सी चालक, PRESS का स्टिकर लगाकर एक खटारा कार से मुझे वाराणसी के चौखम्बे की ओर ले जा रहा है। वहाँ का भूगोल मुझे तो मालूम नहीं। मैं भारत में नेपाली पत्रकारिता के आधारस्तम्भों में से एक स्तम्भ कासी बहादुर श्रेष्ठ के बड़े सुपुत्र दुर्गाप्रसाद श्रेष्ठ (सम्पादक उदय) से मिलने जा रहा हूँ। चालक ने अपने सेल पर नम्बर लगाया। शायद घर की जिस महिला ने जो कुछ बताया उसका अर्थ यह निकला कि श्रेष्ठ जी घर पर नहीं हैं, एकाध घंटे के बाद या इससे भी ज्यादा समय के बाद आएँगे। सामान उठाकर वाराणसी की गलियों में जना असम्भव था, अत: चालक से किसी सस्ते होटल में रात बिताने के लिए कहा। वह कई होटलों का नाम लेने लगा। कार भीड़ की छाती चीरती लगातार आगे बढ़ती जा रही थी। मैंने उसे भेलपुर में डायमण्ड होटल, दहाँ मेरी 1 - 4 फरवरी तक की रिजर्वेशन तय थी, ले जाने को कहा तो उसने वह बहुत दूर है, कहा। मैंने कितकी दूर है, पूछा। तीन चार किलोमीटर से ज्यादा नहीं था यह फासला। मैंने कहा, यह तो कोई ज्यादा दूरी नहीं है। लेकिन उसने एक सौ पुपये अतिरिक्त लेने की शर्त रखी। मरता क्या न करता।

 

होटल डायमण्ड में मैंने काउंटर पर अपनी स्थिति रखी। सवाल था दो दिनों की पेमेन्ट का। साहित्य अकादेमी के नेपाली भाषा के प्रभारी एवं उप सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी से दिल्ली में सम्पर्क किया गया। मैंने उनसे वस्तुस्थिति बताई तो उन्होंने होटल में रहने के लिए होटल प्बन्धक को कह दिया।

 

वाराणसी में मैंने सोचा था, बहुत सर्दी होगा लेकिन यहाँ बिल्कुल सर्दी नहीं है। साधारण कपड़ों में रहा जा सकता है। कमरे में आकर सबसे पहले दो दिनों की सुस्ती और धूल - धूसरित शरीर को हॉट शावर में फ्रेश किया। जान में जान आई। दुर्गा प्रसाद श्रेष्ठ को फोन किया तो उन्होनें कहा कि वह मुझे होटल में मिलने आ रहे हैं। दिवाकर प्रधान भी कल गंगटोक से वाराणसी आ जाएँगे।

 

 

वाराणसी या काशी के नाम से प्रसिद्ध विस्व के इस प्राचीनतम धार्मिक नगरों के बारे में अनगिनत लेखकों, कवियों, इतिहासकारों ने  विपुल साहित्य की रचना की है।  One night @ the call centre, five point someone, to state three mystiques of my life के लेखक चेतन भगत और मोटिवेशन गुरु को वाराणसी ने बहुत प्रभावित किया है। उनके अनुसार दुनिया में इससे अच्छी और गंदी जगह और कोई नहीं।

 

इसी महीने उन्होंने वाराणसी में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा - वाराणसी में भगवान का एहसास होता है, जब भी गंगा किनारे घाट पर जाता हूँ तो कुछ अलग सा अनुभव करता हूँ।

 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का निधन फरवरी 1941 को काशी में ही हुआ था उनके बारे में एक हिन्दी दैनिक ने इस प्रकार टिप्णी की - 

 

'क्रूर काल की शनि दृष्टि विशेष रूप से काशी पर दीखती है। पहले प्रेमचन्द को उसने लिया, मगर उसकी भूख नहीं मिटी। दो साल बाद उसने 'प्रसाद' को हमसे छीन लिया। हमारा सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार और नाटककार हरने से ही उसकी सन्तुष़टि नहीं हुई और अब उसने हमारा सर्वश्रेष्ठ समालोचक भी छीन लिया है। नियति के इस तेज - प्रहार के आगे हम विवश हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की मृत्यु हिन्दी साहित्य के समालोचना - श्क्षेत्र पर एक असह्य - प्रहार है। हिन्दी का समालोचनात्मक और निबन्ध साहित्य आचार्य शुक्ल का ऋणी है। और सदा रहेगा। वर्तमान समालोचना की गम्भीर शैली के आप जन्मदाता थे. तुलसी, सूर, जायसी आदि पर आपने विशद समीक्षाएँ की हैं और वह सर्वथा मौलिक और उनके प्रकांड पाण्डित्य की परिचायक हैं।'

 

 

भारत सरकार के पर्यटन मन्त्रालय द्वारा प्रकाशित पुस्तिका में काशी के बारे में इस प्रकार लिखा है -

 

Varanasi is among the oldest living cities in the world, it is also the holiest of Hindu pilgrimages. Thousands come daily to Varanasi to take a ritual dip in the river Ganga, to cleanse their souls of sins and to worship at its many temples.

 

Varanasi is so old that it is a part of Indian mythology and finds mention in the epics Ramayana and Mahabharata. Through the ages Varanasi was also known variously as Avimuktala, Anandakanana, Mahasmasana, Surandhana, Brahma Vardha, Sudarsana, Ramya and Kasi - the city of light. Its present identity is derived from the two tributaries of the Ganga, Varuna and Asi that join the river along the northern and southern periphery of the city. Today Varanasi is 'Kasi', the ultimate pilgrimage for thousands of devotees around the country, while to urban India it continues to be the popular 'Benaras'.

 

Nearly 5000 years ago, Kasikanda described the glory of the city in 15,000 verses in the Skanda Purana. In it Lord Shiva says - 'the three worlds form one city of mine and Kasi is my royal palace therein'. As Shiva's abode Varanasi has always been venerated. It is believed that the jyoti linga in its Kasi Vishwanath temple goes back to the time of the epics. The temple itself is of more recent origin. Successive invasions starting with the destruction of the city in 1193 by Mohammad Ghori and ending with the plunder of Benaras by Warren Hastings nearly 600 years  later, saw the temple being built and rebuilt a number of times. The present temple was constructed by Rani Ahalya Bai Holkar, the ruler of Indore, in 1776. A few years later in 1835, at the instance of the Sikh ruler of Lahore, Maharaj Ranjit Singh, the temple shikara was  gilded with gold leaf.

 

It is not just the Hindus who venerate Varanasi today, for the city has links with Buddhism and Jainism as well. It was at Sarnath close by that Buddha preached his first sermon nearly 25 centuries ago. Lord Mahavir also revealed his Jain philosophy at Kasi. It was here too that Shankracharya wrote his commentaries on Hinduism, leading to the great Hindu revival.

 

Varanasi has always been a centre of trade and commerce - famous for its silks and brocades and in the 19th century, Lord Macaulay was to describe it as a 'city which, in wealth, population, dignity and sanctity was among the foremost in Asia'. He went on to give a glimpse of its commercial importance saying, 'all along the shore lay great fleets of vessels laden with rich merchandise. From the looms of Benaras went forth the most delicate silks that adorned the halls of St James  and Versailles, and in the bazaars, the muslins of Bengal and Sabres of Oude were mingled with the jewels of Golconda and the shawls of Cashmere". Such was the wealth of Benareas. Even today the city exerts a fascination that is unique in India - attracting visitors from around India and abroad.

 

 

पता नहीं फिर कब वाराणसी जाना हो। लेकिन जब भी जाऊँ, एक नए अनुभव से सराबोर हो जाऊँगा।

(30.01. 2011)                                          - अक्तूबर 2011 

 

खडगबहादुर बिष्ट

 

एल.बी. राई

 

स्टिस हेनरी के न्यायालय में लोगों की भारी भीड़ थी। कटघरे में खड़े तेजस्वी और निडर चेहरे वाले प्रतिवादी ने अपना स्पष्टीकरण रखा -

 

"मैं विश्वास करता हूं कि मैंने न तो नैतिक रूप से न कानूनी रूप से कोई गलती की है। कल की तरह आज भी मैं दुहराना चाहता हूँ कि मैंने हीरालाल को मारा, लेकिन मैं कसूरवार नहीं हूँ। यद्यपि न्यायाधीश और जूरी के उपस्थित सदस्यों का यही विचार है कि मुझे सम्मान और सतीत्व की रक्षा नहीं करनी चाहिए थी। अपनी बहू - बेटियों के अपमान और शोषण पर मैं चुप रहूँ, मैं अपनी किस्मत पर रोता रहूँ, हीरालाल और उसके साथियों के घृणित कुकर्मों का पर्दाफाश कर मैंने राष्ट्र के प्रति कुकर्तव्य किया है, राष्ट्र और परिवार में अशान्ति फैलाई है - आप महानुभाव ऐसा सोचते हैं तो मैं अपने किए का फल भुगतने को तैयार हूँ मुझे कठोर से कठोर दंड मिले।"

 

दो हजार साल पहले रोम के प्रांगण में जूलियस सीजर को मारकर ब्रूटस ने ऐसा ही प्रभावशाली भाषण दिया था। आज कलकत्ता मे सिर्फ इतना फर्क था कि वक्ता राजनीतिज्ञ नहीं था, उसे कोई स्वार्थ नहीं साधना था। उसे सिंहासन का लोभ नहीं था।

 

वे व्यक्ति थे जाति - प्रेमी, कलकत्ता के कानून के छात्र 22 वर्षीय युवा, हृदय में पर्याप्त उत्साह लिए अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ने और अपनी जाति को आगे बढ़ाने का सपना संजोए हुए खडगबहादुर सिंह बिष्ट।

 

1926 के अप्रैल महीने की किसी सुबह खडगबहादुर कलकत्ता के गोरखा कल्याण संघ की सभा में भाग लेने के लिए चितपुर रोड से जा रहे थे कि अचानक उनके सामने एक चिट्ठी गिरती है। उन्होंने उस चिट्ठी को उठाकर ऊपर की ओर देखा। ऊपर खिड़की से एक नेपाली युवती ने कहा, "कृपया इस चिट्ठी को पढ़ें।" इतना कहकर वह खिड़की से लोप हो जाती है। बिष्ट ने उस चिट्ठी को खोलकर पढ़ा। पढ़ते ही उनका खून खौल उठा। पत्र का सारांश इस प्रकार था - पद्मप्रसाद नाम के एक आदमी ने उस युवती को बनारस से हीरालाल नाम के एक आदमी को बेच दिया है। पहले पद्मप्रसाद उसकी अस्मिता से खेलता रहा, अब हीरालाल सेठ की वासना की पुतली बनी हुई है।

 

बिष्ट का शरीर काँपने लगा और वह बड़बड़ाने लगे। सभा में नहीं गए। डेरे पर आकर उन्होंने अपनी बहन के उद्धार के बारे में सोचना शुरू कर दिया।

 

कलकत्ता जैसे महानगर में आज एक बहन रक्षा की भीख मांग रही थी, उस बहन की पुकार को अनसुना कर दूँ? नामर्द बन जीवन बिताऊँ जबकि यहाँ अपनी बहन किसी की वासना की शिकार बन मुक्ति के लिए छटपटा रही हो?

 

बिष्ट के अन्त:करण से आवाज आई - उठ खडगबहादुर! अब अपनी बहन की आबरू की रक्षा कर! खुकुरी तेरी सहायक है, उठ और सीताहरण करने वाले उस पापी रावण का अन्त कर दे!

 

पद्मप्रसाद ने राजकुमारी को हीरालाल के हाथों बेचा था बनारस में। सेठ हीरालाल की कामातुरता का शिकार बन राजकुमारी नारकीय जीवन बिता रही थी। मुक्ति का कोई दिन आएगा दिन आएगा, वह सपना पाले प्रतीक्षा में थी। चितपुर रोड से समय समय पर जाने वाले नेपाली भाई को देखकर वह चिट्ठी लिखकर उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। भाग्यवश उस दिन उसने बिष्ट को देखकर वह चिट्ठी नीचे गिरा दी थी।

 

अपनी बहन की रक्षा करना बिष्ट ने अपना पहला कर्तव्य समझा। कमर में खुकुरी कसकर वह हीरालाल के घर पहुँचे और बनारस से पद्मप्रसाद की खबर लेकर आने की बात कही। हीरालाल ने तुरन्त अन्दर बुला भेजा। खडगबहादुर हीरालाल के कमरे में पहुँचे। एक सूँखट बूढ़ा, सिर के सारे बाल सफेद हो चुके गद्दी पर तकिए के सहारे लेटा था। पद्मप्रसाद से क्या खबर लाए हो, पूछने पर बिष्ट ने बात गढ़ी - अभी दो परम सुन्दर लड़कियाँ चढ़ती उम्र की हैं लेकिन पहले वाली लड़की से ज्यादा कीमत की हैं, तुरन्त काशी पहुँचो।

 

वासनालोलुप हीरालाल की लार टपकने लगी, उसका चेहरा खिल उठा। उसने कहा - पहली लड़की पर काफी कीमत पड़ी है, लेकिन अभी तक काबू में नहीं आ सकी है।

 

हीरालाल अभी बोल ही रहा था कि खडगबहादुर ने लम्बी खुकुरी निकालकर कड़क कर कहा - नराधम, अत्याचारी! पद्मप्रसाद की खबर लेकर नहीं आया हूँ, मैं तो तेरा काल बनकर आया हूँ। तेरे जैसे अत्याचारी दुष्ट का संहार करने के लिए इस खुकुरी ने जन्म लिया है।

 

पैसों के बूते अठारह साल की युवती को खरीदने वाले शायद हीरालाल ने सोचा था कि संसार में सब कुछ पैसे से खरीदा जा सकता है। पैसे से सत्य, न्याय, माँ - बाप, भोग - विलास खरीदे जा सकते हैं कभी - कभार लेकिन खड़गबहादुर को खरीदने की ताकत किसी के पास नहीं थी। हीरालाल की दी हुई एक लाख की थैली को ठोकर मारकर खडगबहादुर खुकुरी उठाकर गरजे।

 

कमरे में बिछाललया हुआ कीमती कालीन मोटा था। सिर कटकर दूसरी ओर लुढ़ककर गिरा। धड़ गद्दी के नीचे गिरकर कुछ देरतक छटपटाने के बाद शान्त हो गया। कटे सिर पर टिकी आँखों में भय झलक रहा था।

 

जब तक पद्मप्रसाद का अन्त न कर दूँ, तब तक इस खुकुरी के कून को नहीं धोऊँगा - ऐसा संकल्प कर बिष्ट काशी जाने के लिए स्टेशन की ओर चल पड़ते हैं। लेकिन रास्ते में ही उन्होंने यह विचार त्याग दिया और सीधे लाल बाजार के थाने में जाकर बयान दिया - मैंने हीरालाल नामक आदमी को मार दिया है, उसकी खबर देने आया हूँ।

 

थाने में पुलिस वाले हक्के - बक्के रह गए। उन्होंने उन्होंने सोचा, कोई सिरफिरा होगा। लेकिन जब बिष्ट ने पुलिस वालों को शिक्षित भाषा में अच्छी तरह समझाया तो उन्हें यकीन हो गया और हीरालाल के घर जाँच के लिए पुलिस दल भेजा। खडगबहादुर का बयान सच निकला। उन्हें हिरासत में ले लिया गया। यह खबर चारों ओर फैल गई। शाम के और अगली सुबह के अखबारों में यह खबर प्रमुखता के साथ छपी।

 

कलकत्ता जुलूसों का नगर है। हर पल यहाँ जुलूस - छोटी सी छोटी बात पर निकाले जाते हैं लेकिन अप्रैल के उन दिनों के जुलूसों का उद्देश्य कितना महान था। वीर खडगबहादुर जिन्दाबाद, हीरालाल की हत्या जायज है, ख़डगबहादुर को रिहा करो इत्यादि नारों से कलकत्ता गूँज उठा। पत्र - पत्रिकाओं मे व्यापक टिप्रणियाँ प्रकाशित हुईं। एक नेपाली युवक खडगबहादुर ने बेशक अपनी बहन की रक्षा के लिए खुकुरी उठाई थी लेकिन यह एक अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध एक प्रतीक के रूप में सामने आया - दुर्गा ने महिषासुर का वध करने की तरह। मारवाड़ी, बिहारी, बंगाली, पंजाबी सभी मिलकर खडगबहादुर की रिहाई की मांग करने लगे। धन संग्रह किया गया, मुकदमा लड़ने के लिए बहुत से वकील सामने आने लगे।

 

खडगबहादुर बिष्ट को आठ वर्षों का सश्रम कारावास हुआ था। उन्होंने अपनी सफाई देते निडर होकर कहा था - मैं कसूरवार नहीं हूँ। अबला के उद्धार में यदि मुझे दोषी घोषित किया जाता है तो मुझे कठोर से कठोर सजा दी जाए।

 

इस सजा के विरुद्ध प्रदर्शन, प्रस्ताव, डेपुटेशन होने के बावजूद सजा बरकरार रही। अंग्रेज न्यायाधीश कान में तेल डालकर बैठा रहा। मानवता और प्राकृतिक  न्याय की वहाँ कोई कद्र नहीं थी।

 

शिमला में हुई व्यवस्थापिका सभा के कुछ सदस्यों के अनुरोध पर खडगबहादुर को दो वर्षों की सजा काटकर 31 मार्च 1930 को रिहा कर दिया गया। उनकी रिहाई पर सारे भारत में खुशियाँ मनाई गईं। उनका चारों ओर स्वागत हुआ। कलकत्ता के स्वागत समारोह में कलकत्ता के नागरिकों की ओर से सुभाषचन्द्र बोस ने उनका अभिनन्दन पढ़ा।

 

बिष्ट को उनके मित्रों और हितैषियों ने राजकुमारी जिसे मैञाँ कहकर पुकारा जाता था, से शादी करने की सलाह दी लेकिन वह नहीं माने। उनका कहना था - जिसे मैं बहन मान चुका हूँ उसे पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकता हूँ? बल्कि उन्होंने आजन्म अविवाहित रहने और देश की सेवा करने का संकल्प किया।  उन्होंने मैञाँ का विवाह किसी दूसरे व्यक्ति से करवाकर खुद बाबुल का धर्म निभाया।

 

बाद में कांग्रेस में शामिल होकर उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया और स्वाधीनता की जंग में अपना योगदान दिया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया।

 

सुभाषच्रन्द्र बोस को साथ उनका निकट का सम्बन्ध था। कलकत्ता से सुभाषचन्द्र बोस को भगाने में उनकी प्रमुख भूमिका थी। अपुष्ट सूचनाओं के अनुसार वह वायु सेना में भर्ती हुए थे। उनके अन्तिम जीवन के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।

उनका जन्म 1887 को देहरादून में एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था।

(हाम्रो भाषा, वर्ष 5, अंक 2 - 3, मई 1980)       प्रस्तुति:  सुवास दीपक

  सितम्बर 2011

 

रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन की उपलब्धियाँ

 

(प्रधानमन्त्री का सम्बोधन)

 

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस का महत्व

 

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस 2010 के समारोह में आज यहां सम्मिलित होने पर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। सबसे पहले, तो मैं, सभी पुरस्कार विजेताओं को उनकी असाधारण उपलब्धियों, लगन और राष्ट्र सेवा की उनकी भावना के लिए हार्दिक बधाई देता हूं। मैं, उनमें से प्रत्येक को आने वाले वर्षों में, इससे भी अधिक सफलता प्राप्त करने और अपनी मातृभूमि का सेवा में गौरवान्वित होने की कामना करता हूं।

 

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस, इस बात का प्रतीक है कि सरकार, देश की प्रौद्योगिक क्षमताओं के विकास को कितना महत्व देती है। एक बड़ी प्रौद्योगिकी शक्ति के रूप में भारत के उदय का मार्ग आसान नहीं है। हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने कई कठिनाइयों का सामना किया है और अपने - अपने क्षेत्रों में उन्होंने शानदार सफलता प्राप्त की है। राष्ट्र को उनकी उपलब्धियों पर निश्चित ही गर्व है।

 

हमने, स्वतंत्रता के फौरन बाद बनाए गए एक बड़े ही मजबूत आधार पर अपनी क्षमताओं का विकास किया है। हमारे गणराज्य के संस्थापकों ने तय किया था कि भारत को अगर, सही मायनों में आत्म - निर्भर बनना है तो उसे अपने वैज्ञानिक ढांचे में निवेश करना होगा। बाद के दशकों में, सीमित संसाधनों को न केवल भौतिक आधारभूत ढांचे के निर्माण में बल्कि विश्व - स्तरीय वैज्ञानिक मानव - शक्ति, विश्व में सर्वश्रेष्ठ बने. उन दूरगामी फैसलों के फल आज, हम चख रहे हैं।

 

डीआरडीओ - महत्वपूर्ण स्तंभ

 

आज, हम अपने वैज्ञानिक प्रतिष्ठान के एक स्तंभ की उपलब्धियों का जश्न मना रहे हैं। मैं, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के सभी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का अभिनंदन करता हूं, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में हमारी रक्षा क्षमताओं को मजबूत किया है। डीआरडीओ ने उन्नत मिसाइलों से लेकर बेहतर युद्ध टैंकों, लड़ाकू विमानों, इलेक्ट्रानिक युद्ध. रडार और संचार प्रणालियों, भौतिक तकनीकी, युद्ध सामग्री और हथियारों तथा गोला - बारूद तक विभिन्न क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी है। हल्के लड़ाकू विमान, तेजस के लिए इसी साल के अंत  तक आपरेशनल मंजूरी मिल जाने की उम्मीद है, और इसके विभिन्न स्वरूप तैयार किए जा रहे हैं। देश के प्रमुख युद्ध - टैंक, अर्जुन का सफल परीक्षण हो चुका है और अब इसका निर्माण चल रहा है। डीआरडीओ द्वारा विकसित अनेक जीवनरक्षक प्रौद्योगिकीयों से भीषण स्थितियों में हमारे बहादुर जवानों के स्वास्थ्य और उनकी आपरेशनल क्षमता को बढ़ाने में मदद मिली है।

 

डीआरडीओ द्वारा विकसित विभिन्न मिसाइलों को हमारे सशस्त्र बलों में शामिल कर लिया गया है। हाल ही में, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के लिए मई क्षमताएं हासिल की गई हैं। इस महीने के शुरू में, अग्नि - 2 का सफल परीक्षण, हमारा रक्षा तैयारियों की दिशा में एक और मील का पत्थर है।

 

गौण - उत्पादों के रूप में फायदे

 

डीआरडीओ के क्रियाकलापों के गौण - उत्पादों के रूप में मिलने वाले फायदों की भी मैं, सराहना करना चाहता हूं। एच1एन1 वायरस के लिए एक सरल और किफायती निदान - किट का प्रयास बड़ा ही सराहनीय है, जिसके व्यापक सामाजिक प्रयोग हो सकते हैं। लद्दाख जैसे दूर - दराज के बहुत ऊंचाइयों वाले इलाकों में तैनात हमारे जवानों की ताजा भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए डीआरडीओ द्वारा विकसित तकनीकों से स्थानीय आबादी को भी लाभ हुए हैं।

 

इन उपलब्धियों की सराहना करने के साथ - साथ, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के अवसर पर हमें आत्म - मंथन भी करना होगा और सोचना होगा कि आने वाले वर्षों में हम इस क्षेत्र का विकास किस प्रकार करना चाहते हैं। कई क्षेत्रों में, हमारा प्रगति काफी तेज रही है, लेकिन हमारे प्रतिस्पर्धियों की रफ्तार हमसे भी तेज रही है। यह सच है कि रक्षा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में आत्म - निर्भरता का हमारा मौजूदा स्तर, हमारी क्षमताओं से कम है और इसमें काफी वृद्धि करने की जरूरत है।

 

प्रौद्योगिकी, बड़ी तेजी से बदल रही है। विश्व - व्यापीकरण ने कारोबार के नियमों को बदल डाला है। प्रतिस्पर्धी विश्व - बाजार में, केवल सर्वाधिक प्रतिस्पर्धी और लचीली कंपनियां ही टिकी रह सकती हैं। हमें सुनिश्चित करना होगा कि हममें, प्रतिस्पर्धा की, नया कुछ करने की और समय पर काम करने की क्षमता हो। अगर हमारी प्रणालियां मजबूत और ठोस होंगी, तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी और हमारे साख मिलकर काम करने को तत्पर होंगी। यह सबक, हमने अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के साथ असैन्य परमाणु समझौता करते समय सीखा था।

 

नए विचारों का स्वागत

 

अगर हम आगे रहना चाहते हैं तो हमें नए विचारों और सोच का हमेशा स्वागत करना होगा। हमें अपने अनुभवों से सीखना होगा। हमें अपनी विफलताओं को स्वीकार करने और उनसे सबक लेने के लिए तैयार रहना होगा। यह सच है कि कुछ रक्षा परियोजनाओं में देरी हुई है और अन्य को आपरेशन के लिए शामिल किए जाने की अवस्था में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। इन अनुभवों से डीआरडीओ के लिए सबक लेना बहुत जरूरी है। उसे सशस्त्र सेनाओं के साथ - साथ उद्योग के साथ भी मिलकर काम करना होगा।

 

हमें, सही तकनीकी अपनाने, अनुसंधान और उत्पाद विकास के बीच समन्वय बनाने और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण तकनीकों पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता विकसित करनी होगी। आज, भारत का, ज्ञान - आधारित उद्योगों में अग्रणी स्थान है, इसलिए हमें अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए इस ताकत का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए।

 

मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि डीआरडीओ ने निजी क्षेत्र के साथ लाभकारी साझोदारी विकसित की है। रक्षा क्षेत्र में भारतीय उद्योगों की अधिकाधिक भागीदारी बहुत जरूरी है। हमारी सरकार इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, एक उत्प्रेरक के रूप में सार्वजनिक - निजी क्षेत्र की साझेदारियों को बढ़ावा देगी। हमें, अपनी क्षमताओं में प्रौद्योगिक कमियों को दूर करने के लिए रक्षा खरीद की आफसेट योजना का इस्तेमाल करना होगा।

 

शिक्षा जगत से निकट सम्पर्क

 

मैं अपने अनुसंधान और विकास संगठनों और प्रयोगशालाओं से शिक्षा जगत से भी निकट सम्पर्क बनाए रखने का अनुरोध करूँगा। अपने युवा वर्ग को अनुसंधान कार्यों में लगाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना बहुत आवश्यक है। उन्नत तकनीक, कोई अलग कार्य नहीं है और न ही यह एक दिन में पूरा हो जाने वाला काम है। सफलता के लिए, वैज्ञानिक प्रतिभा का एक व्यापक आधार बनाना, उत्पादन क्षमताओं की स्थापना करना और दूरदृष्टि का होना बहुत जरूरी है।

 

मुझे पूरा विश्वास है कि यदि हम, इस ओर ध्यान दें, तो हम, निश्चित रूप से साफ्टवेयर क्षेत्र की अपनी उपलब्धियों का रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल कर सकेंगे। हमें, रक्षा तकनीकों में अनुसंधान और विकास में अग्रणी रहने के लिए सतत प्रयास करने होंगे। में, यहां एकत्र आप सब लोगों से आग्रह करता हूं कि अपनी सोच बड़ी बनाएं और आत्म - विश्वास, राष्ट्रीयता की भावना और सबसे आगे रहने की इच्छा के साथ काम करें।

 

मुझे विश्वास है कि हमारे वैज्ञानिक और तकनीशियन, इस चुनौती पर खरे उतरेंगे और इन चुनौतियों को रचनात्मक प्रयासों के नए अवसरों में बदलने में सक्षम होंगे। आपके प्रयासों से एक मजबूत और आत्म - निर्भर भारत बनाने में मदद मिलेगी। राष्ट्र की शान, हमारी सशस्त्र सेनाओं और हमारे देश के नागरिकों को इससे कम पर संतोष नहीं होगा।

 

एक बार फिर, डीआरडीओ परिवार के सभी सदस्यों को मेरी शुभकामनाएं। आपका प्रदर्शन अच्छा रहा है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ अभी बाकी है। में, आपके प्रयासों में सरकार के पूरे सहयोग का आश्वासन देता हूं।

 

( 26 मई 2010 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के अवसर पर दिया गया भाषण डीएवीपी के सौजन्य से)                             - अगस्त 2011

 

 

भारतीय नेपाली कहानी: विशिष्ट प्रवृत्तियाँ

 

राजेन्द्र भण्डारी

 

भारतीय नेपाली जातीयता: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 

न् 1816 में नेपाल और ब्रिटेनशासित भारत के बीच हुई सुगौली सन्धि की धारा तीन के अनुसार पश्चिम कुमाऊँ, गढ़वाल, कांगड़ा, मसूरी, देहरादून तथा पूर्व में मेची से टिस्टा तक का समस्त मैदानी और पर्वतीय क्षेत्र ब्रिटेन शासित भारत के अधीन आ जाता है। इसी तरह सन् 1865 में भूटान और ब्रिटेनशासित भारत के बीच हुई सिंचुला सन्धि की धारा दो के अनुसार उत्तर बंगाल के अठारह द्वार क्षेत्र, टिस्टा के दायीं ओर का समस्त पर्वतीय क्षेत्र भी ब्रिटेनशासित भारत के अधीन आ जाता है। इन क्षेत्रों में सदियों से रहते आए नेपाली सन् 1947 में भारत के स्वाधीन होने पर स्वत:  भारत के नागरिक बन गये। 1975 में सिक्किम का भारत में विलय हुआ, अत: सिक्किमवासी नेपाली भी भारतीय मूलधारा में शामिल हे गए। उपर्युक्त सन्धियों से पहले भी हजारों की संख्या में नेपाली महाराजा रणजीत सिंह की फौज में भरती होते थे। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में असम, दार्जिलिंग, देहरादून, कलकत्ता के नेपालियों ने सक्रियता से भाग लिया था। नेताजी सुभाषचन्द्र की आजाद हिन्द फौज में नेपालियों की एक सामरिक सेनावाहिनी भी थी। कैप्टन रामसिंह ठकुरी, मेजर दुर्गा मल्ल, शहीद दलबहादुर गिरी, शहीदद्वय सावित्री थापा - इन्द्रेणी थापा के नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में श्रद्धा के साथ लिए जाते हैं।

 

दार्जिलिंग भारतीय नेपालियों का सांस्कृति गढ़ माना जाता है। दार्जिलिंग शहर की स्थापना ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने स्वास्थ्य, व्यापार और धर्म प्रचार के उद्देश्य को ध्यान में रखकर की थी। इसी क्षेत्र में नेपाली भाषा में बाइबल का अनुवाद हुआ। कैम्पवेल, मैकफार्लेन, सदरलैण्ड, टर्नबुल सरीखे पादरियों ने स्कूलों की स्थापना कर शिक्षा के प्रचार - प्रसार पर जोर दिया। लगभग एक करोड़ भारतीय नेपाली सभी को निम्नवर्गीय समुदाय माना जा सकता है। सिक्किम के भारत में विलय के बाद एकाध उच्चपदस्थ अधिकारी, मन्त्री या मुख्यमन्त्री के पदों पर पहुँचे हैं। सन् 1904 में पहली बार दार्जिलिंग में नेपाली भाषा की पढ़ाई शुरू हुई और 1916 में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने नेपाली भाषा को द्वितीय भाषा की मान्यता प्रदान की। तीन दशकों के लम्बे संघर्ष के बाद 1992 में नेपाली भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता मिलने पर इसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा मिला। वर्तमान में भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में इस भाषा का पी.एच.डी तक अध्ययन होता है।

 

भारतीय नेपाली कहानी: विकास प्रक्रिया तथा प्रवृत्तियाँ

 

भारतीय नेपाली कहानी की स्वस्थ परम्परा सन् 1920  के दशक से शुरू होती है। इसका सूत्रपात करने का श्रेय रूपनारायण सिंह, इन्द्र सुन्दास और शिवकुमार राई को जाता है। रूपनारायण सिंह की 'अन्नपूर्णा'(1927), इन्द्र सुन्दास की 'गाड़ावान' और शिवकुमार राई की 'मछली का मोल' कहानियाँ भारतीय नेपाली कथा साहित्य की प्रारम्भिक उपलब्धियाँ हैं। सन् 1940 के दशक तक कहानी - विधा में उल्लेखनीय कार्य होता रहा। सने 1920 और 1930 के दौरान देहरादून, दार्जिलिंग और वाराणसी से प्रकाशित 'गोर्खा संसार', 'खोजी','चन्द्र', 'उदय', 'जन्मभूमि' आदि पत्रिकाओं में कहानियों का प्रकाशन निरन्तर होता रहा है। सन् 1938 में नेपाली साहित्य सम्मेलन (दार्जिलिंग) से सूर्यविक्रम ज्ञवाली के सम्पादन में प्रकाशित 'कथा कुसुम' नामक कहानी संग्रह समग्र नेपाली साहित्य का प्रथम कहानी संग्रह है।

 

रोमांटिक भावभूमि, इतिवृत्तात्मकता, आदर्शोन्मुखता, निम्नवर्गीय कृषक तथा फौजी जीवन का वर्णन, भावुक प्रेम और तज्जन्य मनोविकार, रतिरागात्मक भावोन्माद, इतिहास और लोक कथाओं पर आधारित रहस्य रोमांच ही प्रथम चरण की भारतीय नेपाली कहानी की प्रवृत्तियाँ थीं।

 

सन् 1950 से 1965 तक की अवधि को भारतीय नेपाली कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। इस अवधि में कहानीकारों ने रूमानी भावुकता को धीरे - धीरे त्यागकर यथार्थ के खुरदरे धरातल पर प्रवेश किया। अबी तक बंगला, हिन्दी कहानी के प्रभाव से विकसित हुई भारतीय नेपाली कहानी आज पाश्चात्य आख्यान जगत के मनोविश्लेषणात्मक, अस्तित्ववादी चिन्तन आदि के प्रभाव और प्रेरणा से विकास की सीढ़ियाँ चढ़ती आ रही है। कहानीकार आधुनिक जीवन की बहुविध जटिलताओं को अनावृत्त करने में रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं। कथादृष्टि और प्रयोगधर्मिता की ओर भी इनका विशेष रुझान दिखाई देता है। इस अवधि के विशिष्ट कहानीकारों में इन्द्रबहादुर राई, वीरविक्रम गुरुंग, एम.एम. गुरुंग, महानन्द पौड्याल, परशुराम रोका आदि अग्रिम पंक्ति के हस्ताक्षर हैं।

 

सन् 1965 से 1980 की अवधि तक भारतीय नेपाली कहानी युगान्तरकारी परिवर्तन के दौर से गुजरी। 1975 से सिक्किम का भारत में विलय होने के बाद सिक्किम में साहित्यिक नव जागरण का सूत्रपात होता है। नेपाली भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए देश भर में संघर्ष होने लगे जिसका नेतृत्व सिक्किम ने किया। सैंकड़ों पत्र - पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगीं और हो रही हैं। कहानी विधा को इन पत्र - पत्रिकाओं से पर्याप्त प्रोत्साहन मिला। कथ्य और शिल्प दोनों में अनेक प्रयोग हुए। भारतीय नेपाली जातीय अस्मिता की तलाश, आत्मबोध, अस्तित्वबोधमूलक आंचलिक भावभूमि इस काल की कहानियों की प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं।

 

सन् 1980 का दशक भारतीय नेपालियों के लिए राजनीतिक उथल - पुथल का दशक था। साहित्यिक क्रियाकलाप में कुछ शिथिलता आई। 1992 में नेपाली भाषा को संवैधानिक मान्यता मिल जाने के बाद भारतीय नेपाली लेखक साहित्य क्षेत्र में एक नई स्फूर्ति के साथ सक्रिय होने लगे हैं। अस्सी के दशक में सिक्किम भारतीय नेपाली साहित्य के केन्द्र के रूप में उभरकर आया। काफी समय तक मौन रहने के बाद दार्जिलिंग के इन्द्रबहादुर राई ने 'लीला लेखन' नामक नए साहित्यिक चिन्तन का प्रतिपादन किया है। सभी वस्तुएँ और विचार सापेक्षित होते हैं। नितान्त निरपेक्ष अनुभूति का कोई अस्तित्व नहीं होता। उनके चिन्तन का केन्द्रीय मर्म है - विश्व सापेश्क्षता की लीला - भूमि जिसे उन्होंने अपने 'कठपुतलीको मन' नामक कहानी संग्रह में प्रतिपादित करने की चेष्टा की है।

 

विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक दबावों और विसंगतियों से जूझते रहने पर भी सृजनधर्मिता को अक्षुण्ण रखने में भारतीय नेपाली कहानीकार पीछे नहीं हैं।

 

(प्रस्तुत लेख 1996 में लिखा गया था और निर्माण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित तथा सुवास दीपक द्वारा सम्पादित अनूदित भारत ते पहले भारतीय नेपाली कहानी संग्रह 'भारतीय नेपाली कहानियाँ' में प्रकाशित है।)                         - जुलाई 2011

 

स्वाधीनता संग्राम और भारतीय नेपाली साहित्य

 

बडो दुर्लभ जानोस भारतभूमिको जन्म जनले।

सहज मिल्छन् ठाकुर हरि भजिलिय शुद्ध मनले।।

 

नेपाली साहित्य के आदिकवि भानुभक्त आचार्य ने सन 1853 में रचित भक्तमाला में भारतभूमि की महिमा और स्तुति इस प्रकार की थी। दिल्ली का लाल किला साक्षी है - मेजर दुर्गा मल्ल, कैप्टन दलबहादुर थापा प्रभृति  गोरखा सपूतों ने देश की मुक्त और स्वतन्त्रता के लिए हँसते - हँसते फाँसी के फँदे पर झूलकर अपनी शहादत दी थी। सावित्री और इन्द्रेणी सरीखी बालिकाओं ने टैंकों के नीचे सोकर भारत माता के लिए अपने प्राणों की आहुती दी थी। इस स्वाधीनता संग्राम में गोरखा जाति ने कहीं स्वाधीनता सेनानी बनकर तो कहीं आजाद हिम्द फौज के सिपाही बनकर देश के लिए युद्ध लड़े और देश के लिए बलिदान दिए। कप्तान रामसिंह ठकुरी सुभाषचन्द्र बोस की दी हुई वायलन को बजाते हुए 1943 से आजन्म गाते रहे -

 

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।

हम बुलवुलें हैं इसकी ये गुलिस्ताँ हमारा।

 

बीसवीं सदी के प्रारम्भ से ही नेपाली भाषा में विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा था। गोरखे खबर कागत, चन्द्रिका, गोर्खा सेवक, गोर्खा संसार, तरुण गोर्खा, नेपाली साहित्य सम्मेलन पत्रिका, खोजी, आदर्श गोर्खा आदि पत्र - पत्रिकाएँ भारतीय भावना के लिए राष्ट्रीयता की खोज में आगे बढ़ीं। देश की स्वतन्त्रता की चेतना और इसके प्रति आग्रह में भारतीय नेपाली लेखकों और बुद्धिजीवियों ने कलम चलानी शुरू की।

शहीद दुर्गा मल्ल ने फाँसी के तख्तो पर झूलने से पहले ये शब्द कहे थे -

 

शीश झुकाकर भारत माता

तुझको करूं प्रणाम।

 

मायादेवी (सांसद दार्जिलिंग) ने 'स्वतन्त्रता संग्राम' नामक पुस्तक, जो 1947 में प्रकाशित हुई, में 'स्वागतम्' कविता के कुछ अंश इस प्रकार हैं -

 

देशकै प्रेममै लिप्त भई जेलमै।

प्राणको प्रेमलाई त्याग गरी सेलमै।।

जीवनी सर्वदा देशकै शक्तिमा।

लिप्त भै त्याग गरी सत्यकै शक्तिमा।।

 

वीरमा वीर हौ जै जवाहरजी।

जै भनी पुत्र हौ देशका प्रिय हौ।

जै जवाहरजी सर्वदा श्रेय हौ।।

 

गोर्खा दु:ख निवारक सम्मेलन, दार्जिलिंग में स्व. दिलुसिंह छेत्री ने सन् 1947 में 'स्वाधीनता' नामक नाटक मंचित किया था। नाटकों के माध्यम से भी देशभक्ति की भावना जनसाधारण में संचार करने के लिए भारतीय नेपाली नाटककारों की उल्लेखनीय भूमिका रही है।

पुराने कवियों में पुष्पलाल उपाध्याय, हर्कजंगसिंह छेत्री, तुलसी अपतन, अगमसिंह तामांग, चन्द्रदास राई आदि कवियों ने देश भावना से ओतप्रोत विपुल साहित्य की रचना की है।

1932 में 'तरुण गोर्खा' में महात्मा गाँधी की आत्मकथा धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुई थी और 1947 में गोर्खा लीग स्मारक - पत्र में महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आदि की जीवनियाँ प्रकाशित हुई थीं।

इसी सन्दर्भ में कर्सियांग के प्रतिमानसिंह लामा का नाम भी उल्लेखनीय है जिन्होंने 1929 में 'महाकाल जासूस' उपन्यास प्रकाशित किया था जिसके प्रकाशित होते ही प्रेस से सारी की सारी प्रतियाँ जब्त कर ली गई थीं। नेपाली साहित्य के प्रथम मौलिक इस उपन्यास में शायद अंग्रेजों के शासन की क्रूरता और दमन के विरुद्ध 'महाकाल जासूस' का जन्म हुआ था। (प्रस्तोता - सुवास दीपक)                                - जून 2011

 

सिक्किम में नेपाली साहित्य: भारतीय परिप्रेक्ष्य

 

सुवास दीपक

 

सिक्किम में नेपाली साहित्य में योगदान देने वाले प्रमुख व्यक्ति

 

1947 में नेपाली साहित्य परिषद  की स्थापना से संस्थागत रूप से सिक्किम में नेपाली साहित्य के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। अपतन  के चार कवियों के अतिरिक्त अन्य कवि भी इस संस्था से जुड़े थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से इस कार्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

भारतीय स्वतन्त्रता के बाद सिक्किम में राजनीतिक सुधारों का सिलसिला शुरू हुआ। सदियों  की जमीनदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ, आम जनता के शोषण का अन्तहीन सिलसिला कुछ  हद तक समाप्त हुआ  और शिक्षा के प्रचार - प्रसार में सम्पन्न वर्ग आगे आने लगा।

 

अपतन साहित्य परिषद्  के कवियों के द्वारा लिखित कविताओं के प्रथम संकलन इन्द्रकील  का प्रकाशन सन्  1950 को हुआ। यह एक संयुक्त कविता संकलन था जिसके प्रकाशन में गंगटोक के एक अवकाशप्राप्त सरकारी अधिकारी रघुवीर बस्नेत का योगदान था। बस्नेत को सिक्किम के स्कूलों के पाठ्यक्रम में नेपाली भाषा की शुरूआत करने वाले शिक्षाविद के रूप में जाना जाता है। साहित्यकार रश्मिप्रसाद आले ने इन्द्रकील पुष्पाञ्जलि  की भूमिका में लिखा-

 

"दार्जिलिङ के एक प्रतिष्ठित ठेकेदार माथवर सिंह बस्नेत के ज्येष्ठ सुपुत्र रघुवीर बस्नेत दार्जिलिङ राजकीय विद्यालय में विद्या उपार्जन कर युवावस्था में ही सिक्किम की राजधानी गंगटोक आकर पीडब्ल्यूडी विभाग में काम करने लगे थे। अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और कार्यकुशलता का परिचय देते हुए उन्हेंने विभाग के हेड क्लर्क का सर्वोच्च पद शीघ्र ही प्राप्त कर लिया। वे सन् 1946 में सेवानिवृत्त हुए और शेष जीवन लोकोपकार में व्यतीत किया। सार्वजनिक सेवा क्षेत्र में ही उन्होंने भरपूर योगदान किया। पारमार्थिक क्षेत्र में उनका नाम उल्लेखनीय है। उनका जन्म 1888 के जून महीने की 22 तारीख को हुआ था और निधन 21 दिसम्बर 1949 को। उनकी पुण्य तिथि में इन्द्रकील पुष्पाञ्जलि के प्रकाशन का व्यय उनके ज्येष्ठ सुपुत्र धनञ्जय बस्नेत ने वहन किया था।"

 

इन्द्रकील पुष्पाञ्जलि  सिक्किम से प्रकाशित होने वाला प्रथम कविता संग्रह माना जाता है। अपतन साहित्य परिषद्  द्वारा प्रकाशित इन्द्रकील पुष्पाञ्जलि  के सम्पादकों में शिवनाथ मिश्र और तुलसी बहादुर क्षेत्री (तुलसी अपतन), सभापति हरिप्रसाद प्रधान, उपसभापति काशीराज प्रधान और मन्त्री पदमसिंह सुब्बा थे तथा मुद्रक थे नगेन्द्रमणि प्रधान, मणि प्रिन्टिंग प्रेस, दार्जिलिङ।

 

संग्रह की भूमिका में हरिप्रसाद प्रधान ने लिखा

-

यहाँ के कुछ शिक्षित युवकों के हृदयाकाश में प्राकृतिक सौन्दर्य की प्रेरणा से उनके भाव प्रकट होने लगे और वे अपतन साहित्य परिषद् नामक संस्था खोलकर कविता रचने लगे थे। कालान्तर में इस संस्था के नाम के विषय में काफी वाद - विवाद हुआ। लेकिन संस्था का मूल उद्देश्य साहित्य सेवा होने के कारण इसका नामकरण अपतन साहित्य परिषद् करने पर सहमति हुई। इन्हीं शिक्षित युवकों के सहयोग से इस संस्था के संचालनकर्ताओं के विचार में जनता भी इन कविताओं का मधुर रस पान कर सके - इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर संस्था से कविताओं के संकलन को प्रकाशित करने के क्रम में यह प्रथम पुष्प प्रकाशित करने की हिम्मत जुटाई गयी है।

 

संकलन में 43 कविताएँ हैं। 19 कविताएँ केवल तुलसी अपतन की हैं। अन्य कवि हैं - शिवनाथ मिश्र, अगमसिह तामाङ, पदमसिंह सुब्बा, चन्द्रदास राई, रामदत्तलाल ठाकुर, भूपाल लामिछाने, जयवीर सुब्बा और मनबहादुर सुब्बा।

 

अपतन साहित्य परिषद् की स्थापना सन् 1947 के अप्रैल महीने में हुई थी लेकिन यह उस समय गोप्य रूप से सर टाशी नामग्याल उच्च विद्यालय के शिक्षकों तक ही सीमित थी। भारत स्वतन्त्र होने के बाद उसी वर्ष नवम्बर महीने में सर्वप्रथम रश्मिप्रसाद आले की अध्यक्षता में यह संस्था सार्वजनिक हुई। शुरू में इसका उद्देश्य केवल नेपाली भाषा ही नहीं बल्कि तिब्बती और लेप्चा भाषाओं की उन्नति करना था। हर महीने होने वाली सभाओं में तीनों समुदायों के विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ भाषणादि भी होते थे लेकिन बोलचाल की भाषा नेपाली होने के कारण सभाओं का संचालन नेपाली भाषा में ही होता था।

 

अगमसिंह तामाङ

 

सिक्किम की पृष्ठभूमि को लेकर नेपाली साहित्य की चर्चा करते हुए विशेष रूप से कविता के क्षेत्र में अगमसिंग तामाङ का नाम पहली पंक्ति में आता है। उनका जन्म 22 नवम्बर 1925 को नाम्ची के पास बुम्टार में हुआ था। उनके जन्म लेने से पहले ही उनके पिता बहादुर लामा (तामाङ) का निधन हो चुका था। जब वे पाँच वर्ष के थे तो उनकी माँ बुद्धिमाया भी चल बसीं। इस तरह वे मातृ - पितृ स्नेह से वंचित रहे। उनका पालन - पोषण उनके दादा सनमान तामाङ की देखरेख में और फूफियों के स्नेह में हुआ।

 

उस समय सिक्किम के शासक टाशी नामग्याल थे। वे धार्मिक प्रवृत्ति के होने पर भी विभिन्न कारणों के चलते आम जनता उनके शासनकाल में अन्याय, शोषण और अत्याचार का शिकार थी। सामन्तवादी शासन की वह पराकाष्ठा थी जिसके नीचे प्रजा पिस रही थी।

 

अगमसिंह के दादा सनमान तामाङ उस समय नाम्ची क्षेत्र के मुख्तियार पद पर नियुक्त थे लेकिन जनता पर अत्याचार करने या शोषण करने के आरोप उन पर कभी भी नहीं लगे। वे साधारण प्रकार की खेती - बाड़ी से जीविका चलाते थे। वे किसी पर अन्याय या अत्याचार नहीं करते थे और न ही किसी पर हुए अत्याचार को बरदाश्त करते थे। शायद इसी का प्रभाव उनके पोते अगम पर भी पड़ा।

 

पाँच साल की उम्र में उन्हें बौद्धशास्त्र के अध्ययन के लिए टेंडोङ बौद्ध मठ में दाखिल करवा दिया गया। इस मठ में उन्होंने तीन वर्षों तक अध्ययन किया और उसके बाद उन्हें दार्जिलिङ के सन्त जोसेफ्स स्कूल में दाखिल करवाया गया। यहाँ से 1946 में उन्होंने आईए (विज्ञान) की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनकी आगे स्नातक तक पढ़ने की इच्छा थी। इसी बीच उनके दादा को पता चला कि उनका इकलौता पोता एयर फोर्स में जाने की इच्छा बना रहा है। एक दिन सुबह ही वे उन्हें ले जाने के लिए आ धमके। भारी मन से उन्हें वापिस सिक्किम आना पड़ा संयोग से उन्हें तत्काल गंगटोक के एकमात्र हाई स्कूल में शिक्षक का काम मिल गया।

 

उस समय टाशी नामग्याल हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक थे शिवनाथ मिश्र । वे साहित्यानुरागी थे। उन्हीं के अधीन काम कर रहे शिक्षक अगमसिंह तामाङ, तुलसी बहादुर क्षेत्री, पदमसिंह सुब्बा और निमा लेप्चा ने अपने - अपने नाम के पहले अक्षर से "अपतन साहित्य परिषद् " की स्थापना की।

 

अगमसिंह तामाङ का विवाह कालिम्पोंग निवासी कालूसिंह मोक्तान की सुपुत्री उपीनमाया से सन् 1950 को हुआ था। वे भी शिक्षक थीं। सन् 1961 तक दोनों गंगटोक में शिक्षक रहे। अपने जन्मस्थान नाम्ची के प्राइवेट स्कूल की दुर्दशा देखकर उन्हें अपने गाँव और समाज की सेवा करने की उत्कट इच्छा हुई और 1951 में तबादला करवाकर वे नाम्ची स्कूल में शिक्षक पर आने पर इस स्कूल को सरकारी मान्यता दिलाने में सहयोग मिला। उन्हीं के प्रयास से 1959 को यह स्कूल हाई स्कूल बन गया।

 

गंगटोक में रहते वे विभिन्न नाटकों में अभिनय किया करते थे। नाम्ची आने पर उन्होंने हरिश्चन्द्र  और कमल  नाटकों का मंचन किया और विभिन्न परिस्थितियों पर विभिन्न गीत लिखे, गाए और नृत्य प्रस्तुत किए। स्कूल के तकरीबन सभी समारोहों के लिए गीत लिखते और बच्चों को अभिनय द्वारा गाना सिखाते। उन्होंने बहुत से बाल गीत और देशभक्ति गीत लिखे जो अध्यावधि सिक्किम के विभिन्न गाँवों में गाए जाते हैं। गीतों में वे स्वयं धुन भरते और गाते थे।

 

उनका देहान्त 17 अप्रैल 1965 को हुआ। अपने पीछे वे धर्मपत्नी, चार बेटों और और एक बेटी को छोड़ गए।

 

उनके निधन का समाचार गंगटोक से प्रकाशित समाचार पत्रिका कञ्चनजङ्घा के 1 मई 1965 के अंक में प्रकाशित हुआ। तिमी - तार्कु स्थित शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में एक शोक सभा का आयोजन अपतन  के एक अन्य पदमसिंह सुब्बा, जो संस्थान के प्राचार्य थे, की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। शोक सभा में दिवंगत अगमसिं तामाङ को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। अगमसिंह तामाङ द्वारा रचित सिक्किम जननीप्रति जो एक देशभक्ति गीत था,  शोक सभा में गाकर उनका स्मरण किया गया। प्रशिक्षणार्थी आरडी राई ने स्वर्गीय तामाङ की संक्षिप्त जीवनी पर प्रकाश डाला और अन्य प्रशिक्षणार्थी तुलसीराम शर्मा ने अगमप्रति  कविता पढ़ी।

 

कञ्चनजङ्घा के सम्पादक काशीराज प्रधान ने अगमसिंह तामाङ के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए पत्रिका में पाद टिप्पणी में लिखा - वे गान्तोक की अपतन साहित्य परिषद् के निर्माताओं में से एक थे। वे एक लेखक, कवि, समाज सुधारक और एक होनहार नागरिक थे।

 

बीसवीं सदी का तीसरा दशक नेपाली भाषियों के लिए अति निर्णायक दौर रहा है। नेपाल में उस दौरान कवि शिरोमणि लेखनाथ, बालकृष्ण सम, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, सिद्धिचरण श्रेष्ठ प्रभृत्ति अनेक प्रतिभाशाली व्यक्ति साहित्याकाश में चमक रहे थे तो दार्जिलिङ में धरणीधर, सूर्यविक्रम ज्ञवाली, पारसमणि प्रधान, रूपनारायण सिंह, अच्छा राई रसिक, रामकृष्ण शर्मा प्रभृत्ति साहित्यकार सक्रिय थे। सन् 1920 में प्रकाशित धरणीधर का नेवैद्य  और उसके पश्चात 1924 को नेपाली साहित्य सम्मेलन की स्थापना ने नेपाली साहित्य के विकास को गति प्रदान की। 1938 को कथा कुसुम और 1948 को विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला का दोषी चश्मा प्रकाशित होने के बाद नेपाली साहित्य सम्मेलन के प्रयास में जून 1949 से दार्जिलिङ के चौरस्ता में आदिकवि भानुभक्त की प्रतिमा की स्थापना हुई। दार्जिलिङ पढ़ने गए युवक अगमसिंह तामाङ ने इन प्रबुद्ध व्यक्तियों के सम्पर्क में आकर भले ही कुछ ठोस काम किया हो लेकिन उस समय साहित्यिक गतिविधियों से प्रभाव अवश्य ग्रहण किया था।

 

सन् 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ और इसका प्रभाव सिक्किम पर भी अवश्य पड़ा। ऐसी स्थिति में अपतन साहित्य परिषद्  के जागरूक साहित्यकार नेपाली साहित्य की श्रीवृद्धि के द्वारा जन साधारण में सही जागरण का मार्ग प्रशस्त होने की बात से आश्वस्त थे।

 

रामदत्तलाल ठाकुर ने अरने संस्मरणों में लिखा है:

 

सप्ताह में एक बार खास तौर पर शनिवार के दिन वाक्यपूर्ति एवं प्रहेलिका का खेल खेला जाता था। एक मित्र एक वाक्य कहता, दूसरा उसी में मिलाकर लिखे चार वाक्यों से एक पद बनता था। इसी तरह एक दिन चार मित्र तुकबन्दी कर रहे थे। वाक्य लिखने वाला पहले अपने नाम का पहला अक्षर लिख देता। कविता के पद बनते जाने पर पहले लिखे नामों के अक्षरों से "अपतन" ( अ= अगमसिंह तामाङ, प= पदमसिंह सुब्बा, त= तुलसी बहादुर क्षत्री और न= निमा तार्गेन) बन गया और इस तरह कवियों द्वारा लिखे वाक्यों का पद कविता है या नहीं, इसका निर्णय शिवनारायण मिश्र और अन्य सदस्य किया करते थे। स्वतन्त्र रूप से लिखी कविताएँ और इस तरह सभी मित्रों के सहयोग से रची कविताएँ एक हस्तलिखित पत्रिका में संग्रहीत की जातीं। संग्रह का नाम रखा गया था "अमूल्य रत्न"। शिक्षक भूपाल लामिछाने की हस्तलिपि अति सुन्दर थी, वे कविताओं को "अमूल्य रत्न" में उतारने का काम किया करते थे। "इन्द्रकील पुष्पाञ्जलि" में संग्रहीत अधिकांश कविताएँ "अमूल्य रत्न" से ली गई हैं। महीने दो महीने की अवधि में होने वाले कार्यक्रमों में बाहर से अतिथियों को आमन्त्रित किया जाता था और विशिष्ट व्यक्ति को सभापति बनने का अनुरोध किया जाता था। विशिष्ट व्यक्तियों में रश्मिप्रसाद आले, हरिप्रसाद प्रधान, काशीराज प्रधान, मोतीचन्द्र प्रधान, सोनाम छिरिंग बाबू, बर्मेक राय बहादुर और सिक्किम के राजा सर टाशी नामग्याल प्रमुख होते थे। परिषद् के अनुरोध पर 1951 के आसपास नेपाल के प्रतिष्ठित साहित्यकार बालकृष्ण सम, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा और बालचन्द्र शर्मा गंगटोक भ्रमण के लिए आए थे। तिब्बती विभाग के रिंजिंग लामा और दाउछो भुटिया थे। वे अक्सर भाषण देते थे। निमा वाङदी लेप्चा और कुछ अन्य लेप्चा विभाग में थे। कभी - कभार गंगटोक बाजार के व्यापारी ख्यालीराम सिंघी भी लेप्चा भाषा में भाषण देते थे।

 

 इस तरह अपतन साहित्य परिषद् ने गंगटोक में सभी का ध्यान आकर्षित किया था। परिषद् के कवियों ने अपने नाम के साथ अपतन  लिखने की प्रतीज्ञा की थी।

 

प्रेम थुलुङ का कहना है कि अपतन  के प्रमुख हस्ताक्षर अगमसिंह तामाङ ने 1940  से 1944 तक शुरू में नाम मात्र का पारिश्रमिक लेकर नाम्ची प्राथमिक पाठशाला में नि:स्वार्थ सेवा देने के बाद गंगटोक में अपतन साहित्य के अन्तर्गत उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

एक  संस्मरण में राम अपतन ने इस लेखक को अपतन  की पृष्ठभूमि के बारे में विस्तारपूर्वक बताया था। वे बाद में खुद इस संस्था के एक अभिन्न अंग बन गए थे परन्तु जिस समय अपतन  की नींव रखी जा रही थी, उस समय राम अपतन एक जिज्ञासु नवोदित कवि के रूप में अपने शिक्षकों की साहित्यिक रचनाओं को सुनते थे। राम अपतन ने लिखा कि उन्होंने तुलसी अपतन द्वारा रचित कविता, जिसे वे एक दिन अपने कमरे में बैठे गुनगुना रहे थे, उस समय कमरे में सिर्फ दो व्यक्ति तुलसी बहादुर क्षत्री और सन्तवीर लिम्बू साहित्य की चर्चा में लीन थे। बीच में उदय  पत्रिका और उसमें प्रकाशित तुलसी बहादुर क्षत्री की कोई कविता थी। चर्चा का विषय झ्याउरे छन्द (नेपाली लोक छन्द) था। यह 1946 के किसी अपराह्न की बात है। कविता थी -

 

कलिलो कली रली र मली प्रस्फुटित हुँदछ

साहित्य रवि अपूर्व छवि उदय हुँदछ।

 

मेरी मैट्रिक परीक्षा में अभी दो - चार महीने बाकी थे। परीक्षा की ओर अनासक्त मैं साहित्य के आकर्षण से उनकी ओर खिंचा चला जा रहा था अनाहूत।

 

 - आओ, आओ सन्त, यह देखो, यह है रामदत्त। अच्छी कविता लिखता है। इसकी कविता गोर्खा पत्रिका में प्रकाशित हुई है। 'आह! तरुमा पुष्पित पुष्पलता!" कहते हुए मुक्त हंसी से कमरा और ज्यादा मुक्त होने का आभास हुआ। न तो मैं कुछ समझ पाया न सन्त (सन्तवीर लिम्बू) ही। उनकी मुक्त हँसी के रुकने के बाद मैंने साहसपूर्वक पूछा, 'सर मैं तो कविता लिखता ही नहीं, पत्रिका में कैसे प्रकाशित हुई होगी?'

'वाह!'  गोर्खा पत्रिका दिखाते हुए उन्होंने कहा, 'यह, यह किसने लिखी है? यह किसका नाम है? क्या तुम रामदत्तलाल ठाकुर नहीं हो?'

मैं हक्का - बक्का था। हां, यह सही था कि मैंने ही किसी दिन ये वाक्य गाकर सुनाए थे, लेकिन लिखकर कहीं भेजे नहीं थे। कुछ भी समय में नहीं आ रहा था और मैं मुँह बाए खड़ा था।

"लेकिन सर, यह कैसे सम्भव हुआ?

वे पुन: उन्मुक्त रूप से हँसे और कहने लगे, "तुम तो मस्तराम हो, गाते रहो, मैं छपवाते रहूँगा। सुना तुमने सन्त, परले कमरे में न जाने क्या पढ़ता रहता है, लेकिन कभी - कभी पागलों की तरह गाता है - न कोई ग्रन्थ, न किसी गायक की पंक्तियाँ। इस तरह के गीतों को लिपिबद्ध किया जाए तो काव्य हो सकता है। और आनन्द मिलता है। रामदत्त के गाते रहने पर मैंने उसकी पंक्तियों को लिख कर गोर्खा  पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया था। इसका मन पता नहीं कहीं पंख फटफटाता रहता है, इस मन पंछी को रेशमी धागे से बाँधने की आवश्यकता है।"

उन्होंने मुझे पूछा - "कौन है तुम्हारे आकाश में?  अवश्य ही कोई है लेकिन इसे ढूँढने के लिए गम्बीर चिन्तन की आवश्यकता है।"

मैंने संकोचवश कहा, " सर, ऐसी कोई बात नहीं। लेकिन पढ़ते - पढ़ते थक जाने के बाद कुछ गुनगुनाने लगता हूँ। हो सकता है, ऐसा करते कभी कोई शब्द कविता जैसे निकल पड़े हों।"

"अरे, कोई बात नहीं, मुझे इसमें आनन्द मिलता है। देखो, सन्त भी लिखता है। तुम भी लिखो, और मुझे दे दो। पंक्तियों में प्राण छिपे होते हैं। मैंने सन्त को झ्याउरे छन्द सिखाया है, तकरीबन - तकरीबन बंगला की तरह सरल छन्द की तरह छन्द है यह 5/5/6 अक्षर, बस। अच्छा, मैं अब ट्यूशन को चला, तुम भी पढ़ने में जुट जाओ।"

 

रामदत्तलाल ठाकुर बाद में एक प्रतिष्ठित कवि हुए "और छपने में आनन्द मिलता है" -  अपने मार्गदर्शक गुरु तुलसी अपतन की प्रेरणा पाकर वे कविता लिखते गए। उन्होंने लिखा -   ऐसा सोच कर में कविता लिखता गया और किशोरावस्था में उन्हीं की सेवा में समर्पित करता गया।

 

तुलसी अपतन

 

नेपाली वाङमय के सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर तुलसी अपतन का जन्म आसाम के डिब्रूगढ़ में सन् 1919 को हुआ था। उन्होंने अपनी कर्मभूमि दार्जिलिङ और सिक्किम को बनाया। वह बहुभाषी विद्वान थे जो नेपाली, बांग्ला, संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं पर विलक्षण अधिकार रखते थे। उन्होंने 1941 से छन्दोबद्ध कविताँ लिखना शुरू की। उनकी कविताओं पर धरमीधर, लेखनाथ का शैलीगत प्रभाव मिलता है।

 

सन् 1953 से वह दार्जिलिङ के सरकारी महाविद्यालय के प्राध्यापक नियुक्त हुए। दार्जिलिङ में उनकी साहित्यिक प्रतिभा को फलने - फूलने का उचित परिवेश मिला। सन् 1977 में वह उत्तर वंग विश्वविद्यालय के नेपाली विभाग के रीडर और विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए।

 

वह एक सफल नाटककार थे। कमल उनका एक प्रमुख नाटक है जो पचास के दशक में गंगटोक में मंचित किया गया था। इस नाटक का मुख्य सन्देश था - भारत के विभिन्न भागों में रहने वाले नेपालीभाषी नागरिकों को शिक्षा, साहित्य, समाज के प्रति कर्तव्यबोध कराना और जातीय बोध के साथ साथ राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना।

 

कर्णकुन्ती काव्य के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। महाभारत में वर्णित कर्ण और कुन्ती की कथा में मूल रूप में कर्ण और कुन्ती के बीच पाए जाने वाले पारस्पारिक वैचारिक द्वन्द्व को दर्शाया गया है। इस कृति में काव्यात्मक अभिव्यक्ति तथा विषयगत सन्तुलन विशेष रूप में पाया गया है।

 

सिक्किम में साहित्य जागरण में उनकी भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है। उन्हें दार्जिलिङ का नेपाली साहित्य सम्मेलन पुरस्कार (2003) और सिक्किम सरकार के सांस्कृतिक एवं धरोहर विभाग ने 2005 को भाषा दिवस (20 अगस्त) के अवसर पर एक लाख रुपये का पुरस्कार से सम्मानित किया था।

 

उन्होंने 'नेपाली साहित्य में दार्जिलिङ का योगदान' शीर्षक में शोध किया और विद्यावारिधि की उपाधि प्राप्त की। इसी शोध प्रबन्ध के लिए उन्हें सैनध्वज नन्दकुमारी पुरस्कार से नवाजा गया था।

 

उनकी प्रकाशित कृतियाँ

 

कमल (नाटक - 1953), जमाना बद्लियो (नाटक - 1957), विजय (एकांकी - 1955), संकल्प (कविता संकलन - 1956), के होला? (कविता संकलन - 1959), गीताञ्जलि (अनुवाद), न हेर आज मलाई (कविता संकलन), बापू वन्दना (कविता संकलन - 1951) तथा कर्ण - कुन्ती (खण्डकाव्य -1988)।

 

जीवन का आधा हिस्सा उन्होंने सिक्किम और दार्जिलिङ में बिताया। बाद में अस्सी के दशक से वह काठमाडौ में स्थायी रूप से बस गए थे। उनका निधन 2007 को काठमाडौ में हुआ।

 

सिक्किम से अपने सम्बन्ध के बारे में तुलसी अपतन लिखते हैं -

 

"मेरा जीवन स्वयं में एक महत्वपूर्ण कथा है। सच्ची बात कहूँ तो याद करते हुए सिर चकराने लगता है। कितना लम्बा रास्ता तय किया है, कितनी कठिन परिस्थितियों  से गुजर कर यहाँ तक आ पहुँचा हूँ। बहुत सी बातें स्मृति से लोप हो चुकी हैं।, फिर भी याद करने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरे पिता ठेकेदारी के सिलसिले में 1916 को डिब्रूगढ़ गए और 1920 को वहीं मेरा जन्म हुआ। मैं माता सावित्री देवी और पिता चुन्नीलाल की इकलौती सन्तान हूँ। 1927 को पिता का देहावसान हो गया। परिवार में मैं और माँ के अलावा और कोई नहीं था। पिता की मृत्यु के बाद हमारे परिवार को अनेक कष्टों और संघर्षों का सामना करना पड़ा। पढ़ना, पढ़ाना, लिखना और दूसरों को लिखना लिखाना ही मेरे जीवन की परिपाटी बन गई थी। शिक्षण पेशा अपना कर मैंने अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाया और आज के स्तर तक पहुँचने में समर्थ हुआ हूँ। नेपाली भाषा और साहित्य की समृद्धि के लिए मैं शुरू से ही एकाग्रचित्त होकर लगा रहा। अपनी जीवन वृत्ति के लिए शिक्षा सेवा मेरा माध्यम था और समाज में चेतना लाने और नेपाली भाषा को उन्नत बनाने के लिए साहित्य सेवा मेरा माध्यम बना। इस तरह नेपाली भाषा की सेवा, शिक्षा सेवा और साहित्य सेवा मेरे जीवन के अभिन्न अंग के रूप में रहे। मैंने सदैव इन तीनों विषयों में स्वयं स्वयं को केन्द्रित किया। डिब्रूगढ़ से मैट्रिक पास करने के बाद पहले तो मैं दार्जिलिङ पहुँचा और वहीं से शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त किया और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। वास्तव में इसी प्रशिक्षण से मेरे जीवन में शिक्षा के चौड़े राजमार्ग को पकड़ने का द्वार खुला। वैसे तो मैंने मैट्रिक भी प्रथम श्रेणी में ही पास की थी लेकिन हमारे परिवार की उस विषम परिस्थिति में यह कैसे सम्भव हुआ, मुझे हैरानी होती है। मेरे पिता के देहान्त के बाद हमारा परिवार आधारहीन हो गया था। माँ - बेटा दोनों मिलकर दूर के रिश्ते की मौसी के यहाँ पहुँचे। उन्होंने सान्त्वना दी। बहुत धैर्य धारण कर परिस्थिति का सामना किया। डिब्रूगढ़ बाजार में मौसी की एक छोटी - सी चाय की दुकान थी। हम वहीं रहने लगे। कुछ दिनों के बाद हमने अपनी चाय की दुकान खोल ली। इसके बाद ही मैंने मैट्रिक पास की थी। डिब्रूगढ़ पढ़ते हुए मेरी वर्नाकुलर बांग्ला थी।

 

"दार्जिलिङ में शिक्षण प्रशिक्ष पूरा कर मैं सिक्किम में रोजगार की तलाश में पहुँचा। मेरे शिक्षण पेशे की शुरूआत सिक्किम से ही हुई और इसी से सिक्किम के साथ मेरा सम्बन्ध जुड़ गया। यह सम्बन्ध लम्बे अरसे तक रहा और आज तक सिक्किम और नेपाली समाज को भूल नहीं पाया हूँ। नाम्ची माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक की नियुक्ति से ही मैं शिक्षण क्षेत्र में क्रमिक रूप से आगे बढ़ता गया। नाम्ची माध्यमिक विद्यालय में नेपाली शिक्षक के रूप में नियुक्ति पाई। उस विद्यालय में काशीराज प्रधान पहले से ही शिक्षक थे। उस समय रामदत्तलाल ठाकुर नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। मैंने उन्हें भी पढ़ाया। बाद में वह अपतन साहित्य परिषद् में भी शामिल हुए और क्रमश: साहित्य के प्रति उनकी रुचि बढ़ती गई। गैर नेपाली होकर भी वह नेपाली साहित्य के उपासक हैं, इसमें हम सभी को प्रसन्न्ता होनी चाहिए। नरबहादुर भम्डारी भी उस समय नामग्याल स्कूल के छात्र थे। उन्हें भी साहित्य में थोड़ी बहुत रुचि थी।

 

"उस समय तुलसीराम शर्मा कश्यप के साथ भी साहित्यिक चर्चा होती रहती थी। महानन्द पौड्याल, शोभाकान्ति थेगिम, गीता शर्मा भी किसी समय मेरे योग्य छात्र रहे हैं। पदमसिंह सुब्बा भी बाद में इसी स्कूल में शिक्षक बन कर आए। साहित्य में आस्था रखने के कारण वह भी अपतन में शामिल हुए। निमा वाङ्दी तार्गेन भी इसी स्कूल में पढ़ाते थे। रश्मिप्रसाद आले पहले से ही वरिष्ठ शिक्षक के रूप में इसी स्कूल में कार्यरत थे। इस प्रकार अपतन का स्वरूप नामग्याल स्कूल में ही निर्माण होना शुरू हो चुका था। हम स्कूल में ही बराबर मिलते रहते थे। अपनी - अपनी रचनाएँ सुनाते रहे। वातावरण बनता गया। एवंरीत से हमारी संस्था में वृद्धि होती गई। हम नियमित रूप से नेपाली साहित्य की चर्चा करने लगे। सिक्किम में साहित्यिक चेतना क्रमिक रूप से विकसित होने लगी। सिक्किम के साथ मेरा सम्बन्ध न हुआ होता तो अपतन की ऐतिहासिक भूमिका में मैं शामिल नहीं हो सकता था। यह सोचते हुए भी आज आनन्द की अनुभूति होती है।

 

"अपतन की स्थापना करते सभी प्रबुद्ध व्यक्तियों को आमन्त्रित कर संस्था की घोषणा की गई थी लेकिन हमारे निमन्त्रण पर सिक्किम के राजा और राजपरिवार के सदस्यों की उपस्थिति नहीं हो सकी।  अन्य मान्यगणों की उपस्थिति सन्तोषजनक होने के बावजूद राजपरिवार के किसी सदस्य की उपस्थिति न होने पर ऐसा लगा कि अपतन की स्थापना पर राजपरिवार प्रसन्न नहीं है लेकिन उनकी ओर से किसी प्रकार की बाधा नहीं डाली गई।

 

"अपतन की स्थापना के बाद सिक्किम में कञ्चनजङ्घा  का प्रकाशन शुरू हुआ काशीराज प्रधान के सम्पादकत्व में। उसी समय इस पत्रिका में मेरी गद्य - पद्य रचनाओं का प्रकाशन होने की मुझे याद आती है। सिक्किम में प्रतिकूल परिस्थिति में साहित्यिक संगठन का आधार अपतन साहित्य परिषद् ने ही खड़ा किया और ऐसे समय में कञ्चनजङ्घा का प्रकाशन साहित्यिक प्रतिभाओं के लिए प्रकाशन का आधार बना। ये दोनों घटनाएँ अविस्मरणीय हैं।

 

"डिब्रूगढ़ से दार्जिलिङ आते माँ को लेकर मेरे बड़े भाई (ताऊ के छोटे बेटे) का संरक्षण पाने की आशा से उनके पास गया था। आशा के अनुकूल संरक्षण भी मिला। यहीं से शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर नौकरी करने के लिए नाम्ची पहुँचा। बाद में दार्जिलिङ के सरकारी विद्यालय में पढ़ाने और नेपाली साहित्य सम्मेलन की सेवा करने का अवसर मिला। दार्जिलिङ में पहले से ही अग्रज धरणीधर शर्मा, सूर्यविक्रम ज्ञवाली और पारसमणि प्रधान द्वारा निर्मित साहित्यिक वातावरण था। सिक्किम में खुद अग्रसर होकर साहित्यिक चेतना फैलाने और वातावरण बनाने में जुटा रहा। इसी कारण भी सिक्किम के साथ अपने सम्बन्ध को कभी भूल नहीं सकता। नाम्ची में शिक्षक की नौकरी पाकर दार्जिलिङ से माँ को लेकर जब नाम्ची पहुँचा तो मुझे लगा कि अब मैं उनकी सेवा करने में समर्थ हो गया हूँ। माँ ने मुझे मैट्रिक तक की शिक्षा दिलाने और मेरे जीवन को सही दिशा में लाने में जो कष्ट सहे थे, उन्हें स्मरण करते अब मुझे लगने लगा कि मैं एक निश्चित लक्ष्य तक पहुँच गया हूँ। नाम्ची में नौकरी पाने की भी एक कथा है। फाक छिरिङ काजी उस समय नाम्ची के प्रभावशील व्यक्तियों में से एक थे। उन्हें सीधे शिक्षकों की नियुक्ति करने का अधिकार प्राप्त था। उन्हीं के माध्यम से मैं नाम्ची पहुँच पाया था। करीब तीन साल तक मैं नाम्ची के माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद पर रहा। उस समय इस स्कूल में हम तीन शिक्षक थे। उस समय मेरी तनख्वाह केवल तीन रुपये थी। आज यह याद करता हूँ तो लगता है कि यदि फाक छिरिङ काजी मुझे नाम्ची न भेजते तो क्या मैं सिक्किम में अपना सम्बन्ध स्थापित कर सकता था? नाम्ची स्कूल से ही मैं आगे बढ़ सका। गंगटोक का नामग्याल माध्यमिक विद्यालय उस समय सिक्किम का उच्च स्तर का प्रतिष्ठित विद्यालय था। राजघराने के बच्चे उस स्कूल में पढ़ते थे। गंगटोक में मैं माँ के साथ चर्च रोड में रहता था, जहाँ आज राम अपतन ने अपना निजी घर बनाया है। उस समय वहाँ सरकारी इमारत थी।

 

"गंगटोक में मेरे अभिन्न मित्र रश्मिप्रसाद आले, पदम सिंह सुब्बा और रामदत्तलाल ठाकुर थे। रामदत्त मेरे छात्र होने पर भी उन्हें मैं अपनी मित्रमण्डली का सदस्य समझता था। स्कूल से छुट्टी होते ही मैं अक्सर साहित्यिक कार्यों में जुट जाता था या मित्रों के साथ मिलने- जुलने में समय व्यतीत करता था। मित्रगण अक्सर रचना संकलन और सम्पादन का काम मुझे ही सौंपते थे। रश्मिप्रसाद आले और काशीराज प्रधान मुझे लगातार प्रेरणा देते रहते थे।

 

"सिक्किम में आज विभिन्न जातीय समुदायों के बीच सौहार्द का वातावरण विकसित हो चुका है। इसके मूल में मुझे लगता है कि अपतन की भूमिका कुछ हद तक निर्णायक रही है। सिक्किम में आज भानु जयन्ती जिस रूप में मनाई जाती है उसमें अपतन की भूमिका औचित्यपूर्ण थी। यह सोचते हुए मुझे जीवन सार्थक महसूस होता है।"

 

तुलसी अपतन की कविता - यात्रा की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए वासुदेव त्रिपाठी लिखते हैं -

 

"1 जनवरी 1920 को बारत के आसाम प्रान्त के डिब्रूगढ़ में जन्मे क्रमश: सिक्किम और दार्जिलिङ को अपनी कर्मभूमि बनाकर हाल काठमाडौ में रहने वाले डा. तुलसी बहादुर क्षत्री का जन्म - जीवन विशाल नेपाली जन जीवन के आयतन में फैला है। शिक्षा प्राप्ति के क्रम में जहाँ उन्हें बाङला भाषा का यथेष्ठ ज्ञान प्राप्त हुआ, वहीं पर उसका प्रभाव उनके साहित्यिक कृतित्व पर भी पड़ा है। शिक्षा प्राप्ति के संदर्भ में कहें तो बाङला साहित्य के अतिरिक्त अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत साहित्य से भी उनका सम्पर्क स्थापित हुआ। शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर सिक्किम में क्रमश: नाम्ची और गंगटोक के स्कूलों में सन् 1941 से 1953 के बीच उन्होंने अध्यापन कार्य किया तो उनकी साहित्यिक यात्रा भी वस्तुत: सिक्किम से ही शुरू हुई। उनके साथ सम्मिलित साहित्यिक मित्रमण्डली अपतन साहित्य परिद् (सन्1947) के रूप में एक संस्था बनी और साहित्यिक गोष्ठियों का सिलसिला शुरू हुआ। इस संस्था में सम्मिलित साहित्य प्रेमियों के नामाक्षरों के योग से बने अपतन का प्रयोग संलग्न हर कवि के नाम के पीछे जुड़ गया। इस तरह तुलसी बहादुर क्षत्री तुलसी अपतन बने। इस मण्डली को सिक्किम में आज आ रहे नेपाली साहित्य के जागरण की प्रथम मशाल बीसवीं सदी के पाँचवें दशक में ही प्रज्ज्वलित करने का श्रेय प्राप्त है। सन् 1941 के आसपास सिक्किम से छन्दोबद्ध कविता रचते और छपवाते आ रहे तुलसी अपतन की कविता जो शुरू हुई, वह आधुनिक नेपाली कविता के अनेक ऐतिहासिक पड़ावों के साथ अपने तरीके से गतिशील रहते (सन् 1988) तक जारी है। सन् 1950 में प्रकाशित इन्द्रकील पुष्पाञ्जलि  सिक्किम के अपतनों का प्रथम कविता संग्रह है और इसमें तुलसी अपतन की कविताएँ ज्यादा संख्या में हैं। नेपाली कवियों में कवि शिरोमणि लेखनाथ और धरणीधर की कविताओं से उस समय विशेष रूप से प्रभावित तुलसी अपतन की प्रारम्भिक कविताएँ वर्णमात्रिक और मात्रिक छन्दों में रची गईं और उन पर लेखनाथ, धरणीधर की परिष्कारवादी कविता धारा की उत्प्रेरणा भी पड़ी हई दृष्टिगोचर होती है।

 

सन् 1951 में उनका बापू वन्दना (महात्मा गाँधी की शोक स्मृति की पाँच छोटी और लम्बी कविताएँ) खण्डकाव्य प्रकाशित हुआ। सिक्किम प्रवास में लिखे उनके दो खण्डकाव्य छाँगु और मरुद्यान अप्रकाशित ही रहे। सन् 1953 से दार्जिलिङ सरकारी महाविद्यालय के नेपाली विभाग में प्राध्यापन में संलग्न होने रे बाद क्रमश: उन्होंने दार्जिलिङ के साहित्यिक मूल प्रवाह में सम्मिलित होना शुरू किया और उनकी इस काल की कविताओं में स्वच्छन्तावाद के तत्व भी मिलते हैं। सन् 1956 में उनका कविता संकलन संकल्प  और सन् 1959 में एक और संकलन के होला?  प्रकाशित होते हैं। दार्जिलिङ सरकारी महाविद्यालय  विभागाध्यक्ष के प्रमुख पद पर पहुँचे तुलसी बहादुर क्षत्री सन् 1979 में उत्तर बंग विश्वविद्यालय के नेपाली विभाग में सह - प्राध्यापक (रीडर) तथा विभागीय प्रमुख बने और 1985 को वहीं से सेवानिवृत्त हुए।

 

सन् 1976 में उनका कविता संग्रह न हेर मलाई  प्रकाशित हुआ।

 

डॉ. तुलसी बहादुर क्षत्री के साहित्यिक व्यक्तित्व का दूसरा विधागत पक्ष है नाट्य रचना। उनका तीन नाट्य कृतियाँ प्रकाशित हैं - कमल (1953), विजय (1955) और जमाना बद्लियो (1956)। कर्ण - कुन्ती की संवाद रचना में उनकी नाट्यकारिता का प्रभाव स्पष्ट है।

 

अध्यापन उनका पेशा रहा। उन्होंने विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय तक अध्यापन किया। नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय से सन् 1961 में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने से साथ साथ, नेपाली साहित्य के विकास में दार्जिलिङ का योगदान  विषय पर शोधकार्य कर 1979 में पीएचडी उपाधि तक प्राप्त करने वाले तुलसी अपतन की कलम लेख, निबन्ध और समालोचना पर भी बराबर चलती रही।

 

सिक्किम के साहित्यिक जागरण के अग्रदूत तुलसी अपतन मे 10 वर्षों तक नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिङ की अध्यक्षता और लम्बे अरसे तक सम्मेलन की पत्रिका दियालो का सम्पादन किया।

 

रश्मिप्रसाद आले (1892 - 1974)

 

रश्मिप्रसाद आले 1920 में तत्कालीन शासक छोग्याल के निमन्त्रण पर कर्सियांग से सिक्किम आए थे। उन्हें छोग्याल ने नेपाली बोर्डिंग स्कूल के प्रधानाध्यापक का कार्यभार संभालने के लिए आमन्त्रित किया था। कर्सियांग में वह पारसमणि प्रधान  द्वारा प्रकाशित चन्द्रिका  नामक पत्रिका के व्यवस्थापन और मुद्रण से सम्बद्ध थे। सिक्किम के स्कूलों में आधुनिक शिक्षा की प्रदान करने की छोग्याल की इच्छा थी और चूँकि आले उस समय के भारतीय नेपालियों में सबसे ज्यादा शिक्षित व्यक्तियों में गिने जाते थे, इसलिए गंगटोक के नेपाली बोर्डिंग स्कूल का कार्यभार संभालने के लिए वह पूर्ण रूप से योग्य व्यक्ति थे।

 

बाद में आले ने लिखा, "मेरी नियुक्ति 26 अप्रैल 1921 को हुई शासन की ओर से अनुदेश था कि विद्यार्थियों को अंग्रेजी और गणित में निपुण करना ताकि वे सरकारी सेवा में प्रवेश ले सकें। विद्यार्थी बड़ी उम्र के थे, यहाँ तक कि एक विद्यार्थी जब वर्णमाला सीखने आया था तो वह दो बच्चों का बाप बन चुका था। विद्यार्थी आज्ञाकारी थे और अपने शिक्षकों का बहुत आदर करते थे। शिक्षा नि:शुलिक थी। होस्टल की फीस छह रुपये प्रति माह थी।

"शिक्षा का माध्यम हिन्दी था। छात्रों को "कैट माने बिल्ली", "रैट माने चूहा" और "बैट माने चमगादड़" कुछ भी समझे बगैर रटाए जाते थे। यह विडम्बना ही थी कि एक स्वतन्त्र मुल्क के 'नेपाली स्कूल' में, जहाँ 99 प्रतिशत विद्यार्थी नेपाली और भुटिया पृष्ठभूमियों से आते थे और एक प्रमुख पण्डित के अलावा सभी शिक्षक नेपाली समुदाय से सम्बन्ध रखते थे, वहाँ शिक्षा का माध्यम हिन्दी था। मैं अपने बचपन की एक घटना को भूला नहीं था। सरदार बहादुर जंगबीर तामांग जब आसाम के नादिया में एक स्कूल के भ्रमण पर गए थे तो उन्होंने विद्यार्थियों से पूछा - "व्हाट इज अ बट्टरफ्लाई?"

 विद्यार्थियों ने तुरन्त जबाब दिया - "तितली।" जब विद्यार्थियों से पूछा गया कि तितली क्या होती है तो वे कुछ नहीं बता पाए। परन्तु जब उन्हें तितली का अर्थ नेपाली में पुतली बताया गया तो वे तुरन्त समझ गए और खुशी से उछलने लगे। जिन विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के बदले किसी अन्य भाषा के माध्यम से शिक्षा दी जाती है, उनकी कठिनाई का अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

 

"स्कूल का प्रबन्धन एक स्कूल मैनेजिंग कमेटी के अधीन था। कमेटी में 7 या 8 सदस्य थे जो सभी काजी, लामा और सम्भ्रान्त जमीनदार थे। इस कमेटी के अधिकांश सदस्यों में एक दो को छोड़कर बाकी सभी अंगूठा छाप थे। एक दो भी सिर्फ अपनी जनजातीय भाषा में केवल दस्तखत कर सकते थे। मैंने एक दिन कमेटी से हिन्दी माध्यम के कारण विद्यार्थियों द्वारा झेली जा रही समस्यायों के बारे में बातचीत की। कमेटी के विद्वान सदस्यों की राय थी कि भुटिया, लेप्चा और नेपाली विद्यार्थियों को हिन्दी में शिक्षा देना ठीक है चाहे वे इसे समझते हों या नहीं। उनकी राय थी कि विद्यार्थियों की जनजातीय पृष्ठभूमि के कारण उन्हें हिन्दी विदेशी भाषा में शिक्षा देना जरूरी है। उनके विचार थे कि इससे सभी विद्यार्थियों को समान अवसर मिलेंगे। यदि उन्हें नेपाली भाषा में शिक्षा दी गई तो वे अन्य समुदायों से संख्या में ज्यादा हो जाएँगे अर्थात नेपाली भाषियों को ज्यादा सुविधाएँ मिलेंगी। उनके विचार कुछ हक तक सही थे लेकिन जब समस्त मुल्क की सम्पर्क भाषा नेपाली थी तो उनके विचार भ्रामक ही कहे जा सकते हैं। लेकिन मेरे पास उनके साथ तर्क करने का कोई विकल्प नहीं था। इस महत्वपूर्ण बिन्दू पर उनसे इसे ज्यादा तर्क करने की गुंजाइश ही नहीं थी। दरबार को इस विषय को लेकर लिखने का भी कोई अर्थ नहीं था क्योंकि काजियों के विचारों को ही दरबार में तजरीह दी जाती थी। और बिना पूर्व अनुमति के, शिक्षा प्रणाली में कोई परिवर्तन लाना असम्भव था। इस दिशा में कोई अतिरिक्त कदम उठाने से मुझे नौकरी से हाथ भी धोने पड़ सकते थे। फिर भी मुझे विश्वास था कि देश और समाज के प्रति मेरे विचारों की आने वाली पीढ़ी अवश्य तारीफ करेगी। और मेरा यह संकल्प दृढ़ होता गया।

 

"कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। शनिवार और रविवार को छुट्टी होती थी। मैंने निश्चय किया कि इन दो दिनों मैं अपने विद्यार्थियों को नेपाली में नि:शुल्क शिक्षा दूँगा। मैंने सोचा, मेरे ऐसा करने से प्रबन्ध समिति को कोई आपत्ति नहीं होगी। किसी ने कोई आपत्ति नहीं की, बल्कि विद्यार्थियों ने नेपाली माध्यम से सीखने में बेहद दिलचस्पी लेनी शुरू की। और यह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी जिससे मुझे बहुत प्रोत्साहन मिला। अपने विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करके मैंने पहली बाधा को पार कर लिया था।  समय बरबाद किए बिना मैंने गोरखा भाषा प्रचारिणी समिति से पाठ्य पुस्तकें प्राप्त करने के लिए नेपाल सरकार के शिक्षा निदेशक को एक पत्र लिखा। वहाँ से पाठ्य पुस्तकें मंगवा कर मैंने नेपाली माध्यम से अपने विद्यार्थियों को पढ़ाना शुरू कर दिया। इस प्रकार 1921 सिक्किम में नेपाली शिक्षा की नींव रखी गई। नेपाली भाषा और साहित्य में रुचि रखने वाले अभिभावकों की सहायता से मैं संक्षिप्त रामायण, संक्षिप्त महाभारत, गोरखा पत्र और कुछ पत्र - पत्रिकाओं की व्यवस्था करने में कामजाब हुआ।"

 

आले लिखते हैं - "उस जमाने में पड़ोसी दार्जिलिङ जिले में नेपाली भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने के प्रयास किए जा रहे थे। मेरे मित्र पारसमणि प्रधान प्राथमिक कक्षाओं के लिए विभिन्न विषयों की पाठ्यपुस्तकें नेपाली में लिखने में व्यस्त थे। समय बरबाद किए बगैर तथा बिना किसी संकोच के मैंने पारसमणि प्रधान द्वारा लिखित पुस्तकें मंगवायीं और उनके माध्यम से नेपाली में पढ़ाई शुरू कर दी। इस प्रकार सिक्किम में नेपाली भाषा और साहित्य की मजबूत आधारशिला रखी गई। पहली मार्च, 1925 का दिन सिक्किम के इतिहास के लिए एक यादगार दिन है। इसी दिन भुटिया बोर्डिंग स्कूल और नेपाली बोर्डिंग स्कूलों को मिला कर सर टाशी नामग्याल हाई स्कूल की स्थापना की गई थी। प्राथमिक कक्षाओं के लिए तिब्बती पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं थीं। इस अभाव के चलते सिक्किम के सभी स्कूलों को इकलौते हाई स्कूल के निर्देशों का पालन करना पड़ता था। इस तरह सारे सिक्किम में शिक्षा का माध्यम नेपाली भाषा बनी।"

 

दार्जिलिङ में नेपाली भाषा के माध्यम से शिक्षा की शुरूआत सन् 1920 के आसपास हो चुकी थी। 1919 में पारसमणि प्रधान मैट्रिक परीक्षा के लिए नेपाली और संस्कृत भाषा पढ़ाने वाले प्रथम शिक्षक नियुक्त होने के पश्चात नेपाली व्याकरण की आवश्यकता महसूस की गई। पारसमणि प्रधान ने 1920 में नेपाली व्याकरण लिख कर प्रकाशित किया जो बंगाल सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा पाठ्यपुस्तक के रूप में स्वीकार कर लिया गया। भारत में पाठ्यपुस्तक के रूप में पहली नेपाली पुस्तक का श्रेय इसी पुस्तक को जाता है। पारसमणि प्रधान ने प्राथमिक स्तर से हाई स्कूल तक की हर विषय की पाठ्यपुस्तकें नेपाली में लिखीं। इसी बीच पारसमणि प्रधान के अनुरोध को मैकमिलन कम्पनी के लंदन कार्यालय ने नेपाली में पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित करने की अनुमति दे दी। पारसमणि प्रधान ने बाल विज्ञान, बाल भूगोल, इतिहास, अंक गणित, हस्तलेख आदि पुस्तकें लिख कर नेपाली भाषा और साहित्य की आधारशिला रखी। ये सभी पाठ्यपुस्तकें 26 अक्तूबर, 1926 की अदिसूचना सं. 4 टी.बी. के अनुसार बंगाल सरकार की राजशाही प्रेजीडेन्सी (विभाग) की प्रारम्भिक पाठशालाओं और मिडल स्कूलों की प्राथमिक श्रेणियों में पढ़ाने की स्वीकृति दी।

 

भारत में नेपाली के माध्य से शिक्षा की शुरूआत दार्जिलिङ (प. बंगाल) में 1935 से हुई जबकि 1925 में ही रश्मिप्रसाद आले के प्रयासों से सिक्किम (जो उस समय ब्रिटिश बारत के अधीन एक संरक्षित अधिराज्य था) में नेपाली भाषा के माध्यम से पढ़ाई शुरू हो चुकी थी।

 

24 जुलाई, 1918 में नेपाली भाषा को मैट्रिक, आईए और बीए की परीक्षाओं के लिए 17 वर्ष लगे। 4 जुलाई. 1935 को बंगाल सरकार ने इस आशय का आदेश जारी किया।

 

पारसमणि प्रधान (जन्म 1 सितम्बर, 1898 -निधन 2 जनवरी 1986) ने 1917 में मैट्रिक पास की और कर्सियांग में जीविका के लिए 1 सितम्बर 1917 को हरि प्रिंटिंग प्रेस के मैनेजर नियुक्त हुए। यह प्रेस सात व्यक्तियों का एक सांझा उपक्रम था और अप्रैल 1917 को चालू हुआ था। इसी प्रेस से जनवरी 1918 से चन्द्रिका  नामक नेपाली साहित्यिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ जिसके सम्पादक, प्रकाशक, मुद्रक, लेखक और व्यलस्थापक पारसमणि प्रधान ही थे।

 

इसी बीच कलकत्ता विश्वविद्यालय ने नेपाली भाषा को मैट्रिक, आईए और बीए की परीक्षाओं के लिए स्वीकृति दे दी। जिसकी अधिसूचना कलकत्ता गजट में 24 जुलाई, 1918 को प्रकाशित हुई थी। इसके बाद नेपाली विषय को पढ़ाने के लिए कालिम्पोंग की स्काटिश युनिवर्सिटीज मिशन इन्स्टीट्यूशनल के हेडमास्टर डॉ. सदरलैंड ने 16 जनवरी, 1919  को पारसमणि प्रधान को मैट्रिक तक नेपाली और संस्कृत विषय पढ़ाने के लिए प्रथम शिक्षक नियुक्त किया । बीसवीं सदी के आठवें दशक तक इस 'नेपाली व्याकरण' के अनेक संस्कर प्रकाशित हुए। नेपाली भाषा के विद्यार्थियों के लिए यह व्याकर अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ।

 

अपने शिष्यों और मित्रों में "आले गुरुबाबू" के नाम से लोकप्रिय रश्मिप्रसाद आले तकरीबन आधी सदी तक सिक्किम में एक व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक संस्था के रूप में विख्यात रहे। सिक्किम के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अधिकांश व्यक्तियों ने आले गुरुबाबू से ही शिक्षा प्राप्त की थी।

 

उनका जन्म 20 अक्तूबर, 1892 को गोआलपाड़ा, धुब्री (आसाम) में हुआ था। राजकीय उच्च विद्यालय, तेजपुर से उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की और 1913 को प्रवेशिका पास की। उस समय वह इस परीक्षा को पास करने वाले पहले भारतीय नेपाली थे। 1917 को उन्होंने गुवाहाटी कॉटन कॉलेज से स्नातक परीक्षा पास की। उसके बाद उन्होंने कुछ समय के लिए कर्सियांग में एक मुद्रणालय में प्रबन्धक के पद पर काम किया। इस मुद्रणालय से भाषाविद् पारसमणि प्रधान चन्द्रिका  पत्रिका निकालते थे जो भारत में नेपाली में प्रकाशित होने वाली पहली प्रमुख पत्रिकाओं में गिनी जाती है।

 

आले 1920 में सिक्किम आए और नेपाली बोर्डिंग हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक नियुक्त हुए। उस जमाने में समूचे सिक्किम के लिए सिर्फ दो मिडल स्कूल थे - एक नेपाली ब्वाएज और दूसरा भुटिया बेवाएज स्कूल। बाद में 1925 को इन दोनों स्कूलों को मिलाकर सर टाशी नामग्याल हाई स्कूल बनाया गया जो आज के टाशी नामग्याल एकेडेमी के परिसर में अवस्थित था। इस कार्य का श्रेय आले गुरुबाबू को जाता है। आले गुरु बाबू ने इस स्कूल में अपनी सेवानिवृत्ति (1957) तक सेवाएँ प्रदान कीं।

 

आले ने गंगटोक आने के बाद बहुत - सी बहुत - सी नई बातें सिक्किम में शुरू कीं। उन्होंने हैकनी (सवारी का साधारण घोड़ा) सिक्किम में प्रचलित किया। पहाड़ी रास्तो पर परीक्षण के लिए बाइसिकल शुरू किया। उन्होंने "लक्ष्मी ट्रेडिंग कम्पनी" नाम से एक व्यावसायिक उद्यम शुरू किया। इस उद्यम में उनके साथ दिले सिंह घले और रघुवीर सिंह बस्नेत साझेदार थे। उन्होंने पुस्तकालय, वाचनालय खोले तथा अनाथ शवों के संस्कार के लिए एक संस्था की स्थापना की।

 

सन् 1949 को रश्मिप्रसाद आले सिक्किम के पहले मन्त्रिमण्डल में एक मन्त्री की हैसियत से शामिल हुए लेकिन यह मन्त्रिमण्डल सिर्फ 29 दिनों तक ही टिक पाया। मन्त्रिमण्डल के भंग होने के बाद वह पुन: शिक्षण में संलग्न हो गए।

 

बहुभाषीय आले गुरुबाबू संस्कृत, असमिया, अंग्रेजी, बांग्ला तथा नेपाली भाषा और साहित्य में गहरा दखल रखते थे। सिक्किम से बाहर भी उनकी विद्वता की बहुत कद्र होती थी। नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिङ ने उन्हें 'दियालो दुलीचन्द स्वर्ण पदक' से सम्मानित किया था। उक्त पुरस्कार उन्हें अक्तूबर, 1970 को गंगटोक की ठाकुरबाड़ी में आयोजित एक समारोह में प्रदान किया गया था। समारोह की अध्यक्षता चन्द्रदास राई ने की थी। नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिङ के महासचिव जगत क्षत्री व्यक्तिगत रूप से उक्त पुरस्कार प्रदान करने के लिए दार्जिलिङ से गंगटोक आए थे। यह पुरस्कार दार्जिलिङ के नेपाली साहित्य के प्रमुख प्रकाशक श्याम ब्रदर्स द्वारा स्थापित किया गया था। नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिङ की पत्रिका 'दियालो' में प्रकाशित वर्ष भर की रचनाओं पर दिया जाता था। उनके एक निबन्ध के लिए 1969 के उक्त पुरस्कार के लिए चुना गया था।

 

आले गुरु बाबू अपतन साहित्य परिषद्, सिक्किम के संस्थापक अध्यक्ष थे। उन्होंने कुछेक साहित्यिक पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया, जिनमें प्रमुख थीं - 'सुनाखरी''सिक्किम साहित्यकार सम्पर्क समिति' के वह संस्थापक थे। एक धर्मनिष्ठ हिन्दू होने के नाते वह हिन्दू समाज में अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के कार अति आदरणीय थे।

 

उनका निधन 21 अप्रैल, 1974 को हुआ। उनके तीन पुत्र और चार पुत्रियाँ हैं।

उनके निधन का समाचार 'दियालो' (नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिङ, अंक 74, अप्रैल, 1974) में छपा था। समाचार इस प्रकार था - 'रश्मिप्रसाद आले नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिङ के सम्मानित सदस्य थे। उनका लेखन चन्द्रिका  पत्रिका (1918) से शुरू हुआ था। वह समाजसेवी, भाषा और साहित्य के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित व्यक्ति थे। उन्होंने समूचा जीवन नेपाली भाषा और साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में बिताया। सन् 1970 को अपने निबन्ध छ्द्मभेषमा वरदान ( दियालो के 26 वें अंक में प्रकाशित)  पर दियालो दुलीचन्द स्वर्ण पदक  प्राप्त किया था। उनके निधन पर नेपाली भाषा और साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है।'

 

सिक्किम में नेपाली भाषा और साहित्य में उनकी देन अतुलनीय और ऐतिहासिक है।

सिक्किम में रश्मिप्रसाद आले की नेपाली भाषा और साहित्य की भूमिका के बारे में अपनी टिप्पणी करते हुए अपतन साहित्य परिषद् के प्रमुख स्तम्भ तुलसी अपतन ने एक बार कहा था कि रश्मिप्रसाद आले की नेपाली भाषा सूर्यविक्रम ज्ञवाली से भी प्रांजल और परिष्कृत थी।

 

राजनारायण प्रधान लिखते हैं - 'रश्मिप्रसाद आले लेखक हैं, शिक्षक हैं और सर्वोपरि वह भाषाविद् हैं। उन्होंने ही सिक्किम में नेपाली भाषा में शिक्षा देने की व्यवस्था का श्रीगणेश किया है। 1920 में वह जब गंगटोक आए थे तो सिक्किम एक पिछड़ा मुल्क था। स्कूल में नेपाली पढ़ाने की व्यवस्था नहीं थी। या तो अंग्रेजी या हिन्दी पढ़ाई जाती थी। रश्मिप्रसाद आले ने प्रशासकों से लिखा - पढ़ी की लेकिन उन्होंने यह बात एक कान से दूसरे कान से निकाल दी। उन्होंने अपने इन्तजाम में शनिवार और रविवार को नेपाली पढ़ाना सुरू किया। एक वर्ष के बाद सरकार ने नेपाली पढ़ाने की अनुमति दे दी। इसके बाद नेपाली भाषा, साहित्य का प्रचार व प्रसार तथा विकास होने लगा। नेपाली भाषा और शिक्षा के प्रति उनका योगदान अविस्मरणीय है।

 

अपने शिक्षक जीवन की कुछ रोचक घटनाओं के बारे में उन्होंने नव - ज्योति  पत्रिका में लिखा - '1922 की एक घटना है। उस समय दिसम्बर महीने के मध्य से फरवरी महीने तक स्कू में सर्दियों की छुट्टियाँ होती थीं। घोड़े के अलावा सिक्किम में सवारी या यातायात का अन्य कोई साधन नहीं था। शिक्षकों तथा विद्यार्थियों को दूर - दराज अपने - अपने घर पहुँचने में सुविधा हो, इसलिए छुट्टी के दिन सुबह ही कक्षाएँ लगाई जाती थीं। वार्षिक परीक्षा फल विद्यार्थियों को सुनाने के बाद मीटिंग कर शिक्षकों को प्रधानाध्यापक द्वारा धन्यवाद दिया जाता था। समारोहपूर्वक पाठशाला बंद करने की परम्परा थी। ऐसी ही एक सुबह घटी घटना इस प्रकार थी -

 

'ऐसे मौके पर ये कौन - से लड़के हैं जो आपस में लड़ - झगड़ रहे हैं, जाकर देख तो!'

हेडमास्टर ने चपरासी को कहा। चपरासी ने जाकर पता किया। आकर सूचना दी - काजियों के लड़के झगड़ रहे हैं।

'क्यों, क्या बात है? उन्हें यहाँ बुला कर ला।'

 

काजियों के कुछ लड़के और कुछ और लड़के कार्यालय में आते हैं।

 

'क्या हुआ नोर्बू, क्यों झगड़ रहे हो? पूछते ही नोर्बु का चेहरा सुर्ख हो उठा। उसी वक्त थिन्ले वाङ्चुक ने कहा, "सर, इसकी जिद्द बरदाश्त के बाहर है। यह शिक्षकों को अपनी मल्कीयत समझता है। कहता है पिछले साल छुट्टियों में मैदानों की ओर जाने के लिए इसी ने घोड़ा दिया था आपको। इस साल भी आपको ले जाने के लिए कहता है कि वह ही घोड़े का बन्दोबस्त करेगा। सर, क्या आप हमारे घोड़े पर नहीं चढ़ सकते? इस बार गेल खोला तक आप मेरे घोड़े पर जाएँगे, नहीं तो मुझे दुख होगा।"

 

इस बात पर झगड़ने का पता चलने पर मेरी हैरानी की सीमा नहीं रही। मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, "बच्चों, तुम्हारी गुरुभक्ति पर मुझे खुशी है लेकिन इस बार  मैनेजर बाबू के घोड़े का इन्तजाम हो चुका है।'

यह सुन कर दोनों लड़के शान्त हो जाते हैं। मैंने कहा,  'ऐसे गुरुभक्त विद्यार्थियों का गुरु होना मेरा सौभाग्य है। हमेशा शिक्षक रह कर ही जीवन बिताने की इच्छा प्रबल हो उठी।

 

रश्मिप्रसाद आले लिखते हैं - 'सन् 1920 में सिक्किम सरकार के जुडिशियल सेक्रेटरी महामना डब्ल्यू. पाल्देन ने हेड क्लर्क अगमसिंह गिरी (दलबहादुर गिरी के बड़े भाई) यहाँ अपनी नौकरी को तिलांजलि देकर गांधी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के लिए हिन्दुस्तान जाने पर रिक्त पद पर किसी उपयुक्त पुरुषां न मिलने पर कुमार साहब ने मुझे अपने कार्यालय में आने का जोरदार आग्रह किया था। उन्होंने यह भी प्रलोभन देते हुए मुझसे कहा था - 'सिक्किम में मेरा रहने का मन नहीं है। अपनी माता की आज्ञा का उल्लंघन न कर सकने पर ही मैं यहाँ महाराज साहब की सेवा में लगा हूँ। आपको छह महीनों को अन्दर ही जुडिशियल सेक्रेटरी बना कर मैं कालिम्पोंग चला जाऊँगा।'

लेकिन अध्यापक के रूप में ही मैं देश और जाति की सेवा का दृढ़ संकल्प लेकर सांसारिक प्रपंचों से अनभिज्ञ युवावस्था में ही सिक्किम में आया होने के कारण स्वार्थपरायण बन पथभ्रष्ट होने का विचार मन में नहीं आया। 'निस्पृस्य तृणं जात्' ठान कर उनके आग्रह को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। मुझे सन्तोष है कि मेरे प्यारे शिष्य आज राज्य के विकास में लगे हैं। उनके प्रयासों को सफल हुए देख कर अगले जन्म में भी मेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी।'

 

उन्होंने सिर्फ शैक्षिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने रघुवीर बस्नेत के साथ मिल कर गंगटोक में गरीब - बेसहारा लोगों के लिए दु:ख निवारक समिति  का गठन किया था।

 

रश्मिप्रसाद आले की साहित्यिक रुचि इस बात से स्पष्ट है कि उनके विभिन्न लेख उस समय की विभिन्न साहित्यिक पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। वह एक सफल राजनीतिज्ञ भी थे। उस समय सिक्किम में काजी जमीनदारों के अत्याचार और शोषण चरम सीमा पर थे। कालो भारी, झार्लंगी, कुरुवा, बैठी आदि शोषण के विभिन्न माध्यम थे। टाशी बाबू के नेतृत्व में सिक्किम में जमीनदारी प्रथा के विरुद्ध चले आन्दोलन में रश्मिप्रसाद आले ने प्रमुख भूमिका निभाई थी।

 

सन् 1949 में आन्दोलन के बाद प्रजातान्त्रिक मन्त्रिमण्डल  के गठन होने पर रश्मिप्रसाद आले को भू - राजस्व और वन विभागों का मन्त्री बनाया गया था। लेकिन यह मन्त्रिमण्डल 29 दिनों तक ही टिक पाया। मन्त्री पद चले जाने के बाद वह फिर शिक्षण में व्यस्त हो गए।

 

विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान का सम्मान करते हुए सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रन्ट (एसडीएफ) सरकार ने 2005 को गंगटोक में आरिथांग जाने वाली सड़क को 'रश्मिप्रसाद आले मार्ग' घोषित कर उन्हें सम्मानित किया।

 

जानेमाने साहित्यकार डॉ. जगत क्षत्री रश्मिप्रसाद आले को नेपाली भाषा और साहित्य के एक अनन्य सेवक बताते हुए लिखते हैं, 'कुछ लोग किस्मत वाले होते हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में विश्व को जानकारी होती है। वे प्रशंसा पाते हैं, सम्मान पाते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके व्यक्तित्व के बारे में विश्व अनभिज्ञ रहता है। रश्मिप्रसाद आले भी ऐसे ही एक व्यक्तित्व थे जिनके योगदान के बारे में उनके जीवन के अन्तिम वर्षों में ही लोग जान पाए। कई दशकों के बाद उनका एक लेख 'झद्मवेशमा वरदान' 1969 में  'दियालो'  में छपा। और इसी लेख के लिए उन्हें 'दियालो पुरस्कार' प्रदान किया गया। 25 अक्तूबर, 1969 को इन पंक्तियों के लेखक को उनके साथ मुलाकात का सौभाग्य प्राप्त हुआ. जिसके परिणामस्वरूप 'दियालो' के अंक 34, सितम्बर, 1970 में उनके साथ ली गई भेटवार्ता प्रकाशित हुई।

 

'दार्जिलिङ में नेपाली भाषा, साहित्य, शिक्षा और समाज की प्रगति में गंगाप्रसाद प्रधान, धरणीधर शर्मा, सूर्यविक्रम ज्ञवाली और पारसमणि प्रधान का जो योगदान है, उतना ही योगदान सिक्किम में रश्मिप्रसाद आले का है। समाज ने अज्ञानतावश उनकी उपेक्षा की लेकिन वह दुखी नहीं हुए। बल्कि कहते थे,  - मैंने किया ही क्या है कि दुखी होऊँ, बल्कि लगता है कि इस सूँखट बूढ़े को इतनी गम्भीर बीमारी में क्यों जीना पड़ रहा है।

 

उनका जन्म सन् 1892 को असम के धुब्री में हुआ था। उस समय असम में नेपाली भाषा और शिक्षा का नामोनिशान नहीं था। इसलिए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा बाङ्ला भाषा में प्राप्त की। उस समय स्कूल पढ़ने वाले नेपाली विद्यार्थियों में वह और दो अन्य बालक ही थे। उन्होंने सन् 1913 में असमिया भाषा लेकर तेजपुर से मैट्रिक पास की। उसके बाद गुवाहाटी कॉलेज से आईए भी पास की और बीए तक अध्ययन किया। इस तरह उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले असम के नेपालियों में वह प्रथम थे।

 

सन् 1916 में आले दार्जिलिङ आते हैं। नेपाली भाषा पढ़ न सकने से उनके मन में खिन्नता थी। वहाँ पर वह इच्छा पूरी होती न देख वह वाराणसी चले गए। वहाँ सूर्यविक्रम ज्ञवाली, धरणीधर शर्मा और मणिसिंह गुरुङ से उनकी मुलाकात हुई। 1917 में मणिसिंह गुरुङ से मिल कर नेपाली ट्रेडिंग कम्पनी की स्थापना की। बाद में ज्ञवाली और शर्मा दार्जिलिङ और आले असम चले जाते हैं। मित्रों के आमन्त्रण पर वह पुन: दार्जिलिङ आते हैं। चन्द्रिका पत्रिका से सम्पादक पारसमणि प्रधान के स्कूल इन्सपेक्टर बन जाने पर चन्द्रिका  का दायित्व आले पर आन पड़ा।

 

1920 में कुल बहादुर प्रधान के निमन्त्रण पर वह गंगटोक आए। बाद में वह वह बोर्डिंग स्कूल में शिक्षक नियुक्त हो गए।

 

कलकत्ता से प्रकाशित अमृता बाजार पत्रिका  और स्टेट्समैन  की एजेन्सी लेकर गंगटोकवासियों को विश्व के दैनंदिन घटनाक्रम से परिचित कराने का काम भी रश्मिप्रसाद आले ने ही सबसे पहले शुरू किया था। बाद में उन्होंने नेपाल का गोरखापत्र  भी मंगाना शुरू किया था।

 

सिक्किम दरवार ने उन्हें प्रेस सुपरिटन्डेन्ट भी नियुक्त किया था लेकिन उनकी रुचि शिक्षण में होने के कारण वह पुन: में वापस आ गए थे।

 

उनकी रचनाएँ देहरादून से प्रकाशित गोर्खाली  पत्रिका में भी प्रकाशित ही थीं।

रश्मिप्रसाद आले विभिन्न संघ - संस्थाओं से सम्बद्ध थे।

 

निमा वाङ्दी टार्गेन

 

निमा वाङ्दी टार्गेन का जन्म 6 मई, 1923 को दक्षिण सिक्किम के वाक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम पासाङ टार्गेन और माता का नाम तिमीथ रोङगोङ था। निमा वाङ्दी जब बालक ही थे तो उनका परिवार कालिम्पोंग जाकर बस गया। इसलिए उनका बचपन कालिम्पोंग में बीता। गांव के स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद एसयूएमआई से उन्होंने माध्यमिक परीक्षा 1946 में पूरी की।

 

उस जमाने में मौट्रिक परीक्षा पास करना लोहे के चने चबाने की तरह था। मैट्रिक उस समय उच्च शिक्षा गिनी जाती थी। निमा वाङ्दी को मैट्रिक पास करने के बाद गंगटोक के सर टाशी नामग्याल हाई स्कूल में नौकरी मिल गई।

इसी स्कूल में तुलसी बहादुर क्षत्री, पदम सिंह सुब्बा और अगम सिंह तामाङ पहले से ही शिक्षक पद पर नियुक्त थे। इन्हीं चार शिक्षकों ने बाद में सिक्किम में नेपाली साहित्य की नींव रखने वाली संस्था अपतन साहित्य परिषद् की स्थापना की।

 

निमा वाङ्दी टार्गेन अपतन के अन्तिम हस्ताक्षर बने। वह इस कवि मण्डली में शुरू से ही सक्रिय रहे लेकिन 1948 - 49 में वह शिक्षक प्रशिक्ष के लिए दार्जिलिङ ले गए तथा 1950 से 1953 तक दार्जिलिङ के संत रॉबर्ट्स स्कूल में शिक्षक रहे। उसके बाद वह 1988 तक कालिम्पोंग के एसयूएमआई स्कूल में अध्यापक रहे और उसी वर्ष सेवानिवृत्त हुए।

 

उनका विवाह 1965 को दावा ओङमित के साथ हुआ। उस समय वह डॉ. ग्राह्म्स होम्स स्टील मेमोरियल अस्पताल में नर्स थीं। 1990 में उनका निधन हुआ।

निमा वाङ्दी टार्गेन का निधन 21 नवंबर, 2000 को हुआ। अपने पीछे वह दो बेटे, दो बेटियाँ छोड़ गए।

 

15 अप्रैल, 1997 को दक्षिण सिक्किम साहित्य सम्मेलन, नाम्ची ने अपन साहित्य परिषद् की स्वर्ण जयन्ती के उपलक्ष्यमें एक समारोह का आयोजन किया था जिसमें अपतन के दो अन्य स्तम्भों तुलसी अपतन और पदमसिंह सुब्बा का परामर्श लिया गया था। निमा वाङ्दी टार्गेन को उस समारोह में अभिनन्दित करने का कार्यक्रम था परन्तु अस्वस्थता के कारण वह समारोह में उपस्थित नहीं हो पाए थे। यद्यपि संस्था के अध्यक्ष वाङ्दी छिरिंग लामा, उपाध्यक्ष दलमान डी. गुरुंग, संयुक्त सचिव धन निर्दोष सुब्बा और कार्यालय सचिव दिलीप शर्मा ने स्वयं इच्छे बस्ती, कालिम्पोंग जाकर अपतन साहित्य परिषद् के एक स्तंभ निमा वाङ्दी टार्गेन का अभिनन्दित किया था।

 

रामदत्तलाल ठाकुर (राम अपतन)

 

अब जागी उठ्यो आशा, सद्साहित्यिक अभिलाषा

आमा आमा आमा पूर्ण गर्नेछौं, त्यो तिम्रो अभिलाषा

 

अब भाषा फुलोस् फलोस् अनि परिमल मृदु छरोस्

साहित्य सुधा छर्की खोलोस् प्रेंको परिभाषा।।

 

उपरोक्त गीतांश अपतन साहित्य परिषद् के गीत से लिया गया है। परिषद् का यह गीत "अब जाग उठे हैं हम, कुछ करके दिखा देंगे" नामक हिन्दी गीत का सिर्फ भावानुवाद ही नहीं, इसकी लय भी ठीक उसी गीत से ली गई थी तथापि वर्ष 1947 से अपतन साहित्य परिषद् के विघटन होने तक हर साहित्यिक गोष्ठी इसी गीत से प्रारम्भ होती थी। इस गीत को गाते स्वभाव से चंचल राम अपतन आज भी अभिभूत हो उठते हैं। आत्मविभोर होकर किसी गीत को गुनगुनाते रहना उनका स्वभाव आज भी बरकरार है। पदमसिंह सुब्बा अपतन लिखते हैं कि परिषद् के विघटन के इसका केवल नाम ही शेष रहा लेकिन परिषद् के वचनबद्ध सदस्यों ने अपनी रचनाए प्रकाशित करते अपने नाम के साथ "अपतन" उपनाम लिखना जारी रखा और कतिपय सदस्य अभी भी लिख रहे हैं। ऐसे सदस्यों में तुलसी अपतन और राम अपतन उल्लेखनीय हैं।

 

महानन्द पौड्याल लिखते हैं, "अपतन साहित्य परिशद् की कोश से जन्मे सभी कवि कालान्तर में विलुप्त हो गए, उनकी लेखनियाँ निष्क्रिय हो गईं, बचा है केवल एक सुपुत्र राम अपतन के नाम से। चार दशकों की अवधि में अनेक आँधियाँ आईं, काले बाल सफेद हो गए, लेकिन राम अपतन एक शिक्षक के रूप में जीवित रहे, एक कवि के रूप में गाते रहे, नाचते रहे।"

 

राम अपतन का जन्म बिहार राज्य के बैशाली जिले में 1 मार्च 1928 को हुआ था। उनके पिता थे रामचरित्र ठाकुर जो गंगटोक राज दरबार के हेड कारपेन्टर थे। उनकी माता का नाम था सुखावर्ती देवी।

प्रवेशिका तक शिक्षा प्राप्त राम अपतन ने 1947 से 1989 तक सिक्किम के विभिन्न स्कूलों में अद्यापन किया।

 

उनकी कृतियाँ हैं - 1. राम अपतनका केही कविता (1989), 2. ए कलम तिम्रो मुख धोएर आएको छु (कविता संग्रह - 1993) तथा 3. खहरेको आत्मकथा।

राम अपतन को उनकी नेपाली भाषा और साहित्य की दीर्घकालीन सेवा के लिए सिक्किम का भानु पुरस्कार प्रदान किया जा चुका है। इसके अलावा उन्हें राज्य शिक्षक पुरस्कार तथा सिक्किम सरकार के सांस्कृतिक एवं धरोहर विभाग द्वारा एक लाख रुपये के सम्मान से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।

 

पदमसिंह सुब्बा अपतन

 

पदम सिंह सुब्बा का जन्म 11 सितम्बर, 1923 को पश्चिम सिक्किम के टिम्बरबुङ गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम था मण्डल तिलक सिंह सुब्बा और माता का नाम ता मोजिमा सुब्बा।

सोरेंग स्कूल से पाँचवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के समय उनकी उम्र 14 - 15 साल की थी। शिक्षाप्रेमी फाक छिरिङ ी द्वारा दार्जिलिङ की भुटिया बस्ती में स्थापित यंगमैन बुद्धिस्ट एसोसिएशन के बोर्डिंग स्कूल में वह छठी कक्षा में दाशिल हुए और 1938 में छठी कक्षा उत्तीर्ण कर सातवीं कश्क्षा के अध्ययन के लिए दार्जिलिङ के गवर्नमेंट हाई स्कूल में दाखिल हुए। इस स्कूल में सूर्यविक्रम ज्ञवाली, धरणीधर कोइराला और पारसमणि प्रधान जैसे भाषाविद् और साहित्यकार शिक्षक थे। इन शिक्षकों ने नेपाली भाषा और साहित्य के प्रति पदम सिंह सुब्बा में रुचि जागृत कर दी। इन शिक्षकों द्वारा संचालित भाषा और साहित्य सम्बन्धी विभिन्न कार्यकलापों के कारण पदम सिंह सुब्बा के हृदय में साहित्य के प्रति अभिरुचि जागृत हुई। फलस्वरूप नवीं और दसवीं कक्षा में उन्होंने अपने सहपाठियों से मिल कर "प्रकाश" नामक एक हस्तलिखित पत्रिका निकाली।

 

सुब्बा ने दार्जिलिङ के सरकारी उच्च विद्यालय से सन् 1944 के मार्च महीने में मैट्रिक की परीक्षा पास की और आईए के अध्ययन के लिए कालिम्पोंग के एसयूएमआई स्कूल में प्रवेश लिया। दो वर्षों का आईए का अध्ययन 1946 को समाप्त हुआ। इसी वर्ष अगस्त महीने में वह सर टाशी नामग्याल हाई स्कूल में शिक्षक नियुक्त होते हैं। इस स्कूल में उनेहोंने 1955 तक काम किया और इसी वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री प्राप्त की।

 

उनका विवाह 1945 को उस समय हुआ जब वह आईए के छात्र थे। उनका विवाह सिक्ताम (पश्चिम सिक्किम) निवासी वाङहाङ सुब्बा की सुपुत्री सरुहाङ के साथ हुआ। 34 वर्ष के सुखमय दाम्पत्य जीवन में उनके दो पुत्र और एक पुत्री हैं। पत्नी का निधन 1983 को हुआ।

 

शिक्षक प्रशिक्षण के लिए उनका चयन होने पर उन्हें दो वर्षों के लिए वर्धा जाना पड़ा। उस समय वर्धा मध्यप्रदेश में था। 1957 में शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर वह सिक्किम वापस आ जाते हैं। इसी बीच दक्षिण सिक्किम की तेमी बस्ती में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना हो चुकी थी। उन्हें इस संस्थान के प्राचार्य के पद पर सिक्किम सरकार ने नियुक्त किया। 1960 तक इस संस्थान में रहने के बाद वह  नाम्ची हाई स्कूल के प्रधानाचार्य नियुक्त हुए। चार वर्षों तक इस स्कूल में रहने के बाद वह पुन: शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में स्थानान्तरित हुए। एक वर्ष के बाद उन्हें सिक्किम सरकार के विकास विभाग में विकास अधिकारी के पद पर गंगटोक में नियुक्त कर दिया गया। इसी से उनकी शैक्षणिक वृत्ति समाप्त होती है और प्रशासनिक वृत्ति आरम्भ होती है।

 

1955 तक शिक्षक के रूप में गंगटोक में सर टाशी नामग्याल हाई स्कूल में शिक्षक थे तो उनका सम्पर्क तुलसी बहादुर क्षत्री, अगम सिंह तामाङ और निमा वाङ्दी टार्गेन से हुआ और इन चार साहित्यप्रेमियों के प्रयास से अपतन साहित्य परिद् का गठन हुआ। अपतन के वह "" बने।

 

वह कहते हैं, "मैं कोई साहित्यिक, लेखक या कवि नहीं था, हूँ भी नहीं। सिर्फ इतना है कि मेरी कोशिश मित्रों का हौसला बढ़ाना था।"

 

यह तो उनकी विनम्रता की एक मिसाल है।

 

नेपाली साहित्य में उनके योगदान का मूल्यांकन होना अभी बाकी है। उनकी रचनाएँ आधी सदी से प्रकाशित विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं जिन्हें ढूँढ पाना एक कठिन काम है। उन्होंने खुद इस दिशा में कोई रुचि नहीं दिखाई। किसी पत्रिका ने रचना मांगी, भेज दी, छप गई, बस।

 

पदम सिंह सुब्बा विकास अधिकारी से सिक्किम सरकार के कैबिनेट सचिव तक के ऊँचे प्रशासनिक पद पर पहुँचे।  प्रशासनिक सेवाओं के लिए उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा पद "आईएएस" भी प्रदान किया गया।

 

एक सामान्य शिक्षक से प्रथम श्रेणी के प्रशासनिक पद से सुब्बा 1 मार्च, 1984 को सेवानिवृत्त हुए।

पदम सिंह सुब्बा अपतन ने नेपाली के अलावा अपनी मातृभाषा लिम्बू में साहित्य रचना की। वह लिम्बू भाषा के पहले उपन्यासकार हैं। उनके उपन्यास पर एक लिम्बू चलचित्र का निर्माण भी हो चुका है। वह लिम्बू भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे। उन्होंने लिम्बू भाषा के शब्दकोश और पाठ्यक्रम निर्माण में ऐतिहासिक योगदान दिया।

 

उनकी निधन 2010 को गंगटोक में हुआ।

नेपाली और लिम्बू भाषा तथा साहित्य से जुड़ी अनेक संस्थाओं ने उनके निधन पर गहरा शोक प्रकट किया।

 

कृपाशाल्याण राई

 

सिक्किम के वरिष्ठ कवि और साहित्य सम्पादक केदार गुरुंग के अनुसार जिस तरह 1895 को हिमाचल प्रदेश के भागसू (धर्मशाला) अन्तर्गत तोतारानी गाँव में जन्म लेकर 1946 तक जीवित रह कर मित्रसेन थापा (मास्टर मित्रसेन) ने भजन, आरतियाँ, झ्याउरे गीत, नाटक तथा रूपान्तरण साहित्य लेखन तथा विभिन्न धार्मिक पुस्तकों, वेदों, पुराणों और शास्त्रों का अध्ययन, मनन और चिन्तन कर उनका नेपाली भाषा में भावानुवाद कर नेपाली जाति के उत्थान और उत्तरोत्तर विकास के लिए जितनी सृजना की और योगदान कर उपकार किया, ठीक वैसे ही, चाहे उतने परिमाण में न भी हो, लेकिन तत्कालीन सिक्किमी जनजीवन को अशिक्षा, दमन और शोषण से मुक्त करने के लिए कृपाशाल्याण राई ने 25 जून ,1920 को टिम्बरबुङ में हर्कवीर राई और लालमति के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जन्म लिया था

 

लेकिन उनके पिता के असामयिक निधन के बाद उस जमाने में सामन्ती शोषण को सहन न कर सकने से उनकी माँ ने अपनी सारी जमीन - जायदाद अपने मैके वालों को सौंप कर अपने चार छोटे - छोटे बच्चों को लेकर दार्जिलिङ की पुबोङ चाय बागान का रुख किया और वहाँ मजदूरी कर बच्चों को पालने लगी। किशोर कृपाशाल्याण को भी माँ का हाथ बंटाना पड़ा और दस पैसे की दिहाड़ी पर मजदूरी करनी शुरू कर दी और रात्रि पाठशाला में तीन - चार सालों तक पढ़ाई करता रहा। उसके बाद आठ - दस विद्यार्थियों को लेकर ट्यूशन कर अपने छोटे भाई - बहनों के भरण - पोषण में माँ की सहायता करता रहा। किशोर कृपाशाल्याण के मन में उच्च शिक्षा हासिल करने की उत्कठ अभिलाषा थी। यही इच्छा बालक कृपाशाल्याण को दार्जिलिङ की भुटिया बस्ती में सिक्किम के शिक्षाप्रेमी और समाजसेवक फाक छिरि द्वारा स्थापित यंगमैन बुद्धिस्ट एसोसिएशन स्कूल तक ले गई। वहाँ पर किशोर कृपाशाल्याण को होस्टल में बतौर रसोइया रख लिया गया। वह यह काम करते हुए अपनी पढ़ाई भी करता रहा और छठी कक्षा तक पढ़ाई पूरी कर सकने में सफल हुआ। किशोर कृपाशाल्याण की उच्च शिक्षा प्राप्त करने की अभिलाषा पर उस समय तुषारापात हो गया जब 1943 को अचानक फाक छिरिङ  का निधन हो गया। कृपाशाल्याण के लिए फाक छिरिङ  एक अभिभावक थे। उनके न रहने से कृपाशाल्याण को आगे पढ़ने का विचार त्यागना पड़ा।

 

स्कूल से निकल कर उन्होंने सिक्किम का रुख किया। और सोरेङ (पश्चिम सिक्किम) की एक सामाजिक संस्था द्वारा स्थापित पाठशाला में पढ़ाने लगे। 1945 से 1951 तक उन्होंने आसपास की विभिन्न पाठशालाओं जैसे माङसारी, गेजिङ, हिगाँव, कलुक, दोदक और लुङचोक में पढ़ाया और 1952 तक दरमदिन पाठशाला के सचिव की हैसियत से पाठशालाओं की स्थापना कर शिक्षा की ज्योति फैलाने और स्वयं पुस्तकें लिख कर, उन्हें प्रकाशित कर समाज कल्याण के कार्य में जुट गये।

 

'आफै भावी' पुस्तक उन्होंने 1946 - 47 में ही लिख दी थी लेकिन इसका प्रकाशन 1949 में ही हो सका। कलपन्ता स्कूल संचालन समिति चाखुङ के अध्यक्ष मण्डल तिलबहादुर गुरुंग, उपाध्यक्ष वीरधोज गुरुंग, सचिव डिकवीर क्षत्री और सहायक सचिव रणधोज राई के अनुसार कृपाशाल्याण राई परशुराम के छद्म नाम से लेख लिखते और छपवाते थे। सिक्किम के वरिष्ठ नागरिक स्व. रामजीवन प्रसाद ने आफै भावी के बारे में यह लिखित बयान दिया था - सर्व साधारण के लिए यह सचमुच एक हिकारी पुस्तक है। मुझे पूरा विश्वास है कि इस पुस्तक के प्रकाशन से जनता के सामाजिक जीवन में अपार लाभ पहुँचेगा।

 

इस पुस्तिका के विभिन्न अध्यायों में शिक्षा, नैतिकता, अत्याचार, शोषण और दमन के विरुद्ध जागरण का सन्देश पाया जाता है। उनकी दूसरी पुस्तक का नाम है - सबै धर्मको सार । यह पुस्तिका 1954 को प्रकाशित हुई। तीसरी पुस्तक है - शाल्याण योग जो 1954 में ही प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक योगाभ्यास से सम्बन्धित है। चौथी पुस्तक नित्याचार (1956 में प्रकाशित) में पूजा - पाठ, ध्यान और योगाभ्यास की विधियों की व्याख्या की गयी गै। इस पुस्तक में प्रकाशित कुल 40 रचनाओं में आठ रचनाएँ अन्य लेखको द्वारा लिखित कविताएँ, कहानियाँ और निबन्ध भी शामिल हैं। कृपाशाल्याण राई की दो सामाजिक कहानियाँ भी हैं।

 

नित्य कर्म उनकी पाँचवीं पुस्तक है जिसमें सवाई कविता भी शामिल है। यह पुस्तक 1961 - 62 के बीच लिखी गयी थी।

 

कृपाशाल्याण राई समाज सुधार के प्रबल समर्थक और अस्पृश्यता के कट्टर विरोधी थे। उनकी प्रकाशित छठी पुस्तक छुताछुत निर्णय (1964 में प्रकाशित) में अस्पृश्यता पर व्यापक प्रकाश डाला गया है।

 

कृपाशाल्याण राई मे राई समुदाय की भाषा और लिपि पर मदत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने राई शब्दकोश का का निर्माण कई वर्षों के कठिन परिश्रम से किया था लेकिन उनके जीवित रहते वह प्रकाशित नहीं हो पाया। कृपाशाल्याण राई की कविताएँ, कहानियाँ और फुटकर लेख भी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में बिखरे पड़े हैं।

 

1988 में उन्हें नेपाली साहित्य सम्मेलन, सिक्किम (अब नेपाली साहित्य परिषद्) द्वारा नेपाली साहित्य में उनके दीर्घकालीन योगदान का सम्मान करते हुए भानु पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

 

स्रष्टा पत्रिका के सम्पादकद्वय केदार गुरुंग तथा उपमान बस्नेत ने भानु पुरस्कार द्वारा पुरस्कृत होने पर उनका एक विस्तृत इन्टरव्यूह लिया था जो परिशद् द्वारा भानु जयन्ती के अवसर पर प्रकाशित भानु स्मारिका में प्रकाशित हुआ था।

केदार गुरुंग लिखते हैं -

 

"स्वर्गीय कृपाशाल्याण राई से मेरी पहली मुलाकात 1966 - 67 को गेजिङ बाजार के नये बाजार स्थित तत्कालीन दूरभाष कार्यालय या पुलिस विभागीय कार्यालय में हुई थी। उन्होंने मुझे बाजार में फिसलन - भरे रास्ते से जाते हुए देखकर बुलाया था। वह उस समय एक चबूतरे पर बैठे थे।

 

"आप कहाँ रहते हैं? एक मिनट के लिए ऊपर आ सकेंगे?" कहने पर मैं उनके पास पहुँचा। मैंने उनसे उनका परिचय पूछा तो उन्होंने अपने झोले से आफै भावी और छुताछुत निर्णय किताबें निकाल कर एक एक प्रति खरीदने का अनुरोध करते हुए अपना परिचय दिया था। उस समय वह दाढ़ी - मूँछें नहीं रखते थे।...उन किताबों को मैंने आद्योपान्त पढ़ा और जतन के साथ रखा लेकिन उनके साथ 1967 से 1988 के अगस्त महीने तक कहीं मुलाकात नहीं हुई। खोज - तलाश करने पर कोई कहता कि चुम्बुङ के धाम में पुजारी बन बैठे हैं तो कोई कहता कि दरमदिन (पश्चिम सिक्किम) के किसी कोने में कुटिया बना कर बैठे हैं।"

 

केदार गुरुंग लिखते हैं -

 

 '1988 के जून महीने के तीसरे सप्ताह आकाशवाणी गंगटोक से समाचार सुना कि दरमदिन निवासी वयोवृद्ध लेखक श्री कृपाशाल्याण राई को इस वर्ष के भानु पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा नेपाली साहित्य सम्मेलन की निर्णायक समिति ने की है तो मेरे हर्ष की कोई सीमा नहीं रही। दो तीन दिनों के बाद समाचार - पत्रों में इस आशय के समाचार छपे। उनके परिचय के साथ चित्रधर हृदय, लेखनाथ, धरणीधर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर की तरह धवल और पतली दाढ़ी - मूँछों वाले कृपाशाल्याण राई का चित्र छपा देखकर लगा कोई तपस्वी ऋषि - मुनि हैं। लेकिन दो दशक पहले वाले सफाचट चित्र से इस चित्र को मिलाकर यह भ्रम भी हुआ कि क्या यह वही कृपाशाल्याण राई ही हैं!"

 

उस इन्टरव्यू में कृपाशाल्याण राई ने कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त करने के बारे में बताया, "पिता का देहान्त हो चुका था। सिक्किम में उस समय जनसाधारण पर सामन्तीय शोषण अपनी चरम सीमा पर था। आम नागरिक पर अनेक प्रकार के यातनामय कर लगाए गए थे जिन्हें चुकाते - चुकाते आम जनता सामन्तों की गुलाम बन जाती थी। पिता का साया सिर से उठ चुका था। माँ थीं और चार छोटे - छोटे भाई - बहन जिनका भरण - पोषण उन परिस्थितियों में सिक्किम में न होते देखकर माँ ने हमारी जितनी जमीन - जायदाद थी, उसे अपने मायके वालों को सुपुर्द कर हमें दार्जिलिङ की पुबोङ चाय बागान ले आईं और मजदूरी कर बच्चों को पालने लगीं। मैं स्वयं दस पैसे की दिहाड़ी पर लग गया। उस समय चाय बागानों में श्रमिकों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए रात्रि पाठशाला की व्यवस्था थी। मैं उस पाठशाला में रात को पढ़ने लगा। यह पाठशाला मिशनरियों द्वारा चलाई जाती थी। इस पाठशाला से मैंने दो सालों तक शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद तीन - चार वर्षों तक मासिक ट्यूशन पर पढ़ाने लगा। आगे पढ़ने की अदम्य इच्छा थी। सिक्किम के समाजसेवी और शिक्षाप्रेमी फाक छिरिङ काजी ने दार्जिलिङ की भुटिया बस्ती में यंगमैन बुद्धिस्ट एसोसिएशन की स्थापना की थी। वहाँ के छात्रावास में मुझे रसोइये का काम मिल गया। यह काम करते हुए मैंने छठी कक्षा तक पढ़ाई पूरी की। लेकिन इससे आगे पढ़ना मेरी किस्मत में नहीं लिखा था। जनवरी 1943 को मेंरे अभिभावक फाक छिरिङ काजी का अचानक निधन हो जाता है।"

 

दार्जिलिङ से सोरेङ आकर उन्हें स्कूल में शिक्षक की नौकरी मिल जाती है। यह 1943 की बात है। 1945 से 1951 तक माङसारी, गेजिङ, हिगाँव, कलुक, दोदक तथा लुङचोक आदि स्कूलों में शिक्षक रहे। 1952 तक दरमदिन स्कूल के सहायक सचिव और उसके बाद सिक्किम में शिक्षा का व्यापक प्रचार - प्रसार करने के लिए स्कूल खोलने के अभियान में तथा पुस्तकें लिखने में जुट जाते हैं।

 

धर्म और योग की ओर आकृष्ट और प्रवृत्त होने का कारण बताते हुए राई कहते हैं, "योग की ओर आकृष्ट होने का कारण था शिव महापुराण, गीता, सुखसागर और अन्य पुराणों के अध्ययन से मुझे पता चला कि योगाभ्यास से अपार ऊर्जा और शक्तियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। हम अनेक ऐसे सिद्ध पुरुषों का उल्लेख शास्त्रों में पाते हैं जिन्होंने योगाभ्यास से चामत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त की थीं। मुझे ये बातें शुरू में असम्भव दिखती थीं जिसके कारण मैं दुविधा में रहता था। बाद में गम्भीर अध्ययन से पता चला कि योगाभ्यास से विलक्षण कार्य सम्पन्न हो सकते हैं। इसलिए मैं योग की ओर प्रवृत्त हुआ। यहाँ तक धर्म का प्रश्न है योगाभ्यास के द्वारा राजसी और तामसी इच्छाएँ स्वत: सिद्ध होती हैं। योग की शक्ति और महत्व के बारे में जितनी जानकारी मैं हासिल कर सका, उतना ही इस ओर प्रवृत्त होता गया।"

 

धार्मिक और सामाजिक कार्यों में कृपाशाल्याण राई ने नि:स्वार्थ योगदान किया है। नित्य कर्म और सबै धर्मको सार और नित्याचार नामक तीन पुस्तिकाओं की आठ हजार प्रतियाँ वितरित कीं। आफै भावी और छुताछुत निर्णय  पुस्तिकाओं की 6000 प्रतियाँ छपवाकर प्रचार किया। इसी तरह शाल्याण योग और राई अक्षरको वर्णमाला की चार हजार प्रतियाँ छपवाकर प्रचार किया। उन्होंने इन पुस्तकों के माध्यम से धार्मिक और सामाजिक उत्थान का अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रयत्न किया।

 

आज से छहह दशक पहले सिक्किम में समाज सुधार का कार्य इतना सरल नहीं था। उसमें विकट समस्यायों का सामना करना पड़ता था। कृपाशाल्याण राई का कहना है कि उस जमाने में साहित्य को लेकर निरुत्साहित करने वालों का संख्या ज्यादा होती थी। इने - गिने लोग ही शिक्षा और साहित्य में रुचि रखते थे। उस जमाने की मानसिकता इस प्रकार था - "शिक्षित लोग चोर होते हैं, महिलाएँ वेश्याएँ और डाइनें होती ही हैं, न पढ़ने पर भी किस्मत में हो तो नौकरी मिल जाती है।" इसी मानसिकता के प्रत्युत्तर में उन्होंने आफै भावी पुस्तक लिखी। एक विचित्र घटना के बारे में वह बताते है, "1961 में मैं नित्य कर्म पुस्तका की बिक्री के लिए कालिम्पोङ गया। हाट बाजार में इसका खूब प्रचार किया। एक आदमी धुत्त होकर मेरे पास आया और मेरी कमीज का कॉलर पकड़कर कहने लगा - इस किताब को यहाँ से हटा। उसी वक्त एक 28/29 साल की महिला ने उसी तरह उस शराबी की कॉलर पकड़कर कहा - तू यहाँ से फूट और किताब बेचने दे। और उसे दस - पन्द्रह फीट पीछे धकेल दिया। और फिर मुझसे कहा - आप बेफिक्र होकर किताब बेचिए। इसके अलावा और कोई कुछ कहे तो मुझे बताएँ - मेरी सब्जी की दुकान वहाँ पर है। .. और वह अपनी दुकान की ओर चल दी। मेरे ऊपर आई इस आकस्मिक मुसीबत में मेरी रक्षा करने वाली उस भद्र महिला के बारे में जानने की इच्छा हुई और मैं उसकी दुकान पर जा पहुँचा। कहा, आपने मुझे इस मुसीबत से बचाया, आपका परिचय जानने की गुस्ताखी कर सकता हूँ?"

 

उस महिला ने कहा, "में पुलिस इन्सपेक्टर की पत्नी हूं।"

 

नित्य कर्म की एक प्रति हाथ में लेकर मैंने कहा, "मैं आपके इस उपकार का मूल्य तो नहीं चुका पाऊँगा, फिर भी यह पुस्तिका आपको उपहार के रूप में देना चाहूँगा।"

 

लेकिन कृपाशाल्याण राई का यह जानकर आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि उस पुस्तक को वह भद्र महिला पहले ही पढ़ चुकी थीं। वह नमस्कार करके वापस आ गए। कृपाशाल्याण राई आजन्म उस महिला के प्रति कृतज्ञ रहे और उसे अपनी माँ के रूप में स्मरण करते रहे।

 

कृपाशाल्याण राई का विचार था कि साहित्य से ही राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में जागरूकता लाई जा सकती है और और जमाने में सिक्किम में व्याप्त विभिन्न प्रकार की बन्धुवा मजदूरी, विभिन्न करों के आम जनता पर पड़ने वाले बोझ और शोषण से मुक्ति पाई जा सकती है। उस जमाने में सामन्तीय शोषण अपनी चरम सीमा पर था। दार्जिलिङ में चाय बागानों की स्थिति और भी बदतर थी। कृपाशाल्याण राई कहते हैं कि जब वह किशोरावस्था में अपनी माँ के साथ दार्जिलिङ की चाय बागान में जीविका के लिए पहुँचे तो देखा कि समुद्र पार के एक अंग्रेज से बागान के हजारों श्रमिक थर थर काँपते थे। सिक्किम में भी उत्पीड़न और दार्जिलिङ में भी। ऐसी स्थिति को देखकर वह गम्भीरतापूर्वक सोच में पड़ गए। शिक्षा ही एक ऐसा मार्ग था जिससे वह अपने लोगों को जागृत कर सकते थे। अनेक कष्ट उठाकर वह रात्रि पाठशाला में पढ़ने लगे। दिन को मजदूरी करते। फाक छिरिङ  उस जमाने में बिना किसी जातीय भेदभाव के सिक्किम से आने वाले युवकों को शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। वह कृपाशाल्याण राई के अभिभावक बने और उन्हीं की बदौलत वह शिक्षा प्राप्त कर सके।

 

योग पर वह केवल विश्वास ही नहीं रखते थे बल्कि अनेक वर्षों तक उन्होंने अपनी कुटिया रहकर अष्टांग का अभ्यास किया। वह कहते हैं कि योग की बातें करने मात्र से कुछ हासिल नहीं होता। वेदों और पुराणों में ज्योति की बातें कही गई हैं। बातें करने मात्र से अंधकार नहीं मिटता। अष्टांग योग साक्षात ज्योति है अर्थात् अभ्यास से सर्व विश्व का बोध होता है।

 

राई भाषा की लिपि

 

कृपाशाल्याण राई ने सन् 1969 के दौरान राई लिपि का प्रचार किया और साइक्लोस्टाइल कर दो हजार प्रतियाँ बाँटीं। इस लिपि को नेपाल में कैते लिपि कहा जाता है। राई अक्षर स्थानीय हैं। अनुमान लगाया जाता है कि वाल्मीकि ने जिस लिपि में रामायण और भृगु ने भृगु संहिता, ज्योतिष शास्त्र लिखे, वह कैते लिरि हो सकती है।

 

आज सिक्किम सरकार ने राज्य के विभिन् जातीय समुदायों की भाषाओं, बोलियों, लिपियों और लोक - साहित्य के संरक्ष और प्रवर्धन के लिए सरकारी संरक्ष प्रदान किया है। भाषाओं, बोलियों और लिपियों के संरक्षण के महत्व को कृपाशाल्याण राई काफी पहले समझ चुके थे। अत: वह पिछली सदी के छठे दशक से ही किरात राई की विभिन्न बोलियों के संरक्ष के लिए प्रयत्नरत थे। इस कार्य के लिए उन्हें आलोचना का सामना भी करना पड़ा और विरोध का भी लेकिन अपने अभियान में दृढ़ वह एकल प्रयास में लगे रहे।

 

समग्र नेपाली जाति आर्य और मंगोल समुदायों के मिश्रण से बनी है। पृथ्वीनारायण शाह के पहले नेपाल विभिन्न जातियों, उपजातियों और जनजातियों में बंटा था जिनकी अपनी - अपनी भाषाएँ और बोलियाँ थीं। नेपाल के एकीकरण के बाद नेपाली भाषा नेपाल की राष्ट्रभाषा बन जाने से अन्य जातीय समूहों और जनजातियों की भाषाएँ और बोलियाँ उपेक्षित होने लगीं, जिससे वे विलुप्ति के कगार पर पहुँच गईं। सुगौली संधि (1815 - 16) के परिणामस्वरूप पूर्व से लेकर पश्चिम तक के विशाल भू - भाग के ब्रिटिश भारत में चले जाने के परिणामस्वरूप इन भू - क्षेत्रों में नेपाली मूल के लोगों को जातीय एकत्व के लिए नेपाली भाषा को अपनाना एक ऐतिहासिक विवशता थी। इससे समग्र रूप से नेपाली भाषा का विकास हुआ और जातीय एकता में इस भाषा ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

 

राई जाति असंख्य भाषिक उप समूहों में बंटी है। समग्र नेपाली जाति में राई, लिम्बू, सुनुवार, तामाङ, शेर्पा, गुरुंग, नेवार आदि आते हैं। इन सभी जातीय समूहों की भाषाओं व बोलियों ने नेपाली भाषा को समृद्ध किया है।

 

नेपाली भाषा के माध्यम से जातीय एकता सम्भव हो सकी, यह एक पक्ष था लेकिन पिछली एक - दो सदियों से जनजातियों की भाषाओं के लुप्त हो जाने से उनकी अपार सांस्कृतिक धरोहर भी विलुप्ति के कगार पर थी। बीसवीं सदी के प्राम्भिक दशकों से ही भाषाओं और संस्कृतियों की विलुप्ति पर विद्वान चिन्तित होने लगे थे।

 

इन्ही विरले विद्वानों में एक कृपाशाल्याण राई थे जो राई जातीय समूह से सम्बन्ध रखते थे। उन्होंने जब अपनी जातीय भाषा राई और इसकी लिपि के संरक्षण का अभियान चलाया तो विरोधियों को उनका उत्तर था - जिस देश में ज्यादा भाषाएँ होती हैं, उस देश को विदेशी हमेशा के लिए जीत नहीं सकते। भारत में चार कोटी से भी ज्यादा भाषाएँ होने की वजह से 300 साल तक अंग्रेजों ने भारत पर राज किया लेकिन उसे हमेशा के लिए जीत नहीं सके। नेपाली जाति में अनेक भाषाएँ होना नेपाली के लिए सौभाग्य की बात है। नेपाली साहित्य का भण्डार अपार है। यह राई जातीय समूहों का सौभाग्य है कि उसकी अनेक बोलियाँ और भाषाएँ हैं लेकिन विभिन्न राई समूहों को अपनी एक सम्पर्क भाषा विकसित करने की आवश्यकता है।

 

कृपाशाल्याण राई ने सिक्किम में शिक्षा की ज्योति जगाने वाले फाक छिरिङ  उर्फ रे. एस. के. जेनोरासा के बारे में जानकारी दी है जो बड़े महत्व की है। उनके अनुसार पश्चिम सिक्किम के चाखुङ गाँव के निवासी जोरोङ देवान के निधन के बाद उनके धर्मपुत्र फाक छिरिङ को जेरोङ देवान की सम्पत्ति से तत्कालीन राजशाही ने बेदखल कर दिया था। शिमला के हाई कोर्ट तक मुकदमा चला लेकिन फाक छिरिङ मुकदमा हार गए। दरमदिन में आज भी देवानी नाम की नहर के अवशेष पाए जाते हैं। दरमदिन की जेरोङ देवान की जमीन सरकार की सम्पत्ति घोषित कर दी गई। एक छोटा - सा होम फारम ही फाक छिरिङ के हिस्से में आया। निराश होकर वह सिलोन (श्रीलंका) चले गए और वहाँ बौद्ध भिक्षु बन गए। भिक्षु के रूप में उनका नामकरण रे. एस.के. जेनोरासा कर दिया गया। वापस भारत आने पर कलकत्ता में उनकी मुलाकात राजा बिड़ला से होती है। बिड़ला ने उन्हें भिक्षु नने का कारण पूछा। फाक छिरिङ ने आपबीती सुना दी कि किस तरह जोरोङ देवान के निधन के बाद उन्हें  सिक्किम का राजशाही ने जमीन - जायदाद से बेदखल कर दिया। उन्हें धर्मपुत्र तो बनाया था लेकिन कोई लिखित प्रमाण न होने की वजह से वह सारी सम्पत्ति से बेदखल कर दिए गए थे। और श्रीलंका जाकर भिक्षु बन गए थे।

 

बिड़ला ने उन्हें राजशाही से बदला लेने की एक विचित्र लेकिन आदर्श युक्ति बताई। उन्होंने फाक छिरिङ को समूचे सिक्किम में स्कूल खोलकर लोगों को शिक्षित बनाने के लिए प्रेरित किया। बिड़ला का मत था कि जनता शिक्षित होने पर खुद बदला ले लेगी।

 

फाक छिरिङ ने अपने पास धन - दौलत कुछ न होने के कारण ऐसा करने में असमर्थता जताई लेकिन बिड़ला ने उन्हें प्रोत्साहित करते हुए बीस हजार रुपये दिए और अन्य स्रोतों से धन संग्रह कर उस धनराशि को बैंक में जमा करवाकर स्कूल खोलने के लिए मदद की।

 

फाक छिरिङ ने दार्जिलिङ की भुटिया बस्ती में 'यंगमैन बुद्धिस्ट एसोसिएशन' की स्थापना की और छात्रावास और स्कूलों की स्थापना की। एसोसिएशन की इमारत पर बिड़ला का नाम खुदा हुआ मिलता है। दार्जिलिङ की भुटिया बस्ती के अलावा फाक छिरिङ ने पश्चिम सिक्किम के चाखुङ, कलुक, हिगाँव, मंगलबारे और नाम्ची में भी स्कूलों की स्थापना की।

 

फाक छिरिङ के दार्जिलिङ की भुटिया बस्ती में स्थित एसोसिएशन के छात्रावास में कृपाशाल्याण राई को शरण मिली और वह छात्रावास के रसोइये का काम करते हुए छठी कक्षा तक पढ़ने में सफल हुए।

प्रेम थुलुङ ने डॉ. तुलसी बहादुर क्षत्री (तुलसी अपतन) के हवाले से फाक छिरिङ के बारे में कुछ और जानकारी दी है। उनके अनुसार रे. जेनेरासो (फाक छिरिङ) ने ही तुलसी बहादुर क्षत्री से दार्जिलिङ में मुलाकाल कर उन्हें नाम्ची स्कूल के लिए नियुक्त किया था। फाक छिरिङ का निधन 1943 को हुआ।

-------

संदर्भ

1.     दियालो, नेपाली मासिक,  1963,  1969 , 1974

2.    कतै बिर्सिएला, , नगेन्द्रमणि प्रधान, डॉ. पारसमणि प्रधान     प्रकाशन, दार्जिलिङ, 2000

3.    केही व्यक्तिहरू, राज नारायण प्रधान, सूचना एवं जन सम्पर्क विभार, सिक्किम सरकार, 2005

4.    हाम्रो भाषा, मई, 1983

5.    उदगार, नेपाली सामयिक पत्रिका, 2002

6.    ए कलम तिम्रो मुख धोएर आएको छु (कविता संग्रह, राम अपतन) की भूमिका

7.    कृपाशाल्याण राईका सम्पूर्ण कृतिहरू, संपादक, पश्चिम सिक्किम साहित्य प्रकाशन, 2004

8.    सिक्किममा शिक्षाको विकास - संक्षिप्त परिचय, 1998)

(अप्रैल 2011)

महाभारत में शैव धर्म की अवधारणा

 

डॉ. ईश्वर चन्द

"विश्वकोष" के अभिधान से अलंकृत महाभारत विश्व की समग्र साहित्यिक एवं ऐतिहासिक कृतियों में सर्वोत्तम, विशाल तथा अनुपम महाकाव्य है। स्वयं महर्षि वेदव्यास ब्रह्मा से कहते हैं -

"मैंने इस महाकाव्य में वेद, वेदांग, उपनिषद्, इतिहास, पुराण, त्रिविध काल, संध्या, जरा - मृत्यु, भय, व्याधि, धर्म, आश्रम, चतुर्युग, न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान, पाशुपत, तीर्थ, देश, नदी, पर्वत, वन, समुद्र, दिव्य नगर, दुर्ग, युद्ध नैपुण्य और अन्य समस्त लोकोपयोगी पदार्थों का विस्तार से निरूपण किया है।"

भारतीय संस्कृति में एक प्रमुख तत्व अन्तर्निहित है  - "पुरुषार्थ - चतुष्टय।"  धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थ - चतुष्टय कहलाते हैं। पुरुषार्थ चतुष्टय का समस्त सार महाभारत में है। ज्ञान का स्रोत स्वरूप यह महाभारत युग की आत्मा को उद्बासित करता है।

महाभारत भारतीय जनमानस में पवित्र धर्मग्रन्थ है। महाभारत का उज्ज्वल संदेश है कि अधर्म पर धर्म की ही विजय होती है। इसी आदर्श को लेकर महाभारत जैसे पृथुल महाकाव्य की रचना एक अदभुत और महान कार्य है। ऐसे महान कार्य को साकार परिणति देने का श्रेय महर्षि वेदव्यास को है। वेदव्यास का पूरा नाम कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास था। शरीर काला होने के कारण कृष्ण और द्वीप में जन्म होने के कारण वे कृष्ण द्वैपायन कहलाए।

धर्मग्रन्थ के रूप में महाभारत एक वैष्णव ग्रन्थ है जिसकी केन्द्रीय धुरी विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ही हैं। परन्तु हम जब महाभारत का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन करते हैं तो स्पष्टत: उदभासित होता है कि महाबारत मात्र वैष्णव धर्म का ही प्रतिपादक नहीं है, बल्कि यह शैव धर्म का भी प्रतिपादक ग्रन्थ है। अत: हम कह सकते हैं कि महाभारत काल में वैष्णव और शैव धर्म समान रूप से प्रचलित थे।

वैदिक काल की भाँति महाभारत में भी शिव के उग्र एवं सौम्य दोनों रूप वर्णित हैं। महाभारत में शिव परम कल्याणकारी, वर - प्रदाता, मोक्ष - प्रदाता, विष्णु योद्धा, पापहर्ता तथा भक्तों के सिद्धिप्रद देव माने गए हैं। महाभारत में शिव के कार्यों का सर्वतोमुखी विकास हुआ। महाभारत में वर्णित शिव सम्बद्ध कथाएँ, यथा - ऋषि - कन्या पर प्राप्ति कथा, मंकणक ऋषि सम्बद्ध कथा, अर्जुन पाशुपतास्त्र प्राप्ति कथा, समरपुत्र प्राप्ति कथा, गंगावतरण कथा, जयद्रथ - वर प्राप्ति कथा आदि प्रमुख हैं।

महादेव शिव नित्य, सनातन एवं अव्यक्त देव हैं। वैदिक काल से ही रुद्र शिव के चारित्रिक विकास के साथ - साथ शारीरिक स्वरूप का भी सम्यक वर्णन होता चला आ रहा है। महाभारत में भी शिव की विलक्षण शारीरिक विशेषताओं का वर्णन किया गया है। शिव के तीन नेत्र हैं, इसलिए उन्हें त्रयक्ष, त्रयम्बक एवं त्रिलोचन कहा गया है। शिव जटाधारी हैं इसलिए वे कंपर्दी कहे गये हैं। महाभारत में शिव को नीलकंठ और विरुपाक्ष नाम से भी सम्बोधित किया गया है।

शिव कुशल योद्धा एवं सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं। वे अपने अस्त्र - शस्त्रों से शत्रुओं का संहार करते हैं। उनके प्रमुख दिव्यास्त्रों में पाशुपतास्त्र एक है जिसे ब्रह्म शिरास्त्र भी कहा जाता है। यह समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला है।

शिव के युद्ध कौशल एवं श्रेष्ठ धनुर्धर को जानकर विभिन्न योद्धा शिव को तपस्या से प्रसन्न करके उनसे ही अस्त्र - शस्त्र का ज्ञान पाना चाहते हैं। महाभारत में वर्णित है कि स्वयं अर्जुन ने शिव को प्रसन्न करके पाशुपतास्त्र की प्राप्ति की थी। जरासंध ने भी भगवान महादेव की उग्र तपस्या के द्वारा उपासना करके एक विशिष्ट शक्ति प्राप्त की थी, जिनसे वह सभी भूपालों को हरा सका।

भगवान सिव कल्याणकारी तथा वरदान देने वाले देव हैं। महाभारत में सिव की इसी लोकप्रियता का वर्णन हमें दृष्टिगोचर होता है। सच्ची भक्ति के द्वारा इष्टदेव को प्रसन्न करके उनसे यथेष्ट वर प्राप्त करना भक्ति का स्वरूप बन गया। भक्तों के तप और स्तुति से प्रसन्न होकर महेश्वर उन्हें इच्छित वर प्रदान करते हैं। भगवान नारायण ने भी प्राचीन काल में धर्म के पुत्र रूप में अवतरित होकर मैनाकपर्वत पर महती तपस्या से शंकर को प्रसन्न किया। तदनन्तर प्रसन्न महादेव ने नारायण को सर्वाधिक पराक्रमी एवं युद्धभूमि में अपने से भी अधिक पराक्रमी हो जाने का एक अदभुत वरदान प्रदान किया।

शिव सन्तान प्रदान करने वाले देव हैं। महाभारत के आदि पर्व में धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी द्वारा वरदायक 'हर' की आराधना करके सौ पुत्रों की प्राप्ति का वरदान पाने का उल्लेख हुआ है। आदि पर्व में एक अन्य स्थल पर राजा प्रभंकर द्वारा शिव से सन्तान प्राप्ति का वरदान पाने का उल्लेख आया है। मणलूर नरेश प्रभंकर ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से तपस्या के द्वारा पिनाकी देवाधिदेव उमापति को प्रसन्न किया तथा भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारे कुल में एक - एक सन्तान होती जाएगी। इसी प्रकार राजा सगर ने भी शिव की आराधना करके पुत्र - प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त किया था।

महाभारत में शिव का एक नवीन स्वरूप भी हमें दृष्टिगत होता है। तीर्थ एवं तीर्थ फल के प्रसंग में शिव सम्बद्ध विवरण हमें मिलता है। द्वारिका में स्थित पिण्डारक तीर्थ पर महादेव निवास करते हैं। गया में ब्रह्मसर तीर्थ के पास स्थित नदियों का स्रोत पिनाक घृक शिव का निवास है। योगेश्वर शिव के निवास स्थान पंचवट तीर्थ पर जाने से पुरुष सिद्ध हो जाते हैं। भद्रवट, मंजवट, आपगा, नदी - स्थान एवं महेश्वर पूजा, सुवर्णाक्ष, गोकर्ण, ऋंगेश्वर प्रभृत्ति तीर्थों पर विविध रूप से शिव की पूजा अर्चना से मनुष्यों को गणेश पद की प्राप्ति होती है। वाराणसी में वृषभ ध्वज की पूजा से राजसूय यज्ञ फल प्राप्ति होती है। अत: शिव तीर्थ का इतना महत्व है कि देवगण बी वहाँ जाकर पूजा अर्चना करते हैं।

सर्वपापनाशक दृमी नामक तीर्थ पर ब्रह्मादि सभा देवगण शिव की पूजा करते हैं। इसी प्रकार रामेश्वरम् में स्वयं राम ने भी शिव की स्थापना करके पूजा अर्चना की। अत: शिव की पूजा अर्चना करने से मनुष्यों के पापों का अन्त होता है और जीवन में सुख, शान्ति, यश, पुत्र, धन आदि प्राप्त होते हैं।

मंगलमय मूर्ति भगवान शिव अलौकिक स्वरूप देव हैं। महेश्वर शिव समस्त कारणों में परम कारण एवं सर्वव्यापी देव हैं। समस्त चराचर जगत शिव शिव से ही उत्पन्न हुआ है। वे ही समस्त देवताओं तथा दानवों की गति हैं। देव, असुर, मनुष्य सहित त्रिलोक भी शिव को पराजित करने में असमर्थ हैं। देवता भी शिव के अलौकिक स्वरूप को नहीं जान सकते हैं। प्रलयकाल में स्थावर जंगमपर्यन्त सभी पदार्थ शिव में ही समा जाते हैं। महादेव शिव एक निर्गुण, नित्य, सनातन, विभु तथा अद्वितीय हैं। वे एकादश रुद्र हैं: मृगव्याध, शर्व: निवृत्ति, अजैकपात्, अहिंबुध्न्य, पिनाकी, ईश्वर - दहन, कपाली, स्थाणु और भगवान भव।

शिव का अन्य देवों के साथ तादात्म्य भी उनके अलौकिक स्वरूप का परिचायक है। वन पर्व में एक स्थल पर अर्जुन श्रीकृष्ण को उनके वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हुए उन्हें रुद्र नाम से सम्बोधित करते हैं।

शिव और विषणु स्वरूप एक ही हैं, इसलिए अर्जुन शिव की स्तुति करते हुए कहते हैं कि आप ही विष्णु रूप शिव तथा शिव रूप विष्णु हैं। एक स्थल पर नारायण स्वयं को शिव कहते हैं। महाभारत के वन पर्व में अग्नि को शिव नाम से इंगित किया गया है।

भगवान शिव के चतुर्मुख होने की कथा भी उनके लोकोत्तर स्वरूप को दर्शाती है। ब्रह्मा के आदेशानुसार विश्वकर्मा द्वारा निर्मित अनुपम रूप सौन्दर्य सम्पन्न तिलोत्तमा ने समस्त देव वृन्द की परिक्रमा प्रारम्भ की। शंकर ने चारों दिशाओं में जाने वाली तिलोत्तमा को देखने की इच्छा से अपने चार मुख प्रकट किए। इस प्रकार भगवान शिव चतिर्मुख कहलाए।

महाभारत में शैव धर्म की स्थिति एवं विकास का अवलोकन करने के सन्दर्भ में मैंने पाया है कि महाभारत में शिव के साथसाथ देवी पार्वती तथा पुत्र कार्तिकेय का भी बड़ा ही मनोरम चित्रण किया गया है। महाभारत में देवी पार्वती का सर्वप्रथम उल्लेख आदि पर्व में हुआ है। आदि पर्व में द्रौपदी स्वयंवर के प्रसंग में क्षत्रिय राजाओं से घिरी द्रौपदी की देवताओं से गिरी पर्वतराज पुत्री उमा से समानता बताई गई है।

"ते क्षत्रिया स्वगगता समेता, जिगी पमाण द्रुपदात्मजां ताम्।

चकाशिरे पर्वत राज कन्यामुमां यता देवगण:समेता।।"

महादेव महान तपस्वी एवं योगेश्वर हैं। उद्योग पर्व में कहा गया है कि सर्वभूतेश्वर शिव पाताल में तपस्या करते हैं। वे ही योगियों के परब्रह्म एवं ब्रह्म ज्ञानियों के निधि स्वरूप हैं। इसीलिए उन्हें तपसां संनिधान तथा सुवर्चस कहा गया है।

शिव के अप्रतिम, अनुपम एवं सर्वदेवोत्तर विशिष्ट स्वरूप का विलक्षण उदाहरण है - लिंग पूजा। लिंग पूजा प्राचीन काल से ही शैव धर्म का अंग रहा है। महाभारत के द्रोण पर्व में कहा गया है - नारायण और नर दोनों ने युग - युग में महादेव की लिंग पूजा की है।

"ताभ्यां लिंगोर्चितो देव स्तत्व यार्थाया युगे - युगे।"

महाभारत में शिव के विविध नामों की उत्तम व्याख्या की गई है। ये नाम हैं : भूपति, उमापति, पसुपति, महेश्वर, बहुरूप, शर्व, धूर्जटि, विश्वरूप, विभु, त्रयम्बक, शिव, अयुताज्ञ, सर्वतश्चक्षु, महादेव, उग्रतेज, स्थाणु और रुद्र।

अन्तत: कहा जा सकता है कि शिव ही विश्व के आदि कारण एवं लयकर्ता हैं। इस प्रकार महाभारत में शिव भी विष्णु की भाँति सर्वनियंता, सर्वलोकेश्वर परम कल्याणकर्ता, वर - प्रदाता एवं सर्वव्यापी देव के रूप में स्तुत्य हुए हैं।

(निरख - परख, जुलाई - सितम्बर, 2010 से साभार) - नवम्बर 2010

धर्म निरपेक्षता, सांस्कृतिक विकास, राष्ट्रीय एवं भावनात्मक एकीकरण में

 

पवन चामलिङ क

 

 योगदान

 

सुवास दीपक

 

चपन से ही अपने गांव में पुस्तकालय स्थापित करने का सपना पाले पवन चामलिङ आज सिक्किम के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हैं और पिछले 16 सालों से व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और समग्र मानवता के हित और कल्याण के लिए एक क्रांति के अग्रदूत की तरह विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं। उनके इस मिशन में उन्होंने आज तक जो काम किए हैं, जो सफलताएं प्राप्त की हैं, समग्र मानव मूल्यों के सम्वर्धन के लिए जो पहलें उन्होंने की हैं, उन पर विस्तृत शोध अपेक्षित है।

मूलतय: एक कवि रहे पवन चामलिङ ने शुरू में ही अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया था। वह लक्ष्य था - मानव की मुक्ति - जड़ता से सक्रियता और गतिशीलता की ओर मानव-मूल्यों का विकास। कविता लिखने के पीछे के अपने स्पष्ट दर्शन को परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा -

 

मैंने कविता लिखना शुरू की थी जनता के लिए। समाज में व्याप्त असमानता, जहालत और शोषण से मेरा हृदय रो उठता था और इन विसंगतियों से लड़ने के लिए विद्रोह और विरोध की भावना प्रबल हो उठता थी। बाद में राजनीति में आकर अत्याचार, दमन और शोषण का विरोध करने लगा। आज मैं राजनीति जनता के लिए करता हूं, उद्देश्य और लक्ष्य एक ही है। जनता की सेवा ही मेरा अंतिम लक्ष्य है। आर्थिक संपन्नता के साथ-साथ मैं वैचारिक संपन्नता का भी पक्षधर हूं। आदमी की आजादी और सुख का मैं पक्षधर हूं।

 

वे ईश्वर विरोधी नहीं हैं पर निजी लिप्साएं, कुकर्म, लालच आदि छुपाने के लिए ईश्वर का आवरण ओढ़कर चलने वाले पाखंडियों के वे प्रबल विरोधी हैं। इसलिए उनका चिंतन वास्तववादी और वैज्ञानिक है। वे राजनीति और कविता की सरहद पर खड़े मानव शांति के लिए तपस्यारत हैं। समग्र मानवीय उत्थान के लिए कविता और राजनीति उनके लिए एक उपासना है।

 

धर्म निरपेक्षता पर पवन चामलिङ विचार -

 

भारतीय संविधान ने भारत को एक धर्म निरपेक्ष देश बनाया है। इसी देश के बाइसवें प्रदेश सिक्किम को भी धर्मक्षेत्र अर्थात धर्मप्रिय प्रदेश कहा जाता है और धर्म ही शान्ति का मूल स्रोत माना जाता है। धर्म का स्वतंत्र रूप में अपना एक अलग स्थान है और इसे जब भी स्वच्छता और पवित्रता से सुरक्षित बनाकर रखना प्रत्येक धर्मावलंबी व्यक्ति की मुख्य भूमिका होनी चाहिए। लेकिन आज यहां संविधान का उल्लंघन हो रहा है। धर्म को राजनीतिक विसात बनाकर पैसे का प्रलोभन दिखाकर गरीब-दुखी, सीधी-सादी जनता को गुमराह कर सिर्फ वोट हासिल करने का जरिया बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो धर्म राजनीति से बहुत ऊपर है। इसीलिए राजनीति के प्रकोप में पड़कर किसी भी धर्म का पतन न हो, हम सभी को यह उम्मीद पालनी है।

 

एसडीएफ (सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट) की सदभावना महासभा में पारित प्रस्ताव -

 

1. सिक्किम मूल की जनता ने विरासत में  पारस्परिक प्रेम, सदभावना, भाइचारा कायम किया है उससे प्रेरित होकर वे  शान्ति के पथ पर अग्रसर हैं। जात-पात, धर्म, लिंग, नस्ल और वर्ण में विभाजित न होकर मानवीय नाते में एकीकृत और परिचित होना आज के युग का मानवीय चरित्र और विशेषता है। आदमी का आदमी के प्रति धर्म, जात नस्ल और वर्ण तथा लिंग के आधार पर मतभेद करना पुरातनवादी चिन्तन का परिचायक है। हमारे समाज में व्याप्त इस किस्म के पुरातनवादी रूढ़िग्रस्त विचारों को पैरों तले रौंदते हुए हम युगसापेक्ष और आधुनिक विचारों का संचार करने की नीति योजना और कार्यक्रम की शुरूआत पहले से ही कर चुके हैं। अपने लक्षित उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम सिक्किम की सभी जातियों और सम्प्रदायों के प्रति समान व्यवहार और आचरण करते आए हैं। जन जाति एवं अनुसूचित जाति के लोगों के राजनीतिक एवं सामाजिक-आर्थिक अधिकारों का संरक्षण किया गया है। पिछड़ी जातियों को सामाजिक न्याय की गारंटी प्रदान की गई है। इसके साथ साथ समस्त सिक्किमी जनता की भाषाओं, साहित्य, संस्कृति और रीति-रिवाजों का संरक्षण और संवर्धन करने के कार्य पर विशेष जोर दिया गया है। इन नीतियों की पृष्ठभूमि के पीछे एक उच्च विकसित मानवदृष्टि और दर्शन की विशेष भूमिका है। हमने इन नीतियों का तर्जुमा इसलिए किया है कि कोई किसी के प्रति किसी प्रकार की शंका और दुराग्रह न रखे। सभी आपसी सूझबूझ के आधार पर, आपसी प्रेम और सदभाव से सहअस्तित्व कायम करें, इस बात को ध्यान में रख कर हम इन विषयों को आगे बढ़ा रहे हैं। हमारी मान्यता है कि आपसी सौहार्द से ही जातीय सह-अस्तित्व को मजबूत और टिकाऊ स्वरूप प्रदान किया जा सकता है।

 

2. कुछ शक्तियां यहां सक्रिय हैं जो सिक्किम को मध्य युग की ओर धकेल रही हैं। मध्य युगीन सामन्ती चिन्तन को सिक्किम के आधुनिक समाज में मिश्रित कर समाज को प्रदूषित करने में ये ताकतें सक्रिय हैं।

 

3. हम कहते हैं कि हमारे प्रदेश की शान्तिप्रियता और जातीय सदभावना आज देश भर में चर्चा और प्रशंसा का विषय है। यह प्रसन्नता और गर्व का विषय है। इस स्थिति में सुधार लाकर आगे बढ़ना है। हमारे बीच सामूहिकता की भावना को बढ़ावा देना जरूरी है। स्वकेन्द्रित विचारों की महामारी को हमें धीरे - धीरे नियंत्रण में लाना है। समाज, देश या राज्य एक व्यक्ति से नहीं बनते बल्कि समूह से बनते हैं।

 

धर्म व संस्कृति के बारे में पवन चामलिङ के विचार

 

सिक्किम एक धर्मपरायण राज्य है। सिक्किम के हर गांव में मन्दिर और बौद्ध विहार हैं। सिक्किम में सभी नागरिकों को अपनी अपनी मान्यताओं, आस्थाओं और धर्मों पर चलने की पूरी आजादी है। यह धर्म निरपेक्षता का एक ज्वलन्त उदाहरण है। सभी धर्मों के विकास के लिए समान अवसर प्रदान किए गए हैं। सिक्किम की जनता मूलत: धर्मपरायण है। चामलिङ की मान्यता है कि केवल शरीर का स्वस्थ होना लाजमी नहीं है, हमारा चिंतन और चरित्र भी शुद्ध और स्वस्थ होना जरूरी है। जात-पात, वर्ण और रंग के कारम हम सफल आदमी नहीं बन सकते। इसके लिए हमें विवेक और चरित्र के विकास पर ज्यादा जोर देना चाहिए।

 

पवन चामलिङ का कहना है -

 

हमारे लिए सभी वर्गों, जातियों, तबकों और समूहों की जनता आदरणीय है, प्रिय है। हम आर्य-अनार्य के बीच भेदभाव नहीं करते। हमारे लिए शान्ति और समानता का संदेश देने वाले बुद्ध आदरणीय हैं। निम्न जाति में जन्म लेकर भी महान विद्वान बने डॉ. अम्बेडकर और उच्च कुल में जन्म लेने पर भी समानता की बातें करने वाले जवाहरलाल नेहरू का समान रूप से हम आदर करते हैं। हम पुराने जमाने के मनु के विचारों का विरोध करते हैं लेकिन उसी कुल में जन्मीं गार्गी नामक विदुषी का हम समर्थन करते हैं। हमारे लिए जाति नहीं, विचार का महत्व है। सिक्किम की जनता का हित करने, सिक्किम को आत्म निर्भर और खुशहाल बनाने का हमारा सपना सांझा है।

भारत प्रेम का पक्षधर है, घृणा का नहीं। शान्ति का आकांक्षी कै, द्वन्द्वापेक्षी नहीं। इसीलिए हम सभी एक महान राष्ट्र के नागरिक हैं, जहां मतभेद दूर हो जाते हैं और बंधुत्व की भावना स्वत: फलने-फूलने लगती है। विभिनन्ता में एकता को स्वीकार करते हुए भारत ने धार्मिक सहिष्णुता के मार्ग का अनुसरण करके राष्ट्र को एक धर्मनिरपेक्ष स्वरूप प्रदान किया है। अत: यहां स्थानीय धार्मिक विविधता साथ साथ फलती फूलती देखी जा सकती है। विभिन्न आस्थाओं और विश्वासों का यहां एकीकरण हुआ है और सभ्यता व संस्कृति समृद्ध हुई हैं।

 

भारत के एक अंग के रूप में सिक्किम ने देश के एक सर्वाधिक शान्त और धार्मिक राज्य के रूप मे ख्याति अर्जित की है। इस स्थिति का मूल कारण है सिक्किम की जनता का धर्मभीरु होना। सभी धर्मावलंबियों को यहां किसी प्रकार के हस्तक्षेप के बिना जीने के अवसर प्राप्त हैं। सिक्किम राज्य समृद्ध परंपराओं और संस्कृतियों का एक रमणीय अपवाद है।

 

सिक्किम के निर्माण में विभिन्न जातियों और तबकों का समान योगदान रहा है। ऐसे सिक्किम के निर्माण में प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान भाव हो, सभी खुली हवा में जी सकें और भयमुक्त होकर राष्ट्र निर्माण में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सकें।

 

हमारा मानना है कि साम्प्रदायिकता  सामन्तवाद का सगोत्रीय विचार है। ऐसी विचारधारा समाज को प्रतिगामी धारा में धकेल देती है। इसलिए हम इसका सख्त विरोध करते हैं और ऐसे विचारों से अपने समाज को पूरी तरह से मुक्त रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

 

धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखना हमारी पहली प्राथमिकता है। हमने राज्य में धार्मिक निरपेक्षता को व्यावहारिक रूप में लागू किया है और सभी धर्मों को सम्मान देने की परिपाटी कायम की है। राज्य के बहुबाषिक, बहुसांस्कृतिक तथा बहुजातीय सामाजिक स्वरूप के संरक्षण पर उच्च प्राथमिकता दी गई है। जातिवादी राजनीति करने वालों को हमें परास्त करने और देख तथा सिक्किम के हित को सर्वोपरि मानने वाले हम जाति-पाति के संकीर्ण घेरों से बाहर निकल कर अपनी विचारधारा को व्यापकता देने में जी जान से जुटे हैं।

 

साम्प्रदायिकता को हम अपना राजनैतिक और वैचारिक शत्रु मानते हैं। साम्प्रदायिकतावाद सामन्तवादी सोच की पराकाष्ठा है। यह समाज को तोड़ती है, विकास की प्रक्रिया को पीछे की ओर धकेल देती है। हमें सिक्किम के भविष्य की चिन्ता है। सिक्किम जात-पात में विभक्त हुआ तो हम बरबाद हो जाएंगे। हमारा प्रयास सिक्किम को मजबूत बनाए रखने का है, कमजोर बनाने का नहीं। हमने अपनी - अपनी संस्कृति और धर्म के श्रेष्ठ मूल्यों को आत्मसात कर अपने सांझे घर और राष्ट्र के निर्माण का महान कार्य शुरु कर दिया है।

 

संस्कृति के बारे में पवन चामलिङ कहते हैं-

 

इस सुन्दर सिक्किम में सभी सिक्किमवासियों की अपनी अपनी संस्कृति है। इस नाते सभी जातियों और समूहों की संस्कृतियों के प्रति आदर और समानता की भावना रखते हुए उनके संरक्षण और संवर्धन का दायित्व हमारे कंधों पर है।

 

सामाजिक न्याय और सामाजिक समता के तहत अपनी सोच को व्यापकता प्रदान करते हुए हमने सिक्किम के समस्त भाषा-साहित्य और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का बीड़ा उठाया है। हमारी यह दृढ़ धारणा है कि राज्य की विभिन्न भाषाओं, साहित्य और संस्कृतियों की सुरक्षा और संवर्धन से ही सिक्किम में सच्ची सामाजिक समानता लाई जा सकती है।

 

पवन चामलिङ ने इक्कीसवीं सदी के इस तरह के सिक्किम की परिकल्पना की है जो पक्षपात, अन्याय तथा सामाजिक बुराइयों से मुक्त होगा।

स्वार्थी राजनैतिक तत्वों ने जातीय एकता को विगत में सिर्फ नारों में ही सीमित कर दिया था लेकिन इसे व्यवहार में लाने की पहल पवन चामलिङ ने ही की है।

विभिन्न जातियों, कबीलों और समूहों से बने सिक्किम के समाज में राजनीति की रोटी सेंकने वाले नेताओं के चलते लोग एक दूसरे को शक, अविश्वास और हिकारत भरी नजरों से देखते थे क्योंकि ऐसा माहौल पैदा कर दिया गया था कि जन सभाओं में एक जातीय समूह को दूसरे से हेय की दृष्टि से आंका जाता था और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाता था। लेकिन पवन चामलिङ ने जातीय एकता को व्यावहारिकता में उतारने की पहल की। उनका मानना है कि जब एक जाति दूसरी जाति को अपनी तरह व्यवहार नहीं करती, तब तक जातीय एकता सिर्फ एक कल्पना ही रहेगी। सभी जातीय समूहों और कबीलों को समान अधिकार, सम्मान और सहभागिता प्रदान करते हुए ऊपर उठने के लिए समान अवसर दिए जाने पर सामन्ती सोच वाले लोगों का बिदकना स्वाभाविक ही था क्योंकि इससे उनके शोषण का का दायरा सिकुड़ना शुरू हो गया था। पवन चामलिङ ने सिक्किम के समाज को एक बगीचे की तरह उपमा देते हुए अपने दृष्टिकोण को परिभाषित किया और कहा कि जिस तरह एक बगीचे में विभिन्न प्रजातियों के फूल समान खाद और जल पाकर रंग-बिरंगे फूल देने लगते हैं और माहौल को खुशनुमा बना देते हैं, ठीक उसी तरह सदियों से हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों को ऊपर उठने का अवसर देना, समाज को ताकतवर बनाना है, उन्हें कमजोर बनाना नहीं। इस लिहाज से पिछले डेढ़ दशक से पवन चामलिङ ने सिक्किम के समाज को जो सुदृढ़ आधार प्रदान किया है, वह अपने आप में एक मिसाल है और शोधार्थियों के लिए एक जीवन्त शोध का विषय।

 

विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान पर अपने विचार प्रकट करते हुए पवन चामलिङ कहते हैं -

 

पहचान से व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण होता है जो उसे एक सम्मानजनक स्थिति पर पहुंचाती है। लेकिन इस पहचान को सही तरीके से मान्यता न देने से यह हमारी तरह के समाज (जहां सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार काफी हद तक जाति-पाति या तत्संबंधित भेदभावों पर आधारित हैं) में किसी के जीवन को ही नष्ट कर सकती है। समुदाय विशेष अपनी अलग पहचान लेकर जीता है। इसका तात्पर्य एक ही समुदाय में भी एकाधिक उपसमुदाय हो सकते हैं। इसका अर्थ भारत में विभिन्न जातियां हैं जो विस्व में भारतीय समुदायों के रूप में अस्तित्व में हैं, लेकिन भारत में भी बंगाली, नेपाली, लेप्चा, नगा, भुटिया, तमिल आदि बहुत-सी उपराष्ट्रीयताएं हैं, जो संपूर्ण भारत के एक चित्र और एक पहचान का गठन करती हैं। लेकिन इसी कारण हम बंगाली भारत, तमिल भारत या नेपाली भारत कहीं भी नहीं पाते। प्रत्येक उपराष्ट्रीयता ने भारत और भारतीय पहचान बनाने में योगदान दिया है। यद्यपि देश के अंदर भी प्रत्येक समुदाय ने अपनी अपनी पहचान को अक्षुण्ण रखा है जैसे हम गुजराती पहचान या मराठा पहचान पाते हैं।

 

पवन चामलिङ का दृष्टिकोण सम्प्रदायवादी या जातिवादी नहीं है बल्कि भावनात्मक दृष्टिकोण है। उनका कहना है -

 

जब हम आज आधुनिकता के विषय में सोचते हैं तो हम कभी-कभार अपनी  परंपराओं, अपनी जड़ों का उपहास करते हैं। उनके प्रति अवहेलना का भाव प्रकट करते हैं। लेकिन सचाई यह है कि आधुनिकता शून्य में उत्पन्न नहीं होती। यह परंपरा के गर्भ से जन्म लेकर विकसित होती है। हम इस राष्ट्र की महान परंपरा के वारिस होने के कारण सौभाग्यशाली हैं। हमारा राष्ट्र आदि शंकराचार्य, बुद्ध, गुरु पद्मसंभव तथा बहुत सी महान आत्माओं का राष्ट्र है। इन महान विभूतियों के विचार और चिन्तन का एक विशाल भंडार है जो मानव जाति के लिए प्रासंगिक है।

इन अलग-अलग पहचानों ने समग्र रूप से भारतीय पहचान एवं भारतीय राष्ट्रीयता के गठन में योगदान पहुंचाया है। इन उपराष्ट्रीयताओं की अनुपस्थिति में भारतीय संस्कृति सरीखी कोई चीज का कोई अस्तित्व नहीं रहता। क्योंकि भारतीय संस्कृति ही इन उप राष्ट्रीयताओं की संस्कृतियों का एक सुन्दर सम्मिलन है। भारतीय राष्ट्रीयता और संस्कृति के निर्माण में हर उप राष्ट्रीयता का महत्व और गहन भूमिका रही है।

हर जाति और उपजाति की सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण करने के अलग अलग तरीके हो सकते हैं। मैंने सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में सर्वोत्कृष्ट तरीरे से सदैव सकारात्मक राजनैतिक कार्यवाही के बारे में सोचा है।

 

पवन चामलिङ कहते हैं -

 

इस कार्य के लिए मैं दो पद्धतियों को बेहतर मानता हूं। पहली है - 'मेल्टिंग पॉट अप्रोच'। इस पद्धति के तहत नेपाली संस्कृति एवं परिचय को 'मेल्टिंग पॉट' के रूप में माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि इस पात्र में जो भी आता है, वह उसमें ढल जाता है लेकिन पात्र को यथावत रखता है। यह 'पात्र' नेपाली संस्कृति है और इसमें आने वाले तत्व हैं नेपाली जाति की विभिन्न उपजातियां जैसे लिम्बू, दमाई, सार्की, गुरुंग आदि।

दूसरी पद्धति है - 'सलाद-थाली पद्धति''सलाद-थाली पद्धति'., जिसमें सलाद नेपाली जाति में तामांग, गुरुंग, सुनुवार आदि उपजातीय समूह एवं उनकी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। मेरे विचार में तामांग, राई, लिम्बू आदि उपजातियां सलाद-थाली के गाजर. टमाटर, मूली, शलजम आदि प्रमुख उपादानों का संकेत करते हैं जिन्हें एकीकृत करके थाली में सही ढंग से रखने के बाद सुन्दर और स्वादिष्ट सलाद बनता है।

मेरे विचार में 'सलाद-थाली पद्धति' समकालीन भारतीय परिप्रेक्ष्य में हमारी राष्ट्रीय पहचान को संरक्षण देने की सर्वोत्कृष्ट पद्धति है क्योंकि इस सलाद-थाली में नेपाली जाति की प्रत्येक उप जाति अपनी अपनी विशिष्ट पहचान को कायम रखकर भी सामूहिक रूप से ठोस और विशिष्ट भारतीय नेपाली पहचान के गठन में योगदान पहुंचा रही है। यदि एक भी उपादान इस थाली से हटा दिया जाए तो सलाद अधूरा हो जाएगा। मेरा मानना है कि सभी उपजातीय समूह स्वस्थ और खुशहाल रहने से समग्र कौम के लिए एक ठोस आधार बनेगा और राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में सहयोगी होगा।

इन सभी उपजातियों को पिछड़ी जातियों और कुछ को जनजाति का दर्जा प्रदान करना एसडीएफ सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। सांस्कृतिक क्षय के वर्तमान परिवेश में उपजातियों की संस्कृतियों को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने से इस राज्य की विभन्नता में एकता की एक ज्वलन्त मिसाल देश के सामने है।

संस्कृति के विषय में पवन चामलिङ की अवधारणा बिल्कुल स्पष्ट है और बौद्धिक कार्यकलाप सामाजिक सोच तथा प्रगति के प्रतिबिम्ब हैं।

 

 संस्कृति और बौद्धिक विकास के क्षेत्र में पवन चामलिङ की सरकार ने अनेक ठोस काम किए हैं -

 

    -सिक्किम की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के संगक्षण और संवर्धन में राज्य सरकार अति सक्रिय रहती आई है।

    - दक्षिण सिक्किम के साम्दुप्ची में 135 फीट ऊंची पद्मसंभव की मूर्ति की स्थापना की गई है।

    - सिक्किम के अंतिम शासक छोग्याल पीटी नामग्याल की मूर्ति टिबेटोलॉजी परिसर में स्थापित की गई है।

    - सिक्किम विधान सभा परिसर में डॉ. बीआर अम्बेडकर की 9 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है।

    - आदिकवि भानुभक्त आचार्य की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा गेजिंग में एक सांस्कृतिक अनुसंधान केन्द्र में   स्थापित की जा रही है।

    - लेप्चा किवदन्ती को नया जीवन प्रदान करते हुए दरमदिन में 'स्वर्ग की सीढ़ी'  की स्थापना की जा रही है।

    - लिम्बूओं के धार्मिक केन्द्र 'श्रीजंगा माङ्हिम' हिबर्मेक में स्थापित किया गया है।

    - बर्मेक में श्रीजंगा की प्रतिमा स्थापित की गई है।

    - थर्पु में लिम्बू सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना की गई है।

    - गान्तोक में लिम्बू गेस्ट हाउस की स्थापना की गई है।

    - बिहार के बौद्ध गया में सिक्किम के तीर्थ यात्रियों के लिए बौद्ध विहार एवं अतिथि गृह का निर्माण किया गया है। विभिन्न समुदायों के सांस्कृतिक भवनों का सरकारी खर्च पर निर्माण हो रहा है। जोंगु में लेप्चा पारम्परिक गृह तथा राई समुदाय के 'रोदो घर' का निर्माण किया गया है।

   - विविध सांस्कृतिक तथा साहित्यिक परम्पराओं को एक मंच में लाने के साथ साथ बहु सांस्कृतिक अन्तर्क्रिया और संरक्षणात्मक कदम उठाने के लिए सिक्किम अकादेमी की स्थापना की गई है।

   - टिबेटोलॉजी तथा पर्वतीय संस्कृति को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए नामग्याल इन्स्टीट्यूट ऑफ टिबेटोलॉजी का पुनरुद्धार किया गया है।

   - सिक्किम की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहर की मैपिंग का कार्य इंडिया नेशनल ट्रस्ट फॉर कल्चरल हेरिटेज, नई दिल्ली से पूरा किया गया है।

   - सिक्किम के कुछ प्रतिष्ठित प्राकृतिक धरोहर स्थलों और वस्तुओं को राष्ट्रीय तथा विश्व धरोहर सूची में शामिल करवाने के लिए राज्य सरकार प्रयत्नशील है।

   - राज्य में साम्प्रदायिक सदभावना तथा धर्मनिरपेक्ष परम्परा को कायम रखते हुए राज्य सरकार ने कतिपय धार्मिक और उपासना स्थलों जैसे नए मंदिरों, नए बौद्ध विहारों, गुरुद्वारों आदि का निर्माण किया है।

   - सिक्किम की प्रतिष्ठा तथा राज्य के बारे में वास्तविक सूचना प्रदान करने के लिए उल्लेखनीय पुस्तकों का प्रकाशन किया है।

- सिक्किम मानव विकास प्रतिवेदन अंग्रेजी और नेपाली में प्रकाशित की गई है।

   - सिक्किम: पीपुल्स विजन, सिक्किम: पर्सपेक्टिव एंड विजन ( पवन चामलिङ के 125 भाषण), ट्वेन्टी फाइव य़ीयर्स ऑफ स्टेटहुड, अवर नैचुरल रिसोर्सिस: अवर रेस्पांसिबिलिटी, सिक्किम स्टडी सीरीज (सिक्किम के विविध पक्षों पर 5 जिल्दों में पुस्तकें) पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है।

    - सिक्किम की संस्कृति और परम्परा का संरक्षण तथा संवर्धन इस सरकार की प्रमुख चिन्ताओं का विषय है। इन नीतियों के तहत राज्य सरकार ने निम्न विभिन्न समुदायों के विभिन्न पर्वों और त्योहारों को राजकीय अवकाश घोषित किया है -

     - लोछार, टेन्डोङ-ल्हो रम फात,  गुरु पद्मसंभव की जन्मजयन्ती, श्रीजंगा की जन्मजयन्ती, सोनाम लोछार, डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जन्म जयन्ती।

     - चारधाम के नाम से सोलोफू, नाम्ची में एक सांस्कृतिक पार्क का निर्माण किया जा रहा है। चारधाम के मध्य एक 104 फीट की शिव मूर्ति स्थापित की जाएगी।

     - 7 जुलाई 2003 को केदारनाथ शिवालय मन्दिर का देवराली (गान्तोक) में निर्माण किया गया।

10 मार्च, 2003 को नाडोक, सरमसा (पूर्व सिक्किम) में कांची कामकोठी शिव पंचयातन मन्दिर और ध्यान केन्द्र की नींव रखी गई।

     - 17 जून,2005 को लोअर साम्दोंग (पूर्व सिक्किम) में हरेश्वर शिवालय मन्दिर का उदघाटन किया गया।

 

विश्व में जहां हिंसा, अराजकता और अशान्ति व्याप्त है, वहीं भारत के इस छोटे से भू-परिवेष्ठित पहाड़ी राज्य में अमन-चैन और सौहार्द का वातावरण है।

 

सिक्किम भारत का एक मात्र ऐसा राज्य है जहां धार्मिक मामलों का एक अलग विभाग है जो जहां की समूची जनता की आध्यात्मिक जरूरतों और समूचे धार्मिक संस्थानों तथा पवित्र घोषित की गई झीलों, चट्टानों के रखरखाव और हिफाजत का कार्य करता है।

1994 से राज्य में धार्मिक संस्थानों की संख्या में दुगुणी वृद्धि हुई है। 7096 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाले इस राज्य में, जिसकी जनसंख्या मुस्किल से 5.40 लाख है, में 723 धार्मिक संस्थाएं हैं जिनमें बौद्ध मठ, ल्हाखांग, हिन्दु मन्दिर, गिर्जाघर, मस्जिदें, साई बाबा मन्दिर, सत्संग मन्दिरों के साथ साथ मांगहिम, मानकिम और असंख्य पवित्र गुफाएं और झीलें हैं।

सिक्किम ने विश्व में गुरु पद्मसंभव की सबसे ऊंची मूर्ति स्थापित करने का सम्मान और विशिष्टता हासिल की है। 135 फीट की इस मूर्ति की स्थापना की परिकल्पना मुक्यमंत्री पवन चामलिङ ने की थी।

बौद्ध मठों के साथ साथ मणिलाखांग तथा लाखांग के लिए दी जाने वाली वार्षिक अनुदान राशि 1000 रुपयों से बढ़ाकर 2000 रुपये कर देने के बाद अब यह 12000 रुपये कर दी गई है और पारम्परिक कला विद्यार्थियों की वृत्ति में दो गुणा वृद्धि कर इसे तीन सौ रुपये कर दिया गया है। इस प्रकार इन बौद्ध मठों के परम्परागत सह-अध्यापकों के समेकित वेतनों में पर्ति माह एक हजार से पांच हजार रुपये की वृद्धि कर दी गई है। वेतन न पाने वाले शिक्षकों को मासिक मानदेय 1000 रुपयों से बढ़ाकर 3000 रुपये कर दिया गया है।

बौद्ध मठों और संस्कृत पाठशालाओं के विद्यार्थियों को नि:शुल्क पाठ्य पुस्तकें प्रदान की जा रही हैं।

1994 से पहले सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार सत्ता में आने से पहले सिक्किम के प्रमुख छह बौद्ध मठों से प्राप्त राजस्व को सरकारी कोष में जमा करा दिया जाता था। लेकिन चामलिङ सरकार के गठन के तुरन्त बाद इन मठों से प्राप्त राजस्व का पचास प्रतिशत अंश इन मठों को इनकी अनिवार्य उपासनाओं तथा अन्य विविध समारोहों के आयोजन के लिए वापस कर दिया जा रहा है।

1994 में चामलिङ सरकार के गठन के बाद सिक्किम में विशिष्ट आध्यात्मिक नेताओं के स्वागत के लिए आयोजन की जाने वाली खेदजनक "शेर-हाङ्ग" (धार्मिक स्वागत) की प्रथा को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया गया है। इसी तरह चामलिङ सरकार ने क्षेत्र के पवित्र और धार्मिक स्थलों के अपवित्रीकरण के विरुद्ध लोगों की भावनाओं के चलते राथोङ-चु जल विद्युत परियोजना को रद्द कर दिया ता। सौ वर्ष पुराने धार्मिक और उपासना स्थलों के अभिलेखन का कार्य शुरू किया गया है। इस महत्वपूर्ण और अत्यन्त प्रभावपूर्ण कार्य को अंजाम देने के लिए सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार ने एक धार्मिक समिति का गठन किया है जो प्रथम चरण की रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी है।

सिक्किम में संस्कृत अध्ययन के लिए पाठशालाओं और महाविद्यालयों की स्थापना की गई है। 13 जुलाई,2004 को सिक्किम सम्मान सम्मिलन की आयोजना की जिसकी सारे देश में प्रशंसा हुई है। इसमें देश भर के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और कलाकारों ने भाग लिया था और उन्हें सिक्किम सरकार ने सम्मानित किया था।

 

पवन चामलिङ कहते हैं -

 

इन वर्षों में हमारी सरकार ने पारम्परिक मूल्यों के सुदृढ़ीकरण तथा आज के विश्व और अपनी धरोहरों में समरसता लाने में ईमानदारी के साथ काम किया है। किसी भी राज्य व राष्ट्र के लिए अमन चैन अति आवश्यक होता है। हमने इसे कायम रखा है। हम इस विषय में किसी भी कीमत पर कभी कोई समझौता नहीं करेंगे।

सिक्किम की जनता स्वभाव से शान्तिप्रिय है और साम्प्रदायिक भाईचारा कायम रखना भी उसका आन्तरिक स्वभाव है। यह हमारी अन्तर्निहित शक्तियां हैं। यह मिसालें हैं कि हमारा राज्य लिंग-आधारित भेदभावों से मुक्त है। पुरुष व स्त्री दोनों कंधे से कंधा मिला कर काम करते हैं। यह हमारे समाज की एक विशिष्ट पहचान है। हम सिक्किम की जनता के बीच विद्यमान इस एकता की भावना को और ज्यादा ताकतवर बनाने के लिए लगातार संघर्षरत हैं।

 

अपने राष्ट्र की संस्कृति, उसकी समझ तथा स्वराष्ट्र हित की गहरी समझ होना हर राजनीतिज्ञ की अनिवार्य योग्यता होनी चाहिए। इस संदर्भ में पवन चामलिङ में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो अत्यंत प्रेरणादायक हैं। गतिशीलता और कुंठामुक्त व्यवहार उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान है। राजनीतिक विचारहीनता के इस वर्तमान परिवेश में एक जनोन्मुखी विचार तथा संस्कृति संपन्नता की तात्विक पहचान की तलाश में ग्रामधर्मी चेतना के विकास और विस्तार, निरन्तर सृजनशील और सांस्कृतिक सौहार्द के अपने सपनों को साकार करने में पवन चामलिङ सक्रिय हैं।

 

राष्ट्रीय एकीकरण

राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के संदर्भ में 25 नवंबर,1996 को सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया था -

 

16 मई,1975 को सिक्किम भारत का एक अभिन्न अंग बन जाने के बाद सिक्किम की जनता को महान देश भारत के नागरिक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अत: भारत के नागरिक होने के नाते इस देश से अपने मौलिक अधिकार पाना हमारा मौलिक अधिकार है और देश के प्रति त्याग, बलिदान और उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकना हमारा कर्तव्य बनता है। हमारे देश भारत की सार्वभौम सत्ता एवं अखंडता की रक्षा के लिए हमें अपना कर्तव्य निभाना है और देश की गरिमा को उच्च स्तर पर रखकर इसकी अस्मिता, राष्ट्रीय एकता और ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासत को बचाने और उसके संरक्षण की दिशा में पार्टी को हमेशा तत्पर रहना है।

 

पवन चामलिङ ने 4 मार्च, 2002 को अपने एक भाषण में कहा -

 

सिक्किम को भारत के बाइसवां राज्य बने 18 साल बीत चुके हैं। इस अवधि में सिक्किम का जनगण पूरी तरह से भारतीय नागरिक बन चुका है, फिर भी सांस्कृतिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक और कतिपय परिस्थितियों के चलते सिक्किम को राष्ट्रीय मुख्यधारा में भावनात्मक रूप से एकीकृत करने के कार्य में अपेक्षित उत्साह पूर्व राजनेताओं में नहीं दिखा। आज से एक दशक पहले तक भी इस महत्वपूर्ण मुद्दे की उपेक्षा होती रही। सिर्फ सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट पार्टी की सरकार के गठन के बाद ही हमने सिक्किम को शेष भारत से भावनात्मक रूप से जोड़ने की पहल की। सरकार के सदप्रयासों की बदौलत आज सिक्किम में राष्ट्रीय भावना का उल्लेखनीय विकास हुआ है। देश की अखंडता और सार्वभौमिकता को चुनौती देने वाली स्वदेशी और विदेशी ताकतों के विरुद्ध देश के हित के पक्ष में अटल और अविचल रहने की प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए इस दिशा में हम हमेशा तत्पर रहे हैं। मेरी राजनीति के केन्द्र में सिक्किम की जनता है। मेरे लिए सिक्किम की जनता है। मेरे लिए सिक्किम की आम जनता ही पूज्यनीय है। इसलिए सिक्किम की जनता को भूल कर में राजनीति की कल्पना भी नहीं कर सकता। सिक्किम के लिए मेरा एक सपना है। यह सपना दरअसल सिक्किम की जनता का सपना है। सामूहिक जीवन को ज्यादा अर्थपूर्ण बनाने के लिए हर व्यक्ति के ले जरूरी है कि वह अपनी भूमिका निभाकर समाज के प्रति योगदान करे। इस विचार पर अटूट आस्था और विश्वास रखकर हम काम कर रहे हैं।

 

सैंकड़ों वर्षों तक निरंकुशता की बेड़ियों में कसी जनता को मुक्त हुए अरसा बीत जाने पर भी उनकी चेतना के द्वार एकाएक खुल भी नहीं सकते लेकिन चेतना के विकास की रफ्तार को सामूहिक प्रयासों से और ज्यादा गतिशील बनाने के प्रया किए जा रहे हैं। सैंकड़ों वर्षों के शोषण-दमन और दोहन से चीथड़े-चीथड़े हो चुके सिक्किमवासियों के भाग्य में पहली दफा हमारी सरकार ने ही मरहमपट्टी करने का काम किया हैऔर निरंतर करती आ रही है। अपने खून और पसीने से जिन्दा रहने वाली पराक्रमी जनता के बंधे हाथ खोलने के लिए उन्मुक्ति का शंखघोष करते आने वाली सरकार हमारी ही है। अबोध और असहाय जनता पर शोषण का बुलडोजर चलाकर अपना स्वार्थ साधने वाले शोषक इसी कारण जनता द्वारा प्राप्त की गई सहूलियतों और अधिकारों से चिढ़ रहे हैं। शोषक और दमनकारी  लोग ऐन केन प्रकारेण जनता के हाथों से अधिकार छीनकर अपने स्वार्थ के पिंजरों में जनता के अधिकारों को बंद करने को उतारू हैं। जनता की मासूमियत और अबोधपन का फायदा उठाकर उसे दिग्भ्रमित करने और अपना उल्लू सीधा करने के लिए जालसाज और गरीबमार आज दिन रात दौड़ते फिर रहे हैं।

 

पवन चामलिङ की पहले की पीढ़ी के राजनेताओं ने अक्सर भ्रम पैदा करने की कोशिश की। यह कुछ अज्ञानतावश हुआ हो तो कोई बात नहीं लेकिन जानबूझकर सुनियोजित ढंग से कुछ नेताओं ने साभिप्राय सिक्किम के भारत के साथ हुए शान्तिपूर्वक विलय की वास्तविकता और महत्व के बारे में सिक्किम की जनता और शेष भारत को भ्रमित करने की अपनी ओर से पूरी कोशिश की। वे अपने स्वार्थों और अभिप्रायों से अच्छी तरह वाकिफ थे। दरअसल कुछ वरिष्ठ नेतों ने अस्पष्ट और द्वयर्थक रूप से सोचा और विलय के बारे में संदिग्ध बयानबाजी की। उनके भाषण गंगटोक और नई दिल्ली तथा अन्य जगहों पर अलग अलग होते थे लेकिन जनता धीरे-धीरे उनके अभिप्रायों और कार्यप्रणालियों समझने लगी। बारत के साथ औपचारिक और अन्तिम विलय होने के बाद भी ये लोग सिक्किम का जिक्र एक "देश" के रूप में करते रहे।

 

वह कहते हैं -

सिक्किम एक सीमावर्ती राज्य होने के कारण यह देश की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि सीमावर्ती राज्यों की जनता संतुष्ट हो तो वह राष्ट्र की सुरक्षा होती है। अत: अपनी सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अवस्थिति के वजह से इस मुद्दे को हमेशा संवेदनशील माना जाना चाहिए।

 

पवन चामलिह इस प्रमुख सिद्धान्त पर हमेशा जोर दिया है कि आन्तरिक सुरक्षा और जातीय भाइचारे से आन्तरिक सुक्षा और शान्ति और सुदृढ़ होगी। शायद यही कारण है कि उनके शासनकाल में सिक्किम देश में शान्ति का एक टापू बना हुआ है।

सिक्किम की पिछली सरकार ने राज्य को देश से अलग - थलग रखने और स्थानीय तौर पर राष्ट्रविरोधी और अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा को फैलाने का बड़े पैमाने पर प्रयास किया लेकिन चामलिङ सरकार लगातार सिक्किम की जनता का राष्ट्र की मुख्यधारा से एकीकरण करने का प्रयास करती आ रही है। पवन चामलिङ का कहना है -

 

भारत के निर्माण मे, भारत के स्वाधीनता संग्राम में देश के हर हिस्से की जनता ने अपना - अपना योगदान दिया है। हजारों की संख्या में भारतीय नागरिकों ने स्वाधीनता संग्राम में अपने प्राण न्योछावर किए हैं। स्वतन्त्रता संग्राम के इन नायकों, जिनकी कीर्ति के गीत नहीं गाए गए, उन्हें उनके योगदान के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए।

 

 इसलिए पवन चामलिङ ने आज 'रिवर्स इंटीग्रेशन'(विपर्यय एकीकरण) की अवधारणा की वकालत की है। वह उन लोगों की कड़ी आलोचना करते हैं जो राष्ट्रवादी आवेगपूर्ण भाषण तो छांटते हैं लेकिम लक्ष्य और संकल्प के प्रति सच्चे और ईमानदार नहीं हैं।

 

2002 (स्वाधीनता दिवस) पर अपने भाषण में पवन चामलिङ ने कहा -

 

हमारे जैसे स्वाधीन राष्ट्र में राष्ट्रभक्ति का प्रत्यक्ष अर्थ राष्ट्र की समग्र समृद्धि और प्रगति के लिए योगदान करना है। मेरा मानना है कि देश को शक्तिशाली, सक्षम और समृद्ध बनाने के काम में सहयोग पहुंचाना ही वर्तमान अवस्था में सच्ची राष्ठ्रभक्ति है। स्वाधीन और सार्वभौम राष्ट्र में, मेरे विचार में, राष्ट्रभक्ति का अर्थ राष्ट्र के समग्र विकास के लिए काम करना कहा जा सकता है। औपनिविशिक सत्ता के अधीन राष्ट्रीय स्थिति में राष्ट्रभक्ति की परिभाषा अलग थी लेकिन आज की स्थिति, जहां किसी किस्म के प्रत्यक्ष या परोक्ष अतिक्रमण या राजनैतिक व सैनिक उपनिवेशीकरण की परिस्थिति नहीं है, देश की अखंडता और सार्वभौमिकता पर किसी प्रकार का प्रत्यक्ष खतरा नहीं है, ऐसी स्थिति में हर नागरिक या नागरिक समाज को राष्ट्र के विकास और खुशहाली के लिए काम करना चाहिए। देश की आर्थिक स्वाधीनता के लिए लड़ना ही आज के संदर्भ में राष्ट्रभक्ति है। नयी पीढ़ी जिस तरह सभी क्षेत्रों और विचारों को नयी दृष्टि से देखती है, उसी तरह राष्ट्रभक्ति की परिभाषा और अवधारणा को भी नई दृष्टि से देखा जाना चाहिए। सिक्किम और सिक्किम की जनता के पक्ष में हम नये ढंग से राष्ट्रभक्ति को समझने और उसके लिए काम करने की कोशिश में लगे हैं।

 

पवन चामलिङ ने कहा -

 

भले ही हम देर से राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल हुए हों लेकिन हमारी सरकार के शासनकाल में सिक्किम ने अनेक क्षेत्रों में देश को उत्कृष्टता का पाठ सिकाया है। यह दावा हम कर सकते हैं। यह सिर्फ हमारा दावा ही नहीं है, यह एक हकीकत है।

सत्ता में आने के बाद पवन चामलिङ ने लोकतंत्र को प्रबल आधार प्रदान करने के लिए जनता को आजादी और विकास की सहूलियतें देने के प्रयत्न तो किए ही हैं, सिक्किम के लोकतंत्र को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करने का लगातार प्रयास भी किया है। सिक्किम की जनता को उन्होंने वास्तविक विकास के लिए अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं को ढूंढ निकालने के लिए लगातार जागरूक बने रहने का आग्रह किया है।

 

सिक्किम के विकास से चिढ़ने वालों और आधारहीन आरोप लगाने वालों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पवन चामलिङ कहते हैं -

 

आज सिक्किम में सिर्फ विरोध की भावना है, लेकिन कोई विकल्प नहीं। आज एक पक्ष सिक्किम के हित के लिए किए गए काम पर  कीचड़ पोतने की कोशिश में लगा है। इस किस्म की विध्वंसक प्रवृत्ति की सिक्किम में कोई जरूरत नहीं है लेकिन सिक्किम को सचमुच बेहतर बनाने के लिए रचनात्मक सुझाव देने की दिशा में विरोधी खेमा मौन है। नकारात्मक व्यवहार और प्रवृत्ति से सिक्किम का कोई भला नहीं हो सकता। हम हजारों बार दुहराते आ रहे हैं कि हमें रचनात्मक सुझाव और आलोचना चाहिए - सिर्फ विरोध के नाम पर विरोध करने वाले, व्यक्तिगत या दलगत स्वार्थ के लिए सरकार का विरोध करने वाले कतई सिक्किम का भला नहीं कर सकते।

 

स्वस्थ और सभ्य समाज की निर्णायक बूमिका के बारे में वह अपने विचार इस प्रकार रखते हैं -

 

हमारे विगत अनुभव हमें बताते हैं कि समाज में कुछ बेइमान तत्व निर्दोष लोगों की बावनाओं से बार बार खिलवाड़ करते आए हैं। अरसे से मैंने संबावित समाधान के लिए गंभीर चिंतन किया है। और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि संभावित चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें ऐसे स्वस्थ समाज की आवश्यकता है जो कुछ निश्चित मूल्यों और आदर्शों पर आधारित हो। एक स्वस्थ और विचारशील समाज की अनुपस्थिति में सत्य और असत्य, दृश्य और मूल स्वभाव की विभाजन रेखा धुंधली पड़ जाने से नजर नहीं आती। इस परिदृश्य में, मैं सिक्किम में एक स्वस्थ और सभ्य समाज के निर्माण के लिए निरंतर प्रयत्न का प्रस्ताव करता हूं।

 

पवन चामलिङ के शासन में सिक्किम एक नयी ऊंचाई प्राप्त करने के लिए अग्रसर है। नि:स्वार्थी तथा लक्ष्योन्मुख नेता के रूप में पवन चामलिङ समस्त महान कार्यों, जिनकी राज्य और देश को आवश्यकता है, के लिए एक सुयोग्य नेता के रूप में उभर रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के सिक्किम ने भारत में ही नहीं बल्कि विश्व क्षितिज पर चमकले के लिए अपनी यात्रा शुरू कर दी है।

लोकतंत्र को संस्थागत करने के काम को आगे बढ़ाते हुए हमें वैचारिक क्रान्ति के रास्ते को कदापि नहीं छोड़ा है। सिक्किम में फैलाए जा रहे कुविचारों के ढेर को रचनाधर्मी विचारों और व्यवहार के झाड़ू से बुहारना आज उनका दायित्व बन चुका है।

 

वह कहते हैं -

 

आज सिक्किम में लोकतंत्र का उपभोग करने और सभी मानवाधिकारों की गारंटी देकर हमारी सरकार ने सिक्किमवासियों के सर्वांगीण विकास के रास्ते खोल दिए हैं। इसके साथ सिक्किम में सामाजिक न्याय को कार्य रूप में परिणत करने और जनता के मौलिक अधिकारों की बहाली का क्रम हमारा सरकार से पूरा हो चुका है। हमारी सरकार में समूची जनता निर्भय होकर, अपने संपूर्ण अधिकारों का दावा कर जी सके, ऐसी परिपाटी की सृजना हमने कर दी है। हमने चाहा है कि सिक्किमवासी पूरे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के साथ जी सकें और राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें।

 

पवन चामलिङ की कार्यशैली नितान्त पारदर्शी और स्पष्ट है। रात जिन वह मानव हित, मानव कल्याण और राष्ट्र हित के विषय में चिन्तित रहते हैं।

                                             (इस आलेख में प्रस्तुत आंकड़े सन 2004 तक के हैं - सुवास दीपक)

 

 

देवनागरी लिपि की भूमिका

 

(स्व.) डॉ. बाबूराम सक्सेना

 

देवनागरी लिपि का विकास प्राचीन भारतीय लिपि ब्राह्मी से हुआ है। ब्राह्मी लिपि के अभिलेख ईसा पूर्व चतुर्थ शती तक के मिलते हैं। इसके समकालीन एक और लिपि थी जिसको खरोष्ठी कहते हैं। खरोष्ठी दाहिनी ओर से बाईं ओर चलती है जबकि ब्राह्मी बाईं ओर से दाहिनी ओर। ये दोनों लिपियां भारत की अपनी लिपियां थीं और उनका विकास और उदगम शुद्ध भारतीय था। कुछ यूरोपीय विद्वानों का मत यह था कि इनका उदगम अभारतीय प्रभाव पर आधारित था, किंतु इसका प्रतिवाद पं. गौरीशंकर हीरानंद ओझा ने कर दिया था और उनकी उक्ति का खंडन नहीं हो सका। अरबी (उर्दु) लिपि भी दाहिनी ओर से बाईं ओर चलती है, किंतु खरोष्ठी लिपि से इसका कोई संबंध नहीं था। ब्राह्मी और खरोष्ठी के अतिरिक्त सिंधु घाटी में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में पाए गए अभिलेख एक अन्य लिपि में हैं, जो अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी। ये अभिलेख प्राय: ईसा पूर्व 2700 वर्ष पुराने हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अंकन पर्वतों की गुफाओं में पाए गये भारतीय आदिवासियों के रचित चित्रों में भी मिलते हैं। ये चित्र पच्चीस हजार वर्ष पुराने समझे जाते हैं।

ब्राह्मी के दो रूप उत्तरी और दक्खिनी विकसित हो गये थे। उत्तरी रूप में दूसरों के अतिरिक्त देवनागरी और कुटिल लिपि भी विकसित ही। आज देवनागरी संस्कृत, हिन्दी, नेपाली, मराठी लिखने के लिए प्रयुक्त होती है। इसमें स्वर और व्यंजन स्पष्ट रूप से अंतित होते हैं। स्वरों का एक संक्षिप्त रूप भी होता है, जिसको मात्रा कहते हैं। जब स्वर किसी व्यंजन के उपरांत आता है तो इसे मात्रा के रूप में अंकित करते हैं। उदाहरणार्थ - हम लिखते हैं 'ऐसा' और 'कैसा'। प्रथम शब्द में '' स्वर अपने मूल रूप में है और दूसरे में अपने मात्रा के रूप में। ये मात्राएं व्यंजन के पहले, बाद को, नीचे और ऊपर लिखी जाती हैं। हिन्दी में हृस्व इकार और बंगला में एकार की मात्रा व्यंजन के पूर्व रखी जाती है। उकार, ऊकार,ऋकार व्यजन के नीचे और एकार, ऐकार, ओकार और औकार व्यंजन के ऊपर लिखे जाते हैं।

आकार की मात्रा व्यंजन के बाद रखा जाती है। अकार की मात्रा व्यंजन के रूप में ही शामिल होती है और इसका प्रयोग अन्य स्वररहित व्यंजन के रूप में सन्निहित रहता है, जैसे कथा, रस आदि शब्दों में। वर्तमान देवनागरी लिपि में अंकित वर्णों में कुछ व्यंजन संयोग भी सिखाए जाते हैं और ये हैं क्ष (क् ष), (त र), इसके अतिरिक्त र के कई रूप हैं। ब्राह्मी में दो व्यंजनों के संयोग में प्रथम व्यंजन ऊपर और दूसरा उसके नीचे लिखा जाता था। यह प्रथा देवनागरी में भी पाई जाती है, विशेषकर '' के साथ किसी व्यंजन के संयोग में। उदाहरणार्थ - धर्म में रेफ '' के ऊपर लिखा जाता है। '' का प्राचीन रूप '' था जो हमें प्रेम आदि में अंकित मिलता है।

लिपि सुधार की आवश्यकता को देखकर कई समितियों ने समय समय पर विचार किया था। महात्मा गांधी के निर्देशन पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने 1935 में अपने वार्षिक अधिवेशन में लिपि सुधार समिति नियुक्त की थी। फिर 1948 में आचार्य नरेंद्र देव समिति नियुक्त की थी। फिर 1948 में डॉ. संपूर्णानंद के निर्देश पर विद्वानों की एक समिति ने सुझाए गए सुधारों के प्रस्तावों पर विचार विमर्श किया था। इसके पूर्व, 1848 में भारत सरकार ने हिन्दी आशुलिपि और टंकण पर विचार विमर्श के लिए काका कालेलकरजी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। देवनागरी लिपि में प्रचलित लेखन प्रणाली इन सब समितियों के आधार पर विकसित हुई हैं। सिद्धांत यह है कि लिपि में एक ध्वनि को अंकित करने के लिए एक ही वर्ण होना चाहिए। इस सिद्धांत पर देवनागरी लिरि ही भारतीय भाषाओं को अंकित करने में सर्वथा समर्थ है और विभ्रम की कोई गुंजाइश प्राय: नहीं है। इसके विपरीत रोमन में भी तथा अरबी में यह योग्यता नहीं है।

उदाहरणार्थ रोमन लिपि का ए कभी ऐ का और कभी अ को व्यक्त करता है। यू वर्ण कभी अ, कभी ऐ और कभी उ का उच्चारण देता है। इसी तरह उर्दु के ते और तोय त ध्वनि का द्योतन करते हैं। से, सीन और स्वाद स ध्वनि का तथा जाल जे और जोय ज ध्वनि को जतलाते हैं। अरबी लिरि में लिखी जाने वाली उर्दु में स्वरों के अंकन का यथेष्ट और असंदिग्ध प्रबंध नहीं है। देवनागरी लिरि में ये की दोष नहीं है। इसमें जो लिखा जाता है वही पढ़ा जाता है। इसी दृष्टि से भारतीय भाषाओं को अंकित करने के लिए देवनागरी लिपि सर्वश्रेष्ठ और सर्वथा योग्य लिपि है।

प्रो. सुनीतिकुमार चटर्जी ने रोमन लिपि की इस प्रयोग की सुविधा को समझकर प्रस्ताव किया था कि एक इंडोरोमन लिरि हिन्दी के लिए स्वीकार की जाए और हिन्दी के वर्णों के लिए 26 वर्णों की रोमन लिपि को विशेष चिह्न लगाकर उपस्थित किया जाए। उनका यह प्रस्ताव पुस्तक में ही रह गया और किसी ने इसे नहीं माना। (नागरी संगम से साभार)

 

'हर आंख से आंसू पोंछने हैं'

 

ई वर्ष पहले हमने नियति के साथ एक समझौता किया था और अब समय आ गया है जब हम अपने वायदे को पूरा करें, पूरा या पूरी तरह नहीं, बल्कि काफी अच्छी तरह। मध्य रात्रि का घंटा बजते ही जब सारी दुनिया सोयी होगी, भारत जागकर जीवित और आजाद हो उठेगा। इतिहास में ऐसा क्षण विरला ही आता है, जब हम पुराने से निकलकर नए की ओर चल पड़ते हैं, जब एक युग खत्म होता है और जब किसी राष्ट्र की अर्से से दबी आत्मा आवाज पा लेती है। इस पवित्र घड़ी में यह सही होगा कि हम भारत और भारत के लोगों की सेवा और मानवता के बड़े हित में अपने को समर्पित करने का व्रत लें।

इतिहास की शुरुआत में भारत ने अपनी अनंत खोज की और अज्ञात शताब्दियां उसकी महान सफलताओं और असफलताओं की छटपटाहट से भरी ही हैं। अच्छी और बुरी किस्मत, दोनों में ही यह देश उस रास्ते से, उन आदर्शों से भटका या भूला नहीं और भारत एक बार फिर अपने को खोज रहा है। आज जिस उपलब्धि का जश्न हम मना रहे हैं वह बड़ी जीत और उपलब्धियां, जो हमारा इन्तजार कर रही हैं, उनकी ओर एक कदम, एक अवसर है। क्या हम सचमुच उतने बहादुर और बुद्धिमान हैं कि इस अवसर को ग्रहण करें और भविष्य की चुनौती को स्वीकार करें।

आजादी और ताकत जिम्मेदारी लाती है। यह जिम्मेदारी इस सभा को दी गई है, जो भारत के सर्वप्रभुतासंपन्न लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। आजादी के जन्म के पहले हमने प्रसव वेदना के सारे कष्ट सहे और हमारे दिल उस दुख की यादों से भारी हैं। उनमें से कुछ पीड़ाएं तो अभी भी बरकरार हैं। फिर भी, अतीत बीत चुका है और भविष्य की रोशनी अब हमें दीख रही है।

वह भविष्य आराम और इत्मीनान का नहीं, बल्कि जो वादे हम बराबर करते आए हैं उन्हें, और एक वादा जो हम आज करेंगे उसे पूरा करने की निरंतर कोशिश करने का है। भारत की सेवा का मतलब है करोड़ों पीड़ित लोगों की सेवा।

इसका अर्थ है गरीबी, अज्ञानता, रोग और असमानता को खत्म करना। हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की आकांक्षा है हर आंख से आंसू पोंछ देना। हो सकता है इसे पूरा करना हमारे बूते के बाहर हो, लेकिन जब तक आंसू और पीड़ा रहेगी, हमारा काम पूरा नहीं होगा।

और इसलिए हमें मेहनत करनी है और काम करना है और कड़ी मेहनत करनी है ताकि हम अपने सपने साकार कर सकें।

वे सपने भारत के लिए हैं, लेकिन वे सारे संसार के लिए, सभी देशों और लोगों के लिए हैं जो आज कापी निकटता से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता कि वे एक दूसरे से पृथक हैं। कहा जा सकता है कि इस एक दुनिया में शांति का विभाजन नहीं हो सकता है और न ही आजादी का भी, और अब तो संपन्न्ता और विनाश का भी विभाजन नहीं हो सकता। इसे अलग अलग टुकड़ों में तोड़ना संभव ही नहीं है।

भारत के लोगों से, जिनके हम प्रतिनिधि हैं, हमारी अपील है कि भरोसे और विश्वास के साथ महान साहसिक अभियान में हमारे साथ जुड़ें। छोटी - मोटी और विनाशकारी आलोचना का यह समय नहीं, न बुरे विचारों का या दूसरों पर आरोप लगाने का है। हमें आजाद भारत की आलीशान इमारत बनानी है, जिसमें उसके सभी बच्चे रह सकेंगे। (14 अगस्त,1947 की अर्द्धरात्रि को पं. जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक भाषण)

 

पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी के 2009 के शिलांग सम्मेलन पर प्रतिक्रिया

पूर्वोत्तर की जनजातियों के अतिरिक्त अन्य भाषा-भाषियों में हिन्दी के प्रति बढ़ती रुचि और लगाव का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि मेघालय निवासी लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष पी.के. संगमा की 28 वर्षीया सुपुत्री अगाथा संगमा ने 16 वीं लोकसभा में सांसद बनने के बाद केन्द्र में मंत्री पद की शपथ हिन्दी में लेकर सभी को चकित कर दिया। वह फर्राटे के साथ हिन्दी बोलती हैं और उनका उच्चारण बिल्कुल शुद्ध होता है।

पूर्वोत्तर के राज्यों में हिन्दी के महत्व को समझने और इस ओर युवाओं को आकर्षित करने के लिए अगाथा संगमा एक 'रोल माडल' बन चुकी हैं।

पूर्वोत्तर की जनजातियों में हिन्दी सीखने का प्रतिशत निश्चित रूप से कुछ वर्ष पूर्व पूर्वोत्तर परिषद् में सम्मिलित हुए सिक्किम की गैर जनजातियों में कहीं अधिक है। पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में नेपाली भाषी भारतीय नागरिकों की आबादी लाखों में है लेकिन नेपाली के माध्यम से शिक्षा की व्यवस्था सरकारी स्तर पर नगण्य है, जो है वह निजी तौर पर या सामाजिक, सांस्कृतिक या साहित्यिक संस्थाओं के माध्यम से ही संभव हो पाई है। इन राज्यों में इस कारण हिन्दी पढ़ना उनके लिए एक अनिवार्यता है। इससे पिछली एक सदी से इन राज्यों में स्थानीय हिन्दीतर लेखकों द्वारा हिन्दी के विकास व प्रचार - प्रसार में जितना कार्य हुआ है, उस पर व्यापक शोध एवं अनुसंधान की आवश्यकता है।

सम्मेलन में जितने कार्यपत्र पढ़े गये, वे सभी इन राज्यों से बाहर के लेखकों द्वारा लिखे गए थे, एकाध को छोड़कर। एक स्थानीय लेखिका सुश्री हरिप्रियारि देवी थोकचोम द्वारा प्रस्तुत कार्यपत्र में तथ्यात्मक त्रुटि थी। उच्चारण की विविधता को बताते हुए उन्होंने 'कक्षा' शब्द का पूर्वोत्तर के जनजातीय लोग किस तरह उच्चारण करते हैं, उस पर अपनी टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि सिक्किम में 'कक्षा' को 'कोक्षा' कह कर उच्चारित किया जाता है। सिक्किम की संपर्क भाषा नेपाली है जो राज्य की शतप्रतिशत जनता की संपर्क भाषा है। सिक्किम में एक दर्जन जनजातियों की अपनी अपनी बोलियां और भाषाएं हैं, जो तिब्बती - बर्मी भाषा परिवार से संबंधित हैं। उन बोलियों या भाषाओं में संस्कृत शब्द 'कक्षा' का अस्तित्व कैसे संभव हो सकता है? यह शब्द यदि सिक्किम में हिन्दी के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में प्रयुक्त होता है तो वह केवल नेपाली भाषा में क्योंकि नेपाली तत्सम प्रधान भाषा है जिसमें प्रयुक्त संस्कृत के शब्द 90 प्रतिशत से भी अधिक हैं। 'कक्षा' का सिक्किम की किसी भी भाषा में 'कोक्षा' उच्चारण नहीं होता। इन पंक्तियों के लेखक ने जब इन लेखिका से इस संबंध में पूछा तो वह अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हुईं, मुझे ही गलत सिद्ध करने की कोशिश करती रहीं। मैंने उन्हें जोर देकर पूछा कि आप बताएं कि सिक्किम की किस भाषा में 'कक्षा' को 'कोक्षा' कहा जाता है और उसका स्रोत बताएं तो उन्होंने कहा कि उन्होंने किसी विद्यार्थी से पूछा था। सुश्री थोकचोम के इस कार्यपत्र के प्रकाशन से पूर्व इस भूल को सुधार लेना आवश्यक हो जाता है।

सेमिनार में चुंकि समय का अभाव था परंतु आयोजकों को चाहिए कि प्रस्तुत कार्यपत्रों पर खुली अंतर्क्रिया के लिए समय देते जिससे विभिन्न पक्षों पर विचारों के आदान-प्रदान के अतिरिक्त हिन्दीतर लेखकों की सहभागिता सार्थक हो सकती थी और केवल औपचारिक रूप में नहीं बल्कि सार्थक रूप से समझा जा सकता था। सम्मेलन में यदि असम, मिजोराम, मणिपुर, नागालैंड के अहिन्दी भाषी हिन्दी लेखकों को सम्मिलित किया जाता तो पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी का विकास शीर्षक पर आयोजित यह संगोष्ठी और ज्यादा सार्थक सिद्ध होती।

पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी पूर्वोत्तर राज्यों में हिन्दी के प्रचार - प्रसार में महत्वपूर्ण कार्य को आगे बढ़ा रही है। अकादमी का सबसे अच्छा और सार्थक प्रयत्न स्थानीय भाषा- भाषियों को साथ में लेकर चलने का है जो सराहनीय है। डा. अकेलाभाइ के इस कथन से हम सभी सहमत हैं कि 'पूर्वोत्तर भारत में साहित्य रचने के लिए विपुल भंडार है इसे हिन्दी के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इस क्षेत्र में त्याग है, समर्पण है, पवित्र निष्ठा है जो साहित्य के लिए सार्थक है। यहां सत्य की शोधक मनोवृत्ति है। स्वार्थों से हटकर मानवीय कल्याण भाव से जुड़ी चेतना है, बुराइयों के विरुद्ध चुनौती भरा अनुशासन है, करुणा से भरी मानवीय संवेदना है जो साहित्य का विषय बन सकती है।' (सुवास दीपक)

 

य़ूनिसेफ के अनुसार बासी होते हैं सरकारी आंकड़े

 

यूनिसेफ ने कहा है कि सरकार की ओर से मुहैया कराए जाने वाले आंकड़ों के पुराने होने के कारण भारत में शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए टीकाकरण जैसी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में दिक्कतें आ रही हैं। भारत में यूनिसेफ के प्रतिनिधि कारिन हुलसौफ के मुताबिक भारत में टीकाकरण जैसी परियाजनाओं के लिए इस्तेमाल में आने वाले आंकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण जुटाता है लेकिन ये आंकड़े हर साल इकट्टा नहीं किए जाते। हमें मुहैया कराए गए आंकड़े नवीनतम नहीं होते। लेकिन यह भी सच है कि भारत जैसे बड़े और विशाल आबादी वाले देश में हर साल आंकड़े इकट्ठा करना काफी महंगा काम है।

हुलसौफ ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राइमरी स्वास्थ्य केंद्रों के कर्मियों को भी पर्याप्त पर्शिक्षण देने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि भारत में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत के बाद सरकार ने इन स्वास्थ्य केंद्रों में कर्मचारियों की तादाद काफी बढ़ा दी है। लेकिन उनको प्रशिक्षण देकर उनकी योग्यता में सुधार लाने की भी जरूरत है। भारत में चल रही टीकाकरण योजना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह देश के सभी समुदायों और जातियों पर लागू है। लेकिन सबसे ज्यादा पिछड़ेपन और कुपोषण की मार झेल रहे बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इस योजना को लागू करने की दिक्कतें आ रही हैं।

 

करोड़ों लोग रह जाते हैं भूखे

 

वैश्विक खाद्य सुरक्षा दिवस के अवसर पर जारी संयुक्त राष्ट्र की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर की जनसंख्या का छठा हिस्सा भूखा सोता है। हाल के आर्थिक संकट के दौरान भूखे रह जाने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है और परिस्थितियां पहले से और खराब हुई हैं। कोई भी देश इससे अछूता नहीं है। लेकिन जैसा कि आम तौर होता है गरीब देशों में हालात बेहद खराब हैं और लोगों को अधिक परेशानी है।

रिपोर्ट के अनुसार एशिया प्रशांत क्षेत्र में भूखे लोगों की संख्या सबसे अधिक है जबकि दूसरे नंबर पर अफ्रीका के सहारा प्रांत के देश आते हैं। वर्ष 2009 में भूखे रहने वालों की संख्या एक अरब को पार कर चुकी है और 1970 के बाद यह संख्या सबसे अधिक है। रोम में जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दरअसल आर्थिक संकट के कारण गरीब देशों को मिल रही विदेशी मदद में भी कमी आयी है और निवेश भी घटा है। एएफओ का कहना है कि विश्व खाद्य सम्मेलन में दुनिया भर में भूखे रहनेवाले लोगों की संख्या 2015 तक घटाने का जो लक्ष्य तय किया गया था, वह वर्तमान हालात में पूरा होता नहीं दिख रहा है।

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध इकाई ने जो वर्ल्ड हंगर इंडेक्स जारी किया है उससे सबसे खराब हालत में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के लोग हैं, जहां भूखे लोगों की संख्या में 1990 के बाद सबसे अधिक बढ़ोत्तरी देखी गयी है। कांगो के बाद बुरुंडी, कोमोरोस और जिंबांब्बे का नाम है जबकि मेक्सिको, विएतनाम, ब्राजील और सऊदी अरब में परिस्थियां बेहतर हुई हैं। (बीबीसी हिंदी डॉटकॉम)

 

भारत में हर चौथा व्यक्ति भूखा

से समय जब भारत विश्व शक्ति बनकर उभरने का दावा कर रहा है, देश में हर चौथा व्यक्ति भूखा है।  भारत में भूख और अनाज की उपलब्धता पर एक ताज़ा रिपोर्ट में ऐसा दावा किया गया है। भारत के एक ग़ैर-सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार आबादी के हिसाब से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश में तकरीबन 21 करोड़ से अधिक जनसँख्या को भर पेट भोजन नहीं मिल पाता है संख्या के अनुपात में यह अफ़्रीका के सबसे गरीब देशों से भी ज़्यादा है। यह आंकड़े नवदान्य ट्रस्ट द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट का हिस्सा हैं जिसमें कहा गया है कि 'बढ़ती महंगाई और सरकारों द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में हाल के दिनों में फैलाई गई अव्यवस्था ने स्थिति को और भी बदतर कर दिया है।'
नवदान्य ट्रस्ट की प्रमुख वंदना शिवा कहती हैं कि भले ही सत्ताधारी वर्ग और देश का एक वर्ग जीडीपी यानी सकल घरेलु उत्पाद को बढ़ाने को ही सबसे अहम काम समझ रहा है पर सच तो यह है कि एक आम आदमी को प्रति वर्ष मिलने वाली खाद्य सामग्री पिछले 10 बरसों के भीतर 34 किलो कम हो गई है। उनके अनुसार वर्ष 1999 के आसपास भारत में खाद्य सामग्री की प्रति व्यक्ति सालाना खपत 186 किलोग्राम थी जो साल 2001 तक 152 किलोग्राम जा पहुँची। देश में आर्थिक उदारीकरण का काम 90 के दशक में शुरु हुआ था. तब केंद्र में कांग्रेस पार्टी की नरसिंह राव सरकार थी. पिछले पांच बरसों में रिपोर्ट के अनुसार गरीबों को मिलने वाली खाद्य सामग्री में और भी कमी आई है।

'भूख के कारण'
नवदान्य ट्रस्ट के अनुसार खाद्य पदार्थों की बढ़ी कीमतों की सच्चाई को छिपाने के लिए सरकार ने खाद्य पदार्थों को स्टील और धातुओं की कीमतों के आकलन वाले वर्ग में डाल दिया है, जिनकी कीमतें पिछले दिनों तेज़ी से गिरी हैं। इस तरह खाने पीने की वस्तुओं की थोक कीमतें में गिरावट तो देखी गई है लेकिन असल में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ी हैं। सालाना महंगाई जिस फ़ार्मूले से आंकी जाती हैं उसमें ज़रुरत के सामानों के अलग अलग वर्ग तैयार किए गए हैं जिसमें हाल की कीमतों की तुलना के आधार पर एक महँगाई दर आँकी जाती है। 'भूख के कारण' नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में खाद्य सामग्री के वितरण में निजी कंपनियों के बढ़ते दख़ल ने खाने पीने की चीजों की कीमतें बढ़ा दी हैं।
इससे खाने पीने की वस्तुओं पर सरकार द्वारा दी जाने वाली छूट यानी सब्सिडी में भी इज़ाफ़ा हुआ है. आर्थिक उदारीकरण के पहले दी जाने वाली सब्सिडी 2450 करोड़ रुपए थी जो पिछले वित्तीय वर्ष में बढ़कर 32667 करोड़ रुपए हो गई है. कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा है कि अगले साल खाद्य सामग्री पर दी जाने वाली कुल छूट 50,000 करोड़ रूपए हो जाएगी।
उदारीकरण के बाद से सरकार ने 'सही ज़रूरतमंदों को ही छूट' के नाम पर सिर्फ़ बहुत गरीब वर्गों को ही सार्वजानिक वितरण प्रणाली के तहत सस्ते अनाज देने की सुविधा जारी रखी है। पहले सस्ते दामों पर खाने पीने के सामान की सुविधा सभी नागरिकों को थी। अब यह सुविधा जनसँख्या के सिर्फ़ एक छोटे वर्ग को हो मिल रही है। एक अनुमान के मुताबिक गरीबों में भी ये सुविधा केवल 10 प्रतिशत लोगों को ही उपलब्ध है। वंदना शिवा कहती हैं, "हम अपने लोगों को भूखा रखने के लिए ज़्यादा पैसा ख़र्च कर रहे हैं।"
रिपोर्ट का दावा है कि हाल के बरसों में अनाज उगाने वाली 80 लाख हेक्टेअर भूमि पर एक्सपोर्ट की जाने वाले सामग्री उगानी शुरू कर दी गई है जबकि एक करोड़ हेक्टेअर से ज़्यादा ऐसी ज़मीन पर जैविक ईधन पैदा करने वाले पेड़ लगा दिए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिए ली जाने वाली ज़मीनों से कृषि क्षेत्र पर दबाव और बढ़ेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को हर एक नागरिक के लिए सार्वजानिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था करनी होगी जिसका नियंत्रण स्थानीय स्तर पर किया जाए. साथ ही एक ऐसी कृषि व्यवस्था को दोबारा बढ़ावा देना होगा जहाँ केवल 'कैश क्रौप पर ज़ोर न होकर पहले की तरह हर तरह के अनाज उपजाने को बढ़ावा दिया जाए। (बीबीसी - हिंदी)

 

'कहानी लेखन महाविद्यालय' अम्बाला (हरियाणा)

 

 देश का सर्वप्रथम पत्राचार शिक्षा संस्थान

 

विजय कुमार

डा. महाराज कृष्ण जैन द्वारा सन् 1964 को हरियाणा में एक नयी पहल हुई थी। डा. जैन ने 'कहानी-लेखन महाविद्यालय' के रूप में देश को पत्राचार द्वारा रचनात्मक शिक्षा देने वाले प्रथम शिक्षण संस्थान का उपहार दिया था। नये लेखकों को कहानी कला में मार्गदर्शन देने, लिखना सिखाने वाला यह पहला संस्थान था। इससे पहले विदेशों में ही कुछ संस्थान ऐसे थे जो कि पत्राचार द्वारा शिक्षण देते थे।

जब डा. महाराज कृष्ण जैन ने 'कहानी लेखन महाविद्यालय' को आरंभ किया तो बहुत से नामी लेखकों ने आश्चर्य प्रकट किया कि क्या पत्रचार के द्वारा कहानी लिखना सिखाया जा सकता है। उस समय लेखन और पत्रकारिता के पत्राचार पाठ्यक्रमों की बात तो दूर, पत्राचार द्वारा किसी भी प्रकार के शिक्षण को लोग जानते तक नहीं थे। उस समय भारत में कोई शिक्षण संस्थान यहां तक कि विश्वविद्यालय तक में पत्राचार कोर्स की अवधारणा नहीं थी।

कहानी लेखन महाविद्यालय को आरंभ करना नये लेखकों को लेखन और प्रकाशन में आने वाली कठिनाइयों को दूर करना था। जब डा. जैन को अपने लेखन प्रकाशन में कठिनाइयां आईं, उनको देखते हुए उनके मन में विचार आया कि नये लेखकों को मार्गदर्शन की कोई व्यवस्था होनी चाहिए। इसे देखते हुए डा. जैन के दिमाग में पत्राचार कोर्स का विचार आया और डा. जैन ने अपना सारा ध्यान उस पर केंद्रित कर दिया।

जिस समय डा. जैन ने इस विद्यालय को आरंभ किया, उस समय केवल कहानी विधा में ही शिक्षण का विचार था। इसलिए संस्थान का नाम 'कहानी लेखन महाविद्यालय' रखा गया। जब इसे प्रारंभ किया गया तो केवल एक ही कोर्स कहानी - कला का था। धीरे-धीरे इसमें अन्य कोर्स जैसे लेख और फीचर लेखन, पत्रकारिता और संपादन, प्रैक्टिकल इंग्लिश, पटकथा लेखन आदि भी जोड़े गए। कुछ छोटे कोर्स जैसे पत्रिका संचालन, फीचर एजेंसी संचालन कोर्स भी आजकल चल रहे हैं। इस तरह आज इसमें पत्राचार द्वारा सात कोर्स चलाए जा रहे हैं।

पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए योग्य व्यक्ति नहीं मिल पाने पर डा. जैन ने कड़ी मेहनत से सभी पाठ्यक्रमों के पाठ अपनी धर्मपत्नी श्रीमती उर्मि कृष्ण के साथ मिलकर स्वयं तैयार किए। केवल पटकथा लेखन पाठ्यक्रम के पाठ उन्होंने उसके विशेषज्ञ व्यक्ति से लिखवाए थे।

इसका प्रतिसाद बहुत अच्छा नहीं था, तो बुरा भी नहीं था। पूछताछ के लिए पत्र बहुत आते थे किंतु अदिकांश केवल उत्सुकता शांत करने के लिए. कुछ पत्र 'मुक्त' पत्रिका तथा पुस्तिका के प्रलोभन में भी आते थे। अब भी इस स्थिति में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है परंतु शुरू में मानो उन्हें काम ही यही था उसके बाद पचासों तरह के प्रश्नप्रतिप्रश्न, उनके उत्तर भेजने में बहुत ऊर्जा, समय और व्यय लगता था। तो भी प्रवेश का दर कुल सात-आठ प्रतिशत रहता था।

उन दिनों छह माह के पूरे कोर्स का शुल्क 25-30 रुपये था। बहुत से सदस्य तो इतना शुल्क देने में भी असमर्थ होते थे। डा. जैन को शीघ्र ही यह अनुभव हुआ था कि हिंदी भाषियों की आर्थिकक स्थिति अंगरेजीदां परिवारों से दुर्बल है। उन्हें अपने शौक के लिए इतना खर्च भी भारी पड़ता है।

पाठ्यक्रम करने वाले सदस्य डा. साहब से कोर्स के दौरान कई प्रश्न भी पूछते थे तथा लेखन/प्रकाशन में जो कठिनाइयां उन्हें आती थीं, उनका हल भी चाहते थे। वे यह भी चाहते थे कि डा. साहब कोई पत्रिका भी निकालें जिसमें सदस्यों के पत्रों को स्थान दिया जाए।

विद्यालय की पत्रिका शुभ तारिका निकालने के पीछे उस समय डा. साहब का यही मकसद था कि विद्यालय के सदस्यों के लिए आवश्यक सूचनाएं इसमें प्रकाशित की जाएं। इसी को देखते हुए 35 वर्ष पूर्व डा. साहब ने एक साइक्लोस्टाइल पत्र के रूप में इसकी नींव रखी। इस एक पृष्ठ में सदस्यों के इक्का-दुक्का पत्र छपने लगे। पत्रों के साथ सदस्यों ने रचनाएं छापने की मांग भी की। अत: इसमें एकाध रचना भी छपने लगी। जल्द ही डा. साहब को लगने लगा कि इसे एक पृष्ठ तक सीमित रखना संभव नहीं है। धीरे-धीरे इसे चार, फिर छह तथा अब यह हर मास 32 से 100 पृष्ठ तक प्रकाशित हो रही है।

आरंभ में शुभ तारिका रूपाम्भरा नाम से प्रकाशित हुई, फिर तारिका तथा अब यह शुभ तारिका के नाम से प्रकाशित हो रही है।पत्राचार पाठ्यक्रम करते हुए कुछ सदस्य डा. साहब से मिलने की इच्छा जाहिर करते थे और साथ बैठकर लेखन तथा अन्य बातचीत करना चाहते थे। इसी को देखते हुए डा. जैन ने लेखन पर कार्यशालाओं का आयोजन आरंभ किया। इन कार्यशालाओं में नवोदित से लेकर मंझे हुए लेखक आते तथा डा. साहब उनकी जिज्ञासाओं को शांत करते। अब तक विद्यालय के 16 शिविर भारत के अलग-अलग प्रांतों में आयोजित हो चुके हैं। इसी तरह के एक शिविर नौणी (सोलन) में 5 जून 2001 को डा. साहब का स्वर्गवास हो गया।

कहानी को छोड़कर और सभी विषयों में शिल्प और तकनीक ही प्रमुख है। पत्रिका-संचालन में प्रबंधन महत्वपूर्ण है। शिल्प और तकनीक कहानी में भी आती है। इसके अलावा भाषा, शैली, सामग्री, पांडुलिपि, प्रकाशन क्षेत्र जैसे और बहुत से पक्ष हैं। कहानी लेखन महाविद्यालय के पाठ्यक्रमों में इन सब का विस्तृत ज्ञान दिया जाता है। यही नहीं, छात्रों को अध्ययन बढ़ाने के लिए निरंतर प्रेरित भी किया जाता है। छात्रों द्वारा जो अभ्यास भेजे जाते हैं, उन पर विस्तृत टिप्पणियां व सुझाव दिए जाते हैं। विद्यालय का अंग्रेजी कोर्स भी अनूठी पद्धति पर आधीरित है। छात्रों ने विद्यालय के सभी पाठ्यक्रमों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

केवल कोर्स के बल पर कोई लेखक नहीं बन सकता। किंतु नये लेखकों को आरंभ में जिस मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, वह उन्हें कहानी लेखन महाविद्यालय में मिल जाता है।

वस्तुत: हिंदी जगत की सोच बहुत धुंधली है, कुछ लोग मानते हैं कि प्रतिभा को की शिक्षण नहीं चाहिए। ऐसे लोग गायन, वादन, नृत्य, चित्रकला आदि के क्षेत्र में चल रहे शिक्षण को तो मान्यता देतो हैं किंतु कहानी-कला में शिक्षण को अनुपयुक्त बताते हैं अथवा अनिवार्य नहीं मानते।

बहरहाल, शिक्षण की उपयोगिता इससे प्रकट है कि विद्यालय के अधिकांश सदस्य शीघ्र ही पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगते हैं। कोई भी लोकप्रिय पत्र-पत्रिका ऐसी नहीं है जिसमें विद्यालय के सदस्यों की रचनाएं न छप रही हों। विद्यालय की खासियत यह है कि वह अपने किसी भी सदस्य को केवल छात्र की तरह नहीं देखता, बल्कि हर सदस्य को अपने परिवार के सदस्य की तरह समझता है तथा अपने सुझाव, मार्गदर्शन देता है।

इस सबके बावजूद विद्यालय की आय कभी भी इतनी नहीं रही कि केवल उसी से निर्वाह कर सके। यदि सौ विवरणी जाती है तो उसमें से केवल पांच-सात छात्र बनते हैं। यह भी तब जब उन्हें कई-कई स्मरण-पत्र जाते हैं। और भी ढेरों पत्र-व्यवहार होता है जिनका परिणाम कुछ बी नहीं निकलता।

डा. महाराज कृष्ण के स्वर्गवासी (5 जून, 2001) होने के बाद कहानी लेखन महाविद्यालय और पत्रिका शुभ तारिका का सारा काम उनकी पत्नी श्रीमती उर्मि कृष्ण देख रही हैं और यह दोनों उसी तरह चल रहे हैं जैसे डा. जैन के समय में चल रहे थे।

हमें आशा करनी चाहिए कि अंबाला छावनी को साहित्यिक आत्मा प्रदान करने वाला यह दीपक जलता रहेगा..जलता रहेगा...जलता रहेगा...अनवरत!

 

चांद पर पानी होने की पुष्टि

भारत के पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 ने चांद की सतह पर पानी की मौजूदगी के प्रमाण खोज निकाले हैं। वैज्ञानिकों ने पिछले दिनों इसका ऐलान करते हुए कहा कि चंद्रयान - 1 के साथ भेजे गए नासा के उपकरण 'मून मिनरलोजी मैपर (एम 3)' ने परावर्तित प्रकाश की तरंगदैर्ध्य का पता लगाया है जो ऊपरी मिट्टी की पतली परत पर मौजूद सामग्री में हाइड्रोजन और आक्सीजन के बीच रासायनिक संबंध का संकेत देता है। चंद्रयान - 1 ने जो आंकड़े जुटाए, उनके विश्लेषण से चंद्रमा पर पानी के अस्तित्व की पुष्टि हो गई है। इस खोज ने चार दशक से चले आ रहे इन कयासों पर विराम लगा दिया है कि चंद्रमा पर पानी है या नहीं।

वैज्ञानिकों ने पहले दावा किया था कि चंद्रमा पर लगभग 40 साल पहले पानी का अस्तित्व था। यह दावा उन्होंने चंद्रमा से अपोलो अंतरिक्ष यान में रखकर धरती पर लाई गई चट्टानों के नमूनों के अध्ययन के बाद किया था। लेकिन उन्हें अपनी इस खोज पर संदेह भी था क्योंकि जिन बक्सों में इन चट्टानों के टुकड़े लाए गए थे, उनमें रिसाव हो गया ता। इस कारण ये नमूने वातावरण की वायु के संपर्क में आकर प्रदूषित हो गए थे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि नाभिकीय विखंडन के बाद चंद्रमा पर चट्टानों और मिट्टी में मौजूद आक्सीजन की प्रोटोन के रूप में सूर्य से उत्सर्जित हाइड्रोजन के साथ हुई अंतर्क्रिया से पानी बना होगा। एम - 3 वैज्ञानिकों की टीम में से एक टेनेसी युनिवर्सिटी के लैरो टेलर ने कहा कि जैसे ही ये प्रोटोन चंद्रमा से टकराते हैं और वे ऑक्सीजन को मृदा तत्वों से अलग कर देते हैं। जहां स्वतंत्र ऑक्सीजन और हाइड्रोजन एक साथ होते हैं, वहां इस बात का पता लगाने के अधिक अवसर होते हैं कि वहां पानी बनेगा।

एम - 3 उपकरण ने पानी के तत्वों की पहचान के लिए इस बात का विश्लेशण किया कि चंद्रमा की सतह पर सूर्य का प्रकाश किस तरह परावर्तित होता है जिसमें वैज्ञानिकों ने पानी जैसे रासायनिक संबंधों वाले तत्वों को पाया। हालांकि यह उपकरण चंद्र सतह की अत्यंत ऊपरी धरती परतों को ही देख सकता जो कुछ सेंटीमीटर नीचे तक हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने विभिन्न खनिजों की विभिन्न तरंगदैर्ध्यों में परावर्तित प्रकाश का अध्ययन किया और इन अंतरों का इस्तोमाल यह जानने के लिए किया कि ऊपरी मिट्टी की पतली परत में क्या मौजूद है। (जनसत्ता, 25 सितंबर,2009)

साहित्य की पहुंच समाज के सभी तबकों तक

पंकज बिष्ट

साहित्य परिवर्तन का औजार होता है। यह मानने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन केवल यही जरूरी नहीं है। राजनीतिक पार्टियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। साहित्य भी इसमें औरों की तरह योगदान देता है। समाज किसी एक से नहीं बनता है, इसमें सभी चीजें योगदान देते हुए चलती हैं।

साहित्य में निश्चित रूप से कृतिकार का व्यक्तित्व झलकता है, कलात्मक कृति में उसकी मानसिकता, उसकी आन्तरिक रचना से गुजरकर रचनात्मक ऊर्जा लेख से जुड़ती है, उसके सभी मूल्य इससे होकर गुजरते हैं।

साहित्य जीवन से जुड़ा होने के कारण आनंद के साथ मनोरंजन प्रदान करने का कार्य भी करता है। यह जहां एक ओर रस का आनंद देता है, वहीं उसकी अनुभूति कराता हुआ भी चलता है। साहित्य कोई उस तय तक वैचारिक काम नहीं है, यह जीवन से जुड़कर अपनी भूमि तलाशता है। इसके माध्यम से हमें मनोरंजन भी मिलता है। जीवन केवल कठोकता से ही नहीं चल सकता, इसमें समय समय पर मर्मवेदना भी झलकती रहती है। यह इसके लिए भी मददगार है। कलाएं व्यक्ति के जीवन की कठिनाइयों भरे क्षमों में मददगार साबित होती हैं।

परिवर्तन समाज की अवश्यंभावी प्रक्रिया है, जिसका निरंतर चलते रहना जरूरी है। जो भी जीवन में परिवर्तन आ रहा है, उन्हें लाने के लिए लक्षित करना ही जरूरी है। मानव विकास चरम की प्रक्रिया है। उसे बदलने के लिए लगातार लगे रहना जरूरी है। साहित्य जीवन का अंग है, वह समाज से ही निकलता है। उसी को केंद्र बिंदु में रखकर कोई भी साहित्यकार अपनी रचना करता है। वह सामाजिक बुराइयों को भी रेखांकित करता है।

जातीय व्यवस्था जीवन की सबसे निर्मम व्यवस्था है। अपने ही समाज के एक हिस्से को उसने गुलाम बना दिया है। इस तरह का अन्याय समाज के लिए बहुत घातक है। सामाजिक परिवर्तन जरूरी है। बेहतर जिंदगी के लिए आर्थिक जरूरतों का पूरा होना भी बहुत जरूरी है। आधुनिक जीवन की अवधारणा है कि आदर्श जीवन क्या है - न्यूनतम शिक्षा और चिकित्सा?  यह भी इस समाज में उपलब्ध न हो पाये, तो यह समाज के लिए कलंक होगा।

हिंदी साहित्य में आज जो स्थिति उभर रही है, उसे हम केवल मनोरंजन हेतु साहित्य सृजन नहीं मान सकते। रचना के केंद्रबिंदु में दलित, आदिवासी उभर कर आ रहे हैं। साथ ही अभिव्यक्त भी हो रहे हैं। आज के साहित्य ने लगभग सभी महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने का प्रयास किया है।

(लेखक समयांतर के संपादक हैं, प्रभात खबर, 13 सितंबर,2009 से साभार)

 

भारतीय अर्थव्यवस्था कैसी संभली रही?

वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में भारत के ग्रामीण विकास और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में जानी मानी अर्थशास्त्री जयति घोष कहती हैं कि जहां संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन सरकार की पहली पारी गंभीर और सकारात्मक रही, वहीं दूसरी पारी में सरकार कम गंभीर नज़र आ रही है. उनका मानना है कि सरकार की कुछ तैयारियों और बदलावों के संकेत स्वागत योग्य नहीं हैं।

उनका मानना है कि वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था के कुछ स्थिर और संभले रहने के पीछे की वजह यहाँ है की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मज़बूत है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ऐसे कौन से पहलु हैं जिनके कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल समय में भी मज़बूती मिली? इसे किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कई पहलुओं पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर और जानी मानी अर्थशास्त्री जयति घोष से बीबीसी की विशेष बातचीत:

क्या आप सहमत हैं कि वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था के कुछ संभले रहने में ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का योगदान है? यदि हाँ, तो किस रूप में।

बिल्कुल है। बहुत अहम भूमिका है क्योंकि अभी भी 70 प्रतिशत श्रम ग्रामीण क्षेत्रों में ही है।  इसकी एक अहम वजह यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था बहुत मज़बूत तो नहीं है मगर दुनिया की हलचल से थोड़ी सी अलग है।

ये बात अलग है कि पिछले 10-15 साल से ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के सामने भी कई संकट पैदा हुए हैं लेकिन यूपीए की सरकार 2004 में बनने के बाद ग्रामीण क्षेत्र की ओर थोड़ा सा ध्यान बढ़ा है। पैसा ग्रामीण क्षेत्रों में गया है. किसानों के बैंकों से लिए गए ऋण माफ़ किए गए हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि रोज़गार गारंटी क़ानून जैसी चीज़ ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को मिली है।

इन कुछ वजहों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में थोड़ा सा सुधार आया है और इस सुधार ने देश की पूरी अर्थव्यवस्था को संभाले रखने में अपनी भूमिका निभाई है। पर चिंता अब इस बात को लेकर है कि देश में आर्थिक संकट के कारण जो कुछ समस्याएं पैदा हुई हैं, उसके साथ सूखा भी पड़ गया है। इसकी वजह से किसानों के सामने एक बड़ी संकट की स्थिति पैदा हो गई है।

किसानों के हिसाब से देखें तो पिछले वर्ष खाद्यान्न का दाम बढ़ा और फिर नीचे गिरा। इसी तरह कैशक्रॉप का दाम जैसे तिलहन, गन्ना आदि भी ऊपर गया और फिर दाम नीचे गिरे।  यह भी एक संकट है।

इन सारी स्थितियों को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्र में संकट की स्थिति पैदा होने की आशंका है।  इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है।

आख़िर ऐसा क्या हुआ कि ग्रामीण स्तर के बाज़ार संभले रहे?

केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी ने रोज़गार गारंटी क़ानून में बदलावों की बात की है जिनसे कई विशेषज्ञ और कार्यकर्ता असहमत हैं।

देखिए, पहली बात तो है कि किसानों की कर्ज़ माफ़ी ने आबादी को कुछ राहत दी। हालांकि सारे किसान न तो बैंकों से ऋण ले पाते हैं और न ही उन तक इसका लाभ पहुँचा है, पर कुछ किसानों के कर्ज़ का बोझ घटा और उनको राहत मिली है।

दूसरा और सबसे बड़ा योगदान है रोज़गार गारंटी क़ानून का. रोज़गार क़ानून की वजह से लोगों को गांव में एक तरह की गारंटी तो मिली कि 100 दिन का काम मिलेगा. जहाँ गांवों में कोई विशेष राहत योजनाएँ नहीं चल रही थीं, स्थितियां और बिगड़ सकती थीं पर रोज़गार क़ानून ने स्थितियों को संभाल। लोगों को न्यूनतम मज़दूरी नहीं मिलती थी।  यहाँ उस मजदूरी के साथ 100 दिन का वादा था. सौ दिन न सही, 30-40 दिन तो काम मिला ही। इससे बहुत राहत मिली है लोगों को।

हम ऐसा भी न सोचें कि गांव की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से दुनिया के बाज़ार से अलग है. बल्कि पिछले 15 बरसों में इनका संबंध गहरा हुआ है क्योंकि अब किसान भी दुनिया के बाज़ार की ओर देखकर ही बीज बोते हैं, फ़सल पैदा करते हैं. उन्हें भी बाज़ार से बीज या खाद खरीदनी ही पड़ती है।

दूसरी बात यह है कि भारत का जो निर्यात पर आधारित बाज़ार है - जैसे आईटी या टैक्सटाइल के क्षेत्रों में हमारे गांवों से पलायन करके गए मजदूर - उनका भी बहुत अहम योगदान है। अगर प्रोफ़ेशनल के तौर पर नहीं तो सिक्योरिटी, क्लीनर, ड्राइवर जैसी कितनी ही ज़िम्मेदारियां ग्रामीण क्षेत्र से गए लोग उठाते हैं। इन लोगों के काम का मेहनताना कम है और इस वजह से इन लोगों ने हमारे कामों की कुल लागत को कम ही रखा है। इसलिए भी हम दुनिया के सामने मज़बूती से खड़े रह।

अब निर्यात घटने की वजह से इनमें से काफी लोग वापस जा रहे हैं। ये लोग उन्हीं इलाकों में वापस जा रहे हैं जहाँ स्थितियां पहले ही खराब हैं।  नक्सलवाद की समस्या है, विकास न होने की समस्या है, आधारभूत ढांचे के न होने की समस्या है।  यह पूरी स्थिति विस्फोटक हो सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और स्थिति संभली रही है और इसकी वजह बना है रोज़गार गारंटी क़ानून।

 

अर्थशास्त्री जयंति घोष

देखिए, आर्थिक संकट हो या न हो, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभालना तो है ही। सबसे पहले जो बुनियादी ज़रूरतें हैं, उन्हें लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। हर घर में बिजली पहुँचाना, यह तो कोई बड़ी बात नहीं है. हर गांव तक पक्का रास्ता पहुँचाना, यह कोई मुश्किल काम तो नहीं है।  बांग्लादेश तक ने ऐसा सुनिश्चित कर लिया है तो फिर भारत में ये क्यों नहीं हो पा रहा है।  पीने का साफ़ पानी घर-घर तक पहुँचना ज़रूरी है।  इतना तो किया भी जा सकता है।

दूसरा ध्यान देना होगा सामाजिक स्तर पर आधारभूत ढांचा खड़ा करने की ओर..सुविधाएं उपलब्ध कराने की ओर.. जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा आदि...

अगर भारत ऐसा कर पाता है तो एक तो रोज़गार बढ़ेगा, दूसरा ग्रामीण क्षेत्र की राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी. उत्पादन में बढ़त होगी. और इन सब चीज़ों से खुद विकास दिखाई देने लगेगा. अगर हम ग्रामीण विकास को मज़बूत कर लें तो हमारी अर्थव्यवस्था को इस बात की चिंता नहीं करनी पड़ेगी कि दुनिया की अर्थव्यवस्था में क्या हो रहा है.

क्या आपको लगता है कि आम आदमी का नारा देकर चलने वाली यूपीए सरकार ग्रामीण विकास को लेकर, ग्रामीण भारत की आर्थिक और बुनियादी स्थिति को लेकर गंभीर है?

अगर सरकार समग्र विकास की बात कह रही है तो यह तभी पूरा हो सकता है जब वह ग्रामीण विकास भी सुनिश्चित करें। अभी तक के प्रयासों से यही दिखाई देता है कि सरकार तब तक इस दिशा में कोई क़दम उठाती है जब तक कि उस पर इसका दबाव हो. इससे पहले की सरकार में (2004-09) वामदलों का काफ़ी योगदान ग्रामीण क्षेत्र को लेकर रहा।  उनकी ओर से सरकार पर ऐसा दबाव रहा जिसके चलते ग्रामीण विकास पर ज़ोर दिया गया। प्रगतिशील अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा गया।

इस बार स्थितियां बदली हुई हैं। ग्रामीण विकास के प्रति सरकार उतनी गंभीर नहीं है। सभी के लिए खाद्य सुरक्षा की बात छोड़कर कुछ की खाद्य सुरक्षा की बात करने लगी है। रोज़गार गारंटी क़ानून के साथ भी कुछ बदलाव लाने की कोशिश की जा रही है जो कि इसके ख़र्च और प्रभाव को सीमित करेंगे।

ये कोई अच्छे संकेत नहीं हैं। यदि सरकार पर सामाजिक स्तर पर दबाव बनेगा तब ही वह चुनाव से पहले किए गए वादों को ईमानदारी से निभाएगी। (बीबीसी)

 

सिक्किम की जैव विविधता

र्ल्ड वाइड फंड (जब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की एक ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि 1998-2008 तक पूर्वी हिमालय क्षेत्र में खोजी गई 353 नयी जीव और उद्भिद् प्रजातियों का सिक्किम में पता चला है। ईस्टर्न हिमालय नेटवर्क द्वारा तैयार की गई नई पुस्तिका 'व्हेयर वर्ल्ड्स कोलाइड'  में उल्लेख किया गया है कि पिछले 10 सालों में हर साल 35 नयी प्रजातियों की खोज के साथ पूर्वी हिमालय क्षेत्र में 1998 से 2008 की अवधि में 353 प्रजातियों की खोज की गई थी। इस खोज में 242 उद्भिद्, 16 उभयचर प्राणी, 16 सरीसृप, 14 मछलियां, 2 पक्षी, 2 स्तनपायी प्राणी और कमसेकम 61 रीढ़विहीन प्राणी शामिल हैं। इनमें मछलियों की तीन और उद्भिदों की 16 नयी प्रजातियां पूर्वी हिमालय क्षेत्र सिक्किम में पायी गई हैं। 1998-2008 की अवधि में सिक्किम में खोजी की गयी प्रजातियों की मछलियों में सिउडोपोडा, एबनोर्मिस, सियोपोडा हिंगस्टोनी और सिउडोपोडा माइनर मछलियां हैं। सिक्किम में उद्भिदों की 16 प्रजातियों की खोज की गई है जिनमें कैलेंथे युक्सम्नेंसिस, एल्युरी टाप्टेरिस्फ्लेवोपाइजिमिया, एल्युरीटाप्टेरिस सिक्किममेन्सिस, एस्ट्रागेलुस लाचुंगेन्सिस, कोलेगिनी पैंटलिलिगाइ, क्रिप्टोकारिया डेकी, लेपिडोग्रेम्मिटिस सिक्किमेन्सिस, लिपारिस डाग्चेनाई, फिलांथस सूडोपार्विफोलियस, माइर्मेकिस बाखिममेन्सिस, ओबेरोनिया हिन्नीव्ती, प्टेरिस हिमालयेन्सिस तथा पर्सिया सिक्किमेन्सस। उद्बिद जगत में आर्किड (नेपाली में सुनाखरी)) का इसकी सुंदरता के लिए काफी महत्व है। 1998-2008 तक पूर्वी हिमालय क्षेत्र में 21 नयी प्रजातियों के आर्किडों की प्रजातियों का पता चला है। रिपोर्ट में कोइलोजिन पातंलिंगी प्रजाति भी सिक्किम में पाए जाने का उल्लेख किया गया है।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने कहा है कि पिछले पचास सालों में जैव विविधता के संरक्षण के प्रयासों के बावजूद जनसंख्या वृद्धि और वैश्विक और स्थानीय बाजार की बढ़ती मांग की वजह से दक्षिण एशिया क्षेत्र पर अत्यधिक दबाव पड़ता जा रहा है। ये दबाव हैं - खेती की समस्याएं, पेड़ों की कटाई, जलावन के लिए पेड़ों की कटी, घरेलू मवेशियों की ग्रेजिंग, अवैध शिकार, खदानें, प्रदूषण, जल विद्युत परियोजनाएं और घटिया बुनियादी ढांचा। रिपोर्ट में यह क्षेत्र वैश्विक जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से भी सुरक्षित नहीं है जो इन चुनौतियों को और ज्यादा बढ़ा सकता है।

 

 मूर्तिभंजक जसवंत सिंह

 

के. विक्रम सिंह

मैंने जसवंत सिंह की वह पुस्तक नहीं पढ़ी है, जिसको लेकर बवाल मचा हुआ है और न ही उसे मेरा पढ़ने का इरादा है। मैं जसवंत सिंह को न इतिहासकार मानता हूं न ही बुद्धिजीवी। जो व्यक्ति इक्कीसवीं सदी में भी अपनी इज्ज्त के बचाव में रेगिस्तान के ठाकुरों के लिए नाक के महत्व को समझने की कोशिश करता है, मेरे लिए उसे किसी भी प्रकार का बुद्धिजीवी मानना कठिन है। यह किताब लिखने के पीछे जसवंत सिंह का जो भी लक्ष्य रहा हो, इसके कारण जो विवाद उठा है, वह शायद कुछ मुद्दों पर एक नए सोच की शुरुआत कर सकता है।

मीडिया में भी जो कुछ आया है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि मोटे तौर से जसवंत सिंह का कहना यह है कि अगर जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों के बारे में कुछ शांति और धैर्य से सोचा होता तो भारत का बंटवारा टल सकता था। इसी बात का दूसरा पक्ष यह है, जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि मुहम्मद अली जिन्ना अपने निजी जीवन में बिल्कुल सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष थे। उन्हें नमाज भी सही ढंग से पढ़ना नहीं आता था तो उनके कट्टरवादी होने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए थी और इलीलिए उन्होंने मुसलमानों की नुमाइंदगी संभाली और बाद में अलग पाकिस्तान का नारा उठाया। इसलिए जसवंत सिंह का यह कहना कि जिन्ना सेक्युलर थे, कोई नई बात नहीं है। यह जरूर सोचने की बात है कि राजनीतिक नेताओं का मूल्यांकन करने के लिए क्या यह प्रासंगिक नहीं है कि उनके निजी जीवन के साथ -  साथ उनकी राजनीतिक-युद्धनीति और मूल्य क्या हैं? दबाव कुछ भी रहा हो, अंत में जिन्ना ने मजहब के नाम पर भारतीय मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग की, तो क्या उन्हें धर्मनिरपेक्ष कहना सही होगा?

खैर, ये दोनें ही प्रश्न - क्या बंटवारे को टाला जा सकता था और क्या जिन्ना एक धर्मनिरपेक्ष राजनेता थे - अब इतिहास के तेजी से धुंधलाते पन्नों में लगभग लुप्त हो चुके है और इनका क्या सही जबाव है, इससे अब कोई बहुत फर्क पड़ने वाला नहीं है। जिस प्रश्न से फर्क पड़ सकता है, वह है क्या बंटवारा एक गलती थी और क्या इस गलती को भविष्य में सुधारा जा सकता है। भारत में लगभग सभी राजनीतिक दल और राजनेता यह मानते हैं कि बंटवारा एक गलती थी। हैरानी की बात है कि भाजपा जैसा दल भी इसको गलती ही मानता है, हालांकि उनकी राजनीतिक विचारधारा का यह एक स्तंभ है कि भारत हिंदुओं का देश है, जिसमें मुसलमान बराबरी से नहीं, लेकिन दूसरे दर्जे के नागरिक बन कर रह सकते हैं। अगर इस विचार को पूरे तार्किक ढंग से देखें तो भाजपा को बंटवारे से खुश होना चाहिए, क्योंकि इस तरह भारत का कई करोड़ मुसलमानों से पीछा छूट गया। तर्क कुछ भी हो, भाजपा भी यह मानती है कि बंटवारा एक गलती थी और इसीलिए बंटवारे की जिम्मेदारी वह कांग्रेस-नेताओं के माथे मढ़ना चाहती है।

नई बात यह है कि पाकिस्तान के कुच बुद्धिजीवी और लेखक, जिनके विचार जसवंत सिंह की पुस्तक के बारे में 'तहलका' जैसी पत्रिकाओं में छपे हैं, वे भी अब यह पूछते नजर आते हैं कि बंटवारा एक ऐतिहासिक गलती थी, जिससे बचा जा सकता था। मुसलमानों को जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग इसलिए करनी पड़ी क्योंकि कांग्रेस केवल हिंदुओं की नुमाइंदगी करने वाली बन गई थी और वह मुसलमानों के साथ सत्ता बांटने के लिए तैयार नहीं थी। यानी कांग्रेस मुसलमानों को संविधान के तहत सुरक्षा और बराबर के अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थी। कुछ ऐसे ही विचार प्रकट किए हैं, हैदर एजाज ने, जो पाकिस्तान के  'द फ्राइडे टाइम्स'  के सल्लाहकार संपादक हैं और मुशाहिद हुसेन ने, जो पाकिस्तान की विदेशी मामलों की समिति के चेयरमैन हैं। यह उन्होंने सीधे नहीं कहा है, बल्कि यह बात इस बात से निकलती है कि उन्होंने बंटवारे और जिन्ना के बारे में जसवंत सिंह के विचारों से सहमति जताई है।

इससे एक नई संभावना पैदा होती है, बंटवारे की गलती को दूर करके इन दोनों देशों के इकट्ठा होने की संभावना। अगर हम केवल आज के संदर्भ में देखें तो ऐसी संभावना निरी असंभव लगेगी, लेकिन यहां पर एक दृष्टि इतिहास की तरफ डालना आवश्यक है। सन् 1944 तक यूरोप युद्ध का शिकार था। उस समय यूरोप की एकता की बात सोचना बिल्कुल अजीब लगता होगा। सत्तर साल से कम अरसे में यूरोपीय आर्थिक समुदाय के तहत यूरोप के लगभग सभी देशों ने मिल कर एक राज्य-संघ का रूप ले लिया है। एशिया में भी सार्क की पहल हो चुकी है। क्या यह असंभव नहीं है कि निकट भविष्य में, यानी गले बीस-तीस सालों में, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका अपनी-अपनी सार्वभौमिकता को कुच तज कर एक आर्थिक और राजनीतिक संगठन के हिस्से बन जाएं? भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच यह संबंध तबी स्थापित हो पाएगा जब हम बंटवारे को गलती मान कर उसे सुधारने की कोशिश करें। अगर जसवंत सिंह की पुस्तक, अनचाहे ही सही, इस दिशा में थोड़ी भी मदद कर पाती है तो मैं रेगिस्तान के ठाकुर को धन्यवाद करना चाहूंगा। (जनसत्ता, 30 अगस्त से साभार)

 

पत्रकारिता और भाषा

 

डा. महाराजकृष्ण जैन

यों तो संचार के सभी माध्यमों में भाषा का प्रयोग बहुत सावधानी से करना पड़ता है, किंतु पत्रकारिता में भाषा की ओर सामान्य से अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं कि पत्रकारिता में भाषा के विषय में कोई कठोर तथा अकाट्य नियम लागू होते हों। वास्तव में पत्रकारिता की भाषा का स्वरूप पत्रकारिता के विकास तथा आवश्यकताओं से निर्धारित हुआ है।

हिंदी पत्रकारिता अबी अंग्रेजी की तुलना में बहुत पिछड़ी हुई है। अत: हिंदी एक समृद्ध और समर्थ भाषा होते हुए भी आम तौर पर हिंदी पत्रकारिता में इसके उचित प्रयोग पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। हमारे अखिल भारतीय पत्रों की भाषा सामान्य पाठक के लिए काफी कठिन और दुर्बोध होती है, तो दूसरी ओर छोटे तथा क्षेत्रीय पत्रों की भाषा प्राय: अशुद्ध और त्रुटिपूर्ण रहती है। कहना न होगा कि ये दोनों नीतियां ही गलत हैं। हम नवोदित पत्रकारों से आशा करते हैं कि वे इस क्षेत्र में आकर पत्रकारिता के अनुकूल भाषा के प्रयोग की स्वस्थ परंपरा बनाएंगे।

 

अनुकूल भाषा तीन बातों से प्रभावित अवं निर्धारित होती है।

1. पाठकों का बौद्धिक तथा शैक्षणिक स्तर

2. समाचार पत्र पढ़े जाने की स्थितियां

3. समाचार पत्र की तकनीकी सीमाएं

 

1. पाठकों का स्तर

समाचार पत्र किसी विशिष्ट पाठक वर्ग के लिए नहीं बल्कि जन-सादारम के लिए प्रकाशित किया जाता है। यह आवश्यक नहीं है कि समाचार पत्र का प्रत्येक पाठक उच्च शिक्षित हो। हमारे देश में साक्षरता में तेजी से वृद्धि हो रही है, किंतु सभी साक्षर व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। पर उनमें से बहुत से अखबार पढ़ते हैं। अत:  यह आवश्यक है कि समाचार पत्रों की भाषा सरल और सुबोध हो।

इसीलिए विभिन्न वर्गों में चलने वाले पत्रों की भाषा में भी अंतर होता है। कोलकाता का अंग्रेजी दैनिक स्टेट्समैन भारत में बसे अंग्रेजों, ईसाइयों तथा एंग्लो इंडियनों में अधिक बिकता था। अत: इसकी अंग्रेजी अब तक काफी कठिन होती है। दूसरी ओर चंडीगढ़ से निकलने वाला ट्रिब्यून अपनी भाषा की सरलता के लिए भी काफी लोकप्रिय है।

हिंदी पत्रों पर इस दृष्टि से एक विशेष दायित्व आ जाता है। सरकार के विरोध तथा उदासीनता के बावजूद हिंदी अपनी शक्ति के बल पर देश की संपर्क भाषा बन गई है। करोड़ों अहिंदी भाषी व्यक्ति भी हिंदी भाषी क्षेत्रों में जाकर बसने पर अथवा अपनी मातृभाषा में अच्छे समाचार पत्र न मिलने के कारण हिंदी के पत्र पढ़ते हैं। अत: आवश्यक है कि उन पाठकों की सुविधा का ध्यान रखते हुए पत्रकारिता की भाषा सरल रखी जाए।

 

2. समाचार पढ़े जाने की स्थितियां

यह भी ध्यान रखें कि समाचार पत्र प्राय: उस प्रकार नहीं पढ़ा जाता जिस प्रकार पाठ्य पुस्तकें, साहित्य अथवा अच्छी पत्रिकाएं पढ़ी जाती हैं। समाचार पत्र को लोग पृथक समय नहीं देते बल्कि व्यस्ततापूर्ण जीवन में बचे-खुचे समय में ही इसे पढ़ लेना चाहते हैं। क्लर्क दफ्तर जाने की जल्दी में चाय, नाश्ते या भोजन के साथ-साथ मुख्य खबरें देश डालने का प्रयास करता है, या बस की लाइन में, अथवा चलती बस में पत्र पढ़ने का प्रयत्न करता है। व्यस्त दुकानदार ग्राहकों को निबटाते हुए बीच-बीच में एक नजर खबरों पर डाल लेना चाहता है। यानी की भी आराम से बैठकर धैर्यपूर्वक अखबार नहीं पढ़ पाता। समाचार-साप्ताहिक या पत्रिका का जीवन एक सप्ताह या अधिक होने से उसे पिर भी अधिक समय मिलजाता है, जबकि समाचार पत्र बेचारे का यह दुर्भाग्य है कि वह प्रात: या तीसरे पहर तक जितना पढ़ा जाये,पढ़ा जाये, नहीं तो रड्डी के ढेर में पहुंच जाता है।

प्रकट है कि इतनी व्यस्तता, भागदौड़ और परेशानियों के बीच पाठक तभी समाचार पत्र पढ़ेगा यदि उसकी भाषा उसे कठिन, दुर्बोध तथा उबाने वाली न लगे। यदि पाठक को समाचार में बहुत से शब्द कठिन मिलते हैं, या कुछ वाक्यों का अर्थ वह नहीं निकाल पाता, तो वह फिर उस समाचार को छोड़कर दूसरा समाचार पढ़ने लगेगा। या पत्र ही एक ओर फेंक देगा।

एक ओर तो समाचार पत्र सुभीते से पढ़ा नहीं जाता। दूसरी ओर फिल्म, रेडियो, टीवी आदि इसकी प्रतियोगिता में हैं। संचार के माध्यमों में श्रोता अथवा दर्शक को बौद्धिक प्रयास बिल्कुल नहीं करना पढ़ता। अत:  यदि पत्रकारिता की भाषा कठिन होगी तो पाठक उससे विमुख होकर इन माध्यमों की शरण में चला जाएगा। इस प्रतिद्विंद्विंता के कारण समाचार पत्र की भाषा को सरल, सुबोध, प्रवाहमय एवं रोचक रखना और भी जरूरी हो गया है।

3.तकनीकी आवश्यकताएं

 

 समाचार पत्रों का टाइप बारीक होता है और कालम संकरे। इसका भी पत्रकारिता की भाषा पर प्रभाव पड़ता है। कालम संकरा होने से लंबा वाक्य कई पंक्तियों में आता है, और पाठक को उसे पढ़ने के लिए दृष्टि अधिक बार दायें हाथ से हटाकर बायें हाथ ले जानी पड़ती है। चौड़े आकार की पुस्तक में वही वाक्य इतनी पंक्तियों में न फैलता। अत:  प्रकट है कि समाचार पत्र में वाक्य छोटे-छोटे होने चाहिएं।

यही बात अनुच्छेदों की लंबाई में है। कालम संकरा होने से उतनी ही सामग्री समाचार पत्र में अधिक लंबाई तक फैलती है। अत: अनुच्छेद वास्तव में जितना लंबा है उससे अधिक लंबा दिखता है। बारीक टाइप से छपा लंबा अनुच्छेद पाठक को ठोस और बोझिल लगता है। अत:  समाचार पत्र में अनुच्छेद भी छोटे-छोटे होने चाहिएं। आम तौर पर जितनी कालम की चौड़ाई है, उससे अदिक लंबा अनुच्छेद पाठक में अरुचि और विमुखता उत्पन्न करता है।                  (शुभ तारिका, कहानी लेखन महाविद्यालय, अंबाला, अगस्त 2009 से साभार)

 

(तुलनात्मक अध्ययन)

महावीर प्रसाद द्विवेदी और पारसमणि प्रधान: एक तुलनात्मक दृष्टिकोण

शैलेंद्र कुमार दुबे

वास्तव में साहित्य, साहित्यकार, समाज एवं मानव जावन का संबंध अन्योन्याश्रित है। साहित्य समाज का दर्पण होता है तो साहित्यकार समाज का ही अंग होता है। समाज का भी निर्माण व्यक्ति से ही होता है अत: साहित्यकार को भी समाज के प्रत्येक व्यक्ति से संपर्क स्थापित करना अनिवार्य हो जाता है। इस प्रकार साहित्यकार व्यष्टि एवं समष्टि का स्रष्टा अथवा प्रजापति होता है।

साहित्यकार जीवन की अभिव्यक्ति साहित्य की विभिन्न विधाओं को माध्यम से करता है। अत: साहित्य और जीवन का वही संबंध है जो शरीर और आत्मा का। तात्पर्य यह है कि साहित्य भाषा के माध्यम से जीवन की व्याख्या प्रस्तुत करता है। 'लिटेरेचर इज फंडामेंटली ऐन एक्सप्रेशन आफ् लाइफ थ्रू दी मीडियम आफ् लैंग्वेज'। पाश्चात्य विद्वानों द्वारा दी गई उपर्युक्त परिभाषाओं को देखने से पता चलता है कि निश्चय ही, साहित्य जीवन के अत्यधिक निकट है, वह विचारशील आत्माओं की अमर अभिव्यक्ति है। साहित्य की शक्ति का उपभोग समाज-कल्याण अथवा जीवन उत्थान में माना जाता है। इस प्रकार उसके द्वारा निर्मित साहित्य सत्यं, शिवं सुंदरं का प्रतीक होता है। वह हमारे समग्र जीवन को, अपनी मार्मिक उक्तियों से प्रभावित कर लेता है। इस आधार पर हम यदि महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं पारसमणि प्रधान का जब मूल्यांकन करते हैं, तो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दोनों महान साहित्यकारों ने अपने-अपने युग विशेष का प्रतिनिधित्व किया है। अत:  इनकी साहित्य साधना किस प्रकार अपने युग को प्रभावित करती है, इसकी चर्चा अलग-अलग करेंगे।

पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी आधुनिक हिंदी के युगप्रवर्तक लेखक और आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं। जिनके मस्तिष्क की भगीरथ शक्ति संसार में नवीन विचारधारा प्रवाहित करती है, 'ते नरवर थोरे जग माँही।' किंतु जो नई नहरें निकालकर उस धारा का स्वच्छ जल अपने समाज के लिए सुगम कर देते हैं, वे भी हमारी अभ्यर्थना के अधिकारी हैं। आचार्य द्विवेदीजी ने सतत परिश्रम से खड़ी बोली के गद्य और पद्य की एक पक्की व्यवस्था की और दोनों प्रणालियों द्वारा, पूर्व और पश्चिम की, पुरातन और नूतन, स्थायी और अस्थायी ज्ञान संपत्ति संपूर्ण हिंदी भाषा-भाषी प्रांतों में मुक्तहस्त से वितरित की; जिसके लिए हम उनके ऋणी हैं।

 

भारतेंदु युग (संवत् 1950-1975) में हिंदी गद्य का जितना विकास हुआ वह भाषा विषयक विचार से अपर्याप्त था। द्विवेदीजी ने इस कार्य को पूरा किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में व्याकरण की शुद्धता और भाषा की सफाई के प्रवर्तक द्विवेदीजी ही थे। द्विवेदीजी ने हिंदी गद्य को एक सुव्यवस्थित रूप प्रदान किया और उसे नाना भावों का व्यंजक बनाकर युग प्रवर्तन का कार्य भी किया। इनसे पूर्व लेखकों में विरामचिह्नों के संबंध में अनुच्छेद निर्वाह में बड़ा प्रमाद था। उन्होंने इस ओर अपने लेखन के आदर्श से सबको आकृष्ट किया। वास्तव में उन्होंने इस ओर अपने अनेक लेखकों को कलम पकड़ना सिखाया। इस युग में ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों को महत्व मिला। उपन्यास, निबंध, कहानी और आलोचना लिखने की प्रवृत्ति बढ़ी। व्याख्यात्मक, आलोचनात्मक तथा विचारात्मक तीनों प्रकार की शैलियों को अपनाया गया।

अत: इसे हम हिंदी साहित्य (गद्य) का पुनरुत्थान काल कह सकते हैं। द्विवेदीजी ने भाषा की उन्नति के लिए जो कदम उठाया, वह सराहनीय है। कहते हैं, उन्हें घर-घर जाकर हिंदी सिखानी पड़ी थी। सरस्वती नामक पत्रिका का प्रकाशन भी इसी दृष्टि से किया गया। उस समय हिंदी कोई लिखता न था, पर साहित्यकारों ने लोगों में लिखने की भावना की बीजारोपण किया। सरस्वती के माध्यम से नये-नये साहित्यकारों की रचनाएं प्रकाश में आने लगीं। और हर विधा नाटक, कहानी, निबंध, कविता आदि को प्रोत्साहन मिला। कर्मवीर का प्रकाशन भी इसी समय प्रारंभ हो गया था।

उनके लेख हिंदी भाषा की उत्पत्ति, कालिदास की निरंकुशता, मिश्रबंधु का हिंदी नवरत्न, तिलक का गीता भाष्य और ऐसे अन्य अनेक आलोचनात्मक लेख तथा टिप्पणियां द्विवेदीजी की जाग्रत प्रतिभा का परिचय कराते हैं। जो कुछ कार्य द्विवेदीजी ने किया, वह अनुवाद का हो, काव्य रचना का हो, आलोचना का हो अथवा भाषा-संस्कार का हो, या केवल साहित्य-नेतृत्व का ही हो - वह स्थायी महत्व का हो या अस्थायी - हिंदी में युग विशेष के प्रवर्तन और निर्माण में सहायक हुआ है, और उसी के आधार पर नवीन युग का साहित्य प्रासाद ख़ड़ा किया जा सका है। उनकी समस्त कृतियां युग की प्रतिनिधि होने का गौरव रखती हैं।

द्विवेदीजी की तरह ही नेपाली साहित्य क्षेत्र में भाषाविद् साहित्यकार पारसमणि प्रधानजी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रख्यात 'सूधपा' समूह के अंतिम लेखक डा. पारसमणि प्रधानजी का निधन 2 फरवरी 1986 को हुआ। इनका जन्म 1 जनवरी 1898 को कालिम्पोंग में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही नेपाली भाषा और साहित्य के प्रति इनकी रुचि थी। अपनी मातृभाषा नेवारी होते हुए भी नेपाली भाषा और साहित्य की उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहे।

सन् 1914 में वह 'हिंदी साहित्य समाज' के सचिव भी बने, पर नेपाली भाषा की पुस्तकों को उसमें स्थान नहीं दिए जाने के कारण इस समाज से त्याग-पत्र दे दिया। उन्होंने आगे चल कर सन् 1914 में 'नेपाली साहित्य समाज'  की स्थापना की, जिसके माध्यम से नेपाली छात्रों में नेपाली भाषा और साहित्य के प्रति रुचि बढ़ी।

डा. पारसमणि प्रधान और उनके सहयोगियों ने लगातार तीन वर्षों तक संघर्ष करके 24 जुलाई 1918 में प्रवेशिका, आई.ए. और बी.ए. परीक्षा में वर्नाकुलर के रूप में नेपाली भाषा की मान्यता दिलवायी। बाल्यकाल से ही इनकी अभिरुचि छापाखाना के काम में थी। जिस समय वह दार्जिलिंग हाई स्कूल में पढ़ रहे थे, उस समय गोर्खो खबर कागत् एवं बनारस से प्रकाशित होने वाली पत्रिका चन्द्र और गोर्खाली में अपनी रचनाओं को छपवाते थे। छापाखाना के काम में विशेष अभिरुचि के कारण उन्होंने कर्सियांग आकर हरिसिंह थापा वर्मा के प्रेस में 6 महीने तक काम सीखने के बाद उसी प्रेस के मैनेजर के पद पर नियुक्त भी हुए।

इसी प्रेस से सन् 1918 में चन्द्रिका नामक मासिक पत्रिका का संपादन भी किया। चन्द्रिका पत्रिका को उस समय के अनेक लेखकों की सदभावना प्राप्त थी। इसी पत्रिका के माध्यम से आशुकवि शम्भुप्रसाद का 'महेन्द्रमल्ली'  शीर्षक निबंध को नेपाली भाषा में छपने वाला प्रथम निबंध का दर्जा डा. ईश्वर बराल ने दिया है. साहित्यिक पत्रकारिता में डा. पारसमणि प्रधान को दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि सन् 1948 में भारती मासिक पत्रिका के माध्यम से मिली। इससे स्व. शिवकुमार राई, स्व. अगमसिंह गिरी, स्व. गनुसिंह गुरुंग, स्व. परशुराम रोका, एम.एम. गुरुङ आदि लेखकों को साहित्यिक क्षेत्र में प्रशस्त प्रोत्साहन मिला।

डा. पारसमणि प्रधान ने नेपाली भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए प्रयत्न किया। छात्रों की सुविधा के लिए व्याकरण और साहित्य संबंधी पाठ्यपुस्तकों की रचना की। अंगरेजी नेपाली कोश, नेपाली अंगरेजी कोश और नेपाली कोश भी तैयार किए।

प्रधानजी ने त्रिभुवन पुरस्कार विजेता पाँच पौरखी पुरुष-रत्न, नेपाली साहित्यको साउं अक्षर, नेपाली भाषाको उत्पत्ति र विकास, बटुल-बाटुल, क्वाँटी, टिपन-टापन, भानुभक्त ग्रंथावली जैसे ग्रंथ और जीवनियां लिखीं। वि.सं. 2035 में नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान ने नेपाली भाषा और साहित्य की सेवा के लिए त्रिभुवन प्रज्ञा पुरस्कार प्रदान किया था। डा. पारसमणि प्रधान नेपाली भाषा के अथक उपासक थे। वि.सं. 2032 में त्रिभुवन विश्वविद्यालय ने मानार्थ विद्यामहावारिदि उपाधि भी उन्हें प्रदान की। नेपाली भाषा के लिए उन्होंने तन,मन,धन अर्पण किया।

अंत में हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जिस प्रकार द्विवेदीजी सरस्वती में प्रकाशनार्थ आई हुई रचनाओं का आमूलचूल परिवर्तन कर देते, तब लेखक के नाम के अतिरिक्त सब कुछ बदल जाता। इस प्रकार अपनी रचनाओं की अग्नि-परीक्षा को देख तत्कालीन लेखकों ने शुद्ध लिखना सीखा। उसी प्रकार डा. पारसमणि प्रधान ने नेपाली भाषा की शुद्धता के लिए प्रयत्न किया। क्योंकि सन् 1901 में जो गोर्खे खबर कागत् पत्रिका छपी, उसमें कथ्य भाषा की प्रचुरता थी। वास्तव में इस कथ्य भाषा का प्रयोग ईसाई धर्म के प्रचार के लिए करते थे। अत:  उन्होंने 1920 में नेपाली व्याकरण की रचना की एवं चन्द्रिका पत्रिका के माध्यम से नेपाली भाषा की शुद्धता के लिए प्रयत्न किया। द्विवेदीजी की तरह ही अंतिम क्षम तक नेपाली भाषा और साहित्य की सेवा में लगे रहे।

यों तो प्रत्येक महान व्यक्ति के गुण-दोष की आलोचना होती है, फिर भी ये दोनों अपने-अपने क्षेत्र के महान व्यक्तित्व हैं। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, फिर भी भाषा और साहित्य के प्रति जो उनका महत्वपूर्ण योगदान है, वह चिरस्मरणीय रहेगा।

(चन्द्रिका -1998,अंक 5, गोर्खा जन पुस्तकालय, कर्सियांग, दार्जिलिंग से साभार)

 

यौन शिक्षा:  कब क्यों और कैसे

-सुवास दीपक

हाल के वर्षों में भारत में यौन शिक्षा की आवश्यकता पर चर्चाएं हो रही हैं। इस विषय ने विद्वानों, शिक्षाविदों, अभिभावकों, समाजशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों का ध्यान खींचा है। च्रचें और परिचर्चाएं होती रही हैं लेकिन आजतक कोई सर्वसम्मत समाधान या नीतिगत निर्णय न हो पाना इस विषय की जटिलता को उजागर करता है।

इस विषय पर गंभीर चिंतन करने से पहले यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपने समाज की पड़ताल करें। इस विषय को समग्र भारतीय संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। भौगोलिक रूप से भारत एक अखंड इकाई है परंतु हम एक ऐसे देश के वासी हैं जिसमें विभिन्न संस्कृतियां, विभिन्न जातियां और जनजातियां निवास करती हैं जिनकी मानसिक संरचना उनकी परंपराओं, रीति-रिवाजों, रूढ़ियों और अंधविश्वासों से निर्देशित होती है। एक ही देश में अनेक देश हैं जहां ऐसे समाज हैं जो आज भी मानसिक रूप से आदिम युग में जी रहे हैं। मानसिक संरचना में इक्कीसवीं सदी के उत्तराधुनिक विश्व नागरिक बन जाने के बाद, स्वाधीनता प्राप्ति के छह दशक बीत जाने पर भी बुनियादी तौर पर कोई ठोस परिवर्तन नहीं हो पाया है। हमारा समाज अभी भी सदियों पुरानी मान्यताओं से जकड़ा है। विश्व में तेजी से अपना प्रभाव छोड़ रहे वैश्वीकरण ने हमें नैतिकताओं के टकराव की स्थिति तक पहुंचा दिया है।

पिछली अर्ध शताब्दी में एक ओर चुंधिया देने वाली तरक्की हमारे सामने है लेकिन इस चकाचौंध में देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा गरीबी, शोषण और निरक्षरता के अंधेरों तले जीवन यापन करने को विवश है। देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी हाशिए पर है।  पिछली अर्ध शताब्दी से देश का नेतृत्व जिन लोगों के हाथों में रहा, वे एक ऐसा सामाजिक परिवेश विकसित नहीं कर सके जो देश के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और मानसिक कुंठाओं से मुक्त कर सके। शिक्षा प्रणाली एक राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में पूरी तरह असफल रही है। धर्मनिरपेक्ष, समरूप, आधुनिक विज्ञान व प्रौद्योगिकी से समृद्ध राष्ट्र-राज्य का सपना पाले हमारे राष्ट्रनायकों द्वारा एक समरूप राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण न हो पाने के पीछे भारत की बहुजातीय संरचना और रूढ़िवादी सोच का हाथ है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। भिन्न-भिन्न समुदाय अपनी-अपनी पुरातनपंथी नैतिकताओं के शव ढो रहे हैं।

सामाजिक रूढ़ियों से घिरे हमारे उत्तर-आधुनिक समाज में योन का आतंक चारों ओर फैला है। फिल्मों और चैनलों के सर्वव्यापी प्रभाव से कोई अछूता नहीं है। विरोधाभासों में जीने वाले हम तीव्र गति से बदलते सामाजिक परिदृश्य के ऊपर से पूरी तरह प्रभावित-से लगते हैं लेकिन जहां तक हमारे संस्कारों का प्रश्न है, वे हमें इस विषय पर खुले तौर पर बहस करने की अनुमति नहीं देlते।

हमारा देश आज इक्कीसवीं सदी के संक्रमण काल से गुजर रहा है। मूल्यों और नैतिकताओं के टकराव की चक्की में हम जैसे पिसते चले जा रहे हैं। विचारधाराओं के टकराव, धुर दक्षिणपंथी सोच और मजहबी कट्टरवाद के चलते इस विषय पर किसी सर्वसम्मत निष्कर्ष पर पहुंच पाना तो दूर की बात है, इस विषय पर चर्चा करना तक मुश्किल है। घर से बाहर एक पढ़े-लिखे भारतीय नागरिक में नैतिक वर्जनाओं की सीमा पार करने जैसी स्वच्छंदता आज दिखती है, वही घर के आंगन में पैर रखते ही ऐसे गायब हो जाती है जैसे गधे के सिर से सींग। अब प्रश्न उठता है कि आज के युवाओं को यौन शिक्षा देने की कोई आवश्यकता है?  साइबर कैफे, मोबाइल फोन, टीवी चैनल और इंटरनेट ने सारे भूमंडल को सिकोड़ कर एक छोटे से डिब्बे में कैद कर दिया है। आज जहां हमारे बच्चों के लिए विश्व के हर ज्ञान भंडार के दरवाजे कंप्यूटर के माउस को क्लिक करते ही खुल जाते हैं, वहां उनके लिए घर से बाहर के परिवेश से ज्यादा घर के अंदर का परिवेश ज्यादा असुरक्षित बन जाता है। लेकिन यह सब जानते हुए भी क्या हम खुले तौर पर जिस विषय को चर्चाओं और बहसों में उछालते हैं, क्या उसे अपने बच्चों के सामने उठाने की हिम्मत रखते हैं? जो संस्कार हमारे अंदर गढ़े हैं, उनके बाहर निकलने की पहल कर सकते हैं?

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले विशाल भारतीय समाजों में इस विषय पर सर्वसम्मति या सहमति हो सकना टेढ़ी खीर है। इसी क्षेत्र में दो अति कट्टरवादी और चरमपंथी विचारधाराओं के लोग इसकी अनुमति देंगे? इतना ही नहीं खुद को प्रगतिशील घोषित करने वाले और एक प्रदेश में पिछले तीन दशकों से लगातार शासन करने वाले मार्क्सवादी जब धार्मिक मान्यताओं की बात आती है तो दक्षिणपंथियों से भी आगे निकल जाते हैं। क्या वे इस विषय पर खुली बहस करने पर सहमत होंगे?

भूमंडलीकरण ने हमारे समाज को एक चौराहे पर ला खड़ा कर दिया है, जहां प्राचीन श्रेष्ठ मूल्यों और नैतिकताओं को निरंतर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हमारी सनातनी सोच एक ओर हमें यौन विषयों पर चर्चा करने की अनुमति नहीं देती पर पश्चिमी मूल्यों और वर्जनाहीन मूल्यों की जो एक आंधी सी आ चुकी है, उसने पुरानी नैतिकताओं के किलों को तोड़ कर रख दिया है। हमारा किशोर वर्ग हमारे देश का भविष्य है जिसे समय-सापेक्ष शिक्षा की व्यवस्था के अभाव से उचित दिशा नहीं मिल पा रही है। कुल आबादी का एक दो प्रतिशत अति धनाढ्य वर्ग में आता है और तीव्र गति से उभरते मध्यवर्ग, जिन्हें अच्छी शिक्षा मिलती है और उन्हें अपने भविष्य के निर्माण के लिए अनुकूल अवसर मिल रहे हैं लेकिन आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारा युवा वर्ग दिशाहीन है, उसे सही शिक्षा - एक समग्र शिक्षा जिसमें विभिन्न विषयों के अतिरिक्त शरीर विज्ञान के प्रति उचित समझ विकसित करने के लिए प्राथमिक स्तर पर ही वैज्ञानिक तरीके से पाठ्यक्रम बनने चाहिएं, जिससे बच्चों के समग्र व्यक्तित्व का विकास हो सके। "यौन" या "सेक्स" को लेकर हमारी चेतना में जो नकारात्मक संस्कार भर दिए जाते हैं, उनमें परिवर्तन की आवश्यकता है।

इस विषय पर समग्र भारतीय संदर्भों और जमीनी वास्तविकताओं को समेट कर चलने की आवश्यकता है बल्कि वास्तविकता यह भी है कि समूचा उत्तर भारत आज भी लड़कियों और महिलाओं के अधिकारों के मामले में आदिमकालीन सोच से मुक्त नहीं हो पाया है। यही कारण है कि देश को नेतृत्व देने वाले भी महिला सशक्तिकरण के मामले में बाधा खड़े किए हैं। महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका को हाशिए पर धकेल देने के षड़यंत्र हो रहे हैं। हिंदीभा, क्षेत्र की मानसिकता की तुलना में पर्वतीय समाज, जनजातीय समुदायों में बल्कि उदार दृष्टिकोण रहा है और उनमें महिलाओं के प्रति व्यवहार तुलनात्क रूप से बेहतर है।

इस उत्तर-आधुनिक स्वच्छंदता के युग में भारतीय जनमानस स्त्रियों के प्रति अपनी सोच में जब तक एक मुक्कमिल परिवर्तन नहीं ला सकता तबतक यौन शिक्षा का मेरे विचार में कोई अर्थ नहीं है। शिक्षा को समय-सापेक्ष बनाना होगा।

आत्महत्या के मामले में सिक्किम पूर्वोत्तर में सबसे आगे

                                                                  निर्मल मंगर

नेक क्षेत्रों में अपने बेहतर प्रदर्शन के बलबूते पर देश में नाम कमाने के बावजूद सिक्किम में आत्महत्यों की बढ़ती घटनाएं चिंता की विषय बन रही हैं। इस मामले में सिक्किम पूर्वोत्तर के राज्यों में पहले स्थान पर है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार सिक्किम में आत्महत्या दर 20.7 प्रतिशत है जो पूर्वोत्तर के राज्यों में सबसे ज्यादा है। सिक्किम के बाद इसमें त्रिपुरा का नाम आता हैजहां यह प्रतिशत 20.3 है। असम, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेगालय में यह प्रतिशत 10 प्रतिशत से कम है। मोटे तौर पर देखा जाए तो सिक्किम में हर महीने पांच लोग आत्महत्या करते हैं। इनकी उम्र 40 से कम होती है। सिक्किम अपराध ब्यूरो के तथ्यांकों के अनुसार 2004 में 120, 2005 में 115 और 2006 में 121 लोगों ने सिक्किम में आत्महत्याए कीं। लगभग छह लाख की जनसंख्या वाले इस राज्य में आत्महत्या की यह दर चिंता का विषय बनी हुई है। अपराध ब्यूरो के विश्लेषण के अनुसार 2006 के जुराई से दिसंबर महीनों तक आत्महत्यों की ज्यादा घचनाएं घटी हैं। इस अवधि में 60 लोगों ने आत्महत्याएं कीं। आत्हत्या के मुख्य कारण मानसिक तनाव, अवसाद, पारिवारिक कलह, नशा तथा शराबखोरी, लंबी बीमारियां, परीक्षौं में असफलता, प्रेम संबंधों में दरारें आदि बताए जाते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 35 प्रतिशत मानसिक रोग, 13.33 प्रतिशत पारिवारिक कलह और नसा तथा शराबखोरी, 10 प्रतिशत लंबी बीमारारेयों और पांच प्रतिशत परीक्षाओं में असफलता की श्तिति में लोग आत्महत्या करते हैं। एचआईवी-पोजिटिव की तरह आत्महत्याओं के विषय में पूर्व जिला सबसे आगे है। रिपोर्ट के अनुसार 60 घटनाओं में पूर्व जिले में 27, दक्षिण जिले में 17, पश्चिम और उत्तर में 13 - 13 आत्महत्याओं की घटनाएं हुई हैं। आत्महत्या करने वाले 60 मामलों में 39 पुरुष और बाकी महिलाएं हैं।

सिक्किम विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख ओतोजीत क्षेत्रीमायुम के अनुसार राज्य में भढ़ता आधुनिकिकरण भी आत्महत्या का एक कारण है। बच्चों के प्रति अभिभावकों में भावनात्मक लगाब न होना भी इसका दूसरा कारण हो सकता है। लोगों में चेतना के विस्तार के लिए धार्मिक और शैक्षिक संस्थानों और गैर सरकारी संगठनों को आगे आना चाहिए। स्थानीय एसटीएनएम अस्पताल के स्नायु-मनोवैज्ञानिक डा. सी.एल. प्रधान का कहना है कि नशीले पदार्थों के सेवन से युवा आत्महत्या की ओर ज्यादातर प्रेरित होते हैं।

सबसे